छह भगौने और श्रीमती जी


अनुराग शर्मा
पिछले सप्ताह एक मित्र ने एक अङ्ग्रेज़ी लेख के हिंदी अनुवाद का दायित्व सौंपा तो उस बहाने भगौने शब्द के उद्गम की बात चली। थोड़ी उठापटक के बाद अनुमान लगा कि हिंदी का भगौना संस्कृत के भागद्रोणक से आया है। द्रोण तो पात्र है ही, जिससे हिंदी का दोना, और मराठी का द्रोण बना है। यहाँ, 'भाग' शब्द निश्चित माप के रूप में प्रयुक्त हुआ लगता है:
भागद्रोणक => भागदोना => भगौना

इसी बीच फ़ेसबुक पर श्रीमती शब्द पर एक चर्चा देखी तो एक घटना याद आई जिसे आज से तीन दिन बाद पूरे तीस वर्ष हो जायेंगे। एक दक्षिण भारतीय संस्थान द्वारा नये कर्मियों को भेजे गये पत्रों में पुरुषों को श्री, तथा स्त्रियों को श्रीमती कहकर सम्बोधित किया गया था। कुछ उत्तर भारतीय स्त्रियों को यह संबोधन अनुचित लगा। श्री शब्द और उसके विभिन्न अर्थों की विस्तार से चर्चा हुई, अंततः निष्कर्ष यही निकला कि श्रीमती शब्द के सम्मानसूचक प्रयोग का वैवाहिक स्थिति से कोई सम्बंध नहीं है, यद्यपि अब, विशेषकर उत्तर भारत में, परिपाटी उसे विवाहिताओं के लिये प्रयुक्त करने की बनती जा रही है। शब्दों के प्रयोग देश-काल के अनुसार बदलते रहे हैं लेकिन गर्व की बात है कि अपने से भिन्न रीतियों का आदर भारतीय परम्परा का केंद्रीय मंत्र है।

शब्दों की बात चल ही पड़ी है तो ज़िक्र छह का भी हो जाये जिसे अक्सर छ: की तरह लिखा हुआ भी पाता हूँ। हिंदी के शब्दों में छह के अतिरिक्त शायद ही कोई शब्द आपने देखा हो जिसमें 'ह' की ध्वनि को विसर्ग (ः) से बदला गया हो, यह हिंदी का तरीका नहीं है। संस्कृत से आये शब्दों दुःख, प्रातः, अतः, सम्भवतः, अंतःकरण आदि में विसर्ग का प्रयोग उचित है। इसी प्रकार साधारणतः, विशेषतः, आदि जैसे शब्दों में प्रयुक्त क्रिया विशेषण प्रत्यय 'तः' की बात भी अलग है, लेकिन छह को छह ही लिखना अच्छा है।

सेतु के अङ्ग्रेज़ी संस्करण के सम्पादक डॉ. सुनील शर्मा के काव्य संकलन एस्थेटिक नेगोशियेशंस के बाद अब सेतु प्रकाशन का द्वितीय पुष्प ब्रिटेन निवासी विद्वान कवि जॉन थीम के काव्य संकलन पाकोज़ एटलस के रूप में उपलब्ध है। जिन पाठकों को समकालीन अङ्ग्रेज़ी काव्य में रुचि है, उनसे इस 52 पृष्ठीय काव्य संकलन को अवश्य पढ़ने का अनुरोध है। 

पितृपक्ष चल रहे हैं। आजकल गिने-चुने भारतीय ही जनसेवा के उद्देश्य से वानप्रस्थ या सन्न्यास लेकर घर त्यागते हैं। पितृपक्ष में उनके वार्षिक पारिवारिक मिलन की तो बात ही किसी पुराने किस्से जैसी हो चली है। लेकिन पश्चिम में बच्चे आज भी घर, स्कूल, चर्च तथा, अन्य संस्थानों में मिशनरी भावना, जनसेवा आदि बचपन से ही सीखते हैं। पूर्वजों के स्नेहिल स्पर्श को अनुभूत करते हुये, यदि हम बच्चों को जनसेवा की भावना के लिये प्रेरित कर सकें तो कितना अच्छा हो।

इस अंक के पाठकों के लिये एक शुभ सूचना - राजेश उत्साही जी ने सेतु सम्पादन मण्डल में शामिल होने की सहमति देकर हमारा उत्साहवर्धन किया है। हमें पहले भी उनका सहयोग मिलता रहा है, परंतु अब उनके सम्पादन मण्डल में होने से सेतु के कार्य को, विशेषकर बाल साहित्य और लघुकथाओं को अधिक गति मिलनी चाहिये।

हिन्दी और देवनागरी का संदर्भ आने पर फ़ॉण्ट की कमी की बात अक्सर सुनाई देती है। विशेषकर मुद्रकों-प्रकाशकों की ओर से यूनिकोड में लिखकर भेजी हुई सामग्री को दोबारा किसी पुरा-फ़ॉण्ट में टंकित किये जाने से व्याकरण-वर्तनी की घातक दुर्घटनाएँ हमें छपी हुई पुस्तकों में दृष्टिगोचर होती हैं। मंगल, अपराजिता, कोकिला आदि से परिचित जनों के लिये गूगल के फ़ॉण्ट एक सुखद बयार की तरह हैं। आप भी इन्हें प्रयोग करके देखिये। निम्न कड़ी पर इस समय विभिन्न आकार-प्रकार के लगभग 44 फ़ॉण्ट उपलब्ध हैं। यह सम्पादकीय भी इसी कड़ी में दिये गये 'तिल्लाना' फ़ॉण्ट में लिखा जा रहा है। 
गूगल देवनागरी फ़ॉण्ट: https://fonts.google.com/?subset=devanagari

लगभग तीस रचनाओं के साथ, पाँच लाख अद्वितीय क्लिक्स की ओर अग्रसर होता हुआ यह अंक अपने स्थाई स्तम्भों और उत्कृष्ट सामग्री के साथ आप सुधी पाठकों को समर्पित है। आपकी राय और सुझावों का सदा स्वागत है, अवश्य साझा कीजिये।

शुभाकांक्षी,
अनुराग शर्मा

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