पुस्तक समीक्षा: अब क्या करूँ?

कहानी संग्रह – अब क्या करूँ?
लेखक – श्रीमती सावित्री चौधरी
समीक्षक – लता अग्रवाल
प्रकाशक – एम. के. पब्लिकेशन्स, जयपुर
ISBN No.- 978-93-83258-43-7
पृष्ठ 111 / मूल्य 225/- रूपये


समीक्षक – लता अग्रवाल


कहते हैं किसी चीज को पाने की दिल से तमन्ना रखो तो ईश्वर भी सहायता को हाजिर हो जाता है। श्रीमती सावित्री चौधरी आज साहित्य के क्षेत्र में जाना पहचाना नाम हैं यदि कहूँ कि उनके कृतित्व से कम महत्वपूर्ण नहीं है उनका व्यक्तित्व। अध्ययनशीला गहन चिंतक, साहित्यिक अभिरुचि रखने वाली सावित्री जी ने न केवल शिक्षा के महत्व को समझा बल्कि जीवन में धारण भी किया है। वे आज की हजारों नारी शक्ति की प्रेरक हैं। मात्र डिग्रियाँ ही शिक्षा का आधार नहीं और न ही शिक्षा पाने की कोई उम्र सीमा ही होती है,यह बात उन्होंने साबित कर दी। दूसरी कक्षा पास सावित्री जी के मन में शिक्षा के प्रति ललक हमेशा ही रही है उन्होंने प्राप्त संसाधनों से ही न केवल पाँच भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया वरन उसमें लेखन भी उसी गति से कर रहीं हैं। हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, पंजाबी, राजस्थानी, और गुजराती भाषाओं की जानकार सावित्री जी देश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में स्थान पा चुकी हैं।

प्रस्तुत कहानी संग्रह ‘अब क्या करूं’ उनका पहला हिंदी कहानी संग्रह है जिसमें समाज की उन समस्याओं के प्रति चिन्तन ही नहीं उससे मुक्ति की दिशा भी वे सुझाती हैं। प्रथम कहानी ‘नये रंगरूट’ सुरक्षा विभाग जिसके आसरे जनता न्याय की उम्मीद करती है मगर यह विभाग अपने दायित्व के प्रति कितना मुस्तैद है विशेषकर उच्चाधिकारी इस पर प्रश्न चिन्ह है। ऐसे में यदि कोई बन्दा सत्य का झंडा लिए उनके समक्ष आजाता है तो उनका प्रयास होता है कि इसी झंडे को उसका कफन बना दें। यद्यपि यह कहानी उन्होंने अपने पति की ईमानदारी और देश के प्रति निष्ठा को समर्पित की है। “तुम अपने उसूलों और सिद्धांतों पर डटे रहे, अपने विचार नहीं बदले, तो तुम्हारी थानेदारी जरूर खतरे में पड़ सकती है।” तमाम धमकियों के बाद उनका यही जवाब रहा, “मैं तो कानून के आलावा किसी की परवाह नहीं करता, न ही डरता हूँ धमकियों से।” सत्य आज कैसे तलवार की धार पर खड़ा अपना अस्तित्व बचाने को संघर्षरत है, कथा से जान सकते हैं।

लता अग्रवाल
यहाँ एक बात कहना चाहूंगी कि सावित्री जी बहुत ही आशावादी और सकारात्मक सोच रखने वाली विदुषी हैं। मेरी उनसे दो बार मुलाकात हुई उम्र के इस पड़ाव में भी उनके भीतर जो उत्साह है, कुछ कर गुजरने का जज्बा है उसे सलाम करती हूँ। दूसरी कहानी जीवन के उस पहलू को दर्शाता है जहाँ नारी की तमाम परिधि को घर की चौखट तक समेट दिया जाता है। आज नारी घर और कार्यस्थल दोनों जगह शोषण की शिकार हो रही है, आभा इस इससे बाहर निकलना चाहती है अत: अपनी बेटी को साथ ले माँ के यहाँ आ जाती है। यह कहानी तीन पीढ़ियों की स्त्रियों को परिभाषित करती है एक जिसका वर्तमान दाव पर लग चुका है, दूसरे अपनी नन्हीं बेटी को इस माहौल से बचाना चाहती है तीसरी आभा की माँ जो इसमें उनका साहस बनती है। “उसने कुछ नहीं पूछा बेटी से बस उसे गले लगाते हुए उसके सर और पीठ पर मोह-ममता भरा हाथ फेर सहलाने लगी तो आभा के तन-मन में हिम्मत और होंसले की जैसे बाढ़ आ गई।”

 ‘खोट’ एक ऐसे युवा होते बालक की कहानी है जिसके लिए जिन्दगी के भौतिक सुख ही सर्वोपरी हैं जिन्हें पाने वह माँ के गाढे पसीने की कमाई के रूपये भी दाव लगाने को तत्पर हैं। माँ जो शारीरिक व्याधियों से जूझ रही है। रेस्टोरेंट में आकर नन्दू की आँखों से निज स्वार्थ का पर्दा गिर जाता है। कहानी का अंत सुखात्मक करना सावित्री जी का निजी कौशल है जो उनके व्यक्तित्व को मुखर करता है। जो घर कभी सुख की अनुभूति देता है वह वृध्दावस्था आने पर ‘काल कोठरी’ क्यों बन जाता है? क्यों युवावस्था के सतरंगी सपने इस अवस्था में आकर बदरंग हो जाते हैं? यह चंदू और संदीप जी की ही नहीं आज देश के कई वृद्धों की व्यथा है जहाँ उम्र के इस मोड़ पर रिश्तों से या तो धोखा मिलता है या उपेक्षा। “चारों बेटे बहुओं ने सेवा का ढोंग रचकर बची-खुची पूंजी हथिया ली और मुझे भगवान् भरोसे छोड़ दूर जा बसे।” देश की एक बड़ी सामाजिक समस्या को आईना दिखाती कहानी है।

वहीँ बटवारे के दर्द को बयाँ करती मर्मस्पर्शी कहानी है ‘कब खिलेंगे’ अब के बिछड़े न जाने कब मिलेंगे ... मुरझाएँ हैं ऐसे न जाने कब खिलेंगे?’ अपने वतन से जाना यानि अपनी घर गृहस्थी के साथ अपनी स्मृतियाँ, अपना वजूद सबका बिखर जाना। “क्या बताऊँ भाई जान, मैं तो जब से गाँव, सब छोड़कर पाकिस्तान गया हूँ कभी भी सुख सुकून की साँस नहीं ले पाया।” बर्बादी के कगार पर खड़ा हमीद ऐसे कई विस्थापितों का प्रतिनिधित्व करता है। हमीद खाँ और हवलदार का प्रेम धर्म की सीमा रेखा से ऊपर था और आज भी है। बँटवारे ने हमीद खाँ से उसका सब कुछ छीन लिया विस्थापित जीवन, इकलौते बेटे का दुःख, बेटी का दुखी वैवाहिक जीवन ...उफ़! आतताइयों ने एक देश के टुकड़े कर जाने कितनी जिंदगियाँ बर्बाद कर दी। “हवलदार जी मन ही मन कह रहे थे, भारत और पाकिस्तान के बीच प्यार, मोहब्बत, भाईचारे के फूल न जाने कब खिलेंगे?” इसी इंतजार में आज सब हैं।

हमारे दिखावटी जीवन खोखली रीतियों पर कटाक्ष करती कहानी है ‘दुखदायी अनोखा प्रकाश’ ऐसा दिखावा किस काम का जो जीवन ही उजाड़ दे। हॉकर से हाकिम होने के संघर्ष के बीच से निकलकर अपना वजूद बनाने वाले नोरंग बहादुर युवा की प्रेरक कहानी है ‘सेल्यूट’ यह सेल्यूट है हौसले को, जज्बे को जिसने सदमार्ग के बल अपने को इस मुकाम तक पहुँचाया सबसे बड़ी बात इन सबके बावजूद वह माता-पिता के प्रति अपने दायित्वों को भूला नहीं। “ममतामयी माँ का उतरा, उदास चेहरा हर घड़ी, पल मेरी आँखों के आगे डोलता रहता है। शराबी, लड़ाकू स्वभाव के पापा की भी खैर खबर लेनी चाहिए। उनको सही रस्ते पर लाना मेरा कर्तव्य है।” ‘जानी दुश्मन’ यहाँ इन्सान नहीं वो आडम्बर और कुरुतियाँ हैं जो इन्सान की प्रगति में बाधक बनी हुई है। माँ जी तमाम उम्र अपनी बेटियों के लिए इन आडम्बरों को निभाती रहीं, परिणाम उनके खेत–खलिहान से लेकर जेवर इत्यादि सब बिक गये। तब जाकर वे अपने इन जानी दुश्मनों को पहचान पाई “न जाने किस दिन पीछा छूटेगा ... जानी दुश्मन कुरीतियों से?” बेटा यशराज अपने विवाह में एक नरियल और गीता लेकर इन जानी दुश्मनों से पीछा छुड़ाता है। एक युवा की सशक्त पहल में मांजी भी उसका साथ देकर एक नई और स्वस्थ परम्परा का निर्वाह करती है। जो कि आज के समय की मांग है। ऐसे ही बदलाव को दर्शाती एक नई कहानी है ‘नये जमाने की उपज’ मानसी आज के स्वतंत्र किन्तु तार्किक विचारों की लडकी जो विवाह के लिए निर्णय लेती है कि उसे ‘बड़े घराने नहीं बड़े विचारों वाले लडके को अपना पति चुनना है।’ नई पीढ़ी की स्वस्थ सोच को उजागर करता कहानी है।

महानगरों का मोह, एकाकी और स्वच्छंद रहने की लालसा से आज परिवार बिखर रहे हैं। कहीं ये विवशता है तो कहीं उच्छंखलता जिससे इन्सान अकेला हो रहा है, रिश्ते दम तोड़ रहे हैं, मर्यादाएँ टूट रही हैं, संस्कार मिट रहे हैं, नव यौवनाओं में क्षणिक सुख की चाहत इसे हवा दे रही है। इसका बच्चों के मनोविज्ञान पर कितना घातक प्रभाव पड़ रहा है इसका अंदाजा किसी को नहीं। कहानी की पात्र चारु की स्वतंत्रता में बाधक है सामूहिक परिवार किन्तु बबलू के चेहरे की मुस्कान है ... यह मुस्कान छिन जाती है तब महंगे खिलौने भी इसे नहीं लौटा पाते।

बालश्रम आज की बड़ी समस्या ही नहीं चिन्तन का विषय है। कई बार लाचारी होती है माता-पिता की, जिसका लाभ उठाते हैं मालिक जो बच्चों से कसकर काम लेते हैं किन्तु मेहनताने के नाम पर काटकसर इतनी कि बच्चोंका भविष्य कुचलकर रह जाता है। दिव्या जैसे जिम्मेदार नागरिकों की आज देश को बहुत आवश्यकता है जो बच्चों को उनका बचपन लौटा सके। ‘जहाँ चाह वहाँ राह’ विकास के नये आयाम को छूती कथा है।
‘एक नई रीत नया रिवाज’ यद्यपि यह कहानी भी सकारात्मक विचारधारा की कहानी है किन्तु कुछ विचारों पर सहमति से मुझे रोकती है। कहानी की नायिका दुर्गा जो युवा है, शिक्षित है उसके बाद पिता से अपने हिस्से को लेकर खासकर उसके तेवर ... जो चंडी का रूप धारण किये हैं कथा को कमजोर बनाते हैं लड़की शिक्षित है और इतनी साहसी है तो उसे स्वाभिमानी भी होना चाहिए। हाँ बेटियों के वसीयत में अधिकार की विरोधी नहीं हूँ यदि बेटी कमजोर हैं, उसे सहायता की आवश्यकता है तो अवश्य उसे यह अधिकार दिया जाना चाहिए। इसी संग्रह की एक अन्य कहानी ‘इंसानियत को नमन’ जिसकी पात्र भी दुर्गा है किन्तु मर्यादित पात्र है जो दूसरों की मुश्किलों में सहायता करती है ... और सबकी नजरों में संदेह की पात्र बनती है किन्तु कथा का अंत बड़ा ही सुखद किया है लेखिका ने, जिससे दुर्गा अचानक सबके गर्व का कारण बनती है। अच्छाई के मार्ग को प्रबल बनती कहानी है।

दाम्पत्य जीवन पति-पत्नी दोनों के ही सूझ-बूझ का परिणाम है। अन्यथा दोनों के बीच तनाव की रस्सी सदा तनी रहेगी। समय रहते इन्हें सुलझा लेने में ही भलाई है। पुनर्विवाह की सराहना के साथ नारी को उसके दायित्वबोध का ज्ञान कराती ‘ख़ुशी के आँसू’ प्रेम से पगी कहानी है। ‘असली मनहूस ‘ रूढिगत विचारधारा को दर्शाती कथा है अक्सर ऐसा होता है कुछ अनिष्ट होने पर नव विवाहिता पर आक्षेप लगा दिया जाता लेकिन फिर कहानी अपना प्रभाव बनाती है, ‘अन्धविश्वास एक प्रकार का मन का रोग है’ जो श्वेता के पहले ससुराल वालों को हो जाता है किन्तु आज भी आत्मिक सौन्दर्य को देखने–परखने वालों की कमी नहीं है। कथा जैसा बोओगे – वैसा काटोगे के सूत्र को लेकर चलती है। श्वेता का आत्मिक सौन्दर्य उभरकर आता है।

अपनी उम्र के अनुसार लेखिका जिस नई सोच को प्रश्रय दे रही हैं वह निसंदेह साधुवाद के योग्य है। ‘ढीठ औरत’ यद्यपि नाम कुछ अचम्भित करता है किन्तु कभी-कभी ढीठ बनाना पड़ता है। आदित्य और उसकी माँ ने ठान लिया है कि, “अरे मूर्ख तू जिसे बेटी समझ रही है वह बेटी-वेटी कुछ नहीं बल्कि एक तनिक सी बूंद है जिसको खत्म कर देने से कोई पाप वाप नहीं लगना।” ऐसे में अपने अस्तित्व को बचाए रखने औरत को ढीठ बनना ही पड़ता है। बुलंद हौसले की कथा है। संग्रह की अंतिम कहानी ‘विकास की ज्योति’ हालातों से उभरने, विकास के नये आयाम छूने कुछ कदम उठाने ही होंगे जैसे हेतराम ने उठाये हैं।

सभी कहानी बदलते परिवेश के अनुरूप जीवन में नई सोच का स्वागत करती है लेखिका ने परिवेश के अनुरूप भाषा, दृश्यों के साथ कथा को कुछ इस तरह बुना है की कथा खुद ब खुद आँखों के आगे साकार होती चली जाती है। “दिन छिपे से बाप बेटी, कुँवारी बेटी वर अनेक, तंगी का कौन साथी ...आदि सूत्र वाक्य के माध्यम से वे अपने कहाँ को रोचक बनाती हैं।

संग्रह में कुल सत्रह कहानियाँ संग्रहित की गई हैं जिनकी विशेषता है कि सभी कहानियाँ जीवन के अभावों, संत्रासों की लीक भर नहीं पिटती बल्कि उससे बाहर निकले के मार्ग भी प्रशस्त करती है। जिन्दगी में ऊँची सोच, थोडा सा साहस, और अच्छी नियत बस यही सावित्री जी फार्मूला है एक सुखद जीवन की बुनियाद हेतु। सभी कहानियाँ जीवन में सकारात्मकता को लेकर आगे बढ़ती हैं। उतनी सकारात्मक वे स्वयं भी हैं। मैं उन्हें नमन करती हूँ, उनके लेखन को सलाम करती हूँ। वे स्वस्थ रहें, दीर्घायु हो जीवन को आगे भी साहित्य से समृद्ध करती रहें इन्हीं मंगल कामनाओं के साथ ...

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