नीली आँखों वाली लड़की: बचपन की यादों की अभिव्यंजना

पुस्तक समीक्षा: अरुण कुमार निषाद

नीली आँखों वाली लड़की
(बाल काव्य संग्रह)

लेखक: रवीन्द्र प्रताप सिंह
प्रकाशक: सबलाइम पब्लिकेशन, जयपुर
पृष्ठ: 73, पेपरबैक
मूल्य: ₹150 रुपये



रवीन्द्र प्रताप सिंह
प्रोफेसर रवीन्द्र प्रताप सिंह लेखन के क्षेत्र में किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं प्रोफेसर लखनऊ विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफेसर हैं कवि के साथ-ही-साथ प्रोफेसर सिंह कुशल रंगकर्मी और कहानीकार तथा नाटककार भी हैंप्रोफेसर सिंह को उनके नाटक शेक्सपियर की सा रातें पर हिन्दी  संस्थान लखनऊ का मोहन राकेश सर्जना पुरस्कार 2015 भी प्राप्त हुआ है।  इनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं- फ्ली मार्केट एंड अदर प्लेज, इकोलॉगह्वेन ब्रांचों फ्लाईज, अन्तर्द्वन्द्व (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार 2017), पथिक और प्रवाह इत्यादि

अरुण कुमार निषाद
'नीली आंखों वाली लड़की’ के केन्द्र में एक छोटी लड़की है, जो प्रोफेसर सिंह की बिटिया (बुन्नू) है। जिसको वह इन कविताओं को प्रायः सुनाया करते हैंयह काव्य संग्रह बालमन के विभिन्न जिज्ञासाओं को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। कवि का कविता संग्रह उन्हीं बाल जिज्ञासाओं के समाधान का एक सुन्दर दस्तावेज है।  बच्चों के मन में सेकण्ड प्रति सेकण्ड अनेक जिज्ञासाएँ उत्पन्न होती रहती हैं इन जिज्ञासाओं का उचित उत्तर देना ही हर माँ-बाप का कर्तव्य है, क्योंकि बच्चे ही माँ-बाप के जीवन का आनंद हैं प्रो. सिंह के इस काव्य संग्रह में कुल 59 छोटी बड़ी कविताएँ  हैं इनकी पहली कविता नीली आंखों वाली लड़की की जिज्ञासा से प्रारम्भ होती है इसमें एक छोटी लड़की अपने माता-पिता से प्रश्न करती है कि- हम धरती पर किस लिए पैदा हुए हैं
नीली आँखों वाली लड़की,
नील नभ से बात करती –
हम धरती पर क्यों आये हैं?
हम धरती पर क्यों आये हैं?[1]

प्रो. सिंह की कविताओं में भी यह सब दिख जाता है – इनकी दूसरी कविता ‘दुबक गयी जा कर हरियाली’ में सूरज, गौरैया, भौरे आदि का वर्णन है। इस कविता में छोटी लड़की (बून्नू) जिद करती है कि- मुझको गौरैया दिखलाओ-
चलो दिखाओ गौरैया,
फिर फूलों पर ओस दिखाओ
कहाँ जा छुपे गाते भौरे,
क्यों हैं वो चुप? हमें बताओं[2]

 गाँव, शहर और घर में हर कहीं कौआ आसानी से दिख जाता है उसके ऊपर भी कवि की लेखनी चल पड़ी है -
काला कौआ चलता-चलता
काला कौआ उड़ता-उड़ता
पहुँच गया बंगाल,
थककर कौआ चूर हो गया,
भूख से बेहाल।[3]

बच्चे पशु-पक्षियों के नाम भी रखते हैं, जो प्राय: हमें दिखाई देते हैं–
छोटी-छोटी पाँच चिड़ियाँ,
बन संवर के आयीं,
अलक, पलक, झपक, लपक
और टपक थे उनके नाम।[4]

‘दृश्य मनोरम देखा’ कविता में तो कवि ने सम्पूर्ण ग्रामीण जीवन ही उतार दिया –
चिड़िया बगुले
पानी पत्थर
खेत धान के हरियाले,
पगडंडी गाँवों को जाती,
पक्की सड़के, कच्ची सड़के,
गाय-भैंस,
बकरी-भेड़ें,
ज्वार-बाजरा,
वर्षा-बादल,
इन्द्रधनुष भी देखा।
खिड़की के बाहर मैंने मनोरम दृश्य देखा।[5]
हमारे किस्से कहानियों और लोरियों में जीव जंतुओं की बातचीत का भी उल्लेख होता है। कवि डॉ. सिंह ने भी अपने काव्य संग्रह में बादल, नदी, गौरैया, कौआ, बुलबुल, गिलहरी, तितली आदि का बहुत ही सुन्दर चित्रण किया है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि- प्रो. सिंह ने उन सभी बाल जिज्ञासाओं को पकड़ने की कोशिश की है, जो प्राय: बालमन में उठा करती हैं। इनका यह काव्य संग्रह बच्चों के साथ-ही-साथ बड़ों के लिए भी बहुत ही ज्ञानवर्धक तथा उपयोगी है। इसे पढ़ने पर ग्रामीण जीवन की याद ताजा हो जाती है।

संदर्भ सूची
[1] नीली आँखों वाली लड़की, रवीन्द्र प्रताप सिंह, सबलाइम पब्लिकेशन राजस्थान,  प्रथम संस्करण 2016 ई., पृष्ठ 1      
[2] वही, पृष्ठ 2  
[3] वही, पृष्ठ 5    
[4] वही, पृष्ठ 7  
[5] वही, पृष्ठ 11        

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