अर्वाचीन संस्कृत कविताओं में महात्मा गाँधी

अरुण कुमार निषाद 
डॉ.अरुण कुमार निषाद
असिस्टेण्ट प्रोफेसर (संस्कृत विभाग)
मदर टेरेसा महिला महाविद्यालय,
कटकाखानपुर, द्वारिकागंज, सुल्तानपुर

शोधसार  
संस्कृत साहित्य में प्राचीनकाल से ही सत्पुरुषों के चरित्र पर अनेकों ग्रन्थों की रचना हुई है। आधुनिक संस्कृत साहित्य में तो इसकी एक दीर्घ परम्परा मिलती है। जिसमें रचनाकारों ने इन सत्पुरुषों को अपनी रचना का नायक बनाया है। इस परम्परा के प्रवर्तक महाकवि अश्वघोष माने जाते हैं। जिन्होंने भगवान बुद्ध के जीवन-चरित पर ‘बुद्धचरितम्’ नामक महाकाव्य की रचना की। भारत को आजादी दिलाने में जिन महापुरुषों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया उनमें मोहनदास करमचन्द गाँधी का स्थान अग्रगण्य है। जिन्हें राष्ट्र बापू, महात्मा, राष्ट्रपिता आदि नामों से बुलाता है। महात्मा गाँधी के चरित्र पर आधुनिक संस्कृत के बहुत सारे विद्वानों के रचनाएँ की हैं। कुछ प्रमुख रचनाकार और उनकी रचनाएँ इस प्रकार हैं-

की वर्ड : संस्कृत साहित्य, अर्वाचीन काव्य, महात्मा गाँधी।
आधुनिक संस्कृत का अवलोकन करने पर यह विदित होता है कि- गाँधी जी पर लिखिल ग्रन्थों की संख्या सौ से अधिक है और अगर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं की बात करें तो यह संख्या असंख्य है। इस विषय में प्रो.राधा वल्लभ त्रिपाठी का कथन है – “बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में राष्ट्रीयता की भावना का अभूतपूर्व उन्मेष हुआ, विशेषत: महात्मा गाँधी के सत्याग्रह आन्दोलन तथा उनके जीवन दर्शन ने सारे देश को प्रेरणा के सूत्र में बांध दिया। इस काल का संस्कृत साहित्य इस युग निर्माता महापुरुष के चरित्र और सन्देश से अत्यधिक प्रभावित हुआ तथा उसे केन्द्र में रखकर स्वाधीनता संग्राम पर अनेक संस्कृत काव्य लिखे गये। स्वयं गाँधी जी के जीवन को लेकर लिखे गये खण्डकाव्यों या मुक्तककाव्यों की संख्या सैकड़ों में है।”[1]   

पण्डिता क्षमाराव ने महात्मा गाँधी के जीवन-चरित्र पर 54 अध्यायों का ‘स्वराज्यविजय:’ नामक एक काव्य लिखा है कि- महात्मा गाँधी को हिन्दुस्तान-पाकिस्तान बँटवारे का बहुत कष्ट था। उन्होंने इसके बँटवारे के समय का था- मेरे प्रिय देशवासियों! चाहे मेरे शरीर के हजार टुकड़े हो जाएँ, पर इस जन्मभूमि के टुकड़े न हों। कारण था कि- जिस व्यक्ति ने देश के लिए सब कुछ त्याग दिया, वह  देश को टुकड़ों में बँटते कैसे देखता, पर कुर्सी के लोभी लोगों ने उनकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और अन्त में हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का बँटवारा होकर ही रहा। इस बँटवारे के दुष्परिणाम आज भी दोनों देशों को झेलने पड़ रहे हैं।
अयि भो बान्धवा मा मा भैष्टास्मिन् प्रस्तुते मनाक्।
प्राणेभ्योऽपि हि मे प्रेयान् मातृभूमे: सुखोदय:।।
खण्डनं स्वशरीर करिष्येऽहं सहस्रश:।
न तु स्वप्नेऽपि विच्छेदं चिन्तयिष्ये जनुर्भुव:।।[2]

ब्रह्मानन्द शुक्ल ने अपने ‘श्रीगान्धिचरितम्’ काव्य में गाँधी जी के सत्य-अहिंसा मार्ग द्वारा देश को स्वतन्त्र कराने का वर्णन किया है। गाँधी जी ने सदैव सत्य और अहिंसा के मार्ग को अपनाया। देश को स्वतन्त्र कराने के लिए उन्होंने इसी रास्ते को चुना। उनके इस कार्य के कारण आजादी के दीवानों के दो गुट हो गये थे –एक गरम दल और दूसरा नरम दल।
अहिंसया सत्यबलेन चैव
कार्याण्यसाध्यान्यपि यान्ति सिद्धिम्।
इत्थं व्रतं यस्य सदा समृद्धं
जयत्यसौ मोहनदासगान्धी।।[3]

‘गान्धिगौरवम्’ में रमेशचन्द्र शुक्ल लिखते हैं कि- अंग्रेजों ने महात्मा गाँधी को अनेकों बार जेल में बन्द किया, बहुत सारी यातनाएँ दी, पर वे अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए और उन्होंने देश से अंग्रेजों को भगा कर ही दम लिया। 
मनीषिणं तं जगदेकबन्धुं कारालयस्थं विदधु: सिताङ्गा:।
मुहुर्मुहुर्भारतभूविभूतिं साध्यात् परं नो विमुखोऽभवत् स:।।[4]

यज्ञेश्वर शास्त्री ने अपने काव्य ‘राष्ट्ररत्नम्’ में गाँधी, नेहरु जैसे स्वतन्त्रता सेनानियों को अपने काव्य का नायक बनाया है। उनके द्वारा महात्मा गाँधी पर लिखित कविता इस प्रकार है। लँगोट धारण करने वाला, दुबले-पतले शरीर वाला, हाथ में डण्डा लिए हुए, घुटने तक खादी के वस्त्रों से ढका हुआ वह भारत की प्रतिमूर्ति था।  
कौपीनधारी कृशदेहबन्धो
हस्ते समालम्बितलम्बदण्ड:।
आजानु-खादी-पट-वेष्टितश्च
स भारतश्च प्रतिभूतिरासीत्।।[5]

के.एल. व्यासराज शास्त्री ने ‘महात्मविजय:’ काव्य में लिखा है कि– गोली मारे जाने पर गाँधी ने हे राम! हे राम! कहते हुए अपना यह नश्वर शरीर छोड़ दिया। और धरती माता से यह प्रार्थना की कि- जब भी मनुष्य रूप में मेरा जन्म हो इसी भारत भूमि पर हो।
त्वय्यम्ब भूयो मम जन्म भूया-
दितीव घात्रीमुपगूहमान:।
श्रीरामरामेति गिरन् विशोक:
शोकाम्बुधौ लोकममज्जयत् स:।।[6]

जयराम व्यंकटेश पल्लेवार ‘जयेश’ अपने ‘मोहन-मञ्जरी’ में लिखते हैं कि- महात्मा गाँधी अपने शरीर पर आधे वस्त्र ही धारण करते थे। उनका शरीर सोने की तरह चमकता रहता था। उनके नाम में मोहन शब्द जुड़ा हुआ था, इसलिए वे जिससे भी मिलते उसे मोह लेते थे।
अर्धाम्बररत्वेन निवेदितं वपु:
सन्धार्य निष्काञ्चनलाक्षिकं ननु।
यातो यदा वर्तुलसन्निवेशकम्
मुमोह सभ्यान् कृतनाममोहन:।।[7]

मधुकर शास्त्री ने ‘गान्धिगाथा’ में गाँधी जी के बाल्यकाल, शिक्षा-दीक्षा, जीवन की विविध घटनायें, गान्धी पर अन्य मनीषियों के प्रभाव, विदेश-यात्रा, दक्षिण-अफ्रीका-गमन-आगमन, स्वतंत्रता-आन्दोलन में गाँधी जी की भूमिका आदि पर प्रकाश डाला है।      
अनुबन्धानेकादश गान्धी न्यदधाद् राज्यसमक्षं
तद्स्वीकृतवानान्दोलनमुद्घोषितवान् प्रत्यक्षम्।
लवण-नियम-समतिक्रमणेऽस्याऽभवन्निश्चयो गाढं
डाँडीयात्राकृत मनुष्यै: षट्सप्ततिना सार्धम्।।[8]       

‘राष्ट्रसभापतिगौरवम्’ काव्य में श्री लक्ष्मी नारायण लिखते हैं कि- देश को स्वतन्त्र कराने के लिए गाँधी जी ने तीन सिद्धान्त बनाए- खादी, संस्कृत भाषा का महत्त्व तथा विश्व शान्ति की उपस्थापना।
सत्याहिंसासत्त्वबोधस्त्रिवेणेश्चक्रं धृत्वा भारते या पताका।
स्वातन्त्र्यं या स्वाश्रितेभ्यो ददाना सर्वोत्कृष्टा राजते भूतलेऽस्मिन्।।[9]

 इस प्रकार हम देखते हैं कि- संस्कृत के कवियों ने महात्मा गाँधी के जीवन चरित्र को अपनी रचनाओं में बहुत ही सुन्दर ढंग से वर्णित किया है। उनके जीवन का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा जिस पर कवियों ने रचना न की हो।  गाँधी जी के त्याग, तपस्या, देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर कर देने की भावना को आधार बनाकर अर्वाचीन संस्कृत कवियों ने गाँधी जी पर असंख्य रचनाएँ की हैं जो गाँधी के बारे में बहुत सारी जानकारी प्रदान करती हैं।   

सन्दर्भ-सूची-
1. संस्कृत साहित्य : बीसवीं शताब्दी, प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी, राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 1999 ई., पृष्ठ संख्या 21-22 
2. आधुनिक संस्कृत साहित्य का इतिहास, सम्पादक डॉ. जगन्नाथ पाठक, उ.प्र. संस्कृत संस्थान प्रकाशन लखनऊ, प्रथम संस्करण 2000 ई., पृष्ठ संख्या 149   
3. वही, पृष्ठ संख्या 154   
4. वही, पृष्ठ संख्या 155   
5. वही, पृष्ठ संख्या 161  
6. वही, पृष्ठ संख्या 166  
7. वही, पृष्ठ संख्या 167  
8. वही, पृष्ठ संख्या 176   
9. वही, पृष्ठ संख्या 286

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