पत्रकारिता के विकास में हिंदी की भूमिका और तकनीकी शब्दावली का महत्त्व

वंदना शर्मा

शोधार्थी -  हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद

भारतवर्ष में आधुनिक ढंग की पत्रकारिता का जन्म अठारहवीं शताब्दी के चतुर्थ चरण में कलकत्ता, मुंबई और मद्रास में हुआ । 1780 ई. में प्रकाशित हिके (Hickey) का ‘बंगाल गज़ट’ कदाचित् इस ओर पहला प्रयत्न था । हिंदी के पहले पत्र उदंड मार्तंड (1826) के प्रकाशित होने तक इन नगरों की ऐंग्लोइंडियन अंग्रेजी पत्रकारिता काफी विकसित हो गई थी । आधुनिकीकरण के इस दौर में आज क्या कुछ आधुनिक होने से बचा हुआ है। व्यक्ति, साहित्य और भाषा आदि इसकी चपेट में धीरे-धीरे आने लगे है। मानवीयता और नैतिक मूल्यों का ह्रास होता हुआ दिखाई पड़ रहा है। पत्रकारिता जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता; ने हिंदी भाषा के विकास में अपनी महती भूमिका निभाई। हिंदी जब अपनी शिशुवस्था में थी तब पत्रकारिता के माध्यम से उसे विकसित किया गया। पत्रिकाओं के माध्यम से हिंदी भाषा प्रगाढ़ हुयी। हिंदी की आरंभिक पत्रिकाओं में यदि भारतेंदु युग से आकलन किया जाए तो हरिश्चंद्र मैग्जीन, बालाबोधिनी, कविवचन सुधा, हिंदी प्रदीप, आनंद कादम्बिनी आदि का नाम लिया जा सकता है। पहले अंग्रेजी पत्रिकाओं का ही दबदबा था लेकिन वर्तमान समय में हिंदी पत्रिकाओं ने भी अपने-आपको स्थापित किया है।

पत्र-पत्रिकाओं ने राष्ट्र के नवनिर्माण के अभियान में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया, लेकिन इसके साथ-साथ उन्होंने भ्रष्टाचारी नेताओं और नौकरशाहों के कान भी ऐंठे। पत्रकारों ने किसी भी घटना या मुद्दे की तह में जाकर खोज-बीनकर तथ्यों को उजागर किया। जनता की हंसी-ख़ुशी उल्लास-उमंग के साथ-साथ उसकी व्यथा-वेदना और पीड़ा कसक को भी जुबान दी और उसके दर्द को सामने लाकर सरकार और जनता के बीच अपनी भूमिका का ईमानदारी के साथ निर्वाह किया। हिंदी पत्रकारिता की विश्वसनीयता और जनता की सहयात्री बनने का नतीजा यह हुआ कि वह न केवल अंग्रेजी पत्रकारिता के समकक्ष खड़ी हुई, बल्कि आगे भी निकल चली है। हिंदी पत्रकारिता इक्कीसवी सदी में कैसी शक्ल अख्तियार कर रही है, इस सन्दर्भ में हमें सोचने की ज़रूरत है। “हिंदी पत्रकारिता का प्रादुर्भाव, हिंदी गद्य का इतिहास है, प्रारंभ से ही हिंदी पत्रकारों ने खड़ी बोली गद्य को परिवर्धित और परिमार्जित करने का प्रयत्न किया है। प्रारम्भिक हिंदी गद्य एवं हिंदी पत्रकारिता एक-दूसरे के पूरक नहीं अपितु पर्याप्त है।”[1]

इस प्रकार अपने गौरवमयी इतिहास के साथ हिंदी पत्रकारिता ने अपने-आपको स्थापित किया है। आजादी की लड़ाई हिंदी और उर्दू पत्रकारिता ने कंधे से कन्धा मिलाकर काम किया  साथ ही इसका सम्बन्ध राष्ट्रभाषा और खड़ी बोली के विकास से भी रहा है। पत्रकारों की जागरूकता के सहयोग का समय-समय पर उपयोग किया गया। हिंदी पत्रकारिता का यह सौभाग्य रहा कि समय और समाज के प्रति जागरूक पत्रकारों ने निश्चित लक्ष्य के लिए इससे अपने को जोड़ा वे लक्ष्य थे राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक उत्थान और लोकजागरण।

“हिंदी पत्रकारिता के विकास क्रम में कुछ पत्रकार प्रकाश-स्तंभ बने जिन्होंने अपने समय में उपस्थिति दर्ज कराई और अनेक युवकों को लक्ष्यवेधी पत्रकार के लिए तैयार किया गया।"[2]

वास्तव में उस शुरूआती समय को हिंदी पत्रकारिता का स्वर्ण युग कहा जा सकता है। हिंदी को उस स्थिति में गौरवमयी स्थान दिलाने, जिस समय उसकी सोचनीय स्थिति थी पत्रकारिता ने अपनी महती भूमिका अदा की। साथ ही भारतीय भाषाओं के मध्य हिंदी की चहुँमुखी उन्नति की ओर भी हमारा ध्यान आकृष्ट किया।

भारतेंदु ने अपने नाटकों और पत्रिकाओं से स्वभाषा उन्नति का मार्ग दिखाया। भारतेंदु की प्रेरणा से ही ज्ञान विज्ञान की दिशा में हिंदी पत्रकारिता को समृद्ध करने का कार्य भी पहली बार किया। ‘हिंदी प्रदीप’ के सम्पादक बालकृष्ण भट्ट ने मुहावरेदार हिंदी के प्रयोग पर बल दिया। उनकी रचनाएं पढ़ने पर पता चलता है कि उनमें कितना ओज और प्रभाव था। प्रताप नारायण मिश्र आधुनिक हिंदी के सचेतन पत्रकार माने जा सकते है जिन्होंने गद्य और पद्य दोनों के संस्कार पर बल दिया। इसी प्रकार आगे चलकर द्विवेदी युग, छायावाद, स्वातंत्र्योत्तर युग आदि में हिंदी पत्रकारिता का विकास होने लगा। सन् 1900 में प्रकाशित ‘सरस्वती’ के माध्यम से पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी ने साहित्यिक पत्रकारिता की परम्परा को समृद्ध और परिष्कृत किया। द्विवेदीजी के साथ-साथ इस युग की पत्रकारिता को लोकमान्य तिलक और महात्मा गांधी ने भी प्रभावित किया। हिंदी साहित्य की सेवा-साधना में ‘सरस्वती’ का अपना ख़ास योगदान है। हिंदी पत्रकारिता के योगदान पर विचार करते हुए डॉ.अर्जुन तिवारी लिखते हैं कि “हिंदी पत्रकारिता के विकास की यह कहानी संघर्षपूर्ण थी। पत्र-प्रकाशन के पथ पर पग-पग पर कांटे बिछे हुए थे। सरकारी नीति का कुत्सित रूप भयावह था। समय-समय प्रकाशित सरकारी रिपोर्टों से ज्ञात होता है कि अनायास ही संपादकों को चेतावनी देना, पत्रों को जब्त कर लेना तथा प्रेस को तहस-नहस कर देना उच्चाधिकारियों की हॉबी थी।”[3] इसी प्रकार स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता ने हिंदी पत्रकारिता के विकास में उस समय नया मोड़ आया, जब 1947 में देश आजाद हुआ। इस समय औधोगिक विकास के साथ-साथ मुद्रण कला का भी विस्तार होने के कारण प्रेस और प्रकाशन की सुविधाओं में वृद्धि हुई जिसके परिणास्वरूप पत्रकारिता केवल राजनीति और साहित्य के क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रही और इसकी पहुँच हर क्षेत्र तक हो गई। हिंदी में ‘प्रतीक’, ‘नवलेखन’, ‘आलोचना’, ‘समीक्षा’, ‘सारिका’, आदि पत्रिकाओं का  हिंदी में विकास हुआ।

हर विषय की अपनी-अपनी तकनीकी शब्दावली होती है जो उसको व्याकरणिक दृष्टि से सुगढ़ता प्रदान करती है। बिना तकनीकी शब्दों के कोई भी विषय या भाषा का विकास असंभव है। इसीलिए पत्रकारिता की भी अपनी तकनीकी  शब्दावली है जो उसे अन्य विषयों से इतर करती है और विशेषज्ञता प्रदान करती है। विज्ञान, गणित, इतिहास आदि विषयों की अपनी तकनीकी शब्दावली है। पत्रकारिता में विज्ञान, महिला, खेलकूद, फिल्म, व्यावसायिक आदि से सम्बंधित शब्दों का प्रयोग किया जाता है। इन क्षेत्रों की शब्दावली देशज और विदेशी शब्दों में विभाजित है।

संक्षेप में कहा जाए तो हिंदी पत्रकारिता ने समय के साथ चलते हुए और नवीनता के आग्रह को अपनाते हुए सामाजिक आवश्यकता के तहत हिंदी भाषा विकास का कार्य अत्यंत तत्परता, वैज्ञानिकता और दूरदृष्टि से किया है। सहज संप्रेषणीय भाषा में नई संकल्पनाओं को व्यक्त करने के लिए भाषा-निर्माण या कहें प्रयुक्ति-विकास का जैसा आदर्श बिना किसी सरकारी सहयोग या दबाव के हिंदी पत्रकारिता ने बनाकर दिखाया है, उसे भाषाविकास अथवा भाषा नियोजन में सामग्री नियोजन (कॉर्पस डेवलेपमेंट) की आदर्श स्थिति कहा जा सकता है।

लेकिन हिंदी पत्रकारिता की दुखद सच्चाई यह है कि यह आज भी अपने उस स्वरूप को प्राप्त नहीं कर पाई है जिस रूप में होनी चाहिए। जनसंख्या के आंकड़ों के हिसाब से यदि देखा जाए तो हिंदी पत्रिकाओं का एक बहुत बड़ा पाठक वर्ग बन सकता है लेकिन केवल आंकड़ों पर विश्वास नहीं किया जा सकता। आंकड़े जितने सही रूप में दिखाए जाते है वे उतने अधिक प्रमाणित नहीं होते। यहाँ पत्रकारिता के उज्ज्वल भविष्य को गिनाने के लिए हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की तेज रफ़्तार से बढ़ती प्रसार संख्या को गिनाने की खास जरूरत नहीं है। सच कहे तो जब हम सदी की हिंदी पत्रकारिता पर बात कर रहे हो तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने प्रिंट मीडिया को पीछे छोड़ दिया। अब हमें हिंदी पत्रकारिता की बढ़ती हैसियत और भविष्य की ज्यादा साफ़ तस्वीर नजर आती है। इस प्रकार से आये बदलावों में हिंदी हमें कहीं पीछे नहीं छूटती है। वर्तमान समय में इसने अपने आकार में काफी वृद्धि की है।

संदर्भ-ग्रंथ सूची-
1. रामवतार शर्मा, ‘हिंदी भाषा के संवर्धन में पत्र-पत्रिकाओं का योगदान’, (1995) राधा पब्लिकेशन, दिल्ली पृ. सं.94
2. मुक्तज्ञानकोश, विकिपीडिया
3. डॉ. अर्जुन तिवारी, ‘स्वतंत्रता आंदोलन और हिंदी पत्रकारिता’, पृ. सं. 179

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।