लघुकथाएँ: अमरेन्द्र सुमन

अमरेन्द्र सुमन

डॉक्टर साहब

40 वर्षों से एक ही स्थान पर लोगों की सेवा करते-करते डाक्टर साहब काफी वृद्ध हो चले थे। हजारों असाध्य रोगी होंगे, मौत के मुँह से डाक्टर साहब ने जिन्हें निकाला होगा। नयी जिन्दगी दी होगी। सौम्य व सरल व्यवहार के डॉक्टर साहब इलाके में काफी प्रसिद्ध थे। दूसरे-दूसरे जिलों सहित पड़ोस के राज्यों से इलाज के लिये लोगों का तांता लगा रहता।

                           इधर कई दिनों से डॉक्टर साहब बीमार चल रहे थे। जिसने भी सुना लोग दौड़े चले आए। घर पर लोगों का हुजूम खड़ा था। कोई बाहर ले जाने की बातें करता तो कोई ओझा-गुनी से झाड़-फूँक की। एक अनब्याही बेटी के साथ अकेली पत्नी क्या करती? शादीशुदा दो लड़के थे। अपने-अपने परिवार के साथ दोनों दो अलग-अलग प्रदेशों में रह रहे थे। बेटों को सूचना दी गई। जैसे भी हो, बच्चे अपने पिता तक जल्द से जल्द पहुँच जाना चाहते थे। इधर पत्नी व बेटी का रो-रो कर बुरा हाल हुआ जा रहा था। इलाज के लिये बाहर ले जाने की तैयारी चलने लगी। पर डॉक्टर साहब के पास वक्त कहाँ था। एक दिन उनकी सांसे क्या रुकीं, थम सी गई पूरे परिवार की जिन्दगी। उनकी मृत्यु से पूरा इलाका हतप्रभ था। बेचारे नेकदिल इंसान थे, कभी पैसों को तबज्जो नहीं दी। जिसने भी जब चाहा, जहाँ चाहा, बुला लिया। ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, अपने-पराये से हटकर थे। चर्चाएँ चलती रही। अंततः गीली आँखों से लोगों ने विदा किया।

                             श्राद्धकर्म की पूर्णाहुति के पूर्व दान-दक्षिणा की तैयारी चल रही थी। तकिया, तोषक-पलंग से लेकर बर्तन-बासन तक एक सिरे से पसरा था। अपने जीवनकाल में जिन-जिन वस्तुओं का उपयोग वे किया करते थे सारी चीजें चाहिए थीं। लड़के सुखी-संपन्न हैं, श्राद्धकर्म में दान प्राप्त करने वाले ब्राह्मण ने स्वर्ण अंगूठी, कोर्ट-पैंट, काली गाय, महंगे वस्त्र व नकदी के हजारों रुपये मांग डाले। जितनी चीजें दान करें, उनकी आत्मा को उतनी ही शांति मिलेगी? लड़कों ने अपने हाथ खोल दिये। जिन-जिन वस्तुओं की मांग की जाती, बिना देर किये उसे पूरा कर रहे थे।  श्राद्धकर्म में दान प्राप्त करने वाले ब्राह्मण का लालच बढ़ता ही चला गया। तभी एक हाथ दान प्राप्त करने वाले ब्राह्मण के कंधे पर आकर टिक गया।

 पिताजी?

पीछे मुड़कर देखा, आँखों में आँसू लिये जवान बेटा खड़ा था। अतीत के खयालों में खो गया ब्राह्मण। वर्षों पूर्व एक दुर्घटना में गंभीर रुप से घायल हो गया था बेटा। फूटी कौड़ी नहीं थी पास में। महीनों तक डॉक्टर साहब निःशुल्क इलाज करते रहे। महंगी-महंगी दवाईयाँ दी। जब तक ठीक नहीं हो गया, अपनी देख-रेख में रखा। उन्हीं की कृपा थी, बाप के कार्यों में बेटा आज हाथ बँटा रहा था। बेटे की आँखों में आँसू देख ब्राह्मण सब कुछ समझ चुका था।

शर्त

जगेसर भाई से जब भी मुलाकात होती उनके हाथ खैनी से सने होते। लम्बे अर्से बाद एक दिन अचानक मुलाकात हो गई। राम-सलाम हुआ। इस बार हाथ बिल्कुल साफ-सुथरा था। घोर आश्चर्य हुआ।

“जगेसर भाई यह क्या? आपने बंद कर दिया क्या खाना?”

पहले तो समझ नहीं पाए, फिर कहा, “हाँ ऐसा ही कुछ है।”

“कैसे लिया इतना बड़ा निर्णय?”

तनिक मुस्कुराए, फिर सुनाया, “मेरे दो बेटे हैं। बड़ा बेटा बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि रहा, छोटा मेहनती किन्तु अति साधारण। लोग कहते, छोटे बेटे पर ध्यान नहीं दे रहे। लोगों की बातों से मायूस हो जाता था। जितनी मेहनत कर सकता था, करता, परंतु अंक अच्छे प्राप्त नहीं हो रहे थे। वह खुद भी चिन्तित था।”

“ ... मैं यदा-कदा बेटे को सांत्वना देता - कोई बात नहीं, मेहनत से जी नही चुराते। एक दिन की बात है, अपने-अपने कमरे में बच्चे पढ़ रहे थे। मैं खैनी लटाते-लटाते छोटे बेटे के कमरे तक पहुँच गया। उसे पढ़ते देख काफी संतुष्टि मिली। पढ़़ने की यही तो उम्र है।”

“पढ़ने के क्रम में ही छोटे बेटे ने कहा, कितनी बदबू आती है मुँह से। पापा, छोड़ क्यों नहीं देते खैनी खाना?”

बेटे की बातों से मैं अंदर ही अंदर जलभुन गया। जुम्मा-जुम्मा आठ दिन हुआ क्या जन्मे, चले मुझ ही को समझाने। हँसते हुए फिर भी कहा - बिल्कुल छोड़ दूँगा,
मेरी भी एक शर्त है।”

“छोटे बेटे ने पूछा, क्या शर्त है?”

“इस वर्ष कक्षा में प्रथम आए तो समझो परिणाम के दिन से ही खैनी खाना छोड़ दूँगा।”

बच्चा पशोपेश में पड़ गया। शर्त काफी कठिन। गंभीर हो वह सोचने लगा। बात आई-गई, खत्म हो गई। जगेसर भाई भी सबकुछ भूल चुके थे। कछुआ गति से ही सही, बेटा जुड़ा रहा गंभीर स्टडी से। परीक्षा संपन्न हुई। परिणाम ने सबको चैंका दिया। कक्षा में प्रथम स्थान से उत्तीर्ण हुआ था वह। जगेसर भाई काफी प्रसन्न हुए। उनकी शर्तों पर बच्चा खरा उतरा। अगले वर्ष भी परिणाम काफी सराहनीय रहा। इस बार स्कूल टॉपर निकला। सफलता की सीढ़ियाँ लगातार चढ़ता जा रहा था। फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा कभी। कॉलेज तक की पढ़ाई में अव्वल था। इधर जगेसर भाई सुधरने का नाम ही नहीं ले रहे थे। खैनी खाने की पुरानी आदत जो बनी हुई थी।

वर्षों बाद खैनी सना हाथ देखकर छोटा बेटा फिर एक दिन टोक बैठा, “पापा?”

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