’सूरज की मिस्ड कॉल: अनूप शुक्ला-समीर लाल ’समीर’ की नजर से

पुस्तक 'सूरज की मिस्ड कॉल'; लेखक: अनूप शुक्ल; समीक्षक: समीर लाल ’समीर’
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किताब: सूरज की मिस्ड कॉल
लेखिका: अनूप शुक्ला ’फुरसतिया’
प्रकाशक: रुझान प्रकाशन
ईमेल: anupkidak@gmail.com
मूल्य: रुपया 150 / US$ 10
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अनूप शुक्ला हमारे ब्लॉगिंग के दिनों के पहले पहल बने 10 ब्लॉगर दोस्तों में से एक हैं। ब्लॉग के दिनों में उनके साथ मिल कर बहुत काम किया हिन्दी ब्लॉगों के प्रचार  प्रसार के लिए।

ब्लॉग शुरु करने का बाद पहली भारत यात्रा में 2007 में कानपुर में उनसे मुलाकात हुई, फिर अगली यात्रा में पुनः ब़ड़े आत्मीय स्वाभाव के और बात बात में हास्य और व्यंग्य निकाल लेना उनके लिए मानो इतना ही सहज जितना हमारे आपके लिए साधारण बातचीत करना।

अपना ब्लॉग फुरसतिया के नाम से लिखते हैं तो सभी पुराने मित्र इन्हें फुरसतिया जी ही बुलाते हैं और लिखने का अंदाज भी वही फुरसतिया। कब हँसते हँसाते अपनी मार्निंग वॉक का किस्सा सुनाते ऐसा भीषण कटाक्ष कर जाते हैं कि इंसान मुस्कराते हुए सिहर जाये।

आज उनकी नई किताब 'सूरज की मिस्ड कॉल’ पढ़ रहा था। हालांकि इसके पहले भी यह ब्लॉग पर टुकड़ों टुकड़ों में पढ़ते आये थे और हमेशा ही उनसे कहते थे कि इसका संकलन करके किताब छापी जाये। तो वह निवेदन भी पूरा हुआ। कई किताबें और आ चुकी हैं इसके पहले भी इनकी - 'पुलिया पर दुनिया’, 'बेवकूफी का सौंदर्य’, तथा 'झाड़े रहो कलट्टरगंज’। 'बेवकूफी का सौंदर्य' पर पहले ही सेतु पर मैंने समीक्षा लिखी है और उसमें जैसा मैंने कहा था कि क्या खिलंदड़ा अंदाज है लिखने का और भी अनेक बातें। आज जब इस नई किताब को पढ़ा तो उन्हीं सब बातों को दोहराने का मन चाहा मगर न तो यह चुनाव है और न ही हम नेता हैं कि वही वही जुमले दोहरायें तो आते हैं सीधे इस किताब पर।

'सूरज की मिस्ड कॉल’ आपको जिन्दगी देखने का एक नया नजरिया देगी और दिखायेगी। सूरज आपके घर भी आता है। आप भी उससे मिलते जुलते हैं लेकिन क्या कभी आपने उससे बतियाया है या कभी उससे उसके हालचाल पूछे हैं या कभी उसने आपको हड़काया है? फुरसतिया जी के साथ यही अनोखा है।

जबलपुर में पदस्थ थे तो अकेले हॉस्टल में रहते थे, वहीं इनकी सूरज से दोस्ती हो गई। इसे उनकी जुबानी ही जानें तो बेहतर। किताब की भूमिका में कहते हैं कि और अब यह ’सूरज की मिस्ड कॉल’ भी आ ही गई।

सात-आठ साल पहले ब्लॉगिंग के दिनों से सूरज के बिम्ब देखने और लिखने का सिलसिला शुरू हुआ था। लोगों की पसंद ने लिखने के लिये उकसाया तो लिखते रहे। कानपुर से तबादलित होकर जबलपुर पहुँचे तब सूरज भाई से मेल-मुलाकात बढ़ी। उनसे दोस्ती परवान चढ़ी। वाहन निर्माणी , जबलपुर की आफ़ीसर्स मेस के कमरा नंबर 14 में रहने के दौरान सूरज भाई से रोज गुडमार्निंग होती। दफ़्तर की खुली खिड़की से जब मन आया सूरज भाई से गुफ़्तगू होने लगती। सूरज भाई के साथ उनके पूरे कुनबे से घनिष्ठता हुई तो सबके इन्द्रधनुषी बिम्ब दिखने शुरू हुये। इसके बाद तो धड़ल्ले से सूरज भाई से गप्पाष्टक होने लगी। साथ चाय-पानी भी होने लगा।

उन्हीं गपाष्टकों का नमूना है यह पूरी किताब। गज़ब के बिम्ब, गज़ब के कटाक्ष, और प्रवाह और शैली ऐसी कि लगता ही नहीं पढ़ रहे हैं। बस एक किस्सा सुन रहे हैं अहसास है पूरी किताब। लगभग 180 पन्नों में 102 किस्से। एक किस्सा पढ़ेंगे तो दूसरा पढ़े बिना रुकेंगे नहीं और यही सिलसिला पूरी किताब पढ़कर ही उठने देगा आपको, यह मेरा दावा है।

शैली, देखने का अंदाज और गपाष्टकों की कुछ बानगी देखिये:
सूरज भाई पेड़ की फ़ुनगियों से झाँक रहे हैं। पीटी मास्टर सरीखे किरणों, उजाले, रोशनी , प्रकाश को इधर-उधर पसरने, छा जाने का संकेत दे रहे हैं। ऊर्जा-सीटी बजाते हुये सारे अंधेरे को भाग जाने का इशारा कर रहे हैं। एक पेड़ के नीचे कोहरा अंधरे के साथ खड़ा एक किरण के साथ कुछ बदतमीजी सी करता दिखा तो  सूरज भाई के इशारे पर उजाले ने उसकी तुड़ैया कर दी। कोहरे की हड्डी-पसली बराबर कर दी। भागा कराहते-कांखते हुये।
सूरज भाई कभी किसी किरण को या उजाले को चोट भी लगती होगी अंधेरे से उलझने में? तब क्या करते हैं? चाय पीते हुये सूरज भाई से हमने पूछा।

अमूमन ऐसा होता नहीं। अंधेरा हमारे बच्चों को देखकर ऐसे भागता है जैसे किसी चाटू कवि से श्रोता या फिर भीड़ को देखकर अकल की बात। लेकिन कभी अगर किसी को चोट लगती भी है तो हम उसको ऊर्जा के इंजेक्शन लगाते हैं, आपकी दुआओं के एंटीबॉयटिक देते हैं। फ़ौरन असर होता है। मन से की गयी दुआओं का बड़ा असर होता है। वो कविता है न :

मैंने मांगी दुआयें, दुआयें मिलीं,
अब दुआओं पर उनका असर चाहिये।

चाय पीते हुये हम दोनों मुस्कुराते सबकी सलामती की दुआ करने लगे।

 और देखें ...
कलकत्ता से दिल्ली के लिए हवाई जहाज के उड़ते ही तमाम यात्री समाधि मुद्रा में  आ गए। आँखें मूंदकर इतने ध्यान से सांस ले रहे थे जैसे देखकर लग रहा था मानो ये वाली साँस लेने के लिए ही 10,000 रुपया खर्च करके जहाज में बैठे हैं। जहाज में बैठते ही पैसा वसूलना शुरू कर दिए।

बाहर सूरज भाई चमकते दिखे। हम खुश हो गए कि ये भी साथ चलेंगे लेकिन वो बोले चलते तो साथ में लेकिन अब अपन की आज की ड्यूटी का समय पूरा हो गया है। लौटने का हूटर बजने ही वाला है। इसलिए साथ तो न चल पायेंगे। कल मुलाक़ात होगी।

कैसे कैसे बिम्ब, इसकी बानगी देखिये:
पक्षी सामने के पेड़ पर पहुँच गया। वहाँ पहले से बैठे पक्षी ने "चोंच मिलाकर" उसका स्वागत किया। चोंच मिलाते हुए पक्षी एक दूसरे को चूमते हुए लगे। चूमते नहीं पुच्ची लेते हुए।बीबीसी की एक खबर याद आई  जिसमें इस बात पर चरचा थी, "क्या चूमने से पहले पूछना चाहिए?" बीबीसी की खबर से बेखबर दोनों ने फिर एक दूसरे का "चोंच चुम्मा" लिया और थोड़ा सा उचककर दूसरी डाल पर बैठ गये।

सामने बच्चे झूला झूल रहे हैं। सड़क पर चहल-पहल बढ़ गयी। अचानक फिर बारिश होने लगी। सूरज भाई भीगने से बचने के लिए हमारे साथ बैठे चाय की चुस्की ले रहे हैं। हम उनको बिन मांगी सलाह दे रहे हैं, "एक ठो रेन कोट काहे नहीं ले लेते?"

सूरज भाई मुस्करा रहे हैं। सवेरा हो गया है।

हाल में अनूप जी को मिले इस किताब के लिए यात्रा/ रेखाचित्र / डायरी वर्ग में सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ पुरस्कार दिया गया, वाकई सम्मान के वे सच्चे अधिकारी हैं।

'सूरज की मिस्ड कॉल’ को बस पढ़ते जायें। वाह-वाह करते जायें, हँसते जायें, कराहते जायें और जब यह किताब खत्म हो जाये तो तुरंत फुरसतिया की पुरानी, और आने वाली किताबें मंगायें।

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