मेरे प्रिय भाई

मेहेर वान

- मेहेर वान

नेहरू चाहते थे कि आज़ादी के बाद भारत आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी सहित सामरिक स्तर पर भी मजबूत बने। सन 1948 में ही देश में परमाणु ऊर्जा कमीशन बना दिया गया था, जिसके पहले चेयरमेन डॉ होमी जहाँगीर भाभा थे। यह तथ्य कमाल है कि जहां एक तरफ कुछ विद्वान देश का संविधान बन रहे थे और दूसरी तरफ कुछ वैज्ञानिक देश को परमाणु ऊर्जा से सक्षम बनाने का खाका तैयार कर रहे थे। तमाम राजनेताओं ने उस समय नेहरू का मज़ाक यह कहते हुए उड़ाया था, “नेहरू उस देश को परमाणु ऊर्जा से चलाने की सोच रहे हैं जो अभी बैलगाड़ी पर चल रहा है।” नेहरू की दूरदर्शिता का अंदाजा लगाते हुए बहुत आसानी से आश्चर्यचकित हुआ जा सकता है।

यह पत्र पहले गोपनीय था बाद में जिसे सार्वजनिक कर दिया गया। इस औपचारिक गोपनीय पत्र में होमी भाभा देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को 'प्रिय भाई' कहकर संबोधित कर रहे हैं। यह उस पत्र का जवाब है जिसमें नेहरू ने परमाणु ऊर्जा कमीशन के प्रमुख और अपने मित्रवत वैज्ञानिक होमी भाभा से एक किताब में लिखी गई कुछ बातों के बारे में चर्चा की थी जो कि एक अमेरिकी पत्रकार एडगर स्नो ने लिखी थी। यह किताब विश्व में परमाण्विक हथियारों के विकास और उसके प्रभावों पर लिखी गई थी। यह काबिल-ए-तारीफ़ है कि कोई राजनेता कितनी बारीकी से वैश्विक मुद्दों के बारे में व्यक्तिगत स्तर पर वैश्विक विद्वानों के विचारों पर नज़र रखता था और अपने सहकर्मी विशेषज्ञों से विस्तृत जानकारी मांगता था। यहाँ यह भी गौर-तलब है कि सन 1963 में ही भाभा परमाण्विक हथियारों की महत्ता और उनके भारत में निर्माण की संभावनाओं पर चर्चा कर रहे हैं।   

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बोम्बे -1
परमाणु ऊर्जा कमीशन, भारत सरकार

गोपनीय

अध्यक्ष
सन्दर्भ: 5-12463
अगस्त 2, 1963

मेरे प्रिय भाई,

26 जुलाई को भेजे गए पत्र के लिए शुक्रिया, जिसमें आपने एडगर स्नो की किताब “नदी के उस पार” के संक्षिप्त हिस्से भेजे थे। मैंने इन उद्धरणों को अत्यंत रुचि के साथ पढ़ा।

2. मैंने ध्यान दिया कि जब जनरल इलैक्ट्रिक कंपनी और कई अन्य स्त्रोत यह सोचते हैं कि चीन ने नाभिकीय यन्त्र का विस्फोट सन 1963 में ही कर लिया था, स्नो खुद यह अंदाज लगाते हैं कि चीन सन 1964 अथवा 1965 के पहले सफल नाभिकीय परीक्षण नहीं कर पायेगा, और यह कि बड़ी मात्रा में (नाभिकीय यंत्रों का) संग्रहण सन 1967 अथवा 1968 तक ही संभव हो सकेगा।  

3. स्नो कुछ ऐसे विचार भी प्रस्तुत करते हैं जो खुद मैंने कई मौकों पर आपसे व्यक्त किये हैं। चीन के द्वारा किये गये नाभिकीय परीक्षण सैन्य स्तर पर महत्वपूर्ण नहीं होंगे, और और अगर होते भी हैं तो कुछ बमों का संग्रहण सैन्य परिदृश्य में कोई खास बदलाव नहीं ला सकता, क्योंकि, यदि चीन किसी पडोसी देश पर परमाणु बम से हमला करता है तो मेरे हिसाब से यह ज़रूरी तौर पर पश्चिम की तरफ से बहुत ताकतवर प्रतिक्रिया का न्यौता होगा, और विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका की तरफ से। चीन की इस आक्रामक क्रिया की स्थिति में, मैं नहीं सोचता कि सोवियत रूस भी चीन की मदद के लिए आगे आएगा और वैश्विक युद्ध के आसार बनाएगा, ऐसे में खुद उसे (रूस को) भी बहुत गंभीर तबाही झेलनी पड़ेगी। यद्यपि, स्नो बहुत सही तरीके से इशारा करते हैं कि “इस नजरिये से चीन में बने नाभिकीय यन्त्र के मनोवैज्ञानिक-राजनैतिक प्रभाव गणना के हिसाब से अभूतपूर्व होंगे। इसका मतलब यह होगा कि इतिहास में पहली बार एक एशियन कम्युनिस्ट मत, एक नस्लीय मत, एक गरीब तबके के मत से अंततः गोरे लोगों की आतंकी एकसत्तात्मकता का अंत होगा और इस प्रकार चीन और उसके सहयोगियों पर इस आतंक के धमकी के रूप में इस्तेमाल होने का भी अंत होगा।” (हमारे ऊपर) यह एक मनोवैज्ञानिक-राजनैतिक दबाव है कि हमें इसका जवाब देने के लिए तैयार होना पड़ेगा। मेरा झुकाव इस विचार की तरफ है कि वर्तमान समय में हम इतना ही कर सकते हैं कि हम यह दिखावा करें कि यदि चीन इस तरह के (नाभिकीय) यन्त्र का विस्फोट कर सकता है तो हम भी कुछ ही महीनों के भीतर यह विस्फोट करने में पूर्णतः सक्षम हैं। इसका मतलब यह होगा कि हमें अपनी सद्भावना और परमाण्विक हथियार नहीं बनाने सबंधी इरादों को प्रदर्शित करते हुए तुरंत ही नाभिकीय परीक्षण के प्रतिबन्ध सम्बन्धी समझौते पर हस्ताक्षर कर देने चाहिए, लेकिन हमें हस्ताक्षर करते समय यह भी स्पष्ट कर देना चाहिए कि कोई भी पडोसी देश, यदि परमाण्विक परीक्षण के लिए विस्फोट करता है तो इस स्थिति में हम भी अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करने के लिए खुद को स्वतन्त्र मानेंगे। मेरा ऐसा मानना है कि हमारी इस घोषणा का अमेरिका और सोवियत रूस भी स्वागत कर सकते हैं, क्योंकि इसके प्रभाव उस पडोसी को रोकने में संभव होंगे जो कि इस आधार पर नाभिकीय हथियार पाने के प्रयास कर रहा होगा कि भारत भी नाभिकीय हथियार बनाने के लिए विस्फोट करने की दिशा में विकास कर रहा है, यह जानते हुए वे तब तक नाभिकीय विस्फोट करने से रुकेंगे जब तक भारत ऐसा नहीं करेगा। हमारे द्वारा इस परीक्षण प्रतिबन्ध समझौते पर हस्ताक्षर करना और उपरोक्त घोषणा करना, चीन पर कितना प्रभाव डालेगी यह तो कह पाना संदेहास्पद है लेकिन इस तरह के किसी समझौते पर हस्ताक्षर करना हमारे लिए किसी भी तरह से अतार्किकपूर्ण नहीं है, क्योंकि इस स्थिति का केवल एक मात्र प्रभाव अन्य देशों को नाभिकीय हथियारों की ओर अग्रसर होने की दिशा में उत्साहवर्धन के बजाय उन्हें रोकना मात्र होगा।           

4. यदि चीन परमाणु परिक्षण करने से खुद को नहीं रोक पाता है और 1967 अथवा 1968 तक नाभिकीय हथियारों के नियमित निर्माण की कार्यवाही करता है, तब एक नई स्थिति सामने आ पड़ेगी, जिसकी और स्नो ने इशारा किया है। यदि हमारे पास तब तक कोई नाभिकीय क्षमता नहीं होती है, तो उस स्थिति में शक्ति के संतुलन का पलड़ा चीन के पक्ष की तरफ झुक जाएगा। तब तक के लिए चीन किसी भी नाभिकीय रूप से सक्षम देश जैसे अमेरिका और सोवियत संघ पर हमला करने की गलती नहीं करेगा, यह बिना नाभिकीय क्षमता वाले देशों पर हमला ज़रूर कर सकता है, जैसे कि एशिया में, यह जानते हुए कि ऐसी परिस्थितियों में चीन को डराने और बदला लेने की स्थिति में अमेरिकी नाभिकीय क्षमता चीन के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होगी। हालांकि चीन में होने वाला विध्वंस अमेरिका में हुए विध्वंस से कई मायनों में अधिक होगा, ऐसा होने पर भी अमेरिका को दिए गए घाव अमेरिका के स्तर पर ऐसी किसी भी क्रिया को संभव कराने जितनी गंभीर नहीं होगी। अगर दूसरे शब्दों में कहा जाए तो इस प्रकार चीन न्यूनतम नाभिकीय निवारण की मुद्रा वाली स्थिति में होगा जिस परिस्थिति में आज सोवियत रूस है। इसका विरोध केवल वह देश कर सकेगा जिसपर कि हमला होने की सम्भावना बहुत अधिक होगी जैसे कि भारत, जो कि खुद न्यूनतम नाभिकीय निवारक होने की क्षमता रखने वाला है। 

5. मैं चाहता हूँ कि इस पर कमीशन विचार करे और मैं आपको इस विषय में औपचारिक टिप्पणी के द्वारा सूचित करूँ। नाभिकीय परीक्षण प्रतिबन्ध समझौता पर हस्ताक्षर करने की इच्छा को इतना महत्व देते हुए, हम सब कुछ वास्तविक हस्ताक्षर करने के समय के लिए ही न छोड़ दें, हमें इन सारे बिन्दुओं को बहुत अच्छी तरह, सावधानी से परखना है। मुझे आशा है कि इस समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर करने से पहले मुझे आपसे साथ इस विषय पर वार्तालाप करने का अवसर प्राप्त होगा।    

आपका सस्नेह 
होमी भाभा

श्री जवाहर लाल नेहरु
प्रधान मंत्री, नई दिल्ली

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