हिंदी लघुकथाओं के आलोक में राष्ट्रीय चेतना

राधेश्याम भारतीय

- राधेश्याम भारतीय

आचार्य डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने राष्ट्रीयता का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है- "प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र का अंश है और इस राष्ट्र की सेवा के लिए, इसको धन-धान्य से समृद्ध बनाने के लिए, इसके प्रत्येक नागरिक को सुखी और सम्पन्न बनाने के लिए, प्रत्येक व्यक्ति को सब प्रकार के त्याग और कष्ट स्वीकार करने चाहिए।"
दूसरे शब्दों में इसे यूँ भी व्यक्त किया जा सकता है कि राष्ट्र-प्रेम से तात्पर्य देशभक्ति में राग के साथ-साथ शौर्य एवं उत्साह का भाव होना, साथ में राष्ट्र पर आएँ संकटों का सामना करना, उसके लिए प्राणों की बाजी लगाना, देश के विकास में ही अपना विकास समझना, देश की प्रकृति से प्रेम होना, धर्म और जाति की संकीर्णता से ऊपर उठकर सर्वजन हिताय की चिंता करना, राष्ट्र-प्रेम को दर्शाता है। यदि देश के किसी भी नागरिक में ये गुण विद्यमान न हों, तो उसे भार समझना चाहिए । उस व्यक्ति के लिए कवि की निम्नलिखित पंक्तियाँ सटीक बैठती हैंः-
जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं।
वह हृदय नहीं पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।।

राष्ट्रप्रेम के संदर्भ में देखें तो हमारे देश का अतीत स्वर्णिम रहा है। इस देशप्रेम को उपन्यासों, कहानियों के साथ-साथ लघुकथाओं में व्यक्त किया जाता रहा है। वैसे तो लघुकथाएँ पौराणिक काल से ही लिखी जाती रही हैं, पर उस समय वे मात्र बोध कथाएँ बनकर ही रह गईं। देश और समाज की पीड़ा, उनसे कोसों दूर थी। पर आज लघुकथाएँ समाज के यथार्थ को लेकर पाठक को चिंतन एव मनन के लिये बाध्य करती हैं। यदि लघुकथाओं में राष्ट्रीय चेतना की बात करें तो अनगिनत लघुकथाएँ देशप्रेम की लौ जगाने में सफल सिद्ध हुई हैं। यहाँ माताएँ ऐसे पुत्र प्राप्ति की कामना करती रही हैं, जो देश के काम आएँ। नारियाँ अपने पति को देश की खातिर युद्ध में जाने से पहले उनकी आरती उतारती थीं। यही परम्परा आज भी अक्षुण्ण है।

प्रेमचंद की लघुकथा ‘वरदान’ देशप्रेम को समर्पित है। जो हर भारतवासी स्त्री को प्रेरित करती है कि हमें अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए ऐसे ही सुपुत्र की कामना करनी चाहिए। इस लघुकथा में एक माँ देवी माँ से ये वरदान माँगती है कि हे माँ! मुझे ऐसा सपूत दे, जो इस मातृभूमि की सेवा कर सके। इसका उपकार कर सके। यदि इस जन्मभूमि पर कोई आँच आए तो अपने प्राण न्योछावर करने से एक पल के लिए भी न सोचे। लघुकथा का सार रूप इस प्रकार है।
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‘माता! मैंने सैंकड़ों व्रत रखे, देवताओं की उपासना की। तीर्थ यात्राएँ कीं, परन्तु मनोरथ पूरा न हुआ। तब तुम्हारी शरण में आयी। तुमने सदा अपने भक्तों की इच्छा पूरी की। क्या मैं तुम्हारे दरबार से निराश हो जाऊँ?’
‘सुवामा! मैं तुमसे बहुत खुश हूँ। माँग क्या माँगती है?’
...... .......
"ऐसा सपुत्र जो अपने देश पर उपकार करे।"
"तेरी बुद्धि धन्य हो। जा, तेरी इच्छा पूरी होगी।"

प्रेमचंद की लघुकथा के साथ-साथ रमेश बतरा की लघुकथा ‘लड़ाई’ में भी ऐसे ही भावों के दर्शन होते हैं। उसमें एक पत्नी अपने पति के देश पर शहीद होने पर खुद को गौरवान्वित महसूस करती है।

बहू ने कमरे का दरवाजा ठीक उसी तरह बंद किया जैसे हमेशा उसका ‘फौजी’ किया करता था। वह मुड़ी तो उसकी आँखें भीगी हुई थीं। उसने सज-संवरकर पलंग पर रखी बंदूक उठाई। फिर लेट गई और बंदूक को बगल में लिटाकर उसे चूमते-चूमते सो गई।

रमेश बतरा की लघुकथा में तो पत्नी अपने पति की शहादत पर गर्व करती है लेकिन डॉ. सतोष गौड़ की लघुकथा ‘मेरा देश’ में तो एक प्रेमिका ही अपने प्रेमी से स्वाधीनता संग्राम में जाने को बाध्य करती है।

... आशा ने अपने होने वाले पति विक्रम को स्वाधीनता संग्राम में जाने की हामी भरवा ली। विक्रम के पिता बड़े प्रसन्न हुए तथा दूसरे दिन अश्रुपूरित नेत्रों से उन्होंने विदा किया। उस समय आशा भी आई और आरती उतार कर कहा, "मेरे विक्रम सदैव ध्यान रखना, मैं तुम्हारी हूँ, तुम्हारी ही रहूँगी, हाँ, हम सब के लिए सबसे पहले है हमारा देश।

डॉ. पूरन सिंह की लघुकथा ‘मैं माँ हूँ’ में भी देशप्रेम की मिसाल जलती दिखाई देती है जिससे दूसरे भी उससे प्रकाश पाते हैं। इसमें एक माँ दूसरी माँ (भारत माँ) की रक्षा के बारे में सोचती है और अपने पुत्र को उसकी रक्षा हेतु सीमा पर भेजती है।

अयोध्याप्रसाद गोयलीय का अधिकतर कार्य लघुकथा पर रहा। इनकी रचनाएँ राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत मिलती है। उनकी लघुकथा ‘शहीद बकरी’ हमें प्रेरित करती है कि न तो अन्याय करो और न ही अन्याय सहो, क्योंकि अन्याय सहने वाला भी उतना ही दोषी होता है, जितना करने वाला। यह लघुकथा यह भी संदेश देती है कि हम जब तक डरते हैं, शोषक हमें डरा कर रखते हैं। मृत्यु निश्चित है इसलिए मृत्यु से क्या डरना। जब देश-धर्म पर मरने की बात हो तो फिर सोचने की कोई बात ही नहीं, यही निश्चय कर जब बकरी भेड़िये से टकराई तो उसने भेड़िये को चारों खाने चित्त कर दिया। बकरी मर जरूर गई। पर, भेड़िये को भी दूसरों पर अत्याचार करने को नहीं छोड़ गई।

अयोध्याप्रसाद गोयलीय की लघुकथा पढ़ने के बाद जब हबीब कैफी की लघुकथा‘ कवि के गीत’ पढ़ते हैं तो वहाँ भी कवि अन्याय के विरूद्ध आम जनता को उठ खड़ा होने को प्रेरित करता मिलता है। वह राजदबरबारों का स्तुतिगान गाने वाला न था बल्कि राजा के अन्याय को अपनी कविता के माध्यम तक दरबार में पहुँचाने वाला था। और ऐसे कामों की सजा मिलती है मौत। राजा आखिर राजा होता है लेकिन राजा यह भूल जाता है कि कवि भी कवि होते हैं। उनकी कलम विद्रोह की ऐसी आग जला जाते हैं कि राजा भी सोचने को मजबूर हो जाते हैं। जो सेना अधिकारी पद के लालच में आकर कवि को राजद्रोह के अपराध में फंसाकर राजा के सम्मुख ले आता है और उसके बदले उपसेनापति का पद भी पा लेता है लेकिन कवि को मौत के घाट उतारने के बाद भी उसके कानों में कवि के गीत गूंजते हैं और कमाल तब होता है जब दूर अपने घर आया वह फटी-फटी आंखों से देखता है कि नाजों पली उसकी इकलौती बेटी दर्द-भरी आवाज में कवि का गीत गा रही है।

लघुकथा के सशक्त हस्ताक्षर बलराम अग्रवाल के लघुकथा संग्रह ‘जुबेदा’ और ‘पीले पंखों वाली तितलियाँ’ का अध्ययन करने पर पाते हैं कि अनेक लघुकथाएँ राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत हैं। इसी विषय पर उनकी लघुकथा ‘खोई हुई ताकत’ जिसमें लेखक ने स्पष्ट कर दिया है कि हमारे सोचने के दायरे अलग-अलग हैं। देश से सच्चा प्रेम करने वाला व्यक्ति हर वक्त देश हित में ही सोचेगा। उम्र का उस पर कोई असर नहीं होता। लघुकथा में मुख्य पात्र मसूद मियाँ को लिया गया है। जो मुसलमान है। लेखक ने पात्र का चयन करते समय यह बात ध्यान रखी है कि इस देश की आजादी में मुसलमानों का योगदान कम नहीं है। उनके बलिदानों की लम्बी गाथा है, इसीलिए जब वे देश के बदतर हालात देखते हैं, उनके हृदय में एक हूक-सी उठती है।

..."वह फिर बुदबुदाये, "किशोरावस्था में ही मैं आजादी की जंग में कूद पड़ा था - इसे आप कम उम्र में किया गया मेरा पहला कुटेव मान सकते हैं। आजादी के बाद सत्ता सुख लूटने की बजाय मैं कुँवारा रहा और खंडित मूल्यों की पुनःस्थापना में जुट गया। यह जवानी की भूल थी। अब बुढ़ापे में मुझे लगता है कि गुलामी अभी गई नहीं है। आपका शर्तिया इलाज अगर वही जवानी, वही उमंग इन रगों में भर दे तो मैं एक फिर से आजादी की लडाई में कूद पड़ना चाहता हूँ, डॉ. साहब... यकीन माने।

इनके अतिरिक्त ‘अलाव के इर्द-गिर्द’, ‘गुलमोहर’, ‘कश्मीर समस्या’, ‘नयी पौध’, ‘सुबह का इंतजार’ भी देशप्रेम के भाव जगाने में सफल सिद्ध होती हैं।

एन उन्नी की लघुकथा ‘कबूतरों से भी खतरा’ में वैसे तो कबूतर शांति के प्रतीक माने गए हैं, पर उनके मन में भी आजादी की तीव्र इच्छा होती है। उस आजादी के लिए वे भी बगावत करने पर उतर आते हैं। लघुकथा में स्पष्ट कर दिया कि उस दिन के बाद तो उनके अन्दर आजादी की प्रबल इच्छा जाग उठी जब एक कबूतर खुले आसमान में उड़ आया। उसने आजादी के महत्व को समझा। वह अन्य साथियों को भी उस आजादी का आनन्द लेने को प्रेरित करने लगा। मानो उन्हें संघर्ष का पाठ पढ़ा रहा हो और प्रतीकात्मक रूप से लिखी लघुकथा के अन्त में उसका क्या परिणाम हुआ देखिएः-

... मुझे लगा कि पिताजी कबूतरों से भी भयभीत हो उठे हैं। रात को दो-तीन बार पिताजी बिस्तर छोड़कर बाहर चले गए थे। दूसरे दिन सुबह होते ही पिताजी ने पिंजरा खोला और सभी कबूतरों को आकाश में उड़ा दिया। इस पर मैंने पिताजी से पूछा, "आपने यह क्या किया पिताजी? आपने कबूतरों को उड़ा दिया?’

पिताजी ने बोझिल स्वर में कहा, "बेटे, जब प्रजा आजादी की तीव्र इच्छा से जाग उठती है तो बड़े से बड़ा तानाशाह भी घुटने टेकने को मजबूर हो जाता है। फिर तुम्हारे पिता तो...’

एन उन्नी की लघुकथा ‘सर्कस’ भी ऐसे ही संघर्ष करने की प्ररेणा देती है। और भगीरथ परिहार की लघुकथा ‘स्पार्टाकस का जन्म’ को देखें तो भगीरथ जी की लघुकथा भी गुलामों की पीड़ा का बड़ा ही मार्मिक चित्र खींचती है। वह भी आजादी के लिए संघर्ष करने की प्रेरणा देती है। संघर्ष करते समय वैसे तो जीवन दाँव पर लगाना पड़ता है पर एक समय ऐसा भी आता है जब खुशियाँ प्रदान कर जाता है। सैकड़ों स्त्री-पुरूष गुलाम बाजार में बेचे जा रहे थे। बात-बात में झिड़कियाँ, गालियाँ, अपमान और कोड़े, फिर भी हजारों गुलाम पैदा हो रहे थे। गुलाम विद्रोह कर उठते हैं। नायक गुलामों की ताकत को इकट्ठा करता है, ये मालिक लोग हमारी बदतर जिन्दगी के लिए जिम्मेदार हैं। मालिको का कत्लेआम, गुलामों का कत्लेआम। रोमाँचित करने वाले दृश्य। मुझे लगा, गुलामों की जिन्दगी में कुछ क्षण सुन्दर होते हैं। अन्तिम दृश्य में नायक का बच्चा दौड़ते-दौड़ते बड़ा होता है और उसके पीछे सैकड़ो गुलाम बच्चे दौड़ते हैं हथियारों से लैस। मेरा मन हल्का हो जाता है।


विष्णु प्रभाकर की लघुकथा ‘मुक्ति; राष्ट्रीय चेतना की एक सशक्त लघुकथा जान पड़ती है। लघुकथा ‘पराधीन सपनेहु सुख नाहि’ वाली लोकोक्ति को स्वयं सिद्ध करती है। लघुकथा में नीग्रो मालिक-जाति के शोषण से छुटकारा पाकर काम की खोज में रहता है।दुर्भाग्य, उसे कहीं काम नहीं मिला तो अंत में मालिक के सामने था। मालिक सहानुभूति दर्शाते हुए बोला, "तब तो यह मुक्ति तुम्हें महंगी पड़ी। तुम लोग पहले ही अच्छे थे।"

न जाने उसे क्या हुआ, न जाने उस कंकाल में कहाँ से जीवन उमड़ आया। उसकी आँखों से प्रसन्नता की एक तेज रोशनी चमकने लगी थी। दरवाजे पर आकर वह क्षण भर के लिए रुका, बोला, "जी नहीं! तब हम दास थे, अब मुक्त हैं अपना जीवन बनाने और बिगाड़ने के लिए मुक्त है। मुक्ति इन्सान के जीवन की शर्त है।"


किसी भी राष्ट्र के नागरिक युद्ध नहीं चाहते। वे सदैव शांति की अभिलाषा रखते हैं, परन्तु राजनीतिज्ञ लोग अपना उल्लू सीधा करने के लिए अनावश्यक युद्ध जनता पर थोप देते हैं; शांति भंग हो जाती है। लाखों करोड़ों का नुकसान हो जाता है। जगदीश कश्यप की ‘युद्ध का गणित’ भी ऐसी ही सटीक लघुकथा है।

दो देशों के बीच लड़ाई पूरे जोरों पर चल रही थी। अचानक युद्ध विराम की घोषणा हुई। दोनों देशों के जवान सीमा में आमने-सामने थे, लेकिन अब उनका रूप अक्रामक न होकर स्तब्धकारी था। इधर ये दोनों जवान भाई-चारा निभा रहे थे, उधर दोनों देशों के रेड़ियो पर यह खबर अपने-अपने ढंग से प्रसारित कर रहे थे-अस्थायी युद्ध विराम भंग। वार्ता असफल। देश की जनता अन्त तक दुश्मनों का मुकाबला करेगी।
गुरमीत सिंह की लघुकथा ‘युद्ध और पुण्य’ में शहीद का वृद्ध पिता भी युद्ध को किसी समस्या का हल नहीं मानता।

वृद्ध ने कहा, “मेरा एक मात्र पुत्र युद्ध में शहीद हो चुका है। मेरी तरह ना जाने कितने लोगों के एक मात्र पुत्र सेना में है, क्या उनका सहारा नहीं खो जाएगा। मैं इस निर्जन मरूस्थल में पानी पिलाने का कर्म इसलिए करता हूँ, शायद इस थोड़े से पुण्य से युद्ध ना हो, किसी का सहारा ना खो जाए।" वृद्ध व्यक्ति की आँखें नम हो गईं।

स्वदेश प्रेम का भाव सर्वश्रेष्ठ भाव माना गया है। जिस व्यक्ति में ऐसी भावना होगी तो वह अपने देश की हर वस्तु से प्रेम करेंगा। विदेशी वस्तुओं को पास भी फटकने नहीं देगा। सूरज फोगाट ने अपनी लघुकथा ‘हथियार’ में यही स्पष्ट किया है। लघुकथा में नारी पात्र यही सोचते हुए केवल अपने देश के उत्पादन ही खरीदना चाहती है। ऐसा करने से उसके अन्दर की राष्ट्र-भक्ति के दर्शन होते हैं।

युद्ध में जितना महत्व लड़ने वाले का है उतना ही महत्व जय बोलने वालों का भी होता है। देशभक्ति जहाँ देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले सैनिकों में दिखाई देती है वैसी ही देशभक्ति उन नागरिकों में देखी जा सकती हैं जो देश के अन्दर रहकर देश के संसाधनों की सुरक्षा करते हैं। पंकज शर्मा की लघुकथा ‘देशभक्ति’ देश के नागरिकों को देश-हित में कार्य करने को प्रेरणा देती है।

यदि हम बात करें इन्दु गुप्ता की लघुकथा ‘देश की माटी’ तो लेखिका भी पाठकों तो यह भाव संप्रेषित करने में सफल होती है कि अपने वतन की माटी में एक अलौकिक शक्ति होती है, जो सात समुन्द्र पार गए प्रवासी को भी अपने मोह में बांधे रखती है।पात्र अपने साथ अपने देश की सौंधी गंध से महकती माटी को ले जाता है।

नरेन्द्र कुमार गौड़ की लघुकथा ‘टांगों का दुख’ ऐसे ही देशभक्त सैनिक, जो युद्ध-भूमि में अपनी टांगें गंवा बैठा है का मनोविश्लेषण करती है। वह अपने दुख-सुख को देश के साथ जोड़ लेता है। लघुकथा ऐसे ही सैनिक की महिमा का बखान करती है।

रोहित यादव की लघुकथा ‘लाठियाँ’ हमारा ध्यान आकर्षित करती है, और उन शहीदों की याद दिलाती है जिन्होंने देश पर अपने प्राण न्यौछावर किए। लघुकथा अपने अन्दर पूरा इतिहास समेटे हुए है।

आकाश में उड़ते पंछी से पूछो खुले आकाश में उड़ने का आनंद क्या है। परम सुख का अनुभव होता है। उन्हें अपने पंखों पर गर्व होता है। जीवन का लक्ष्य पूर्ण हो जाता है। यहीं बातें मानव पर भी लागू होती हैं। आजादी का सुख केन्द्र में रखकर रतन चंद ‘रत्नेश’ की लघुकथा ‘आजादी’ उसी ओर संकेत करती है।

पिता ने आकाश की ओर इशारा कर बताया, "वह देखो, पक्षी आकाश में उड़ रहे हैं। स्वच्छंद, निर्भय, अब यदि इन्हें पकड़कर कोई पिंजड़े में डाल दे तो इनकी आजादी छिन जायेगी।"

इसी से प्रेरित हो बच्चे ने एक दूकान पर एक पिंजड़े में बंद तोते का दरवाजा खोल दिया। तोता फुर्र से उड़ गया।

आतंकवादी अपने मनसूबों में तभी कामयाब होते हैं। जब हम धर्म, जाति, क्षेत्र के नाम पर बंटे होते हैं। वे इसी भेदभाव का लाभ उठाते हैं। यदि हम सब एक हो तो किसी की हिम्मत नहीं कि दुश्मन हम पर वार कर सके। हमें ऐसे समय में एक हो जाने का संदेश देती है, महेन्द्र सिंह महलान की लघुकथा ‘एक ही रास्ता’।

पारस दासोत की लघुकथाएँ भावप्रधान होती हैं। वे मानवेतर प्राणियों का सहारा लेकर लघुकथाओं की रचना करते हैं। राष्ट्रीय चेतना से ओतप्रोत रचनाएँ देश प्रेम को जागृत करती हैं। आजादी के महत्व को प्रतिपादित करती उनकी लघुकथा ‘पन्द्रह अगस्त’ ऐसे ही भाव पैदा करती है। इसके साथ-साथ दूसरी लघुकथा ‘माटी का खेल’ भी देश की माटी के सम्मोहन को व्यक्त करती है।

इसके विपरीत देश प्रेम का ढोंग दिखाने वालों को अमरीक सिंह दीप ने अपनी लघुकथा ‘देश-प्रेम’ में लताड़ा है। उन्होंने बताना चाहा है कि देश-प्रेम दिखाने की नहीं बल्कि अनुभव करने की चीज है।

जितेन्द्र सूद की लघुकथा ‘वादा’ में राष्ट्र के प्रति कर्तव्य को निर्वाह करते हुए उनके सामने वे दृश्य सजीव हो उठते हैं कि सैनिक पात्रों को भूलना पड़ता है कि जो दुश्मन उनके सामने है। मारने लायक हैं पर वे उसको मारने की बजाय उसे छोड़ देते हैं । क्योंकि वह मरने से पहले अपनी बेटी की तस्वीर देखता है और उससे वादा करके आया था कि वह वापिस आयेगा। ऐसा करने से उन्हें भी अपने बच्चों की याद आ जाती है।

अतिथि देवो भवः भारतीय संस्कृति का अंग है । देश में अनेक आंतरिक समस्याएँ होने के बावजूद वे विदेशियों के सामने अपनी ईमानदारी की मिसाल पेश करते हैं। ऐसा ही संदेश मुकेश शर्मा ने अपनी लघुकथा ‘देश के नाम पर’ में दिया है।

राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत एक दिव्यांग को केन्द्र में रखकर शील कौशिक ने लघुकथा ‘विकलांग’ की रचना की है जिसमें एक दिव्यांग राष्टगान के दौरान बैसाखियों के सहारे खड़े होकर अपने राष्ट्र के प्रति सम्मान पदर्शित करता है।

रमेश बतरा की एक अन्य लघुकथा ‘सिर्फ हिन्दुस्तान’ में’ भी देशप्रेम के दर्शन होते है। विदेशों में जहाँ लोग अपने आप में ही खोए रहते हैं वही भारतीय अलग-अलग होने पर भी एक होने का प्रमाण देते हैं। लघुकथा में पाश्चात्य संस्कृति और भारतीय संस्कृतियों की तुलना करने पर हम भारतीय संस्कृति को कहीं अघिक श्रेष्ठ पाते हैं।
लोग विदेशों में जाकर अपने देश को छोटा समझने लगते हें यह उनकी यह गलती क्षमा करने लायक नहीं होती। एक सच्चा देशवासी कभी भी अपने देश को कमतर नहीं आंकता। यदि देश में कुछ समस्याएँ हैं तो उनका समाधान करना हर देशवासी का कर्तव्य बनता है। ऐसे ही भाव रामकुमार आत्रेय की लघुकथा‘शर्म की बात’ में देखने को मिलते हैं। ‘ मतलब यह कि भारत एक सुन्दर देश है। अन्य कुछ देशों से ज्यादा ही सुन्दर और सम्पन्न। परन्तु यहाँ रहने वाले लोग यदि बेईमान हैं और सब ओर गन्दगी फैलाए रखते हैं तो इसमें भारत का क्या दोष? भारत खुद तो सफाई करने आयेगा नहीं। हर बुराई का दोष देश के सिर मढ़ने की आदत जब तक हम नहीं छोड़ पायेंगे तब तक यहाँ भ्रष्टाचार और गन्दगी का बोलबाला बना रहेगा। आपको यदि वहाँ शर्म महसूस हो रही थी तो भारतीय होने पर नहीं, बल्कि खुद के भ्रष्ट और गन्दगी प्रिय होने पर महसूस होनी चाहिए थी।’

चैधरी साहब के चेहरे का रंग अचानक बदल गया था। और उसी से मिलते जुलते भावों को अपने अन्दर समेटे अरूण कुमार की लघुकथा ‘शर्त’ में देखने को मिलते हैं।


मिथलेश कुमारी मिश्रा अपनी लघुकथा ‘तिरंगा’ मे एक माँ के कड़े संघर्ष के बाद से बेटा के आई. ए. एस बनने पर उसे एक तिरंगा खरीदकर देती है ताकि उस समय की अधूरी अभिलाषा अब पूरी की जाए। इससे यही सिद्ध होता है कि उनके दिल में अपने राष्ट्र के प्रति कृतज्ञता प्रकट करती है।

संविधान किसी भी देश की आत्मा होती है। और उस आत्मा का सम्मान करना हम सब दायित्व बनता है लेकिन राजनीतिज्ञों की बिगडैल औलाद कानून को कानून नहीं समझते। लेकिन मधुकांत की लघुकथा ‘मंत्रीपुत्र’ में एक ऐसे सकारात्मक सोच के राजनीतिज्ञ हैं जो अपनी बिगडैल औलाद को उसके किये की सजा दिलाकर देश के लोकतंत्र में सच्ची आस्था दर्शाते हैं। ऐसे ही भाव से ओतप्रोत है रामकुमार घोटड़ की लघुकथा ‘नियमानुसार’।
शोभा रस्तोगी की लघुकथा ‘पुनः भगतसिंह’ में बेटा जब पिता की तरह देशभक्ति की राह पर चल पड़ता है तो माँ घबरा उठती है भगतसिंह की माँ की तरह। वह अपने सैनिक पति की तरह अपने बेटे को खोना नहीं चाहती इसलिए सेना में जाने से रोकना चाहती है। लेकिन बेटा अपनी माँ से बढ़कर भारतमाता को मानता है । माँ को अपने सामने अपना बेटा नही मानो भगतसिंह खड़ा दिखाई देता है। लघुकथा यही भाव पैदा करती है कि हमें देशभक्तों की तरह अपने देश के सर्वस्व न्यौछावर कर देना चाहिए।

विष्णु प्रभाकर की लघुकथा ‘खद्दर की धोती’ में ऐसी राष्ट्रीयता के दर्शन होते हैं।

चित्रा मुद्गल की लघुकथाएँ अपने कथ्य को बड़ी ही सादगी से पेश करती हुई आगे बढ़ती है। चित्रा मुद्गल मुख्यतः कथाकार है; पर, उनकी लघुकथाएँ लघुकथाकारों को सीख देती है। उनकी लघुकथाओं में सामाजिकता के साथ राष्ट्रीय भावना के भी दर्शन होते हैं। उनकी लघुकथा ‘सेवा 17' देश को समर्पित है।

रत्नकुमार सांभरिया की ‘कैद’ में पिंजरे और टहनी के माध्यम से आजादी की परिभाषा समझ में आ जाती है। एक तोते को पिंजरे सहित बिकता देख, पेड़ की टहनी पर बैठे दूसरे तोते से व्यंग्य से कहा, "भैया, बड़े भाग्यशाली हो, दाना-पानी सदैव तुम्हारे पास रहता है और जहाँ जाते हो, अपना घर साथ रखते हो।"
पिंजरे में बैठा तोता क्षोभ से सुलग उठा, "तुम मेरी इन सुख-सुविधाओं को टहनी पर बैठने के दुर्भाग्य से बदल लो।"

टहनी पर बैठे तोते ने प्रत्युत्तर में गर्दन हिलाई और झट उड़ गया।

‘शहीद की माँ’ लघुकथा प्रताप सिंह सोढ़ी द्वारा रचित एक ऐसी लघुकथा जो माँ अपने बेटे को देश की आजादी के लिए तैयार करती है। और बेटा भी देश पर शहीद हो जाता है। उस माँ के आंसू बेटे के शहीद होने पर नहीं निकलते, वे तब बेकाबू हो जाते जब वह देश की दुर्दशा देखती है। ये लघुकथाएँ

शहीद की माँ ने धोती के आँचल में आँसुओं को समेटा और उत्तर दिया, "तब देश को आजाद कराने का जुनून और जज्बा था, जिसके लिए शहादत की जरूरत थी, त्याग और हौंसले की जरूरत थी, आँसुओं और बुजदिली की नहीं। आज जो मेरी आँखों में आँसू समाये हैं, वे देश की दुर्दशा की उपज है।"

ऐसा ही उद्देश्य संतोष सुपेकर की लघुकथा ‘सम्मानीय पागल’ में चित्रित किया गया है। श्यामनंदन शास्त्री की लघुकथा ‘देशभक्त’ में ऐसे ही देशभक्तों पर प्रकाश डालती है।

राधेश्याम भारतीय की लघुकथाएँ ‘नमक’ तथा ‘साहस की जिंदगी’ में राष्टीय चेतना के भाव देखे जा सकते हैं।

यह देश हम सब का है। इसकी रक्षा करना हम सब दायित्व बनता है। डॉ लीला मोदी की लघुकथा ‘वसीयत’ में मुख्य पात्र देश को एकजुट बनाए रखने के लिए प्रयासरत रहता है। वह किसी भी कीमत पर उसके टुकड़े नहीं होने देना चाहता । वह एक पत्र देश के नौजवानों के नाम लिखता है, “मेरे प्यारे बच्चो, रिश्तेदारो और, देशवासियो, पहले तो हमारी अचल संपत्ति बहुत विशाल थी। माँ भोली थी। उसका बंटवारा होता चला गया है। साम-दाम -दंड-भेद से लोग हमें लूटते रहे हैं। पड़ौसी घुसपैठ करते रहे। अब माँ के मानचित्र का मान रखना। अब इसकी रक्षा का भार तुम्हारे कंधों पर है। इसे और मत बंटने देना। सब मिलकर सुरक्षा करना।"

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