कहानी: मिलन हो कैसे?

कादम्बरी मेहरा
- कादम्बरी मेहरा

कॉलोनी में घुसते ही, बाईं ओर, एक कतार से इंजीनियरों की नई कोठियाँ बनाई गईं। इनसे करीब पचास गज परे रेलवे लाइन थी और बीच में सदाबहार खरपतवार का जंगल। यानि दूसरे शब्दों में कहें तो विश्व के सबसे लम्बे, सबसे प्रसिद्ध, सार्वजनिक शौचालय का एक टुकडा, यानि भारतीयों के दैहिक सम्मान का अनावृत्त कब्रिस्तान!

 पी डब्ल्यू डी के ठेकेदारों ने इस जंगल में सुबह शाम विचरण करनेवाले 'छोटे लोगों' को समर्थ सम्पन्न अफसरों के लिए मूलभूत ख़तरा मानकर एक दस फुट ऊँची दीवार खींच दी। इस दीवार का एक उद्येश्य यह भी था कि सभी सम्मानित सभ्य ऊँचे लोग 'नीचे लोगों' की नग्नता व गन्दगी न देखें।

 नीवें खोदने व पुराने रेलवे क्वाटर गिराने से जो मलबा निकला उसे दीवार के उस पार पसा दिया गया जिससे करीब दस पंद्रह फुट चौड़ा समतल रास्ता बन गया जो बाक़ी जंगल से चार फुट ऊंचा बैठता था। यह रास्ता कहीं नहीं जाता था फिर भी उस पर आमदरफ्त बढ़ने लगी। रास्ता पक्का चबूतरा बनता चला गया।

 कोठियों में आकर बसने वालों ने अपने घरों के पीछे बने नौकर निवास कॉलिज के लड़कों को किराए पर देकर आमदनी बना ली। अब बेचारे नौकर कहाँ जाते?

 कलवा जमादार तब केवल अठारह बीस साल का लड़का ही था। कहीं भी रैनबसेरा कर लेता था। मगर एक बार जब सावन में घर गया तो माँ ने उसका गौना करवा दिया। आखिर माँ को उसकी रोटियों की चिंता थी। कलवा पतली-दुबली, पायल-छनकाती लुगाई के साथ शहर वापिस आ गया। मालिकों ने उसे बहुत सा पुराना धुराना कपड़ा लत्ता दिया मगर रैन बसेरा? भला चमार को कौन रखे?

मलबे के ढेर में से साबुत साबुत ईंटें छाँट छूंट कर और कुछ शहर के अन्य निर्माणाधीन भवन स्थलों से चोरी करके कलवा ने कॉलोनी की दीवार से सटाकर दो दीवारें खडी कर लीं। चार छै दिनों में एक घर जैसी आड़ खड़ी हो गयी। उसपर बांस डालकर पहले केवल एक पुरानी चादर तानी छत के नाम को फिर जोड़ जुगाड़ करके एक टीन का छप्पड़ डाल दिया। सामने बोरी का पर्दा तान लिया। लो जी! इंसान की मूलभूत आवश्यकता ---प्रजनन --- को ढंकने का साधन जुट गया।

 प्रजनन! जिसके निर्जीव पत्थर के स्वरूप को शिवलिंग मान कर भारत भर में अरबों की लागत से हजारों बेजोड़ मंदिरों का निर्माण होता आ रहा है युगों से!

 कलवा की लुगाई, लछमी, चूल्हा तो फिर भी बाहर ही जलाती थी ताकि घर में धुआँ न भरे। उसके घर के सामने सीधे हाथ को मिस शीला डिसूज़ा का मकान था। अपनी छत पर खड़ी होतीं तो वह उसके घर के अन्दर तक देख सकती थीं। लछमी मेहनती थी मगर बेहद अज्ञानी। दिन बीते, एक एक करके घर का सामान बढ़ने लगा। साथ ही लछमी का पेट भी। कलवा ने हुमककर दुकानों का काम भी पकड़ लिया। जिम्मेदारी से माल पहुँचाने रखवाने में पैसा भी ज्यादा था , जूते लात भी नहीं थे और देह पर उजला कपड़ा भी नजर आने लगा। वार त्यौहार को इनाम इकराम भी मिल जाता था।

 जवान लछमी, घर पर अकेली, धूप की तलाश में शीला जी के मोटरखाने के सामने बनी पक्की सड़क पर आ बैठती। वहीं कंघी पट्टी करती, धुली धोती और कमीज फैला देती। शीला जी उदारमना स्त्री थीं। बचा खुचा नौकरानी मंजू के हाथ उसे भेज देतीं थीं। लछमी शर्म की मारी उन्हें देखकर सिर पर पल्ला ढँक लेती। शीलाजी इसी को सबकुछ समझ लेतीं - नमस्ते भी और धन्यवाद भी। दो मिनट चुप खड़े रहकर लछमी मुँह घुमा लेती जानो उसकी तरफ से बाय बाय हो गया।

 एक दिन सुबह ग्यारह बजे शीलाजी बाज़ार जाने लगीं तो लछमी के झोंपड़े से कराहने की आवाज़ आई। वह जैसे इसी का इंतज़ार कर रही थीं। रिक्शेवाले को भेज दिया और सीधे लछमी के बोरेवाले परदे के पीछे झाँका। लछमी जमीन पर चटाई पर लेटी प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी। शीला जी ने मोबाइल पर फोन करके डा ० शैल को बुलाया। मित्रता के नाते उन्होंने सरकारी दाई को फ़ौरन भेज दिया।

 यूँ नताशा का जन्म हुआ! नंगी चटाई पर! बुझे हुए चूल्हे के सामने! बोरी की आड़ में! तपती टीन की छाँव में! निःसंतान शीला जी के सामने!

 दाई को पच्चीस रुपये देकर शीलाजी ने बच्ची को हाथ पोंछने के तौलिये में समेट लिया। माँ की हालत कमजोर थी, बच्ची मरणासन्न! मगर समाजसेवी शीला जी कटिबद्ध थीं दोनों के जीवनोद्धार के लिए। वर्षों से दबी कुँआरी ममता ढलती उम्र की परतें फोड़कर, फव्वारे की तरह फूट पड़ी। हर संभव चेष्टा, हर संभव सहायता, हर संभव उपकार। समय का कोई प्रश्न नहीं। नौकरानी मंजू ने अपने चार बच्चों के अनुभव को समूचा नन्हीं सी जान पर उँडेल दिया। दो महीने की होते न होते लछमी अपने पैरों पर खड़ी होने लायक हुई। मोहल्ले भर की सहायता से कुछ बचा खुचा, कुछ दान पुण्य का, जोड़ तोड़ कर दो बखत की रोटी चल ही जाती। नताशा का नाम शीला जी ने ही रखा। एक बार डॉ शैल ने उसे खतरे से बाहर करार दे दिया तो बस चल निकली। चन्द्रकला सी बढ़ने लगी। डॉ शैल ने लछमी को सरकारी भत्ता भी दिलवा दिया।

 कलवा ने नलका लगवा दिया। नताशा के भाग्य से उसकी आमदनी अच्छी हो गयी मगर सोहबत खराब! रोज शराब पीकर घर आता। लछमी कुछ बोलती तो उसे मारता। आस पड़ोस वाली कामवालियों ने समझाया, अपनी इज्जत रखनी है तो मरद के मुँह न लगे भले ही दूसरी कमाई कर ले। लछमी ठहरी चमारी, उसे गुसलखाने साफ़ करने का काम मिल गया। नताशा दो साल की हुई तो उसका भाई भी आगया। बेटे के आने की खुशी में कलवा ने एक और कच्ची पक्की दीवार खींचकर एक और कमरा खड़ा कर लिया।

 तभी एक नंबर की कोठी के बड़े साहब का तबादला हो गया। नए इंजीनियर ने अपने घर के क्वार्टर में वर्षों से रहते मिस्सर और मिसरानी को निकाल बाहर किया। कहाँ जाते बेचारे! किसी ने सलाह दी कलवा की तरह तुम भी घर बना लो। मिसरानी चार घर चौका बर्तन करती थी। दो लड़के। सुबह शाम की ड्यूटी। दूर कहाँ जाती, वहीं आ गयी। उसी तरह कच्चे पक्के दो-ढाई झोंपड़े और सामने वाली खाई में ही नलका लगवा लिया। लछमी का नलका उनकी जात का नहीं था। हालाँकि सरकारी पाइप से जोड़कर खींचा गया था।

 लछमी की जात थी, नलके की जात थी, मगर गेंद-तड़ी के खेल की जात नहीं ठहराई कभी किसी ने। न ही बरसते पानी में नहाने की, न सिकड़ी की, न सूखे पत्तों की होली जलाकर आग का तमाशा देखने की। मिस्सर जी के छौने और नताशा संग खेलते। मिस्सर जी चार पोथी पढ़े लिखे थे। सुबह शाम दोनों लड़कों की पढाई पर ध्यान देते। वह दोनों सरकारी स्कूल जाते थे मगर नताशा जिदियाती ही रह गयी स्कूल जाने के लिए। कलवा ने न मानी। मिस्सर जी का बड़ा लड़का रामू - राम शरण मिश्रा, नताशा के बिना न रह पाता। नताशा के बाल बिखरे, पाँव में कैंची चप्पल, एक पैर की नीली एक पैर की लाल, सर में जुएँ खुजाती, रामू की बाट देखती। रामू की माँ उसे घर में न आने देती मगर रामू को बाहर खेलने से कभी न मना किया।

 इन्हीं घरौंदों में जीवन के तमाम खेल चलते। मेहमान भी आते, टेलीविजन और मोबाइल भी। मिस्सर जी को शीला जी ने लड़कियों के छात्रावास का रसोइया बनवा दिया। आठ हजार तनखा हो गयी। नताशा ने माँ की रसोई में से चुराई हुई दियासलाई से खेलना बंद कर दिया। उसे कंघी करने की अकल आ गयी। शीला आंटी ने दांतों में ब्रश करना भी सिखा दिया मगर बहुत समझाने पर भी कलवा उसे स्कूल भेजने को तैयार नहीं हुआ। न ही उसकी शराब छूटी, न लछमी को लताड़ना छोड़ा और न ही बच्चे पैदा करने बंद किये। नताशा के आठ बरस के होते न होते चार और नाक सिनकते, धूल-धूसरित, अधनंगे नमूने इकट्ठे कर लिए। नताशा के लिए सब खेलकूद के साथी संगी। चार साल की उम्र से वह सबसे छोटे को खिलौना समझकर गोद में उठाये फिरती। गली के कुत्तों को ढेला मारकर अपने और अपने बहन भाईयों के भोजन से हटाती। अमरुद के पेड़ पर चढ़ कर कच्चे अमरुद तोड़कर उन्हें खिलाती। बकरी के बच्चे पकड़ लेती या कुत्ते के पिल्ले के गले में रस्सी बाँधकर खेलती। रामू उसका भी गुरु। रामू का छोटा भाई मुरलीधर - खबरी भी, चुगलखोर भी।

 जाने कब रामू की गिरफ्त में कसाव आ गया। बात छुल-छुलाई की ही थी मगर रामू उसे छूकर भागता नहीं, टटोलता। नताशा को झुरझुरी आ जाती। वह सिकुड़कर गठरी बन जाती। रामू शुरू-शुरू में सहमकर छोड़ देता मगर दिन-ब-दिन उसकी ढिठाई बढ़ने लगी। नताशा उसे दाँत काट लेती या पंजे गड़ाकर अपने को छुड़ा लेती। मगर दोनों में से किसी का गुस्सा ठहर नहीं पाता। रामू उसे ही खोजता वह जान बूझकर उसे छकाती। मौका मिलते ही रामू उसे जकड़ लेता। वह खिल-खिल हँसती। दोनों हाथों से उसे मारती। जितना मारती उतना ही रामू उसे दबोचता। एक दिन लछमी ने देख लिया। कान पकड़ कर अन्दर ले गयी और स्त्री की मर्यादा का पहला और आख़िरी सबक सिखाया।

 “बदनामी हुई जाई तो कौनो बियाह नाहीं करिहै समझी!” नौ बरस की नताशा आकाश पर उड़ती उड़ती ज़मीन पर आ गिरी। लछमी रोती हुई शीला जी के पास आई। उन्होंने नताशा को अपने पास रख लिया। रसोई में छोटा मोटा काम करना सफाई, कपड़े तहाना वगैरह सीखती, टेलीविजन देखती। सलेट पर अपना नाम लिखना सीख लिया। मगर रह-रह कर छत पर दौड़ जाती कि कहीं रामू दिख जाए। एक दिन रामू घर के पीछे संडास के बम्बे के सहारे छत पर चढ़ आया। नताशा को दबोचकर बैठ गया। नताशा उससे चिपटी रही। न मारा न नोचा। न दाँत काटा।

 “रामू तू रोज़ आयेगा?”

 “हाँ।”

 नताशा शीला जी के फ्रिज में से फल चुराकर उसे खिलाती। वह खाता तो एकटक उसे निहारती। वह आग्रह करता, “आज गेंद-तड़ी खेलने आयेगी? ”

 “न! माँ मारेगी।”

 खबरी ने मिसरानी को बता दिया। “भैया हाथ पैर तुड़वाय के मानेंगे। रोज़ बम्बा पर चढ़त हैं। ऊ छोकरिया केला संतरा खिलात है। कभी बिस्कुट कभी दालमोठ।”

 “हाय हाय! चमारी के हाथ का? ”

 “कौन उसका रहै। माल तो शीला आंटी का रहा।”

 “ऊ हौ किरिस्तानी हैं। मिस्सर जी कौनो उपाय कीजे। बहुत हुआ। लड़का पढाई से निकल गया तो भविस्स खराब। कहाँ आप सरकारी नौकरी के सुपना देखे रहे।”

तेरह साल का रामू दस बरस की नताशा से जुदा हो गया। मिस्सर जी ने डाक्टरों के मेस में नौकरी हासिल कर ली। अपनी जगह मिसरानी को लगवा दिया। शहर के किस कोने में जा बसे किसी को नहीं बताया।

 कलवा के सात बच्चे हो गए। किसी के पास स्वेटर, किसी के पास पैजामा। लछमी की चीख पुकार वैसी ही बरकरार। नताशा शीला जी के घर में बड़ी होती गयी। माँ का घर भी वह सँवार कर रखने लगी। भाई बहनों को समझाती। तरीका कायदा सिखाती। गंदे घूमने से हटाती। सलेट पर नाम लिखना सिखाती। चौका चूल्हा बेटियों ने सँभाल लिया तो लछमी ने और चार घरों में सफाई का काम पकड़ लिया।

 जैसे जैसे नताशा का शरीर बदलने लगा उसकी यादों का दंश गहराने लगा। उसका अंग-अंग, रोम-रोम रामू को माँगता। रामू, रामू और रामू! कभी-कभी छुप-छुप कर रोती। माँ ने देखा तो गरिया उठी, “ए लड़की, ऊँची जात वाले सिर्फ फायदा उठाना जानते हैं। भूल जा रामू को, ऊ कुलच्छ्ना रहा। खराब बात किये रहा।” फिर सर पर हाथ फेर कर प्यार से बोली , “तोरे मामा आवें तो तोरे वास्ते हम भला घर देख के तोरी सादी करावेंगे।”

 नताशा पर जैसे परियों की छाया पड़ गयी हो। उजले दाँतों वाली उसकी निश्छल हँसी, घने घुँघराले बाल, छोटी छोटी चमकीली आँखें और भरे भरे गाल! उम्र का लोच कमर में। समझदारी की गंभीरता चेहरे पर संजोये वह घर के बाहर कम ही दिखाई देती थी।

 एक दिन शाम को कलवा कहीं से पी कर आया। लछमी के रोने चीखने का बखेड़ा सुनकर शीला जी ने मंजू को भेजा कि सबके खाने पीने का समय है सब अपने परिवार में मगन हैं और यह लोग बेकार का कोहराम मचाये पड़े हैं। मंजू दसेक मिनट बाद वापस आकर चुप चाप रसोई घर में चली गयी। कलवा के घर से भी आवाजें आनी बंद हो गईं। खाना खाते हुए शीलाजी ने किस्सा पूछा तो मंजू टालती हुई बोली कि आप ज्यादा ही मुँह लगाती हैं इन लोगों को। कलवा ही कुछ किये हैं। छोडिये हम चुप करा आये हैं। शीलाजी ताड़ गईं की मामला गंभीर है। वरना लड़ाई झगड़े की खोल फरोल मंजू से अधिक कौन कर सके भला। जरूर कुछ छुपा रही है। अगले कुछ दिनों एकदम सन्नाटा छाया रहा। नताशा बुलाने पर भी नहीं आई। न ही और कोई बच्चा।

 सुबह चार बजे से अजान की आवाज़े लाउडस्पीकर पर शुरू हो जाती हैं। उधर से गुरुद्वारा और शिवमंदिर भी बदों-बदी भगवान् को जगाते हैं। शीला जी को हफ्ते में दो दिन योग की बैठक में जाना होता है। अतः वह मुँह अँधेरे जरूरी कामों से निपटकर तैयार हो जाती हैं। कॉलोनी का चौकीदार पहरा ख़तम करके जा चुका होता है। अलबत्ता रेल की पटरी के जंगल में जाते हुए बुत्त पानी की बोतलें लटकाए, चुपचाप सरकते नज़र आ जाते हैं। दो फर्लांग की सीधी सड़क पर सन्नाटा होता है और कॉलोनी के अंतिम छोर तक सीधा सब कुछ देखा जा सकता है। एक दिन सुबह झुटपुटे में उन्होंने देखा कि वहाँ एक कार रुकी और उसमे से एक बुर्केवाली उतरकर कुछ दूर तक अन्दर आई फिर एक ओर को निकल गयी। तीस बरस में पहली बार कोई बुर्केवाली इधर नज़र आई। सवाल बना ही रहा उनके मन में।

 कलवा परिवार जैसे उनसे छुप रहा हो। उनकी चुप्पी बड़ी अजीब थी। कई बार मंजू से पूछा पर वह टाल गयी। शीला जी ने हमेशा की तरह अपने जन्मदिन पर केले मंगवाकर बाँटे तो बच्चे आ गए। पाँच-छह बरस के सबसे छोटे ने चहक कर कहा, “अम्मा के लिए भी दो।”

“उसे बुलाकर लाओ।”

“ऊ घर पर नहीं है। बप्पा से मिलने जेल गयी है।”

“जेल? बप्पा कब गए जेल?”

“बहुत दिन हो गए। चोरी किये रहे।”

“और नताशा? ”

“बप्पा एक दिन आये रहे। उसे भी ले गए जबरजस्ती।”

“क्या? नताशा जेल में है?”

“नहीं। कभी कभी आती है। उसका ब्याह कर दिए बप्पा।”

“किससे?”
अब बच्चा घबरा गया। उसे उत्तर नहीं पता था बड़ी बहन माया उसे बरजने लगी। शीलाजी ने मंजू को पूछा तो उसकी आँखें भीग गयी। बोली, “आंटी, नताशा को भूल जाईये। उसकी किस्मत जहाँ लिखी थी उसे वहीं ले गयी। हम कुछ बोलें इससे तो आप खुद ही देख लीजियेगा।”

शीलाजी का मन कच्चा होने लगा। नताशा को वह बुरी तरह मिस कर रही थीं। दो चार दिन बाद देखा रात के अँधेरे में कलवा की झोपडी से एक बुर्केवाली रात के अँधेरे में निकली और रेल की पटड़ी के समानांतर चलती हुई दूर पर कॉलोनी के बाहर जानेवाली सड़क पर मुड़कर ओझल हो गयी। सामने से आती रेलगाड़ी की तेज रौशनी में उसका काला बुर्का भी पारदर्शी हो गया। शीला जी को दो और दो चार जोड़ने में देर नहीं लगी। सुबह अँधेरे में कार से उतरनेवाली और अभी अँधेरे में घुल जाने वाली मूरत उनकी जानी पहचानी नताशा ही थी।

 कॉलोनी के बाहर दिगपाल राठौर की गाड़ी ठीक रात के नौ बजे आकर खड़ी हो जाती। नताशा बुर्के में चुपचाप पिछले रास्ते से आती और उसमे बैठ जाती। ड्राईवर पहले उसे बंधे के पुल के पास बनी झुग्गी झोंपड़ियों में सलमा मैडम के ढाबे पर ले जाता। बंधे के उस पार नया नगर-विस्तार गगन चुम्बी इमारतों से पाटा जा रहा था। करोड़ों की लागत से गुलाबी पत्थर लाकर एक से एक होटल, मॉल, सड़कें, पार्क, और अनगिनत मूर्तियाँ जड़ दी गईं थीं मगर बंधे के पुल के इस तरफ? मजदूर बस्ती और स्लम! बिना लगत का शहर जहाँ होटलों की ऐय्याशी भी, मॉल के फैशन भी, और सड़कों की चहल पहल भी, रात के अँधेरे में दहकते चहकते। सरकारी पोलों से चुराई बिजली से जगमगाता यह दलित नगर अनेकों तरह की मस्ती सस्ते में परोसता था। दिन के उजाले में यहाँ सिर्फ सब्जीवाले सड़क के दोनों ओर पसरे नज़र आते थे।

 सलमा मैडम का आदमी किशोर टोपीवाला, मुगलई खाना बनाता था। शहर भर के पैसेवाले शाम पड़ते ही खाने पीने या 'ले जाने' के लिए कारों में बैठ-बैठकर वहाँ आते थे। जहाँ ग्राहक पड़ता हो वहाँ क्या न बिकेगा? सलमा मैडम बेहद मिठबोली थीं। ढाबे के पीछे बने दो टीन शेड अन्दर से खूब साफ़ सुथरे सजे हुए थे। दो प्रौढा, साड़ीवालियाँ जवान लड़कियों को नख-शिख सजाती थीं। इस काम में आनेवाली सब स्त्रियाँ किसी न किसी फ़िल्मी नाम से जानी जाती थीं। नताशा का नाम ' रेखा ' पड़ गया। रोज रोज उसका लिबास बदला जाता।

नताशा नई थी इसलिए उसका ख़ास ख्याल रखा जाता हालाँकि उससे गोरी और सुन्दर और भी थीं। मैनीक्योर, पैडीक्योर, बालों का स्टाइल, पोशाक आदि को खुद सलमा मैडम चेक करती थीं। तमीज से बात करना सिखातीं। शराब के पेग बनाकर पेश करने के लिए ही उसे कई सेशन करने पड़े। अंग्रेजी के शिष्टाचार सीखने पड़े। सलमा मैडम की ख़ास हिदायत थी कि फोटो न खींची जाय। फोटो खिंचाने का दाम उनके शरीर के उपयोग के दाम से भी अधिक रखा हुआ था।

 तैयार होकर लडकियाँ पुनः वैन में दिगपाल राठौड़ के घर लाई जाती थीं। यह दूसरा पड़ाव होता था। या यूँ कहिये 'वितरण विभाग '। यहाँ उन्हें 'भले लोगों' से मिलवाया जाता था। उसके बाद का काम एकदम सीधा और तय था। कोई सवाल नहीं। नताशा खुशकिस्मत थी। सलमा मैडम ने दिगपाल से पहले ही कह दिया था कि जबतक वे न कहें नताशा को कहीं और न भेजा जाय। सो नताशा - नई नवेली - एक बड़ी सी कोठी में जाने लगी। दिगपाल उसके मालिक को 'खडूस जैकरण' बुलाता था। खडूस सर्दी में पैजामा और अचकन पहनता था और गर्मी में धोती कुर्ता। पान की पीक अक्सर मुँह में भरे भरे ही बोलता था। अमिताभ बच्चन जैसी अंडाकार, खिचडी दाढ़ी- मूँछ के बीच उसके काले किष्ट दाँतोंवाली हँसी उसके काले रंग को और भी गहरा बना देती थी। एक दिन उसने नताशा से पूछा, “तेरा बापू घर आ गया क्या?”

“जी नहीं, अब तो छै महीने हो चले हैं।”

“च्च च्च च्च, ये पुलिसवाले बड़े हरामी हैं, पैसा लेकर भी कोई काम नहीं करते।”

“अम्मा की नौकरी भी और बच्चे भी ...”

“घबराओ नहीं, इंतजाम हो जाएगा।”

सो कुछ दिन बाद ही कलवा घर आ गया। मगर लछमी को कोई खुशी नहीं हुई। वही क्रम फिर दोहराया जाने लगा। पीना झगड़ना बच्चों की काँय-कचर। कलवा की लगी-बंधी छूट गयी थी। मंजू ने शीला जी को बताया की लछमी बच्चों को लेकर गाँव चली गयी और नताशा की छोटी बहन माया की शादी करा दी। पश्चात उसे माँ के पास ही छोड़ आई जबतक गौना न हो जाय। माया कुल जमा तेरह साल की होने आई थी। लछमी को बुलाकर शीलाजी ने डांटा नाबालिग की शादी क्यों की। लछमी रो रोकर बोली “ई बाप कसाई है आंटी। अब हम आपको अपनी का सुनावें। जवान होने से पहले ही सादी हो जाय तो अच्छा। इज्जत से जिनगी कटेगी। मेहनत करे ही परे, इहाँ भी उहाँ भी। गाँव माँ खाने की कमी न है।”

सलमा मैडम से कहकर नताशा ने वहीं एक झुग्गी में अपना डेरा डाल लिया। कलवा के संग रहना उसे असह्य था। सुनने में आया कि बड़े दो लड़कों को वहीं सलमा मैडम के ढाबे आदि पर रखवा दिया बर्तन सफाई के काम पर। कलवा निकम्मा चौड़ा होकर घूमता। नताशा इन अंधी गलियों में डगर डगर चलती रही। ईमानदारी तो कहीं भी न थी। अक्सर खडूस जैकरण की कोठी से रात के तीसरे प्रहर जब वह राठौड़ की गाड़ी से वापस आती, सलमा मैडम उसे पहले अपने पास बुला लेतीं जहाँ चोरी छुपे कोई दूसरा ग्राहक उसे निपटाना होता। खडूस ' इवेंट मैनेजमेंट ' का बिजनस करता था। पार्टियों में नाचने के लिए यही लडकियाँ, बिजनस की ऊँची डीलें करते समय डाइरेक्टरों के मनोरंजन के लिए यही , पार्टी राजनीति में जलूसों में नारे लगाने के लिए भी यही और धनी मृतकों की मुर्दनी में सफेदपोश रुदालियाँ भी यही। सौ रूप धरे जीने के लिए - - -

 मगर नताशा के सरपर तो जैसे परियों की छाया थी। और जैसा की परियों की कहानियों में अक्सर होता है, उसके साथ भी, कमोबेश, वैसा ही हुआ।

 इलेक्शन के दिन पास आ रहे थे। खडूस जैकरण सत्ताधारी पार्टी का चमचा था। विपक्षी दल इन दिनों सत्ताधारियों की पोल खोलने में जी जान से जुड़ा हुआ था। अतः अपनी कोठी पर चलने वाली सभी अनैतिक गतिविधियाँ उसने स्थगित कर दीं। खाने पीनेवाले छुटभैये बिलों में दुबक गए। पार्टी के नेता अपनी छवि धुली पुंछी चाहते थे। अतः सलमा मैडम के धंधे में मंदी का दौर आ गया।

 एक दिन उन्होंने उसे सजा सँवारकर नई चाल का सूट पहनाया और समझाया कि एक नए पुलिस अफसर को खुश करना है। जवान है। सजीला है। फाँस ले तो उसकी चाँदी ही चाँदी। यह धंधा पुलिसवालों की आँखों पर पट्टी बाँधने से ही चलता है। एक नई हौंडा सिटी कार उसे लेने आई। इस बार वह पीले रंग से पुते हुए सरकारी क्वाटरों वाली कॉलोनी में ले जाई गयी। एक खाकी वर्दी वाले हट्टे कट्टे सिपाही ने एक फ़्लैट का ताला खोला। सिगरेट के पुराने धुएँ की बास, धूल और कोनो में मकड़ी के जालों के फुनगे देखकर वह समझ गयी कि यहाँ कोई नहीं रहता। मगर एक कमरे में झाड़ू आदि लगाकर निवाड़ का पलँग डाल दिया गया था। जिसपर नया चादर तकिया बिछा था।

“आप बैठिये। साहब अभी आते ही होंगे।” कहकर वह आदमी बाहर जाकर बीड़ी पीने लगा।  नताशा सर झुकाए बैठी रही। कुछ देर बाद पुलिस की एक जीप आकर रुकी। उसमे से छह फुट लंबा, खूब तगड़ा एक पुलिस अफसर उतरा। बूट टकटकाता वह अन्दर आया। बाहर जो आदमी था उसे इशारे से बर्खास्त कर दिया। जीप भी चली गयी। उसने अन्दर से दरवाज़ा बंद कर लिया। नताशा उठ कर खड़ी हो गयी। हमेशा की तरह, सर झुकाए झुकाए ही उसने हौले से सलाम कर दिया। नफरत के इस खेल में उसे ग्राहकों के चेहरे पहचानने की कोई इच्छा कभी नहीं हुई। न ही कभी कोई चेहरा याद रखा।  उस आदमी के मुँह से बोल ही नहीं निकला। वह बस जड़ खड़ा खड़ा उसे निहारता रहा। नताशा खड़ी खड़ी कसमसाने लगी। उसने नज़र उठाई तो वह बोला, “तेरा असली नाम क्या है?”

 नताशा चुप रही। सलमा मैडम की ख़ास हिदायत थी कि असली नाम पता न बताया जाये।

 “देखो पुलिस अफसर से तुम कुछ नहीं छुपा सकतीं। साफ़ साफ़ बताओ तुम्हारा नाम क्या है।” अफसर का स्वर कड़क था।

 हथियार डालते हुए वह मिमियाते हुए बोली, “नताशा!”

 “और मेरा नाम नहीं पूछोगी?” अफसर की आवाज़ थरथरा रही थी जैसे रो पडेगा।  नताशा चौंक गयी मगर कुछ समझ नहीं पाई। अगले क्षण अफसर ने उसे कन्धों से झकझोरा, “देख! देख और पहचान! ”

 नताशा नहीं पहचानी। तब उसे पकड़ कर अफसर पलँग पर बैठ गया और अंक में दबोच लिया। नताशा के मुँह से अनायास निकल पडा, “रामू?”

 “हाँ मैं तेरा रामू! राम शरण मिश्रा। “उसने अपने होंठ नताशा के बालों में गड़ा दिए। कैसे न पहचानती नताशा उस स्पर्श को? कितने आये और गए। संगवार पक्षी के गुलाबी पंख से गर्दन सहलाने से लगाकर उसकी किशोर छाती की गाँठों को दाँतों से चिन्चोड़ने तक, स्पर्श के सभी प्रकार उसने झेले थे। मगर जो स्पर्श उसकी शिराओं में नशा बनकर दौड़ जाता था, जिसकी याद भर उसके मेरुदंड की कड़ियों में झंकार भर देती थी, जिसकी ताल पर उसका दिल धड़कता था, उसे क्या वह पहचानती नहीं? रामू की शकल क्या से क्या निकल आई थी। कैसा सजीला बाँका सिपाही था वह देखने में? नताशा की कल्पना से कहीं ज्यादा।

 कोमल धैवत और निषाद के मंद्र रुदन के स्वर में रामू बोला, “यह क्या कर बैठी तू? सोचकर ही कलेजा फट रहा है मेरा।”

 “क्या करती? बप्पा को गैंगवाले जेल करवा दिए। सात बच्चों के पेट माई कैसे भरती? बप्पा हम ही को सलमा मैडम के हवाले कर दिए …”

 नताशा का बाँध टूट गया। हिलक हिलक कर रोने लगी। पहली बार उसका प्रतिरोध फूटा था। पहली बार उसे अपने ऊपर दया आई थी। पहली बार उसने अपने चारों ओर चिपके पंक को महसूस किया था। “हमका जाय दो रामू। जौन बिगड़ गयी सो अब बिगड़ी ही रहेगी।”

 “क्या कह रही हो! तुमका जाय दें? न आ आ, कभी नहीं!” चुम्बनों की बौछार के बीच कुछ रुक कर रामू बोला, “तब हम बच्चे रहे। बाप के मोहताज! अब हमपे सब कुछ है। तुमका न जाय देब। ... बहुत सोच समझ कर कह रहे हैं। सलमा मैडम की मजाल नहीं कि हमरे सामने बोलें। ... घाट घाट तुमका न नाचे देब। समझीं? तुम हमरे खातिर ही बनी हो जभी से भगवान् मिलाए दिए।”

 नताशा का दिल बाग़ बाग़ हो उठा। सिमटकर रामू के वक्ष पर अपना सर रख दिया। प्रगाढ़ आलिंगन में बंधे दोनों एक दूसरे की त्रासदी में डूबे रहे। नताशा की आँखों में हज़ारों सपने तैर गए। बचपन की सुखद यादों की शीरनी में तैरती वह मनुहार से बोली, “आपकी अम्मा और बाबूजी मान जायेंगे? ”

 “उनसे पूछ ही कौन रहा है और उन्हें बताएगा भी कौन? खबरी तो गया अमरीका। तुमको हम अलग फ़्लैट में रखेंगे। अम्मा बाबू की रोटी पानी तो रत्ना देखती ही है। हम तुम अलग रहेंगे। जीवन भर प्रेम से। कोई कमी नहीं रखेंगे हम।”

 रामू की गिरफ्त कसने लगी। नताशा पर नशा छाने लगा। फुसफुसाते हुए पूछा, “रत्ना कौन? ”
 “हमरी घरवाली! तीन पुत्रियाँ जन के ढेर लगाईस है। बहुत दम दिखाती है बाप के पैसे का।”

 नताशा ठंडी बर्फ सी जम गयी। अपने को अलग करती हुई बोली, “सलमा मैडम ने तीन चार बजे तक वापस आने को कह रखा है। आप जो करने आये थे …”

 रामू अचकचा गया, “क्यों क्या तुम्हें मंजूर नहीं? सलमा की भेजी हुई गन्दगी ढोती रहोगी जिन्दगी भर? ”
 नताशा का स्वर गंभीर और सधा हुआ निकला, “अपने माँ बाप, भाई बहन का भला करने खातिर यह गन्दगी ढोने का काम उठाया था राम शरण बाबू। अपना स्वार्थ भूलकर उपकार किया मैंने। मै अपनी नज़र में महान हूँ। मगर आप? तीन बेटियों के पिता? अपने स्वार्थ की खातिर अपने परिवार का बुरा करेंगे। मेरी नज़र में यह महानीचता है। मै धंधेवाली आपसे ज्यादा भली!”

और नताशा ने सर पर मंडराती परियों को अलविदा कह दी।

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