हिन्दी कविता और आदिवासी विमर्श

उमेश चन्द्र शुक्ल

उमेश चन्द्र शुक्ल


हिन्दी कविता के व्यापक परिदृश्य पर दृष्टिपात करने पर आदिवासियों जीवन संघर्ष पर केन्द्रित कविताओं का अकाल सा दिखाई पड़ता है। यह नीरसता यहाँ तक परिलक्षित होती है कि आदिवासी समुदाय को जाने या समझाने के लिए कविता के रास्ते से होकर गुजरना चाहे तो निराशा हाथ लगाती है। किन्तु  आदिवासियों द्वारा आदिवासी जीवन संघर्षों को लेकर लिखी कविताएँ नया रास्ता दिखाती है। आदिवासी कविताओं में मूल स्वर पहचान के संकट को लेकर जद्दोजहद है। वैश्विक परिदृश्य में यह सांस्कृतिक संकट के रूप में सुरसा की तरह मुँह बाएँ खडा है। सब कुछ निगल जाना चाहता है। आधुनिकता के बघनखे में नुचते समुदाय के सामने विकास का दानव आदिवासी जीवन के मुख्य आधार जल, जंगल, जमीन और जोरू को निगल जाना चाहता है। महादेव टोप्पो की कलम प्रतिरोध के साधन गढ़ती है। आदिवासी समुदाय की सामुदायिकता ही उसकी पहचान है अब पहचान का संकट है तो इस संकट से उबरने का रास्ता भी  सामुदायिक शक्ति से निकलेगा --             
''यह है सबसे बड़ा खतरा कि हम अपनी पहचान
खो रहे हैं  खो रहे हैं कि हम अपने स्वाभाविक
स्वर न मिमिया रहे न गरज रहे हैं इसी
कारण ऊंची अट्टालिकाओं में  पंखों के नीचे
हमारी असमर्थता पर मुस्करा रहे हैं
इसलिए मित्र आओ हम पहले अपने कंठो
में गरजती हुई  आवाज भरे। '' 'सबसे बड़ा खतरा'- महादेव टोप्पो -आदिवासी स्वर और शताब्दी

                 'सबसे बड़ा खतरा' कविता में कवि महादेव टोप्पो आदिवासी समुदाय को संगठित और शिक्षित करने का आवाहन करते है। आदिवासियों को अन्याय, अत्याचारों के विरुद्ध उसे स्वयं लड़ाई लड़नी होगी तभी उनके जीवन उपेक्षित बदलाव या परिवर्तन संभव हो पायेगा। आदिवासी संस्कृति और समाज, आदिम जातियाँ या आदिम समाज नहीं है, उससे भिन्न सभ्यता और संस्कृति का समाज है। “जिस साहित्य में प्रकृति की लय-ताल और संगीत का अनुसरण नहीं हो, संपूर्ण जीव जगत की अवहेलना हो, जो धनलोलुप और बाजारवादी हिंसा और लालसा का नकार नहीं करे, जहाँ सहानुभूति, स्वानुभूति के बजाय सामूहिक अनुभूति का प्रबल स्वर-संगीत हो और जो मूल आदिवासी भाषाओं में नहीं रचा गया हो वह आदिवासी साहित्य नहीं है।” ग्रेस कुजूर के शब्दों में “आदिवासी समाज न अपनी औरतों का अपमान करता है और न ही उनके साथ हिंसा से पेश आता है। वह दुनिया में सहअस्तित्व और सहजीविता का सबसे बड़ा पैरोकार है। लेकिन हिंसा और गैर बराबरी के खिलाफ डटकर खड़े इस आदिवासी समाज को ही खत्म करने की कोशिश हो रही है। इस आदिवासी दर्शन को विस्थापित करके दुनिया को बचाया नहीं जा सकता है।” आदिवासी कथा साहित्य में जल, जंगल, जमीन और जोरू का सवाल ऐसे ही नहीं उठता अपितु वह पूरी तरह से आदिवासी संस्कृति को आत्मसात कर रहा होता है।

         आदिवासी कवियों में महादेव टोप्पो, निर्मला पुतुल, हरिराम मीणा, वाहरु सोनवणे, केशव मेश्राम, महादेव टोप्पो, अनुज लुगुन, रामदयाल मुंडा, सरिता बड़ाइक, डॉ.मंजु ज्योत्स्ना, दीनानाथ मनोहर आदि ने आदिवासी जीवन के विभिन्न पहलुओं, सामाजिक विद्रोह, नारी का जीवन संघर्ष, सामाजिक संघर्ष, आदिवासी न्याय व्यवस्था, विस्थापन, अस्तित्व की समस्या और अशिक्षा, व्यवस्था के शोषण-दमन को शब्दबद्ध किया है। आदिवासी कविता जीवन की भट्ठी में जलते समुदाय की त्रासद जीवन यात्रा की बानगी मात्र नहीं यह आदिवासी समुदाय के जीवन संघर्ष का दस्तावेजीकरण है --
 हम मंच पर गए ही नहीं
और हमें बुलाया भी नहीं
उंगली के इशारे से
हमें अपनी जगह दिखाई गई
हम वही बैठे रहे
हमें शाबासी मिली
वे मंच पर खड़े होकर
हमारा दुःख हमसे ही कहते रहे
हमारा दुख हमारा ही रहा कभी उनका नहीं हो पाया
हमने अपनी शंका फुसफुसाई
वे कान खड़े कर सुनते रहे
फी ठंडी साँस भारी
और हमारे ही कान पकड़ कर हमें डाँटा
माँफी माँगों वरना ----स्टेज'- वाहरु सोनवणे आदिवासी स्वर और शताब्दी-रमणिका गुप्ता, पृ. 101

                आदिवासी चिंतन आदिवासियों का तथाकथित सभ्य समाज के प्रति मुखर विरोध का स्वर है। जिसके मूल में विसंगतियों के प्रति  प्रतिरोध का भाव है। आदिवासी विमर्श अस्तित्व और अस्मिता का विमर्श है। इसमें आदिवासियों  की परंपरा, रूढ़ियां, संस्कृति, अन्याय, अत्याचार, अपमान, शोषण सभी कुछ बयान हो रहा है। लोककला, संगीत, नृत्य, संस्कृति, भाषा, बोली, लिपि आदि विभिन्न धरातलों पर आदिवासी लेखन एक व्यापक विमर्श का हिस्सा बन रहा है। साहित्य और कला, साहित्य और जीवन के बीच जो दीवारें समाज में खड़ी हैं, उन दीवारों का आदिवासी समाज में कुछ भी स्थान नहीं है। इन व्याख्याओं को बदलना जरूरी है क्योंकि आज आदिवासी समाज में कई प्रथाएं लोकगीत और नाटक तथा अनेक अन्य कलाएं विद्यमान हैं जिसे शब्दबध्द नहीं किया गया है। हजारों वर्षों से चली आ रही परंपराएं कभी थमी नहीं। वे परम्पराएं आज भी मौलिक रूप में आदिवासी जीवन का अभिन्न अंग रही हैं। फिर इसे साहित्य कैसे नहीं कहेंगे। ऐसी दलीलें इस बात की आवश्यकता जता रही हैं कि आदिवासी साहित्य को सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत है। आदिवासी विमर्शकार डॉ. विनायक तुकाराम के अनुसार, ''आदिवासी साहित्य वन संस्कृति से संबंधित साहित्य है। आदिवासी साहित्य उन वन जंगलों में रहने वाले वंचितों का साहित्य है जिनके प्रश्नों का अतीत में कभी उत्तर ही नहीं दिया गया। यह ऐसे दुर्लक्षितों का साहित्य है जिनके आक्रोश पर मुख्यधारा की समाज व्यवस्था ने कभी कान ही नहीं धरे। यह गिरि, कंदराओं में रहने वाले अन्याय ग्रस्तों का क्रांति साहित्य है। सदियों से जारी क्रूर और कठोर न्याय व्यवस्था ने जिनकी सैकड़ों पीढ़ियों को आजीवन वनवास दिया, उस आदिम समूह की मुक्ति का साहित्य है- आदिवासी साहित्य।” आदिवासी साहित्य प्रकृति से जुड़े, सतत जीवन के अभ्यासी जंगलों में रहने वालीआदिम जातियों का साहित्य है। जिनका मूलस्वरूप अभी तक आधुनिक सभ्यता के कुहासे से दूर है। इसका कारण जीवन से जद्दोजहद समुदाय की ताकत है तो अपनी सभ्यता और संस्कृति को बचाए रखने की धुन इनकी पहचान है।

                             निर्मला पुतुल आदिवासी स्त्री के जीवन संघर्ष और चेतना के साथ प्रति एकाग्रचित भाव से खड़ी है। उनके संस्कारों में संथाली आदिवासी समुदाय के लगभग 5000 वर्षों की थाती है। उनके शब्द जीवन के श्वास-प्रश्वास का शब्दांकन है। अनुभव का गझिन संसार है। शहरी संस्कृति के संपर्क में आने के बाद भी अपने मूल की थाती को संजोकर चलने की जिद है। यही जिद निर्मला पुतुल को निर्मला पुतुल बनाती है। जिसमें जीवन के जद्दोजहद की निर्झरनी सतत कलकल प्रवाहित है। आदिवासी स्त्रियों की आत्मा को भावनात्मक श्रम के साथ उनके उपेक्षित हृदयों को और उसमें सुलगते प्रश्नों को शब्दों के माध्यम से वाणी देने का प्रयत्न किया है। आदिवासी पारिवारिक संरचना के बीच केन्द्रीय धूरी के रूप में उपस्थित आदिवासी स्त्री। परिवार के लिए हाड़तोड़ मेहनत कर अपना घर-परिवार चलाती है। आदिवासी स्त्री अपने हक़ की बात नहीं कर सकती क्योंकि हक़ जताना सिर्फ़ पुरुषों का अधिकार है--
"हक़ की बात न करो मेरी बहन
मत माँगो पिता की सम्पत्ति पर अधिकार
ज़िक्र मत करो पत्थरों और जंगलों की अवैध कटाई का
सूदखोरों और ग्रामीण डॉक्टरों के लूट की चर्चा न करो बहन
भरी पंचायत में डायन क़रार कर दण्डित की जाओगी। "1. नगाड़े की तरह बजते शब्द- निर्मला पुतुल, पृ. 24

आदिवासी जीवन संघर्षों को शब्दबद्ध करती हुई रमणिका गुप्ता लिखती है "जंगल माफ़िया कीमती पेड़ उससे सस्ते दामों पर खरीदकर, ऊँचे दामों पर बेचता है और करोड़पति बन जाता है। पेड़ काटने के आरोप में आदिवासी दंड भरता है या जेल जाता है। सरकार की ऐसी ही नीतियों के कारण आदिवासी ज़मीन के मालिक बनने के बजाए पहले मज़दूर बने फिर बंधुआ मज़दूर। "2.आदिवासी विकास से विस्थापन - रमणिका गुप्ता, पृ.12 आदिवासी स्त्री का जीवन लोहे के काँटों पर चलने सरीखा है। कभी-कभी ऐसा भी होता है की आदिवासी समुदाय के हित संरक्षण के लिए काम करने वाली सामाजिक संस्थाएँ जो आदिवासी समाज के हित में कार्य करती हैं उनकी नियत में भी खोट होता है। समाज सेवा करने निकले समाजसेवी कुछ ग्रामीण भागों में कार्य करने वाले अफ़सर, ठेकेदार, बिचौलिये आदिवासी श्रम एवं स्त्री का शोषण करने से नहीं चूकते। इन्हें प्रायः अशिक्षा, भय तथा भोलेपन का शिकार होना पड़ता है। कभी जंगल के अधिकारी, लेखापाल, सिपाही तो कभी राजनेता एवं ठेकेदार का शिकार होना पड़ता है। शिकार होना तो जैसे उनकी नियति है। वस्तु से भी बदतर स्थिति है कही भी किसी के द्वारा कुछ भी घृणास्पद, अमानवीय, त्रासद --
"एक ऐसी चीज़
जिसे घाट में, बाट में
जहाँ मिले थाम लो
जब जी चाहे अंग लगा लो
पूरी हवस तो त्याग दो
न चीख न पुकार।" पहाड़ हिलने लगा है - वहारु सोनवणे, पृ. 19

आदिवासी कविताओं का वितान विषय के वैविध्य के अटा पडा है। श्रुति-स्मृति की जबरदस्त व्यवस्था रही है। आदिवासी साहित्यकारों के लिए यह कथ्य-वस्तु का कोष है। जहाँ से जितना चाहो, सामर्थ्य भर सिक्त हुआ जा सकता है। मौखिक साहित्य की समृद्ध परंपरा का लाभ आदिवासी रचनाकारों को मिला है। आदिवासी साहित्य की उस तरह कोई केंद्रीय विधा नहीं है, जिस तरह स्त्री साहित्य और दलित साहित्य की आत्मकथात्मक लेखन है। कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक-सभी प्रमुख विधाओं में आदिवासी और गैर-आदिवासी रचनाकारों ने आदिवासी जीवन समाज की प्रस्तुति की है। आदिवासी रचनाकारों ने आदिवासी अस्मिता और अस्तित्व के संघर्ष में कविता को अपना मुख्य हथियार बनाया है। 13 जनवरी 2013 की घटना जारवा आदिवासी महिलाओं को विदेशी पर्यटकों के सम्मुख नाचने के लिए मजबूर किया गया तथा उनकी अर्धनग्न तस्वीरें इंटरनेट पर अपलोड की गईं। व्यापारी आदिवासी लड़कियों को बहला फुसलाकर भगा ले जाते हैं और उन्हें देह व्यापार हेतु झोंक दिया जाता है। आमतौर पर नाबालिग़ तथा ग़रीब परिवारों की लड़कियों को अपना शिकार बनाकर तस्कर सम्पन्न राज्यों में बेच देते हैं। झारखंड, असम, पश्चिम बंगाल जैसे पिछड़े राज्यों की गरीब लड़कियाँ गाय-बैल से भी कम क़ीमत पर बिक जाती है। "सरकारी और गैर-सरकारी सूत्रों के मुताबिक हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में ग़रीब ख़ासकर आदिवासी लड़कियों की कीमत ५ हज़ार से १५ हज़ार रुपये तक है। "4. मुझे जन्म दो माँ-संतोष श्रीवास्तव, पृ.101 वस्तु का व्यापार बात समझ में आती है पर मनुष्य का व्यापार, खरीद-फरोख्त अंतरात्मा विद्रोह कर उठती है। निर्मला पुतुल ऐसे आदमखोरों के खिलाफ जबरदस्त प्रहार करती हैंI उनके शब्द  के शब्द दरांती बन हिंसक जानवरों, मानवता के दुश्मनों पर प्रहार करती है। निर्मला पुतुल अपने शोषकों अत्याचारियों एवं तथाकथित संरक्षकों की बखिया उधेड़कर रख देती है जबरदस्त खबर लेती है --
"ये वे लोग है जो दिन के उजाले में
मिलने से कतराते
और रात के अँधेरे में
मिलने का माँगते है आमन्त्रण
ये वे लोग हैं
जो हमारे बिस्तर पर करते हैं
हमारी बस्ती का बलात्कार
और हमारी ही ज़मीन पर खडे हो
पूछते हैं हमसे हमारी औक़ात। "5. नगाड़े की तरह बजते शब्द - निर्मला पुतुल, पृ.54

आदिवासी जीवन में स्त्री की सामाजिक स्थिति के साथ-साथ आर्थिक स्थिति का सजीव वर्णन भी आदिवासी कविताओं के माध्यम से हमें देखने को मिलता है। रोटी इन आदिवासियों के लिए शायद पहला और आखिरी प्रश्न है और हमारे देश में तो भूखे लोगों को दिल्ली से यह कह कर दिलासा दिया जाता है - ’भूख है तो सब्र कर, रोटी नहीं तो क्या हुआ’। आज पुरुषों की तुलना में स्त्री को कम मज़दूरी दी जाती है। हल जोतने से फ़सल काटने तक का कार्य आदिवासी स्त्री करती है। पत्तल बनाना, झाड़ू बनाना, चटाई बुनना, तेंदुपत्ता, महुआ चुनना उनका जीवन रोटी की खोज में भागता नज़र आता है। इसीलिए ग्रेस कुजूर ’क़लम को तीर होने दो’ कविता में लिखती हैं -
      "ईटों के भट्टों में / सीझ गई ज़िंदगी
       रोटी की खोज में कहाँ नहीं भागी। " 6. आदिवासी स्वर और शताब्दी - सं. रमणिका गुप्ता, पृ.26

गाँवों का देश भारत आज अपने मूल उत्स से षड्यंत्र के तहत उजाड़ा जा रहा है। जहाँ उसका मूल स्वरूप, भाषा-वाणी, रहन-सहन खानपान तो बाद में गायब होगा उसके पहले कुछ साधन या डर दिखाकर अस्मत लूट ली जा रही है\वन संरक्षण के नाम पर हम जंगल के मूल निवासी आदिवासियों के मालिकाना हक़ समाप्त करने पर तुले है। गैट समझौता, अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार नीति, पेटेंट जैसे क़ानूनी अधिकार इस भूमंडलीकरण के युग में आदिवासियों को ग़ुलाम बनाने का कार्य कर रहे हैं।

"अब तक अमेरिका और जापान द्वारा नीम के आठ उत्पादों पर पेटेंट का अधिकार प्राप्त कर लिया गया है। यदि भविष्य में अन्य औषधीय पौधों जिनके प्रयोग एवं इलाज पर अब तक आदिवासियों का नियंत्रण समाप्त हो जाएगा। "7.आदिवासी विकास से विस्थापन - रमणिका गुप्ता, पृ.47 तथाकथित आधुनिक विकास के देवता ने आदिवासियों के शोषण, भ्रष्टाचार, विस्थापन, पलायन और बेरोज़गार करने में अपनी तरफ से कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा है। आदिवासी महिलाएँ पलाश के पत्तों से पत्तलें, झाड़ू बनाकर अपना जीवन निर्वाह करती थी। आज तो प्लास्टिक युग है। हम उनका यह रोज़गार भी छीन रहे हैं। आकर्षक दिखने वाली प्लास्टिक की झाड़ू, दोने तथा थरमाकोल की पत्तलें हमारे सम्मुख हैं। इसीलिए निर्मला पुतुल ’बहामुनी’ कविता में आदिवासी स्त्री की भूख और आर्थिक विवशता का चित्रण करते हुए लिखती हैं -
"तुम्हारे हाथों बने पत्तल पर भरते है पेट हज़ारों
पर हज़ारों पत्तल भर नहीं पाते तुम्हारा पेट
कैसी विडम्बना है कि
ज़मीन पर बैठ बुनती हो चटाइयाँ
और पंखा बनाते टपकता है
तुम्हारे करियारे देह से टप... टप... पसीना। "8. नगाड़े की तरह बजते शब्द- निर्मला पुतुल, पृ.12

आज भी हिन्दुस्तान के अन्दर पूर्ण लोकतंत्र नहीं है। आदिवासी जब अपनी समस्याओं को लेकर लोकसभा तथा विधानसभा तक पहुँचते हैं तो उनके साथ बर्बरता का व्यवहार किया जाता है। नागपुर के आदिवासी समुदाय ने अपनी मांगों को लेकर 2002 में मोर्चा निकाला। इस शांति से निकाले जाने वाले मोर्चे पर लाठी प्रहार किया गया। भीड़ तितर-बितर हो गई। मीडिया को बाद में मोर्चे वाले स्थान पर सूखी रोटी, हरी मिर्च, टूटे चप्पल., फटे कपडे के टुकडे मिले जिनसे सरकार को खतरा था। डॉ. भगवान गव्हाडे की ’आदिवासी मोर्चा’ कविता -
"संसद भवन के प्रांगण में,
जब पहुँच गया मोर्चा।
बरस पड़ी पुलिस कर्मियों की अनगिनत लाठियाँ,
जैसे झेली थी सीने में पूर्वजों ने अंग्रेज़ों की गोलियाँ
तितर-बितर हो गई भीड़
भागने लगी हमारी बहूँ-बेटियाँ
जैसे भगाई जाती हैं जंगल से मुर्गी, भेड़, बकरियाँ। "9. दलित अस्मिता - सं. विमल थोरात, पृष्ठ-24

आदिवासी लेखन जीवन का लेखन है यह कल्पना और मनोरंजन का क़िस्सा नहीं है और न ही आदिवासी औरतें नुमाइश की वस्तु है। वे दर्द सहने की आदी है उनका जीवन कठोर संघर्ष की गाथा कहता है किन्तु मुक्ति की बैचेनी तो उनमें भी है-
मेरी सोच के भीतर
अचानक बज उठा है राष्ट्रगान
और मैं खड़ा हूँ
राष्ट्रद्रोही कहलाने के डर से
सावधान की मुद्रा में।
ठीक इसी समय दीमकों का झुंड
घुस आया है मेरे भीतर
मेरी देह को मिट्टी का टीला समझ
खोखला करता हुआ मुझे
और मैं चीखने में असमर्थ
खड़ा हूँ सावधान की मुद्रा में।। राष्ट्रगान बज रहा है- जसिन्ता केरकेट्टा

 मुगलों एवं अंग्रेज हुकूमत के खिलाफ आदिवासी समुदाय ने निजता की रक्षा के लिए समय-समय पर अपने विरोध के स्वर मुखर किए है। अस्तित्व और अस्मिता का संकट आदिवासी समुदाय का सबसे बड़ा संकट है। आदिवासियों ने अपने-अपने भू-भाग में अपने हकों, अधिकारों और अस्तित्व की लड़ाई के लिए विभिन्न विद्रोह किए। अंग्रेजों, साहुकारों, महाजनों, जमीनदारों और सुद्खोरों के अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आंदोलन किए। झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में पहचान का आंदोलन भी शुरु हुआ था। जिनमें संथाल हुल विद्रोह, उलगुलान, बस्तर की लड़ाई, पूर्वोत्तर का पहचान का आंदोलन जैसे विभिन्न आंदोलन हैं। आज अधिकतर आदिवासी साहित्य के प्रेरणा स्रोत बिरसा मुंडा, सिद्धो-कानू, तिलका माँझी, टंट्या भिल, कालिबाई, झलकारी बाई जैसे तमाम क्रांतिकारी हैं। आदिवासी निगाहें अब उन लोगों को पहचानने लगी हैं जो आदिवासी स्त्रियों को वस्तु मानते आए हैं और आदिवासी समाज को सस्ता मज़दूर बनाकर उनकी संस्कृति, भाषा, जल, जंगल, ज़मीन एवं जोरू को हथिया कर उन्हें उनके मूल से नेस्तनाबूत करने पर तुले है।

2 comments :

  1. आदिवासियों से बेहतर उनकी कविता और कौन लिख सकेगा भला ! रजवाड़ों के अवसान के साथ ही वे भी उपेक्षित होते गये । अपने दर्द के साथ सुलगता रहा आदिवासी... दर्द के ही साथ विद्रोह भी करता रहा समय-समय पर और गाता रहा अनछुये गीत भी ।

    प्रस्तुत आलेख संग्रहणीय है ...लेखक को साधुवाद !

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