चार कविताएँ: धर्मपाल महेंद्र जैन

धर्मपाल महेंद्र जैन

माँ मैंने देखा

माँ, गोद में धरती भर
आँखों से प्यार की रश्मियाँ और
स्तन से अमृत बरसाती
जब तुम अपने पोरों से बुनती थीं
मुझे बड़ा और बड़ा
दुलराती-बहलाती लोरियों-कथाओं से
उड़ेलती थीं ध्वनि, शब्द
मैंने तुममें देखा था ईश्वर गाते हुए।

तुम्हें पकड़ने में गिरता-उठता था बार-बार
तुम बह जाती थीं हवा-सी
मेरे क़दमों से ज़्यादा
खिलखिला भर देती थीं जीवन
तुम्हारी ऊँगली थामे
जब मैं रख रहा था पहला क़दम
मैंने तुममें देखा था ईश्वर क्रीड़ा रत।

याद है मुझे
तुमने रोपा था अक्षर पट्टी पर
हाथ थाम मेरा तुम चलाती रहीं चाक
चाक-सा
घड़ डाला अक्षर अनाकार-साकार
माँ मैंने देखा था तब
ईश्वर मेरा हाथ पकड़ कर लिख रहे थे।

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उस क्षण 

आकाश, झिलमिलाते तारे
चाँदनी और डैम से उठती पछुआ हवा
प्रिये मैं नहीं था केवल पुरूष
मैं नहीं था अतृप्त वासना
मैं नहीं था कोरा उन्माद
सच, आँखें नहीं थीं दृष्टि सीमित
पर तुम कैसी दिखती थीं नहीं देखा
नहीं जाना
सागर के उत्ताल ज्वार में।

एक आकाश था पारदर्शी, शुभ्र दिशातीत
और मैं था डैने फैलाये
गहराता-तैरता दिग्-दिगंत
न थीं स्वाँस-उच्छवास, धड़कनें
न तुम, न मैं, न हम उस क्षण बचे
उस क्षण मनुष्य घड़ रहा था प्रतिकृति
और गा रही थी पछुआ हवा।

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भर दोपहर 

चितकबरे पर्दे से ढँकी खिड़की
खामोश खड़ी है
आज हवा नहीं आई
साँय-साँय बात करने।

पर्दे से सुनहरी धूप
दबे पाँव आ रही है
मेरी टेबल पर
खिड़की खामोश खड़ी है मातहतों जैसी
मैं खिड़की से बात करना चाहता हूँ
ख़ामोशी तोड़ने के लिए।

उफ़! तवे सी तपन है
क्या हो गया है सूरज को।
पर्दा खिसका देने पर भी
सूरज नज़र नहीं आता
नज़र आता है सिर्फ एक मकान
कवेलू की उबड़-खाबड़ छत
उस पर फैली बेलें
उनमें खिले, पीले तुरई-फूल
जैसे घेरदार घाघरे में
सुस्ता रही वन नर्तकी।

धधकी हुई है धूप
लगता है सूरज फलालेन से रगड़ खाकर
भभक गया है
धूप उस ओटले पर भी है
जहाँ बैठा है एक दिगंबर बच्चा
मिट्टी के रंग-सा
हाँ, काला बच्चा और गोरी धूप
दोनों खेल रहे हैं उस ओटले पर।

यहाँ ऑफिस में लोग
कुर्सीनुमा सलीब पर टंगे हैं
तेज़-दूधिया ट्यूब-लाइट की रोशनी
लगातार घूमते सीलिंग फैन
नाज़ुक-नफीस वातावरण
न मक्खी, न कचरा
न घोसला बुनती चिड़िया।

बाहर, बच्चे लंगड़ खेल रहे हैं
लड़की गोबर थेप रही है
मजदूरनियाँ ईंटें ढो रही हैं
सब्जीवाला फेरी लगा रहा है
और बच्चा मिट्टी खा रहा है।

उफ़! यहाँ कितनी गर्मी है!

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गोधूलि में मेघ 

सतरंगी असीम आकाश में
गड़गड़ करते ढोल इंद्र के
टकटकी बाँध धरती की आँखें बाट जोहतीं
रंभाती गायें धूल उड़ातीं, नाद बजातीं
खलिहानों में,
ऐसे में कैसे रहता मैं ढेर रुई का?

छोड़ जुलाहे की प्रत्यंचा
सागर का सागर भर लाया अपने में
आह्लादित दिग्-दिगंत के
वक्ष पर भरता कुलांच
आत्म रति रत मैं चला पवन संग
कि छू गई वह देह रक्तिम विद्युती
लचलचीली काँप कर।

सिहरन–साहस, भय–अपनापन
क्षण-क्षण बढ़ता उन्मुक्त निमंत्रण
मैं सम्मोहित महाकाश का बादल
इच्छित भर बैठा बाहुपाश में निर्मल काया
कि भड़की वह नृत्यांग
गति-लय-लस, ओजस्व
मैं आवेशित ज्वालादेही गरजा
गूंज उठे मृदंग नभ के श्यामांचल में
मैं बरस पड़ा अणु-अणु
हिमधारा बन कर
विहँसी धरा नद नालों के कलरव से
मेरी इस अठखेली पर!

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