कविता: कालोस्मिऽहम्

गिरिजेश राव

चार ताखों में सिमट गया है
माँ का संसार
देव विग्रह, चित्र, प्रदर्श
सभी वैसे ही हैं जैसे
पिता छोड़ गये थे।

नीचे है एक दिन पहले का समाचार
उस दिन साँझ को पिता ने सजाये थे सब
ऊपर बिछाया था पीला प्लास्टिक।

ज्यों अभी भी हों स्फुल्लिङ्ग भाँति
अगरबत्तियों की राख में
जल गये हैं छिद्र प्लास्टिक में
आग से झाँकते हैं अक्षर काले भूरे
दिखता है सजी चिता पर
झँवराता शरीर, 
दिन भर पहले ही जो थी 'देह'। 

उस दिन कहा था पिता ने हाकर से
न चाहिये अब मुझे समाचार।   

माँ को उस दिन से पहले की स्मृति है
न बचा मन में कुछ उस दिन के पश्चात -
माँ भूलती है।

न रहा घर में कोई समाचार,
न पढ़ने वाला, न सुनाने वाला,
ठहरा संसार।

विचित्र सी लगती है
हर वह बात
निकसे जो माँ के कण्ठ से
भरती निर्वात। 

पहले गाती थी - करने पर मनुहार
अब कह कर गाती है
अचानक ही उतर आये हैं उसकी स्मृति में
जाने कितने पितर, कितने नाम, धाम
हँसते हुये गाती है,
नहीं बचेगा कोई
गाने को मेरे पश्चात
- कर लो रिकॉर्ड।

मैं ढूँढ़ता हूँ अवसाद
उसकी बातों में,
जिनमें तने हों स्मृतियों के बंदनवार
वाद, विवाद, संवाद, अनुहार।

वही पुरानी बातें
दुहराती समझाती
जाने किससे कहती बताती
नित नव रूपों में बार बार।

न होता प्रबोध
सुनता न जो उसकी प्रार्थनायें भोर -
उठा लेना बस ऐसे ही चलते चलाते
जैसे उन्हें ले गये
हे प्रभु !
न बनाना मुझे किसी की आश्रिता।

अचानक हुआ प्रकाश -
वे निज को दुहराती बातें
रह रह बार बार। 

माँ गिनने लगी है उस दिन से
उतरी थी जिस दिन
आँगन में -
नवकी बहुरिया।

वृद्धा गिनती जा रही है
एक एक दिन, एक एक रात
वाद, विवाद, संवाद, अनुहार
आगे बढ़ती, लौटती रह रह
ज्यों कर रही हो रुद्र पाठ
पूरा होगा अभिषेक 
जब पहुँचेगी उस दिन तक
सिधारे थे पिता जिस दिन।

हुआ क्या था उस दिन माँ ?
मुझे पल पल की बताओ 
माँ बताती है निर्वेद
बिन लगाव, बिन विस्तार
ज्यों परजन की हो,
न परिजन की।

पुन: ज्ञान
क्यों ऐसे बताती है - 
न पहुँची है गिनती उसकी
अभी उस दिन तक, 
माँ अभी जियेगी।

लौटते हुये मैंने हाथ जोड़े हैं
बरम से, काली माई से
डीह के गोंसाई से
समाधे के साधू भाई से -
कुछ करो कि माँ 
भूल जाये गिनती।

रोका है माँ ने मुझे चलते हुये
भूल गये थे तुम दिन गिनते हुये
करते हुये दूध का बकाया भुगतान
अभी हमें देना है शेष।

मेरे भीतर उमड़े हैं सागर अशेष -
नहीं माँ, भूलेगी भला मुझे!
इतनी सीधी सी गिनती !!

मुस्कुराई है माँ
साँझ में डूबते
वट झुरमुट से झाँकते
सूरज की भाँति -
मोह में हो जाता है बेटा!

तुम भूल रहे हो -
मुझे गिनती आती है।
चुप लौटा हूँ
उस नीम तले रोने को
अपने अवसाद धोने को
जिसे रोपा था पिता ने,
बची ही कौन छाँव अब
यूँ रोने को?

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