उत्तराखण्ड भूमि सुधार एवं राजी जनजाति की भाषिक अस्मिता

सत्येंद्र कुमार अवस्थी

एलडीसीआईएल, भारतीय भाषा संस्थान, मैसूरु (कर्नाटक)

शोधसार
वर्तमान में हमारा देश भारतवर्ष हर क्षेत्र में विकास के पथ पर अग्रसर है। देश के प्रत्येक भू-भाग को विकसित करने के लिए निरन्तर प्रयत्न किए जा रहे हैं। जैसा कि आप जानते हैं यह देश विविधताओं वाला देश है। भौगोलिक विषमता के कारण देश के सभी क्षेत्रों का विकास समान रूप से नहीं हो पाता है। इस देश का एक राज्य है उत्तराखण्ड, जो कि पर्वतीय क्षेत्र है। इस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाली ‘राजी जनजाति को भी प्रगति की मुख्यधारा के साथ जोड़ने के भरसक प्रयत्न किए गए हैं। उत्तराखण्ड भूमि सुधार के अन्तर्गत इन्हें विकसित करने, अन्य समाज तथा आधुनिकता से जोड़ने के पूर्ण प्रयास किए गए हैं। जो जनजाति, अन्य समाज से कोई सरोकार नहीं रखती थी वह आज आधुनिकता तथा भूमण्डलीकरण के दौर में अपनी परम्पराओं एवं वर्तमान कुमाऊँ सभ्यता के बीच पिस रही है। समाजशास्त्री दीपांकर गुप्ता (2005) के अनुसार तो भारतीय गाँव की जीवनशैली विलुप्त होने की कगार पर है।1 अब ग्राम्य समाज भी पूर्व की भाँति अपने में सापेक्षतः सामित, समरूपी, सरल व पूर्ण समुदाय नहीं रह गए हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य उत्तराखण्ड भूमि सुधार का राजी भाषिक समाज पर पड़ते प्रभाव को उद्घाटित करना है।

* उत्तराखण्ड भूमि सुधार एवं राजी आदिम जनजाति की भाषिक अस्मिता *

राजी जनजाति से जनसामान्य का परिचय 1823 में हुआ। इनका मूल कार्य शिकार करना एवं लकड़ी से बर्तन बनाना था। उत्तराखण्ड के जिला पिथौरागढ़ में इनकी दस बस्तियाँ हैं जिसमें जनगणना 2011 के अनुसार 732 लोग निवास करते है। आरम्भ में इनका अन्य समाज से कोई सरोकार न था इसलिए कुमाउँनी जन समुदाय इन्हें ‘अदृश्य व्यापारी’ कहते थे।2 ये लोग लकड़ी से बने बर्तन को कुमाउँनी लोगों तक रात के अँधेरे में पहुँचाते थे। राजी जनसमुदाय उस क्षेत्र की मुख्यधारा से कटा हुआ था। चूँकि शर्मीलापन इनका स्वभाव है इसलिए ये लोग कम मिलनसार होते हैं और न ही नवआगन्तुक या अन्य व्यक्ति से मेल-जोल बढ़ाते हैं। राजी जनजाति के लोग समय और वचन के पाबन्द नहीं होते हैं। राजी जन समुदाय की यह भाषा आज भी मौखिक रूप में प्रयोग की जाती है। प्रो॰ रस्तोगी (2010) के अथक प्रयत्न से ‘राजी वर्णमाला’ प्रकाशित हुई, जिसमें उन्होंने इस भाषा को संरक्षित एवं स्थायित्व प्रदान करने का पूर्ण प्रयास किया है।

उत्तराखण्ड राज्य की लगभग 90% जनसंख्या कृषि पर ही निर्भर करती है। यहाँ कृषि योग्य लगभग 7,84,117 हेक्टेयर भूमि है। राज्य की कुल आबादी का लगभग 70% भाग ग्रामीण है। स्वतंत्रता के पश्चात् जब ज़मीदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार क़ानून में पंचायतों को उनकी सीमा की बंजर, परती, चारागाह, नदी, तालाब आदि के प्रबंध व वितरण का अधिकार दिया गया तो पहाड़ की ग्राम पंचायतों को इस अधिकार से वंचित करने के लिए 1960 में ‘कुमाऊँ उत्तराखण्ड ज़मीदारी उन्मूलन क़ानून’ (कूजा एक्ट) लाया गया। 1976 में ‘वन संरक्षण क़ानून’ के अन्तर्गत किसानों को अपने खेत में उगाए गए वृक्ष के दोहन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। चूँकि राजी जनजाति के जीवन-यापन का आधार आखेट एवं लकड़ी से बर्तन बनाना था अतः इस क़ानून के बनने से इस समाज की दिशा एवं दशा दोनों प्रभावित हो गयी। जहाँ एक ओर ये अपने पारम्परिक जीवन-यापन के तरीकों को छोड़ने पर मजबूर हुए, वहीं दूसरी ओर इनका अन्य पड़ोसी समाजों से भी सम्पर्क हुआ, जिससे इनकी मनोदशा व भाषा दोनों पर गहरा प्रभाव पडा। भारतीय सरकार ने राजी समुदाय को 1967 में जनजाति के रूप में तथा 1975 में आदिम जनजाति के रूप में स्वीकार किया। ये लोग अपने को निम्न जाति का मानते हैं। अक्टूबर 2014 में फील्डवर्क के समय हमने कई बार देखा कि राजी जन जाति के लोग किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति की दुकान या घर के अन्दर जाने से पहले बाहर किसी बर्तन में रखे पानी को छूते थे। यह सामाजिक भेदभाव आज भी देखने को मिलता है। इसलिए ये लोग अपनी भाषा के प्रति भी भेदभाव रखते हैं। यह जनजाति आज बहुभाषिकता की चपेट में आ चुकी है तथा ‘राजी’ भाषा के अतिरिक्त हिंदी, कुमाउँनी पर अपनी पकड़ धीरे-धीरे बढ़ा रहे हैं। परिणामतः समस्त राजी समुदाय द्विभाषी हो गया है।

उत्तराखण्ड में भूमि विविधता के कारण एक ही प्रकार का नियोजन करना सम्भव नहीं है क्योंकि प्रत्येक घाटी एवं पर्वतीय ढ़ाल की उर्वरा शक्ति में भिन्नता मिलती है। कृषि के क्षेत्र से पलायन करने का यह भी एक कारण माना जा सकता है। दूसरा कारण जलवायु परिवर्तन का हो सकता है। विगत दस वर्षों में देश में हुई आपदाओं की समीक्षा करते हुए 10 सितम्बर 2014 को ‘सेंटर फ़ॉर सांइस एण्ड एनवायरमेंट’ (CSE) ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में हुई चार बड़ी आपदाएँ निम्नलिखित हैं, 1. 26 जुलाई 2005, मुम्बई (वर्षा), 2. 6 अगस्त 2010, लेह, (वर्षा) 3. 15-16 जून 2013, उत्तराखण्ड, (वर्षा) 4. 7 सितम्बर 2014, जम्मू-कश्मीर (वर्षा) तथा 25 अप्रैल 2015 को नेपाल तथा भारत में आए भूकम्प ने हिला कर रख दिया। यदि मुम्बई को छोड़कर देखा जाए तो सबसे अधिक प्रभावित पहाड़ी क्षेत्र है। स्पष्ट है कि भारत के पर्वतीय क्षेत्र जलवायु-परिवर्तन की चपेट में है और यह कहना कदापि गलत न होगा कि ये आपदाएँ वहाँ पर रहने वाले समाज के जीवन-स्तर को अस्त-व्यस्त कर देती हैं। ऐसी स्थिति में वहाँ पर रहने वाले समुदाय पलायन के लिए मजबूर हो जाते हैं।

मैदानी क्षेत्रों में रबी व खरीफ दोनों फसलें उगाई जाती हैं लेकिन पर्वतीय क्षेत्रों में एक बार फसल उगाते हैं। ऐसी खाली पड़ी ज़मीन को परती के नाम से जाना जाता है। इस परती भूमि में पशुओं के लिए खुली छूट होती है अर्थात् यह भूमि चरागाह के रूप में प्रयोग की जाती है। इस कारण से राजी जनजाति को जीवन-यापन के अन्य मार्ग प्रशस्त करने पड़ते हैं। इनके लिए यह दुष्कर कार्य होता है क्योंकि छोटे समाज में रोजगार की समस्या आम है। रोजगार हेतु इन्हें अन्य समाज से सम्पर्क करना पड़ता है जिसका प्रभाव इनकी जीवन-शैली एवं भाषा पर स्पष्ट दिखाई पड़ता है।

राजी जनजाति के उत्थान के लिए सरकारी व गैर सरकारी संस्थाएँ भरसक प्रयास कर रही हैं और इस उद्देश्य में सफल भी हुई हैं। मैं इस जनजाति से कई वर्षों से सम्पर्क में हूँ और इन लोगों में आए परिवर्तन को बहुत पास से देखा है। यह परिवर्तन एक ओर तो सराहनीय है किन्तु दूसरी ओर इससे इनकी भाषा एवं संस्कृति खतरे में पड़ गई है।

भूमिसुधार के अन्तर्गत राजी जनजाति को समाज की मुख्य धारा से जोड़ने का एक सफल प्रयास किया गया। इन्हें खेती करने के तरीके एवं लाभ से अवगत कराया गया। इन लोगों को समय-समय पर बीज, कृषि सम्बन्धी तथा अन्य सामग्री सरकार द्वारा उपलब्ध करायी जाती है। कुमाउँनी लोगों द्वारा भी इन्हें कृषि-कार्य के प्रति प्रेरित किया जाता है। इस प्रकार कृषि-सम्बंधित शब्दावली का इनकी भाषा में समावेश हुआ। नये शब्दों के आगम से इनकी मूल भाषा पर भी प्रभाव पड़ा। जैसे- राजी ‘झिक्कल’ (अर्थ-बहुत) के स्थान पर हिंदी ‘बहुत’ का प्रयोग करने लगे हैं। उदाहरण के लिए राजी भाषा के एक वाक्य को देख सकते हैं जिसमें हिंदी का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगत होता है यथा- बाबू नामें श्री राम सिंह हीं।

शांत एवं सौम्य स्वभाव वाली राजी जनजाति कृषि के लिए सदैव जैविक खाद का उपयोग करती थी। आज ये लोग रासायनिक खादों तथा कीटनाशकों का भी प्रयोग कर रहे हैं जिसके दुषप्रभाव का इन्हें ज्ञान भी नहीं है। इस प्रकार के प्रयोग न सिर्फ इनकी ज़मीन एवं कृषि को प्रभावित कर रहे हैं बल्कि इन लोगों के स्वास्थ को भी।

चूँकि यह क्षेत्र पर्वतीय है तो यहाँ खेतों के आकार बहुत छोटे होते हैं। मैदानी क्षेत्रों की तरह बड़े नहीं होते है। इसलिए इनका कृषि-कार्य समय पर सम्पन्न हो जाता है और ये लोग काम न होने के कारण खाली हो जाते हैं। सूरज निकलते ही ये लोग आस-पास के कस्बे में लकड़ियाँ बेचकर प्रतिदिन के उपयोग के लिए सामान लेते हैं। राजी पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ अधिक कामकाजी होती हैं। कुछ राजी पुरुष नशे की लत के कारण सुबह से ही शराब पीना शुरू कर देते हैं। चाय का शौक रखने वाले स्त्री-पुरुष अपनी पसन्द की दुकान में जाकर चाय का आनन्द लेते हैं और कुमाउँनी या हिंदी में वार्तालाप करते हैं। इस सम्पर्क से ये समुदाय समाज की मुख्यधारा से तो जुड़ गए किन्तु इनकी भाषा अन्य भाषा से प्रभावित हो गई। आज इस आदिम जनजाति की भाषा पर कुमाउँनी भाषा का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है जैसे-

राजीकुमाउँनीहिंदी
दुकइयाकक्काचाचा
याइजामाँ

इसी तरह हिंदी का प्रभाव भी देखने को मिलता है यथा- चक्कू, कामे, ब्याह, बाघो (बाघ), बरियाती (बराती), बल्टिया (बाल्टी) आदि।

वर्तमान में यह राजी समुदाय सरकारी व गैरसरकारी योजनाओं का लाभ प्राप्त कर रहा है और अपने शिकारी जीवन से दूर कृषि, पशुपालन, मछलीपालन, कीड़ापालन आदि पर आश्रित हो चुके हैं। इन योजनाओं को प्राप्त करने के लिए ये लोग बढ़-चढ़ कर आगे आ रहे हैं। सरकार ने भी इन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के भरसक प्रयत्न किए हैं। निःसंदेह इन सभी योजनाओं से इनका विकास तो हुआ है किन्तु इनकी भाषा सबसे अधिक प्रभावित हुई है। इनकी भाषा पर कुमाउँनी तथा हिंदी भाषा का प्रभाव पड़ा है जिससे ये लोग अपनी मूल भाषा को खो रहे हैं। ये लोग अपनी भाषा को हेय दृष्टि से देखते हैं इसलिए सरकारी व गैरसरकारी लोगों से हिंदी या कुमाउँनी भाषा में सम्पर्क करते हैं तथा अपनी भाषा के विषय में बताने से भी कतराते हैं।

तीव्र गति से हो रहे शहरीकरण से भी राजी जनजाति भी बच नहीं पायी है। एक तो पहले से ही इनके पास कृषियोग्य भूमि एवं संसाधनों का अभाव था दूसरे कृषियोग्य भूमि पर भवन, स्कूल, पेयजल के लिए जगह-जगह नल तथा पक्की दुकानों का निर्माण कर रहे हैं, जिससे कृषियोग्य भूमि में कमी कमी आ गयी है। इस कारण ये लोग मज़दूरी करने को भी विवश हैं। मज़दूरी करने के लिए ये लोग आस-पास के कस्बों जैसे- अस्कोट, जौलजीबी, डीडीहाट, धारचूला आदि को जाते हैं। इन क्षेत्रों के लोगों के सम्पर्क में आने के कारण राजी जनजाति की सभ्यता, संस्कृति एवं भाषा प्रभावित हुई है। वास्तव में यह स्वाभाविक है कि जब कोई समाज अन्य समाज के सम्पर्क में आता है तो उसका प्रभाव एक दूसरे पर अवश्य पड़ता है। जो समाज अधिक प्रतिष्ठित एवं समृद्ध होता है तो उसका प्रभाव अन्य समाज पर पड़ता है। ऐसा प्रभाव स्पष्ट रूप से राजी के ऊपर दृष्टिगत होता है। जैसे- कुमाउँनी लोगों की तरह ये लोग आँठू (कुमाउँनी), होली, दीवाली आदि मनाने लगे हैं जबकि ये त्योहार इनकी प्राचीन परम्परा में सम्मिलित नहीं थे।

निष्कर्ष
राजी आदिम जनजाति का सामाजिक जीवन तो प्रभावित हुआ ही, साथ ही भाषा भी प्रभावित हुई है। व्यक्ति और समाज को जोड़ने का सर्वोत्तम साधन भाषा ही है और इस स्थिति में भाषा के महत्व को नकारा नहीं जा सकता है। भाषा सम्प्रेषण का एक सशक्त माध्यम होने के साथ-साथ हमारी अस्मिता का एक अभिन्न अंग भी है। यही व्यक्ति का उसकी संस्कृति के साथ प्रथम परिचय कराती है और उसे एक अस्मिता प्रदान करती है। अर्थात् व्यक्ति को एक पहचान प्रदान करती है। वास्तव में भाषा और अस्मिता को अलग करके नहीं देखा जा सकता है। एक ओर भाषा व्यक्ति को समाज से जोड़ती है तो दूसरी ओर उसे एक पहचान भी प्रदान करती है। आज राजी समुदाय का सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, भाषिक तथा मानसिक स्तर प्रभावित होता स्पष्ट दिखाई देता है तथा इस समाज की भाषिक अस्मिता विलुप्ति की ओर बढ़ रही है।

संदर्भ ग्रंथ सूची
1. गुप्ता, दीपांकर-2005 'विदर द इन्डियन विलेजः कल्चर एण्ड एग्रीकल्चर इऩ रूरल इण्डिया' इकोनॉमिक एण्ड पॉलिटिकल वीकली, खण्ड XL.संख्या.08, पृ.751-758।
2. रस्तोगी, कविता- भाषा विमर्श-2008, न्यू रायल बुक कम्पनी, लखनऊ। पृ. 81

सहायक ग्रंथ सूची
1. Fishman, J.A.-1972, Languages in Sociocultural change, California, Stanford University Press.
2. Mishra, A.K. and R. Dutta-1999, The Manipuris in the Barak Valley: A Case Study of Language Maintenance. Linguistic of Tibeto burman Area Volume, 22.1.
3. Pandit, P.B.-1972, India as a Sociolinguistic Area, University of poona, pune..
4. ग्रियर्सन (अनु.- यू.एन.तिवारी)- 1959, भारत का भाषा सर्वेक्षण, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ।
5. रस्तोगी, कविता -2008, भाषा विमर्श, न्यू रायल बुक कम्पनी, लखनऊ।
6. रस्तोगी, कविता -2010, राजी वर्णमाला, लेज़र ग्राफिक्स, लखनऊ।
7. श्रीवास्तव, रवीन्द्र नाथ-1996, भाषाई अस्मिता और हिंदी, वाणी प्रकाशन, दिल्ली।
8. गवेषणा-भाषा का संकट, अंक 91/ जुलाई-सितम्बर, 2008. केन्द्रीय हिंदी संस्थान, आगरा।
9. http://mobi.bharatdiscovery.org.india.

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