नए स्त्री प्रश्नों का कोश: अलगोजे की धुन पर

आलोक रंजन

पुस्तक समीक्षा: आलोक रंजन

पत्र- पत्रिकाओं में कुछ कविता व कहानियाँ प्रकाशित, अखबारों में नियमित लेखन।
पहली प्रकाशित पुस्तक ‘सियाहत’ के लिए भारतीय ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार 2017 सम्मान।
संप्रति: जवाहर नवोदय विद्यालय एर्णाकुलम केरल में अध्यापन।



       पिछले दिनों दिव्या विजय की किताब ‘अलगोजे की धुन पर’ को पढ़ने का अवसर मिला। यह किताब राजपाल प्रकाशन से प्रकाशित हुई है जिसे ‘लिट-ओ-फेस्ट’ ने 2017 के श्रेष्ठ पाण्डुलिपि अवार्ड से सम्मानित किया था। आमतौर पर सम्मानों के प्रति एक शंकालु दृष्टि रहती है उसी के मद्देनज़र डरते-डरते यह किताब खरीदी गयी। किताब जितनी सहजता से आ गयी उतनी आसानी से उसे पढ़ा न जा सका। काम से मिले हुए वक्त में इस किताब को टुकड़ों में पढ़ा गया। मध्य तक आते आते किताब ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू किया और अंततः यह हुआ कि किताब दोबारा पढ़ी गयी। छोटे कलेवर की यह किताब नावक के तीर के समान है। इनमें उपस्थित भाव अपना गहरा प्रभाव रखते हैं।

                      ‘अलगोजे की धुन पर’ स्त्री प्रश्नों के नए आयाम सामने रखती है। यहाँ ‘स्त्री के प्रश्न’ और ‘नए’ दोनों को देखने की जरूरत है। किताब में शहरी स्त्रियों की कहानियाँ हैं और उन कहानियों से यदि स्त्री का कोई एक रूप बनाया जाए तो वह उस ‘मल्टी टास्किंग वुमन’ का बनेगा जो अपने भीतर प्यास लेकर गुजरती है। कुछ-कुछ मोहन राकेश के नाटक आधे अधूरे की सावित्री की तरह। वे स्त्रियाँ युवा हैं और अपने मन की अभिव्यक्ति को मुखरता से रखती है। उनकी अभिव्यक्तियाँ जटिल हैं। जटिल से तात्पर्य यह कि उनके मन के भाव बेचैनी पैदा करते हैं और कई पुराने सवालों पर चोट करते हैं जैसे दूसरी कहानी ‘प्रेम पथ ऐसो कठिन’। इस कहानी की नायिका अपने चयन और अपने तरीकों से जीते हुए उन्हें अपनी शर्तों पर मनवाना चाहती है। इस कहानी का संघर्ष ठीक इसके अंत में आता है जहाँ पुरुष वर्चस्व से नायिका के चयन की टकराहट होती है। क्योंकि नायिका जो चाहती है वह पुरुषों को मान्य नहीं है जबकि पुरुष ऐसा करते हैं और चाहते हैं कि ऐसा होता रहे। यह कहानी जिस जगह आकर खड़ी होती है वहाँ स्त्री की उन्मुक्त और जरूरी स्वीकारोक्ति का निषेध करती पुरुषसत्ता है। यह बात बहुत साधारण सी लगेगी लेकिन कहानी जिन संदर्भों से बात कहती है वे संदर्भ बिलकुल नए हैं। दिव्या विजय की इस किताब का मूल स्वर यही चयन है। कहानियों की नायिकाओं के चयन अपने हैं और उन चयनों के साथ वे अपना स्वीकार चाहती हैं। इन नायिकाओं का जीवन और उसे देखने का तरीका  अंतर्विरोधों से भरा हुआ है। उनसे बहस की जाये तो वे शायद अपने तर्कों से अपने कार्यों को पुष्ट न कर पाएँ लेकिन वे अपने को अतार्किक रखते हुए भी अपनी स्वीकृति की चाह से भरी हुई हैं।

दिव्या विजय
                     कहानी संग्रह , प्रेम के ताने बने में रचा गया संसार है जिसमें प्रेम की बहूस्तरीय अभिव्यक्ति हुई है। प्रेम कहानियों का शाश्वत विषय रहा है लेकिन इस किताब के प्रेम को एक बार देखने की जरूरत है। चालीस प्रतिशत कहानियाँ बहुकोणीय प्रेम को समर्पित हैं। वर्तमान समय में प्रेम की बहुकोणीयता एक सहजता ग्रहण करती जा रही है। इसके रूप साहित्य से लेकर जीवन तक में लगातार प्रकट होते रहे हैं लेकिन उनमें पलड़ा पुरुषों का भरी रहा है। यह किताब बहुकोणीय प्रेम को एक स्त्री की ओर से बरतती है। यह कार्य दुस्साहस की श्रेणी में आता है। क्योंकि एक पाठक के रूप में हम कहानियों को ही नहीं पढ़ते हैं बल्कि उनके माध्यम से रचनाकर के अंतस में झाँकने का प्रयास करते हैं। उस अवस्था में इतनी बोल्ड कहानियाँ लिखना खतरे से खाली नहीं रहता। दिव्या विजय ने इस खतरे को उठाया है।

                 इस संग्रह में प्रेम को शुद्ध प्रेम की तरह देखने की एक तरह से वकालत है। जहाँ प्रेम और शरीर को पृथक पृथक रखकर देखा गया है। प्रेम का जो कलात्मक रूप इन कहानियों में आया है वह कोमल और साफ भावनाओं पर आधारित है। इस तरह के प्रेम में शरीर हो भी सकता है और नहीं भी। शरीर के होने से प्रेम नहीं है बल्कि प्रेम के होने से शरीर भी है। हाल के दिनों में इतनी मजबूती से प्रेम के इस मधुर पक्ष को रखने वाली कहानियाँ स्त्री के प्रसंगों से बहुत कम देखने को मिली है। यहाँ ‘प्यार की कीमिया’ शीर्षक कहानी का उल्लेख जरूरी है क्योंकि सुकोमल प्रेम को समर्पित इस संग्रह को यह कहानी चरम पर ले जाती है। यह कहानी अमेरिकी भूगोल में घटित हुई है जहाँ क्लारा अपने खर्चों के लिए अपना शरीर बेचती है। अल्फ्रेड को उससे प्यार होता है। वह इतनी प्यारी है कि उससे किसी को भी प्यार हो सकता है। क्लारा का पहला प्रेमी प्रेम को जिस संकीर्णता से देखने लगा था अल्फ्रेड भी ठीक वही नज़रिया अख़्तियार करता जा रहा था। अल्फ्रेड को प्रेम की उदात्ता को सीखने में वक़्त लगा और उसे बहुत सी बातों से गुजरना पड़ा। यह कहानी जितनी मजबूती से प्रेम के मीठे और सुकोमल पक्ष को रखती है वह उल्लेखनीय है।

                 इस कहानी संग्रह की एक कहानी बिट्टो अलग से चर्चा की माँग करती है। एक तरह से देखा जाये तो वह कहानी इस संग्रह के मिसफिट है लेकिन प्रेम के मसृण तत्व की उपस्थिती उसे अन्य कहानियों से जोड़ती है। बहरहाल यह कहानी हिन्दी साहित्य से गायब होते जा रहे किशोर मन को वापस लाती है। साथ ही यह और विशेष तब हो उठती है जब यह किशोरी की बात करती है। बिट्टो उन सभी किशोरियों का प्रतिनिधि चरित्र है जिन्हें हम आमतौर पर देखते हैं और जिनके उमंगों , सपनों, स्वतन्त्रता व मासूमियत पर अतिरिक्त सामाजिक निगरानियों के कारण प्रतिबंध लग जाते हैं। जैसे उनका कोई अस्तित्व हो ही न। बड़े होते लड़के गली को अलग अलग तरह से प्रयोग में लाते हैं। उनके लिए वह स्थान कौतुक और करतब दिखाने के मैदान जैसा होता है। लेकिन उसी गली से बड़ी होती लड़की को बच बचकर गुजरना होता है। यह बच – बचकर चलना सोद्देश्य होता है क्योंकि उनके इस व्यवहार के प्रति प्रताड़ित होने का अतिरिक्त भय लगातार बना रहता है। दिव्या विजय की यह कहानी उस सोद्देश्यता के पहले के पूरे संसार को रचती है। यह कहानी किशोरी की मासूमियत को खत्म होते देखने की कहानी के रूप में आती है। मानववैज्ञानिक व समाजशास्त्री लीला दुबे, की बात यहाँ इस कहानी के समर्थन में खड़ी दिखती है “ लड़की की नारी सुलभ पहचान की एक मांग यह भी है कि वह पुरुषों से सावधान रहे। सयानी होती लड़की को न केवल पुरुषों से बल्कि खुद अपने आप से भी सुरक्षित रखा जाना होता है। स्त्री यौनत्व को नियंत्रित करने की जरूरत प्रायः रूपकों के माध्यम से अभिव्यक्त होती है। युवतियों और युवकों को एक दूसरे के पास न आने देने की जरूरत पर बल देने के लिए कहा जाता है कि अगर फूस और आग में दूरी न बनाए रखी गयी तो फिर फूस को आग पकड़ने से बचाना असंभव है।” बिट्टो कहानी आग और फूस के प्रतीकों से आगे की बात प्रस्तुत करती है। किशोर मन को केंद्र में रखकर लिखी गयी कहानी भारत में किशोरावस्था को समझने की प्रतिनिधि कहानी हो सकती है जहाँ भारतीय संदर्भों की बहुत आवश्यकता है। यहाँ फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘लालपान की बेगम’ की ‘चंपिया’ पर माँ द्वारा लगाए गए प्रतिबंध वाले एक दो संवाद भी द्रष्टव्य हो सकते हैं।

                 इन कहानियों की खास बात है इसमें उपस्थित भूगोल और समाज का विस्तृत होना। कहानी केवल भारत के वातावरण तक ही सीमित नहीं रहती है। वे विदेशी पृष्ठभूमि में भी उसी सहजता के साथ चलती है जैसे देश में। कहानियों के माध्यम से प्रस्तुत वातावरण वहाँ की सैर कराने के बजाय दृश्यों की गहराई दिखाते हैं जिससे होकर थाईलैंड, अमेरिका आदि अपने  खुले रूप में सामने आते हैं। कहानियों में आए उन स्थलों के द्वारा वहाँ की वास्तविकताओं से परिचय होता है। यह कार्य कहानी के समानांतर चलता रहता है। लेखिका की सफलता यही है कि उन्होने बिना किसी प्रयास के कहानी और उसके देशकाल को ऐसा ब्लेन्ड दिया है कि आम पाठकों के लिए भी कुछ असहज नहीं रह जाता और कुछ अबूझ भी नहीं रहता। कहानियों का वातावरण अलग से प्रभावित करता है। कहानी ‘मन के भीतर एक समंदर रहता है’ अपने शुरुआती चरण में परिवेशगत विशिष्टता के होते हुए भी नायिका के अवसाद से भरा हुआ है। इस कंट्रास्ट को गढ़ना सहज नहीं है। यह रचना के पीछे कि तैयारी को रेखांकित करता है। कहा जाता है कि हर रचनाकार की भाषा उसके अपने तर्कों और द्वन्द्वों के सहारे तैयार होती है। इस कहानी संग्रह की भाषा विशिष्ट है। यहाँ संस्कृतनिष्ठ हिन्दी के साथ साथ फ़ारसी के शब्द सहजता से कहानी को गति देने के काम में आते हैं। यह अच्छा ही है कि भाषा के प्रति कोई दुराग्रह नहीं रखा गया है। पाठकों तक पहुँचाने के नाम पर जानबूझकर किए जाने वाले भाषायी खिलवाड़ जिसे ‘केयरफुल केयरलेसनेस’ की संज्ञा दी जा सकती है से बचा गया है।

                 इस किताब का प्रभाव गहन है। इन कहानियों के मर्म एकसाथ कई प्रश्न छोडते हैं और उनके उत्तरों के लिए उद्विग्न भी करते हैं। इस नायिका प्रधान कहानी संग्रह की कहानियाँ समकालीन नारियों के मुद्दों को मुखरता से रखती है। स्त्री से मुद्दों की समकालीनता इसे खास बनाती है। कथ्य के रूप में यह बात देर तक रह जाती है कि ये कहानियाँ इतने बंजर समय में भी प्रेम के कोमल तत्वों को जीवित रखने का काम कर रही हैं।

संदर्भ: पृष्ठ 109; लिंगभाव की रचना: पितृवंशीय भारत में हिंदू लड़कियों का सामाजीकरण; लिंगभाव का मानववैज्ञानिक अन्वेषण: प्रतिच्छेदी क्षेत्र, लीला दुबे ; वाणी प्रकाशन 2004।

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