उत्तर भारत का प्राचीनतम पर्यटन स्थल डलहौज़ी

मधु संधु

मधु संधु

बच्चों को छुट्टियाँ हो चुकी थी। होम वर्क कब का निपटा चुके थे। पर किस पर्यटन स्थल पर घुमाने के लिए जाया जाये, यह निर्णय नहीं हो पा रहा था। हरिद्वार मसूरी का सोचा और रेल-होटल की बुकिंग भी करवा ली। खबरें आ रही थी कि शिमला में पानी की कमी हो गई है और लोग दूसरे पर्यटन स्थलों, विशेषत: मसूरी का रूख कर रहे हैं। वहाँ घंटों लंबे जाम लग रहे हैं। उधर छुट्टियाँ बीत रही थी, इधर पंजाब में प्री- मानसून ने दस्तक दे दी थी। ऐसे में छोटे सफर का निर्णय लेना अनिवार्य होता जा रहा था।

नौ जुलाई की सुबह हम सभी परिजन पंजाब, अमृतसर से हिमाचल प्रदेश के डलहौज़ी पर्यटन स्थल के लिए दो गाड़ियों में चल दिये। हालांकि डलहौज़ी में सभी का यह दूसरा चक्कर ही था। हमारे परिवारों के ग्यारह लोग थे। तीन पैंसठौत्तर, चार व्यस्क और चार बच्चे थे। बाई- पास बनने से पठानकोट का रास्ता काफी आसान एवं छोटा हो गया है। केवल दो-पौने दो घंटे का- कोई 100 किलोमीटर और फिर डलहौजी की यात्रा- लगभग 80 किलोमीटर। तरोताजा होने और नाश्ता करने के लिए हम बुंगल में ‘मामा’ज रसोई’ पर रुके। यहाँ हरियाली से लहलहाते, रंगबिरंगे फूलों से दमकते, खूब बड़े-बड़े सजे- धजे पार्क थे। सीढ़ियाँ उतरकर नीचे गए तो पास ही नीचे गोल्फ कोर्स दिखाई दे रहा था।

आधा सफर तय हो चुका था और उसकी थकान से मुक्त हो हम गंतव्य के लिए चल दिये। चम्बा जिले का पर्वतीय स्थल डलहौज़ी उत्तर भारत का सबसे पुराना हिल स्टेशन है। 1854 में अंग्रेजों द्वारा इसे बनाया और बसाया गया और तत्कालीन वायसराय लॉर्ड डलहौज़ी के नाम पर इसका नाम रख दिया गया। यह शांत, नीरव, शीतल, मनोरम, अतिसुन्दर पर्यटन स्थल समुद्र तट से कोई 2000 मीटर की ऊंचाई पर है और 13 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यह धौलाधार पर्वत श्रंखलाओं के पाँच पहाड़ों कठलोंग, पोट्रेन, तेहरा, बकलोटा, बलून पर स्थित है। विशेष यह है कि इसके एक ओर बर्फीली चोटियाँ हैं और दूसरी ओर चिनाव, ब्यास, रावी नदियों की कल-कल करती धारा।

यहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य और मनमोहक वातावरण पर्यटकों को बार-बार आमंत्रित करता है। कहते हैं कि 1883 में कवीन्द्र रवीन्द्र और 1925 में जवाहरलाल नेहरू भी यहाँ आए थे और इन रम्य नैसर्गिक वादियों का आनंद लिया था।

हमें एल्प रिज़ॉर्ट में रुकना था। रास्ते में डलहौज़ी पब्लिक स्कूल आया। उन सर्पाकार सड़कों पर बच्चे बाज़ू पर रेन कोट लटकाए अध्यापकों की देख-रेख में, अनुशासित पंक्तियों में गुजरते दिख रहे थे। जगह- जगह पार्किंग थी। काफी सीढ़ियाँ और रेलिंग चढ़कर एल्प का परिसर आया- दुमंजिला, सजे- धजे उपवन, बोन फायर, ट्री हाउस, कुछ-कुछ दूरी पर लगे डाइनिंग टेबल- कुर्सियाँ, बच्चों के झूले, वाई-फाई । बच्चे भी गिटार, बॉल, राकेट-शटल, ताश, स्पीकर वगैरह लेकर गए थे। देवज्ञ, तनुष और लावण्या का तो ज्यादातर समय झूले पर ही बीता। मौसम बहुत सुहावना था। ठंडी शीतल हवाएँ थी, पर सर्दी नहीं लग रही थी। होटल के उपवन में बादल भाग दौड़ रहे थे, पर उनमें बैठना- चलना रोमांचित कर रहा था। बरसात रोज़ होती थी, बार- बार होती थी, मूसलाधार होती थी, पर रुकने पर भीगे मौसम का एहसास ही नहीं रहता था। देवदार के पेड़ों पर लंगूर थे, पर बच्चों के खेल-कूद में बाधा नहीं बन रहे थे। पास आने पर माली गुलेलों से डरा उन्हें दूर भगा देता था।

10 जुलाई को नाश्ते के बाद हम निकल लिए। गांधी चौक बाज़ार अपनी ही तरह का था। खूब भीड़-भाड़ थी। हथकरघा की खूबसूरत चीजों से दुकानें अटी पड़ी थी। खाने-पीने की दुकानें थी। एक व्यक्ति खरगोश लेकर बैठा था। भागने-फलांगने वाले नहीं, अर्ध चेतन से खरगोश। बच्चे उन्हें हाथ से पकड़ कर, कंधे पर रख कर फोटो सेशन करवा रहे थे। सफ़ेद खच्चर के साथ एक आदमी घूम रहा था। तीन वर्षीय तनुष और सात-आठ का देवज्ञ उस पर सवारी करके साहसिक एडवेंचर सा महसूस रहे थे और हम भी साथ-साथ चल रहे थे। कुछ दूर आकर उसने बच्चे उतार दिये। यह रास्ता सुभाष चौंक की ओर जाता था। कोई दो किलोमीटर पहाड़ी घुमावदार सड़क पर चलने के बाद हम सुभाष चौंक पहुँच गए, लेकिन पहाड़ी रास्ते ने सभी को थका मारा था। यहाँ सुभाष बावली है। थोड़ी सी दूरी पर विष्णु जी का मंदिर है। बच्चों ने खूब मस्ती की। कुछ देर बैंचों पर बैठने के बाद ‘शेर-ए-पंजाब’ में लंच किया और फिर टैक्सी करके लौट आए। कहते हैं कि बीमारी के दौर में अंग्रेज़ सरकार द्वारा आजाद हिन्द फौज के कर्मठ नेता सुभाषचंद्र बोस को पैरोल पर स्वास्थ्य लाभ के लिए यहाँ भेजा गया था। रात खाने का ऑर्डर करने के बाद सर्वज्ञ ने गिटार पर इतनी सुंदर धुन बजाई कि आसपास के लोग भी मंत्रमुग्ध हो उठे।

पंचपुला में स्वतन्त्रता सेनानी सरदार भगत सिंह के चाचा अजीतसिंह की समाधि है। यहाँ से सरदार भगत सिंह और अजीत सिंह ने देश की आज़ादी के लिए लगातार प्रयास किए। पंचपुला में पाँच छोटे-छोटे पुल और एक प्राकृतिक कुंड है। कहते हैं कि पंचपुला की धारा यहाँ की जल आपूर्ति का मुख्य साधन है। सतधारा चश्मा डलहौजी से कोई डेढ़ किलोमीटर दूर है। बता रहे थे कि यहाँ पहले सात धाराएँ थी। अब एक बड़ी धारा ही रह गई है। यहाँ पर्यटन विभाग का कैफेटेरिया यात्रियों को चाय-कॉफी-नाश्ते से तरोताजा रखता है। खजिआर देवदार के ऊंचे लम्बे वृक्षों से ढका डेढ़ किलोमीटर लंबा और एक किलोमीटर चौड़ा तश्तरीनुमा मैदान है। पहले यहाँ एक सुंदर झील भी हुआ करती थी, जो अब सूख सी गई है। इसके सौन्दर्य और मौसम के कारण इसे मिनी स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है। यह डलहौजी से 27 किलोमीटर दूर है। यहाँ का गोल्फ कोर्स गोल्फ प्रेमियों के आकर्षण का केन्द्र है। डलहौजी में अनेक मंदिर हैं। चार चर्च हैं- सेंट पेट्रिक, सेंट एंड्रू, सेंट फ्रांसिस, सेंट जॉन चर्च।

11 जुलाई को तो खूब और मूसलाधार वर्षा हुई। छाते पकड़ बच्चे रिज़ॉर्ट में ही मस्ती करने लगे। वर्षा के रुकने के कुछ देर बाद ही पानी निकल गया और लंच के बाद हमने कालाटोप वन्यजीव अभयारण्य की ओर प्रस्थान किया। यह अभयारण्य 30.69 किलोमीटर में फैला हुआ है। गुरु नानक देव विश्वविद्यालय का विश्रामगृह भी रास्ते में आया । हम आगे बढ़ते जा रहे थे । सड़क नितांत सूनी और अकेली थी। दोनों ओर घने जंगल थे। कोई आता-जाता दिख नहीं रहा था। एक चाय-पानी का खोखा दिखा तो उससे कालाटोप वन्यजीव अभयारण्य का पूछा। उसने बताया कि आजकल अभयारण्य बंद है। जाना बेकार था, लेकिन बच्चों के उत्साह को शांत करना और भी मुश्किल था। देखा तो पास ही ‘आमोद’ रिज़ॉर्ट था। उसकी पार्किंग थोड़ी नीचे होने के कारण 200-300 मीटर पैदल चलना पड़ा। यहाँ सब ओर हरीतिमा थी। इतने बड़े- बड़े गगनचुंबी पेड़- मानों पाताल से निकल कर आकाश छू रहे हों। टेरेस पर सजी कुर्सी मेजों पर बड़े-बड़े छातों के चंदोवे थे। एक ओर कैरम, टेबल टेनिस, स्नूकर सी इन-डोर गेम्स थी तो दूसरी ओर प्रशिक्षित प्रशिक्षकों द्वारा खिलाए जाने वाले अद्भुत, जोखिमभरे, साहसिक खेल- ऐसे कि युवा और किशोर अपने को रोक न पाएँ और साठोत्तर लोग काँप-काँप जाएँ। गहरी खाइयाँ और रस्सी से आगे बढ़ना। बिलकुल तलवार की धार पर चलने जैसा। इससे पहले सुरक्षा हेतु सेफ़्टी बेल्ट लगाई जाती, हेलमेट पहनाए जाते, हार्नेस बांधे जाते।

12 जुलाई इन मनमोहक वादियों और नैसर्गिक सौंदर्य से अटे पड़े पहाड़ों से हमारा वापसी का दिन था। वर्षा तो आज भी जमकर हुई थी, पर डलहौज़ी की बरसात सबको स्पेस देती है। एक बजे के आसपास हम चले। कोई चालीस किलो मीटर दूर धारकलां स्थित शांत और जीवंत, ‘बेस्ट वेस्टरेन हन्की डोरी’ रिज़ॉर्ट अब हमारा अगला पड़ाव था। यहाँ लंच भी करना था और आगे के सफर के लिए तारो-ताज़ा भी होना था। एक संकरी-पतली लेन के बाद एक विशाल प्रवेश द्वार था। बड़े-बड़े उपवन, दूर-दूर तक फैली हरीतिमा- जहाँ तक दृष्टि जाती थी- सब नयनाभिराम था, हमारे ट्रिप की गुणवत्ता बढ़ा रहा था। डाइनिंग हाल अत्याधुनिक, कलात्मक और भव्य था। लंच करने और चार- छ: फोटो लेने के बाद जैसे ही हम गाड़ियों में बैठे, मनोरम सफर स्मृतियों में ढल-ढल कर मन को गुदगुदा रहा था।

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