भक्तिकालीन साहित्य की पुनर्व्याख्या प्रेममार्गी संतों के विशेष संदर्भ में

महेंद्र कुमार जाट

शोधार्थी, हिंदी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर
चलभाष: +91 779 282 6000 ईमेल: mahendrajaat943@gmail.com

हिंदी साहित्य के इतिहास में दूसरा भाग अथवा कालखंड है भक्तिकाल। जिसे विभिन्न विद्वानों ने अलग-अलग नामों से पुकारा है। इस काल का समय 1375 से 1700 वि० सं तक स्वीकारा गया है। हिन्दी साहित्य और संवेदना का विकास में आचार्य रामस्वरूप चतुर्वेदी लिखते हैं – “भक्तिधारा का विकास इतिहासकारों को कुछ अटपटा सा लगता रहा है, यद्यपि उन्होंने अधिक ध्यान बराबर इस पक्ष पर दिया है कि वीरगाथा काल के बाद सहसा भक्ति-भावना का उदय कैसे हुआ अपने ‘रहस्यवाद’ शीर्षक निबंध में जयशंकर प्रसाद ने इस स्थिति की व्याख्या यह कह कर की है कि, “दुःखवाद जिस मननशैली का फल था वह बुद्धि या विवेक के आधार पर तर्कों के आश्रय में बढ़ती ही रही, अनात्मवाद की प्रतिक्रिया होनी ही चाहिए। फलत: पिछले काल में भारत के दार्शनिक अनात्मवादी ही भक्तिवादी बने और बुद्धिवाद का विकास भक्ति के रूप में हुआ।” फिर कुछ व्यंग्य की मुद्रा में प्रसाद आगे कहते हैं, “जिन-जिन लोगों में आत्म विश्वास नहीं था, उन्हें एक त्राणकारी की आवश्यकता हुई।” कवि प्रसाद की यह व्याख्या आलोचक रामचन्द्र शुक्ल के एक विशेष दृष्टिकोण से एक भिन्न स्तर पर जुड़ जाती है। जिसे उन्होंने अपने इतिहास में ‘वीरगाथा काल’ कहा, वहाँ आत्मविश्वास का भाव छुट जाता है, और भक्ति-भावना मुखर हो उठती है, कारण कि पिछले कुछ वर्षों में इस मुद्दे पर इतनी बहसें हो चुकी हैं कि कुछ नवोचार या नवोन्मेषी संकल्पनाएं उभर कर सामने आ ही नहीं पा रही। इस प्रकार रामचंद शुक्ल के द्वारा की गई ऐतिहासिक सन्दर्भों की व्याख्या और प्रसाद के दार्शनिक सन्दर्भ की व्याख्या एक-दूसरे की पूरक बन जाती है।

भक्तिकाल की इसी व्याख्या के अगले चरण में ग्रियर्सन, रामचन्द्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी भक्ति के उदय की व्याख्या भिन्न रूपों में करते हैं। यूँ हिंदी साहित्य का समस्त मध्यकालीन भाग राजनीतिक एवं साहित्यिक दृष्टि से भारत में मुस्लिम साम्राज्य के क्रमिक उत्थान-पतन का युग तो है ही वहीं दूसरी ओर शासकीय सत्ता की दृष्टि से इस युग की दीर्घ अवधि में हुए विभिन्न परिवर्तन भी शामिल हैं। इसी कारण से विशेष कर इस काल में इतिहास लेखन की दृष्टि से आम जनता तथा सत्ता के मध्य एक संघर्ष लगातार बना हुआ दिखाई देता है। दरअसल इस काल में भक्ति की धारा के साथ-साथ काव्य की अनेक परम्पराएं भी समानांतर रूप से सक्रिय रही हैं। ‘हिंदी साहित्य युग और प्रवृत्तियां’ के भक्तिकाल की भूमिका ‘डॉ० शिवकुमार शर्मा’ लिखते हैं – “शुक्ल जी ने ज्ञानाश्रयी, प्रेमाश्रयी, कृष्ण भक्ति तथा राम-भक्ति की धाराओं का उल्लेख तो किया है किन्तु उन्होंने रसिक भक्ति की एक सशक्त काव्य धारा की उपेक्षा कर दी है। हमारा यह विश्वास है कि समूचे मध्यकाल में काव्य की समान धाराएँ प्रवाहित होती रही हैं।

इस सब के मध्य देखा जाए तो ऐसी बात भी नहीं है कि सभी मुसलमान शासक हिन्दुओं के प्रति अनुदार और असहिष्णु रहे हों। “बहुत से मुस्लिम शासकों ने संस्कृत तथा देशी भाषाओं के साहित्य, संगीत और कला को प्रोत्साहन दिया। कश्मीर के जैनुलाब्दीन के प्रोत्साहन से जोनराज ने संस्कृत में दूसरी राजतरंगिणी लिखी। जौनपुर के सुल्तानों ने शास्त्रीय संगीत का पुनरुद्धार करवाया और संगीत शिरोमणि नामक ग्रन्थ संस्कृत में तैयार हुआ। हुसैन शाह बंगाली ने महाभारत और भागवत का बंगाली में अनुवाद करवाया।” सच यह भी है कि अधिकांश मुसलमान शासक भारतीय ही थे। दरअसल ये सभी विवाद उस समय इतिहासबोध के साथ-साथ अपराध बोध से भी लगने लगते हैं जब विशेषकर ऐसे संकटों के दौर में हताश, निराश लोगों द्वारा भाग्य को कोसा जाता है। हिंदी साहित्य के भक्तिकालीन इतिहास में भी दो वर्ग भक्ति के भिन्न-भिन्न मार्ग पर बंटे हुए थे। एक सगुण और दूसरा निर्गुण फिर आगे चलकर इनमें भी विभेद और विभिन्नताएँ देखने को मिलती है। मसलन सूफी काव्य धारा, संत काव्यधारा, राम काव्य धारा, कृष्ण काव्यधारा इत्यादि और इन विभिन्न विद्वानों ने इसे भी अपने-अपने मत-मतान्तरों से स्पष्ट करने का प्रयास किया। भक्ति काल के दौरान जो प्रमुख घटना हुई वह थी हिन्दू और मुस्लिम संस्कृतियों के एक-दूसरे से प्रभावित होकर पास आना। इस काल में मुस्लिम आक्रान्ताओं के आने से एक फायदा यह भी हुआ कि संगीत, चित्र, निर्माण आदि विभिन्न कलाओं में इसने भारतीय  संस्कृति को इस कदर अपने में घुला मिला कि परस्पर दोनों को पहचानना मुश्किल प्रतीत होता था।

किन्तु वहीं हिंदी साहित्य के महान एवं वरिष्ठ विद्वान आचार्य रामचन्द्र शुक्ल भक्ति आंदोलन को पराजित मनोवृत्ति का परिणाम तथा मुस्लिम राज्य की प्रतिष्ठा की प्रतिक्रिया मानते हैं और लिखते हैं – “अपने पौरुष से हताश जाति के लिए भगवान की शक्ति और करुणा की ओर ध्यान ले जाने के अतिरिक्त दूसरा मार्ग ही क्या था ?” आदिकाल में जहाँ भक्ति और धार्मिकता की स्थिति शांत बनी हुई थी। वहीं पूर्वमध्यकाल में यह कुछ उग्र हो विभिन्न समुदायों में बंट गई। आदिकाल में वैदिक यज्ञ, मूर्ति-पूजा, जैन एवं बौद्ध उपासना पद्धतियाँ एक साथ चल रही थीं  किन्तु सातवीं सदी में इनमें परिवर्तन आरम्भ हुआ और भक्ति दक्षिण से होते हुए उत्तर की ओर लौटने लगी। अपने इतिहास ग्रन्थ ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ के दूसरे भाग ‘भक्तिकाल की पूर्वपीठिका’ में डॉ० नगेन्द्र लिखते हैं – “भक्तिकाल से तात्पर्य उस काल से है जिसमें मुख्यत: भागवत धर्म के प्रचार-प्रसार के परिणामस्वरूप भक्ति आंदोलन का सूत्रपात हुआ था और उसकी लोकोन्मुखी प्रवृत्ति के कारण धीरे-धीरे लोक-प्रचलित भाषाएँ भक्तिभावना की अभिव्यक्ति का माध्यम बनती गयी और कालान्तर में भक्ति विषयक विपुल साहित्य की बाढ़ सी आ गई।” इसके पश्चात पूर्वमध्यकाल की निर्गुण भक्तिधारा के अंतर्गत सूफी काव्यधारा भी पनपी। जिसे प्रेममार्गी काव्यधारा भी कहा जाता है। इसे प्रेममार्गी यानी सूफी शाखा,  प्रेम काव्य, प्रेमकथानक काव्य, प्रेमाख्यानक काव्य,  सूफी काव्य भी कहा गया। वस्तुत: ये सभी नाम इस तथ्य के द्योतक हैं कि इस परम्परा के काव्य ग्रन्थों में प्रेम तत्व की प्रमुखता है, किन्तु इसका ‘प्रेम-तत्व’ परम्परागत भारतीय श्रृंगार भावना से थोड़ा भिन्न है। जहाँ सामान्यत:  शृंगार-रसात्मक काव्यों में विवाह, दाम्पत्य एवं सामाजिक जीवन की मर्यादाओं को स्वीकार करके चलने वाले गार्हस्थिक प्रेम का निरूपण होता रहा है, वहाँ इनमें शुद्ध स्वच्छन्दतापूर्ण दृष्टिकोण, सौन्दर्यभावना, साहसपूर्ण क्रिया कलाप एवं समाज, विमुख प्रणय-भावना का चित्रण हुआ है। विश्व साहित्य के सन्दर्भ में इसे ‘रोमांस’ अर्थात् स्वछन्द प्रेम भी कहा गया है। ‘डॉ० गणपतिचन्द्र गुप्त’ अपने इतिहास ग्रन्थ ‘हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास’ (प्रथम खंड) में प्रेमाख्यानक काव्य को दो वर्गों में विभाजित करते हैं – एक जिनमें परम्परागत कथानक, रुढियों एवं कथाओं के आधार पर लिखित प्रबंधात्मक रचनाएँ हैं और दूसरा रोमांस (स्वछन्द प्रेम) की निजी अनुभूतियों के आधार पर रचित मुक्तक काव्य मानते हैं।

यद्यपि इन दोनों वर्गों के काव्य का मूल तत्व रोमांस ही हैं किन्तु उनकी विषय-वस्तु के विस्तार, काव्य-रूप एवं शैली में परस्पर पर्याप्त अंतर है। जहाँ तक सूफी शब्द की बात है तो इसकी व्युत्पत्ति कुछ इस प्रकार हुई –

1. मुसलमान अपने पवित्र तीर्थ मदीना की मस्जिद के सामने बने चबूतरे को सफ्फा चबूतरा कहते हैं। इस प्रकार वहाँ बैठने वाले फकीरों को सूफी कहा जा जाता है।
2. कुछ विद्वान इसका सम्बन्ध सोफिया शब्द से जोड़ते हैं – जिसका अर्थ है- ज्ञान
3. एक दूसरे मत के अनुसार यह ‘सफा’ शब्द से विकसित है जिसका अर्थ है – शुद्ध एवं पवित्र।
4. सबसे अधिक मान्यता इस कथन की है – कि सूफी शब्द का संबंध ‘सूफ’ से है जिसका अर्थ है – ऊन। सूफी लोग सफेद ऊन से बने हुए चोगे पहनते थे और उनका आचरण पवित्र एवं शुद्ध होता था।

भारत में यूँ तो सूफी मत का आगमन 9वीं-10वीं शताब्दी में ही हो गया था किन्तु इसके प्रचार-प्रसार का श्रेय ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती को जाता है, जिन्होंने इसे लोकप्रिय बनाया। इसके अलावा कुछ मुसलमान सूफी कवियों ने इस काल की काव्य धारा को प्रेममार्ग पर चलाते हुए ऐसी मान्यताएँ पेश की, कि जिससे ईश्वर और जीव दोनों के परस्पर प्रेम संबंध का खुलासा हो पाया। साथ ही उन्होंने मुस्लिम समुदाय से होते हुए भी भारतीय जीवन दर्शन पर उन्होंने जो लिखा वह अपने आप में अद्भुत स्तर का था। इन रचनाकारों में मंझन, कुतुबन, जायसी, कासिमशाह आदि प्रमुख हैं। यह सब उनकी रचनाओं का खुलापन ही था जिससे यह संभव हो पाया। वहीं सूफियों के आलावा फ़ारसी मसनवियों में नायिका का विवाह प्रतिनायक से करवा कर नायक की आत्महत्या कर लेने जैसे दृश्य दिखाई पड़ते हैं। परन्तु वहीं इसके इतर भारतीय प्रेमाख्यानकों में किसी दैवी शक्ति की सहायता से नायक को नायिका की प्राप्ति हो ही जाती है। यही नहीं इनमें नायिका को पाने के लिए पक्षियों द्वारा संदेश ले जाना उनकी सहायता लेना, युद्ध करना आदि जैसे वृत्तांत भी देखने को मिलते हैं। जो फ़ारसी मसनवियों में न होकर भारतीय पौराणिक आख्यानों के अनुरूप है।

वस्तुत:  प्रेमाख्यानक परम्परा महाभारत की अनेक कथाओं में भी उपलब्ध होती है। जहाँ प्रणय स्वप्नों की पूर्ति के लिए सामाजिक मर्यादाओं का उल्लघंन, कन्याओं का हरण तथा विवाह में आर्य-अनार्य आदि के भेद का लुप्त होना भी जायज माना जाता था। इसीलिए  पुराणों और भारतीय संस्कृति की आख्यायिकाओं में सुनने को मिलता है कि भीम ने असुरकन्या हिडिम्बा से, अर्जुन ने नाग-कन्या चित्रांगदा से और कृष्ण ने यक्षकन्या जाम्बवती से विवाह किया था। वहीं महाभारत का नल दमयन्ती वृतांत जो वन-पर्व के मध्य उधृत है वह प्रेमाख्यानक काव्य की  सभी विशेषताओं से युक्त माना गया  है और डॉ० नगेन्द्र ने भी इसी को भारतीय प्रेमाख्यानों की आधारभूमि माना है।

हिंदी के प्रेमाख्यानक काव्यों द्वारा जनसाधारण के ज्ञानकोश में पर्याप्त वृद्धि हुई क्योंकि इनके रचियताओं ने दर्शन, धर्म, नीति, काम आदि विषयों की जानकारी का समावेश अपनी रचनाओं में किया तथा साथ ही मध्यकालीन संस्कृति एवं लोकजीवन के विविध पक्षों का भी सहज स्वाभाविक चित्रण भी इनमें हुआ। निष्कर्षत: इन रचनाओं में प्रेम के गम्भीर, उद्दात एवं भव्य रूप का गरिमापूर्ण चित्रण हुआ है, जिससे इन्हें हिंदी साहित्य में उच्च स्थान प्रदान किया जा सकता है। “साहित्य युगों का अतिक्रमण करता चलता है, इसके बावजूद उस की रचना किसी युग- विशेष में होती है और उस युग विशेष की समस्याएँ अपने ढंग से उसके लिए उत्प्रेरक भी बनती है।”

सूफी अथवा प्रेमाख्यानक काव्य की प्रवृत्तियों को निम्न रूप से और अधिक अच्छे तरीके से समझा जा सकता है। 

1. मसनवी शैली – इसके भीतर प्रेमाख्यानक अथवा सूफी अधिकाँशत: मुसलमान कवि ही हैं परन्तु उनमें धार्मिक कट्टरता का अभाव देखने को मिलता है। इन कवियों ने विवादों से परे अपनी एक अलग विचार भूमि बनाते हुए प्रचार-प्रसार के लिए हिन्दुओं के यहाँ प्रचलित प्रेम कहानियों को अपने काव्य का विषय बनाया है।
2. प्रेमगाथाओं का नामकरण के भीतर सूफी कवियों ने प्रेमगाथाओं का नामकरण प्राय: नायिका के आधार पर किया है। कारण की तत्कालीन समय में भारत देश की प्राचीन संस्कृति अथवा काल सतयुग की मातृसत्तात्मक प्रतिष्ठा का प्रभाव भी कुछ हद तक देखने को मिलता था। उदाहरण के लिए जायसी कृत पद्मावत का नामकरण इसकी नायिका के नाम पर है तो मंझन कृत मधुमालती तथा कुतुबन कृत मृगावती भी नायिका को आधार बनाकर नामकरण किये गए हैं।
3. अलौकिक प्रेम की व्यंजना की बात करें तो इसमें प्रेमगाथा काव्य परम्परा के अधिकाँश कवियों ने लौकिक प्रेमकथाओं के माध्यम से अलौकिक प्रेम की व्यंजना की है। राजा रत्नसेन एवं पद्मावती के जिस प्रेम का उल्लेख पद्मावत में किया गया है वह इसी प्रकार का है। जहाँ आत्मा, परमात्मा मिलन की अभिलाषा में है। उदाहरण के तौर पर पद्मावती के नख-शिख चित्रण में उसकी दंत पंक्ति की शोभा का वर्णन कराते समय कवि संसार के सारे पदार्थों में उस ज्योति को दिखा जाता है।

रवि ससि नखत दिपहिं ओहि जोती।
रतन पदारथ मानिक मोती।।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल इनके काव्य में पाई जाने वाली रहस्यवादी प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए इसे भावात्मक कोटि का रहस्यवाद स्वीकार करते हैं – “यदि कहीं सच्चे भावात्मक रहस्यवाद के दर्शन -होते हैं, तो जायसी आदि सूफी कवियों में।

कथा-संगठन एवं कथानक रूढ़ियों के परिप्रेक्ष्य में इन सूफी कवियों के प्रेमाख्यानक प्रबंध काव्य प्रकार के हैं, जिनमें कथा तत्व का समावेश तो है ही साथ ही इन काव्यों के कथा स्त्रोत भारतीय पुराण, इतिहास एवं अन्य लोक प्रचलित प्रेम कहानियों पर भी आधारित हैं। इन कवियों की प्रेमगाथाओं प्राय: एक ही साँचें में ढली हुई है। इन प्रेमगाथाओं में प्राय: वे सभी काव्य रुढियों मिल जाती हैं जो परम्परा से भारतीय कथाओं में व्यवृहत होती रही है और इसी तरह कुछ कथानक रूढ़ियों को ईरानी साहित्य से भी लिया गया है। उदाहरण के तौर पर क्रमश: चित्र दर्शन,  स्वप्न  दर्शन,  शुक द्वारा नायिका का रूप सौन्दर्य देख-सुन उस पर मोहित हो जाना। इसी तरह ईरानी में – प्रेम व्यापार में परियों एवं अलौकिक शक्तियों के सहयोग से उड़ने वाली राजकुमारियों आदि का प्रकरण।

चरित्र-चित्रण के मामले में सूफी प्रेमाख्यानकों में नायक-नायिकाओं के चित्रांकन की एक जैसी पद्धति दिखाई पड़ती है। हालांकि उनके जीवन में विविध घात-प्रतिघातों का अभाव भी है। नायक को प्राय: राजकुमार दिखाते हुए उसे सह्रदय, साहसी, प्रेमी एवं पर दुःखकातर बताया गया है जबकि नायिका अनिंद्य सुन्दरी, रूप गर्विता, बुद्धिमती  राजकन्या के रूप में चित्रित की गई है। प्रेम पथ की कठिनाईयों का चित्रण करते हुए नायक के चरित्र को उभारने का प्रयास प्राय: सभी सूफी प्रेमगाथाओं  में किया  गया है। इसीलिए नायक को नायिका प्राप्त करने के लिए जिन संघर्षों से गुजरना पड़ता है वे संघर्ष ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में आने वाले संघर्षों के भी द्योतक प्रतीत होते हैं।

लोकपक्ष एवं हिन्दू संस्कृति का चित्रण देखें तो हम पायेंगे की  प्रेमाख्यानक कवियों ने अपनी रचनाओं में लोक जीवन का पर्याप्त चित्रण किया है। जिनमें जन सामान्य में प्रचलित अंधविश्वास, जादू टोना, तंत्र-मन्त्र, लोक व्यवहार का सुंदर दिग्दर्शन इन काव्य ग्रथों में कराया गया है। भाव एवं रस व्यंजना की दृष्टि से  सूफी कवियों का मूल प्रतिपाद्य प्रेम ठहरता है। इसी के बनिस्बत इनकी रचनाओं में श्रृंगार रस की प्रधानता रही है। शृंगार के दोनों ही पक्षों,  संयोंग और वियोग का प्रभावपूर्ण चित्रण इनके प्रेमाख्यानकों में मिलता है। वहीं वस्तु वर्णन में  प्रेमाख्यानक काव्य ग्रन्थों में वस्तु वर्णन की प्रधानता है। जिसमें ये कवि तथा संत लोग मूल कथा के साथ-साथ वस्तु, दृश्य एवं घटना का विवरण अतिशयोक्तिपूर्ण शैली में प्रस्तुत करने में सिद्ध हस्त रहे हैं। जायसी के पद्मावत में वन, वाटिका, समुद्र, पर्वत, नगर,  पर्व,  उत्सव आदि विविध प्रकार से वर्णन करते हुए वस्तु वर्णन की ओर अपनी रुचि दिखाई है।

खंडन-मंडन के अभाव को देखा जाए तो  सूफी कवियों ने किसी विशेष सम्प्रदाय का खंडन-मंडन नहीं किया। संत कवियों में जहाँ यह प्रवृत्ति उग्र थी, वहीं सूफियों में इसका अभाव देखने को मिलता है। इन कवियों ने सूफीमत का प्रचार करने के लिए प्रेमगाथाओं की रचना अवश्य की किन्तु कहीं पर भी किसी अन्य धर्म या सम्प्रदाय के विरुद्ध एक भी बात नहीं कही। आचार्य शुक्ल इन सूफी कवियों की विशेषता को स्पष्ट करते हुए   लिखते हैं – “प्रेम स्वरूप ईश्वर को सामने लाकर सूफी कवियों ने हिन्दू और मुसलमान दोनों को मनुष्य के सामान्य रूप में दिखाया और भेदभाव के दृश्यों को हटाकर पीछे कर दिया है।” वहीं काव्य रूपों में आचार्य शुक्ल सूफी प्रेम गाथाओं को फ़ारसी की मसनवी शैली में रचित काव्य ग्रन्थों के अंतर्गत मानते हैं। उनके अनुसार ईश वंदना, शाहे वक्त का उल्लेख, कथा का सर्गों में विभक्त न होना आदि ऐसी विशेषताएँ  हैं जिस कारण इन्हें मसनवी रचनाएँ कहा जाना उपयुक्त है। जबकि डॉ० गणपति चन्द्र गुप्त इन्हें कथा-काव्य कहना ज्यादा उचित मानते हैं। तो दूसरी ओर आचार्य परशुराम चतुर्वेदी सूफी काव्य को स्पष्ट करते हुए लिखते हैं -  “सूफी प्रेमाख्यानक एक ऐसी रचना है जिसमें  इसके साथ ही कथा आख्यायिका जैन चरित काव्य एवं मसनवी की भी विशेषताओं का समन्वय हो गया है और यही इनकी सबसे बड़ी विशेषता है।”

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि - प्रेमाख्यानक काव्यों की स्वछन्दता ही उनकी विशेषता है कि जिसके चलते संस्कृत के गद्यात्मक काव्य भी रोमांस काव्य तथा प्राकृत, अपभ्रंश के कथा-काव्य से विकसित होते हुए  आधुनिक भाषाओं तक आ पहुँचता है। जहाँ से यह अत्यंत व्यापक और गम्भीर अर्थ का बोधक बनकर एक नई सभ्यता का निर्माण करता है। जिसका सम्बन्ध वर्तमान सन्दर्भों में नागरिकता से भी है। यही कारण है कि हिंदी साहित्य अपने साहित्यकारों की व्यक्तिगत प्रतिभा तथा सांस्कृतिक एवं साहित्यिक विशेषताओं के चलते आधुनिक चेतना लबरेज हो प्रगतिशीलता के पथ पर सदैव गतिशील होता आया है। इन सूफी अथवा प्रेममार्गियों की मान्यताओं में इस्लाम धर्म में शरीयत यानी कर्मकांड की प्रतिक्रिया का वैसा ही परिणाम है जैसा हिन्दू धर्म में वैदिक कर्मकांड की प्रतिक्रिया का परिणाम है। सूफी धर्म की सबसे बड़ी विशेषता है की इसके इस्लामीकरण में कट्टरता का अभाव है तथा इनमें उदारता एवं कोमलता का भाव विद्यमान है। कारण इसके मूल में प्रेम तत्व है। जिसमें इश्क हकीकी एवं इश्क मजाजी की भावना निहित है।

सन्दर्भ सूची –

1) हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचन्द्र शुक;, नागरी प्रचारिणी सभा, प्रथम संस्करण
2) हिंदी साहित्य का इतिहास, डॉ० नगेन्द्र, मयूर पेपर बैक्स प्रथम संस्करण, 1973
3) हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, प्रथम संस्करण, ग्यारहवाँ संस्करण, 2015
4) हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, बच्चन सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन, नवीन संस्करण 2015
5) हिंदी साहित्य युग और प्रवृत्तियाँ, डॉ० शिवकुमार शर्मा, अशोक प्रकाशन, दिल्ली, बीसवाँ संशोधित संस्करण
6) सी० बी० एस० ई० (यू० जी० सी० ) हिंदी द्वतीय प्रश्नपत्र
7) हिंदी साहित्य और सामासिक संस्कृति, डॉ० कर्ण राजशेषगिरि
8) हिंदी साहित्य की मुस्लिम साहित्यकारों का योगदान,(1200 से 1850 ई० तक)  प्रो० शैलेश जैदी (लेख)
9) हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, डॉ० रामकुमार वर्मा
10) हिंदी साहित्य का इतिहास, डॉ० जयनारायण वर्मा, तरुण प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2013, गाजियाबाद
11) हिंदी साहित्य का सरल इतिहास, डॉ० विश्वनाथ त्रिपाठी, ओरिएंट ब्लैकस्वान, दिल्ली, प्रथम संस्करण 2016 

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