ओ रंगरेज - अनुराधा चंदेल ’ओस’ का कविता संग्रह

पुस्तक: ‘ओ रंगरेज
लेखक: अनुराधा चंदेल ’ओस’
मूल्य:  ₹ 350 रुपये
प्रकाशक: शशि प्रकाशन, गाज़ियाबाद

समीक्षक: समीर लाल ’समीर’

ये वो समय है जब
कविता खदबदा रही
चूल्हे की आँच पर रखी
देगचियों में भात की तरह
ये वो समय है जब
कुम्हार के चाक पर
कच्ची मिट्टी
आकार पाना चाहती है...

अपने पहले कविता संग्रह ’ओ रंगरेज’ में यहाँ से अपनी बात शुरु करने वाली अनुराधा चंदेल ’ओस’ से फेसबुक के माध्यम से परिचय हुआ और फिर उन्हीं से पता चला कि उन्होंने मेरी किताब पढ़ी है, वो भी मेरी ससुराल में जो कि उसी शहर में है जहाँ अनुराधा रहती हैं और उनका मेरी ससुराल में आना जाना है। निश्चित ही तब से फेसबुक पर उनकी कविताओं पर ज्यादा ध्यान जाना शुरु हुआ। पता चलता रहा कि लगातार तरह तरह की पत्र पत्रिकाओं में छप रही हैं और तमाम सम्मानों से नवाज़ी जा रही हैं। अनुराधा अनेक मंचों से अपना काव्य पाठ कर चुकी है एवं मंचों की स्थापित हस्ताक्षर हैं। आकाशवाणी से भी इनकी कविताएँ प्रसारित होती रहती हैं।

फिर उनकी किताब आई और मौका लगा एक साथ उनकी कविताओं को पढ़ने का और उनकी कलम से गुजरने का। न कोई नियमों का बंधन, न ही किसी काव्य की स्थापित मान्यताओं की परवाह - बस वही साफगोई, चूल्हे की आँच पर रखी देगचियों में भात की तरह, एकदम वही गाँव की सच्ची खुशबू लिए खदबदाती हुई कवितायें। छंदमुक्त कविताओं का जगमगाता संसार। कहीं जुगनूओं की टिमटिमाती हुई रोशनी, कहीं चांद तारों से रोशन संसार तो कहीं शहर की जगमगाहट, फिर कहीं कहीं इन रोशनियों के भीतर छुपे अंधकार के दर्द को उकेरती पंक्तियाँ।
एक उदास झोपड़ी
चौराहे के कोने पर खड़ी
देख रही है
चकाचौंध शहर को
जो शायद धब्बा लग रही है
काई लगी दीवारें
टूटती चौखट की लकड़ी
अंदर अँधेरा और भूख है
टपकती छाजन
जो शायद वर्षों से इंतज़ार
कर रही है
आधुनिक विकास का
जो कभी नहीं खटखटाता
दरवाज़ा उसका...

एक सच्ची अभिव्यक्ति एक संवेदनशील हृदय की। भीतर की सच्चाई और दर्द को उकेरते उकेरते कब बाहर की दुनिया मुखर हो उठती है, पता ही नहीं चल पाता उनकी किताब को पढ़ते हुए।
लहरों सुनो,
तेरे विरुद्ध तैरना है मुझे
सागर के गर्भ में छिपे
रत्न की तरह,
कुछ सच्ची मोतियों
शंख की तरह
उत्तर स्वयं के प्रश्न का
ढूँढना है मुझे...

एक अकुलाहट, एक बेचैनी, एक अपने दिन की बात कागज पर उतार देने की उत्सुकता... और एक प्रेम अनुभूति। नारी मन की कलम, नारी की मन की एक अभिव्यक्ति।
मैं मुक्त छंद सी उठती गिरती
मैं भावों की रसधारा हूँ
पौराणिक कहानियों की
नायिका सी मुग्धा
सबका ताप हर लेती हूँ।

और फिर एकाएक एक और आयाम उसी कलम का...
एक पतंगा फिर आया
जलने दीपक पथ पर
देने प्रिय का साथ
करने स्वयं को अर्पण
देखो वो फिर आया
एक बूँद फिर से गिरी...
धरती की प्यास बुझाने को
तृप्ति का अहसास दिलाने को
देखो वह फिर आया...

एक संपूर्ण यात्रा है इस पुस्तक से गुजरना। इस पुस्तक को पढ़ना और इस पुस्तक के कविता संसार में अपने आपको ढालना।

यह भी तय है कि जब पाठक किताब एक बार पढ़ना शुरु करेगा तो पहली कविता अगली कविता को पढ़वाने को बाध्य करेगी। ऐसा कम ही होता है छंद मुक्त कविताओं का संसार आपको बाध्य करे प्रवाह में बंध जाने को।अनुराधा की छंदमुक्त कविताओं में आप पायेंगे वो लय जो झंकृत करेंगी आपकी उस यात्रा को, जो होगी आपकी उसकी कविताओं को पढ़ने की।
कोशिशें नाकाम नहीं होती हैं
मुश्किलें आसान कहाँ होती हैं
तितलियों का पता ढूँढती हूँ
दिन कहीं रात कहीं होती है
साँस लेने दो इन हवाओं को
बस्तियाँ आबाद जहाँ होती हैं...

ऐसी ही न जाने कितनी अभिव्यक्तियाँ इस पुस्तक में आपको भी मुरीद बना देंगी अनुराधा की लेखनी का और एक उम्मीद जगा देंगी भविष्य में उसकी कलम की संभावनाओं की। मुझे उम्मीद है अनुराधा की कलम से। मैं अनेक संभावनाओं को देख रहा हूँ उसकी कलम में। बहुत शुभकामनाओं के साथ। और अंत में एक बार फिर उनकी कलम:
आग ही आग है
एक नदी चाहिए
इन भटकते घरों को
जमीं चाहिए
धूप की किरचियाँ
ओढ़ती पत्तियाँ
चाँदनी की शीतल नमी चाहिये...

एक कविता संग्रह जिसका नाम है ’ओ रंगरेज’ निश्चित ही सभी को पढ़ना चाहिये लेखनी का यह एक नया आयाम।

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