कविताएँ: कुमार गौरव मिश्रा

स्वतंत्र लेखक, प्रधान संपादक एवं संस्थापक: जनकृति पत्रिका एवं विश्वहिंदीजन
ईमेल: kumar.mishra00@gmail.com; संपर्क- +91 880 540 8656

अस्वस्थ

क्या आपको कुछ जलता दिखाई नहीं दे रहा
क्या आपको चीखें सुनाई नहीं दे रहीं
क्या आपको प्रतिरोध शब्द से दिक्कत है
क्या आपको सरकार पर बोलने वालों से नफरत है
क्या आपको देश एक रंग में अच्छा लगता है
क्या आपको बंजर ज़मीन हरी नज़र आती है
क्या आपको भीगी आँखें मुस्कराती नज़र आती हैं
क्या आपको सड़क पर सोते इंसान पत्थर लगते हैं
क्या हरेक विरोध करने वाला आदमी देशद्रोही लगता है
अगर यह सब लगता है
तो फ़िर आप व्यक्ति से भीड़ हो गए हैं
आपका चेहरा खो रहा है
आपका कोई देश नहीं है
आप झाँकिए अपने भीतर
देखिये अपने भीतर मरते इंसान को
देश का क्या है
जब देखना सुनना चालू कर देंगे
देश दुबारा देश बन जाएगा
........................................

सड़कें

सड़कें होती हैं हमारे सच की गवाह
जिसके सीने से चिपटा है मेरा भी अतीत
वे रातें जिन्हें सीने से लगा सिसकता था
वह तपती ज़मीं जिसने पैरों के नीचे छोड़े निशाँ

कितना कुछ बदल देना चाहता था
सपने रोज़ कपड़े बदलते थे
सच नंगेपन की तरह आँखों पर चिपक जाता था
एक काँधे पर छुअन की आस में
रोज़ दबा देता था अपने बिस्तर का गला
रोज़ सुबह बयाँ करता था तकिया रात की दास्ताँ
एक हसरत थी जो कि पहले किरण की साथ पैदा होती थी
और ढलती शाम के साथ सो जाती थी
न जाने अब यह कैसी थकान है, कैसा सफ़र है
अब जो है, जहाँ है, जहाँ छूटा है
उकेर रहा हूँ पन्नों पर
देखोगे तो दिख जाएगा चहरा मेरा...

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