युगान्तर अभिप्राय: चंद्र मोहन भण्डारी

चंद्र मोहन भण्डारी
चंद्र मोहन भण्डारी

[1] अलबर्ट आइंस्टाइन

किरण-रथ सवार
वक्र दिक-काल से साक्षात्कार
विचार-प्रयोग -- अनूठा अंदाज
गहन विचार-रत मनीषी आइंस्टाइन
तुम एक साथ
अंतरिक्षीय उड़ान पर थे
यथार्थ की ठोस जमीन पर भी
गहन मानवीय आस्था के साथ।
गूढ़-गहन प्रश्नों के
उलझाते गलियारे
दिक व काल से जुड़ते
सापेक्षिकता के सारे
सूत्र तुम्हें थे प्यारे
क्वांटम जग की अंधियारी
भूल भुलैयों वाली
राहों में भटके भी
सुलझाते-उलझाते वाद-विवादों वाले
जालों में अटके भी
बात यही थी खास
जटिलतम प्रश्नों से
दो-दो हाथ करने से
कभी नहीं भागे तुम।
विस्तृत था वर्णपट
तुम्हारे अवलोकन का
भौतिक संदर्भों का
मानवीय गरिमा का।
याद हमें संदर्भ तुम्हारा
गांधी से भी जुडता था

अवलोकन उस युग-मानव का
कथन तुम्हारा चर्चित था।

कैसा मानव-प्रारूप
संकीर्ण क्षितिज स्वीकार नहीं था
उदार व्यक्तित्व, परिष्कृत संकल्प
वैचारिक परिपक्वता के साथ
किरण रथ सारथी जा पहुँचा
उन ऊंचाइयों तक कि वह
बन सका युगांतर- पर्याय ।
काश,
कुछ और होते
किरण रथ सारथी
ऐसी विकट उडान को आतुर
पैर जमीन छूते भी
ढूंढ लेते अंतरिक्षीय विस्तार।
तुम जैसे कुछ और मानव
कुछ और मनीषी
कुछ और इंसान।

[2] बाबा आम्टे

पावन है भूमि यह
तप की तपोवन की
ऋषियों, मुनियों के
ज्ञान की, ध्यान की
सांसारिक जीवन में

आत्मिक उत्थान की
अध्यात्मिक चिन्तन की
गुरुकुल की, शिष्यों की
प्रेरणा स्रोत जीवन के
पथ-दर्शक लमहों की।
पर इन सबसे अलग
थोथे पांडित्य के अलंकरण
कर एकदम अस्वीकार
मात्र किरण एक लिये हाथ में
घनान्धकार को चीरने का दम्भ नहीं
उसे मात्र कुछ बेअसर करने का प्रयास
इंसान के प्रति उत्तरदायी
एक उत्कट आस्था के साथ।

सदा से ही
समाज-बहिष्कृत, तिरस्कृत और
अपनों से भी उपेक्षित - कुष्ठ-रोगी
रोगी जो थे अभिशप्त, असहाय
परन्तु सामान्य रोगी को प्राप्य
संवेदनशीलता व सहानुभूति से वंचित
पाता रहा मात्र उपेक्षा व तिरस्कार
तुम जैसे कर्मठ योगी की ज्वलंत आस्था से
बना मानवीय संवेदना का आधार।
प्रतिफल तुम्हारे प्रयासों का
कल का असमर्थ, असहाय
आज चिकित्सा पुनर्वास से बना
आजीविका अर्जन में समर्थ
मानवीय गरिमा का हकदार।
यह कैसी ज्वलंत आस्था है
जो हजारों वर्षों के अंतराल में
एक भौगोलिक भूल सी

तुम्हें यहां इस धरती पर ले आयी --
बाबा आम्टे।
शायद अब हम उस पहली भूल का
कर सकेंगे प्रायश्चित
जिसने तुम्हें इस धरती पर
जन्म लेने को
बीसवीं सदी तक
रोके रखा था।

[3] चार्ल्स डारविन

धरती पर जीवन का
जैविक रूपान्तरणों का
जैविक विकास कथा में
उद्भव हम सबने जाना
वैविध्य भरी दुनिया में
एकता सूत्र पहचाना
विज्ञान परक नजरों से
प्रेक्षण विश्लेषण विधि से तुम
तार्किक निष्कर्षो पर पहुँचे
संभावित परिवर्तन कैसे
कडियाँ जुडती थी वैसे
यद्यपि आज भी कई प्रश्न
उलझा जाते हैं
पारम्परिक समझ से हटकर
द्वार कई खुल भी जाते हैं।

जो भी हो यह निर्विवाद
तुम्हारी शोधों ने
मानव को उसके अहं शिखर से
ठोस यथार्थों की जमीन पर
ला पटका है;
याद अभी है कथन तुम्हारा-
‘अपने सारे श्रेष्ठ गुणों के होते
अंकित हैं मानव शरीर में
चिन्ह उसी के निम्न मूल के ’।

जैविक विकास में
काफी कुछ है जो जोड़ रहा है
दम्भी मन को तोड़ रहा है
उसको तो जुड़ना ही है
जीवन विकास के विस्तारों में
हर एक जीव से
वह जुड़ा सभी से
इतना कुछ तो सभी जानते
असर तुम्हारे निष्कर्षों का
वैचारिक दिशाबोध पर
कितना होगा, नहीं जानते
और नहीं है ज्ञात सभी को
वह कौन भाव था जिसने तुमको
प्रेरित कर डाला
वैसा दिशाबोध, उद्देश्य प्रखर

संभव कर डाला
किस तरह मिला वह भाव प्रबल
अपने ही घर में, अपनों से
और उन्हीं के संस्कारों में पले बढे
उनसे ही प्रेरित सपनों से।
ज्ञात हमें है आज
आत्मीय तुम्हारे सभी
विरोधी दास प्रथा के
मानव मानव के अंतर को
जटिल बनाते सभी भाव
करते थे अस्वीकार।
मानव मानव की समता का
वह भाव तुम्हारा प्रेरक था
वैज्ञानिक दृष्टि कोण से
जीव जगत में
एकता सूत्र की खोज
मानव मानव ही नहीं अपितु
सारा जीव जगत जुड जाता है
जैविक विकास के प्रक्रम से
उद्भव सबका एक
बदलता रहता है परिवेश
विविध रूप जीवन के
संभावित परिवर्तन से
जीव योनि में अलग अलग
अवतरित हुए हैं।

कि हमको होना है नम्र
क्योंकि हम गहन रूप में
वैज्ञानिक निष्कर्षों से
बंधे हुए हैं
श्रेष्ठ सभी से, अहं भाव यह
कैसे भी हो, रहे कहीं भी
मूल रूप में मानव सारे
जीव जगत से जुडे हुए हैं।

[4] महात्मा गांधी

सत्यान्वेषण के वे
अनथक, अप्रतिम प्रयोग
स्वयं चले जिस राह
अपेक्षा तब औरों से
सत्य अहिंसा की हो बात
कथनी औ करनी का साथ
निर्णायक दौरों तक
अपने मंतव्यों को पहुँचा देना
कितने कितने आयामों में
मौलिक सोच, प्रखर संवेदन
दृष्टि समग्र, अपरिग्रही तन-मन
एक नया अध्याय सोच का
दर्शन एक नया जीवन का

बापू तुमने रचा लिखा था
इतना कुछ तो हमें ज्ञात था
और तुम्हारी झोली में तो
क्या क्या कुछ था।
यों कोई नहीं पराया तुमको
अपना कभी पराया भी था
जो था अंदर, बाहर भी था
खुली किताब तुम्हारी फिर भी
पढना उसको कठिन रहा था
सत्य अहिंसा के प्रयोग
जीवन के मुश्किल दौरों में
कथनी औ करनी का योग
यही मंत्र था पास तुम्हारे
और खिंचे आते थे लोग।

यही नहीं थी बापू
पूरी पहचान तुम्हारी
सत्य अहिंसा के इतर
अन्य मसलों की भी
व्यस्त तुम्हारे जीवन में
आयी थी बारी
पर्यावरण प्रदूषण मसला आज
बन गया एक चुनौती
सहज रूप में तुमने

उसकी नींव रखी थी
कुदरत से भी ना हो हिंसा
ऐसी तुमको सोच मिली थी
अर्थ गहन, यह भाव प्रखर
प्रदूषण एक तरह की हिसा ही है
यह गहन समझ
निजेतर मंतव्यों में
जीव जगत के साथ साथ
जैव मंडल भी शामिल
गहन निजेतर संबंधों में
होना था आदर्श सभी का
पर है कितना अनुकरणीय
दौड भाग की इस दुनिया में
कहना मुश्किल
वह दर्शन, वह मंतव्य
सत्य अहिंसा कठिन डगर
दूर दीखता कभी कभी
धुंधला सा गंतव्य।
अक्सर प्रतीत होता है मुझको
यह सब एक विरासत सी है
अरे याद है हमें
मनीषी आइंस्टाइन का कथन
“कि वक्त में आने वाले

लोग यकीन न कर पायेगे
जन्मा और चला था
इस धरती पर तुमसा कोई’’।

आजादी की बात करे
नहीं योद्धा तुम सा कोई
सत्याग्रह का यंत्र तुम्हारी झोली में
ब्रह्मास्त्र बन गया
अपनी बात मना लेने को
अनशन भी अभिप्राय बन गया।

इतना सब होते भी
हमने सीखा क्या है
अपेक्षित मंतव्यों को, जीवन को,
जीवन दर्शन को
संग्रहीत ही कर पाये हम
यदा कदा बेचा भी हमने
शर्मिंदा हम
बात तुम्हारी नही कहीं भी
अंतर्मन छू पाई सबका
नहीं सके हम बना इसे
विश्व तुम्हारे सपनों का।

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