मध्यप्रदेश में लघुकथा, अतीत और वर्तमान

कांता रॉय

- कान्ता रॉय

कथा-साहित्य की प्रमुख विधा उपन्यास, कहानी और लघुकथा। तीनों विधाओं में लघुकथा का उद्भव वैदिक काल से है। वेदों, उपनिषदों में प्रसंगवश कही गयी कथाएँ जो व्यक्तित्व निर्माण के तहत गढ़ी जाती रही और सुनाई जाती रही है वे ही समयानुरूप अपना स्वरूप बदलती हुई विकसित होती वर्तमान की लघुकथा के रूप में विद्यमान है।

हिन्दी लघुकथा-साहित्य की पहली लघुकथा तो भारतेंदु हरिश्चंद की 'अंगहीन धनी' को होना था लेकिन 'परिहासिनी' का 'संकलन' के रूप में पाया जाना और उनमें संकलित रचनाओं का लेखन काल और मौलिकता पर साक्ष्य की कमी ने 'एक टोकरी भर मिट्टी' 1901 ई. 'छत्तीसगढ़ मित्र' में प्रकाशित माधवराव सप्रे को यह स्थान मिला।

अनेकोनेक साहित्यकारों की मध्यप्रदेश की इस समृद्धशाली भूमि में जब लोक कथाएँ, बोधकथाएँ, नीति कथाओं से निकलकर आधुनिक साहित्यिक परिपाटी में लघुकथा साहित्य की यात्रा को देखते हैं तो अधिकारिक तौर पर दर्ज़ की गयी हिंदी की पहली लघुकथा ‘टोकरी भर मिट्टी’ के लघुकथाकार माधव राव सप्रे (सन-1871-1926)  को, जो हिन्दी के आरंभिक कहानीकारों में से एक हैं उन्हीं से उस यात्रा की शुरुआत पाते हैं। माधव राव सप्रे का जन्म स्थान मध्यप्रदेश के दमोह जिले के पथरिया गाँव में हुआ था जिनके द्वारा 1900 ई. में ‘छतीसगढ़ मित्र’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन भी एक साहसिक कदम था।

माखनलाल चतुर्वेदी (सन-1889-1968) का जन्म मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में बाबई में हुआ था। उनको आरंभिक कहानीकारों में प्रथम स्थान मिला है। वे जितने लेखक थे उतने ही पत्रकार भी थे। उनकी लघुकथा ‘बिल्ली और बुखार’ प्रकाशन के समय-काल को लेकर प्रमाणिक दस्तावेज ना मिलने के कारण हिंदी की पहली लघुकथा होने में आलोचकों-समीक्षकों द्वारा सदा संशय में बनी रही।

डॉ॰ पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी (27 मई 1894-28 दिसम्बर 1971) का जन्म राजनांदगांव के एक छोटे से कस्‍बे खैरागढ़ में 27 मई 1894 में हुआ।  वे सरस्वती के प्रधान संपादक थे। उनकी लघुकथा ‘झलमला’ संवेदनाओं को अभिव्यक्ती की सर्वोत्तम शिखर को छूती है।

मध्यप्रदेश के खंडवा से रामनारायण उपाध्याय हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक हैं। वे अपने लेखन के उस दौर में लघुकथा के नाम का इस्तमाल करते हुए लघुकथा लिखा करते थे। उनका जन्म २ मई १९१८ को कालमुखी,  में हुआ और शिक्षा गाँव में हुई। अपनी सरल भाषा शैली एवं सहज, सरल प्रभावशाली गद्य के लिए पहचाने जाते रहें हैं। उनकी लघुकथा ‘सिंह न्याय’ और ‘योजनावादी लोग’(सन्दर्भ: लघुकथा के आयाम, सं. मुकेश शर्मा) उल्लेखनीय है।

मध्यप्रदेश के होशंगाबाद जिले में जन्में हरिशंकर परसाई (सन-1924-1995) हिंदी के जितने प्रसिद्ध व्यंगकार थे उतने ही लघुकथाकार।  व्यंग्यकार होने के नाते अपनी ख़ास तरह की भाषा शैली ‘जाति’, ’बात’, ‘सूअर’, ‘संस्कृति’ जैसी रचनाओं के जरिये लघुकथा विधा को कटाक्षयुक्त एक नया कलेवर दिया और समाज में निहित पाखंड और रूढ़िवादी जीवन–मूल्यों जैसी विसंगतियों के खिलाफ कलम की तीव्रता को व्यापक प्रश्नों से जोड़ा। लघुकथा का आदर्शौन्न्मुख प्रारूप का उद्भव वैदिक काल से ही हमें मिलता है। वेदों, उपनिषदों में प्रसंगवश कही गयी कथाएँ जो व्यक्तित्व निर्माण के तहत गढ़ी जाती रही, सुनाई जाती रही है वे ही परसाई काल में नए कलेवर में समयानुरूप अपना स्वरूप बदलती हुई विकसित होती हुई वर्तमान की लघुकथा के रूप में आज विद्यमान है। इसलिए हम विकसित लघुकथा के देनहार हरिशंकर परसाई अर्थात मध्यप्रदेश को मान सकते हैं।

महाकाल की नगरी उज्जैन का संस्कृतिक परिवेश और शरद जोशी (सन-1931 से 1994) जैसे व्यंग्यकार, जिन्होंने अपनी धारदार शैली से ‘मैं वही भागीरथ हूँ’ और ‘कुत्ता’, ‘बुद्धिजीवियों का दायित्व ’, ‘लक्ष्य की रक्षा’ जैसी लघुकथाएँ देकर लघुकथा साहित्य का गौरव बढ़ाते हुए दिखाई देते हैं। प्रो. कृष्ण कमलेश ने भोपाल में रह कर जिस तरह से देश भर में लघुकथा विधा के लिए आन्दोलन चलाया वह उल्लेखनीय है। ज्ञातव्य हो कि डॉ. शकुंतला किरण को लघुकथा पर पहला शोध करने के लिए उन्होंने ही प्रेरणा दी थी। लघुकथा पर लम्बे अरसे तक निरंतर काम करने, लेखकों को प्रोत्साहित करने के फलस्वरूप हिंदी लघुकथा को कई नए लेखकउनकी प्रेरणा से लघुकथा में आये। ‘मोहभंग’ और ‘मुखौटे’ प्रो. कृष्ण कमलेश द्वारा लिखी गयी लघुकथाओं का संग्रह वर्तमान में लघुकथा साहित्य की अमूल्य धरोहर है।

रचनात्मक और आलोचनात्मक दोनों पक्ष में राधेलाल बिजधावाने, भोपाल के द्वारा लघुकथा-विधा में सार्थक काम हुआ है।

डॉ. मालती बसंत लघुकथा-विधा में पदार्पण करते हुए सन 1965 में अपनी पहली लघुकथा लिखती हैं। अपनी तीन लघुकथा संग्रह शिक्षा और संस्कार, अतीत का प्रश्न और बुढ़ापे की दौलत के साथ लघुकथा संकलन ‘नारी संवेदना की लघुकथा’ का संपादन सहित आलोचनात्मक कार्य करते हुए आरंभिक दौर से लेकर वर्तमान तक की सभी संघर्षों की साक्षी रही हैं। सन 2017 में उन्होंने लघुकथा शोध केंद्र भोपाल की स्थापना की।

लघुकथा शोध केंद्र भोपाल के सचिव पद पर रहते हुए कान्ता रॉय की दो लघुकथा संग्रह ‘घाट पर ठहराव कहाँ’, ‘पथ का चुनाव’, अस्तित्व की यात्रा (प्रकाशाधीन), संपादित पुस्तकों में  ‘चले नीड़ की ओर’, ‘सहोदरी लघुकथा’, ‘सीप में समुद्र’, ‘बाल मन की लघुकथाएं’, ‘लघुकथा रजत श्रृंखला-1’, ‘भारत की प्रतिनिधि महिला लघुकथाकार’ आमद देती हैं। बतौर अतिथि संपादक, संपादित पत्रिका- ‘दृष्टि’ और साहित्य कलश, त्रैमासिक पत्रिका। फेसबुक मंच पर ‘लघुकथा के परिंदे’ समूह की संचालिका। बतौर समाचार संपादक ‘सत्य की मशाल’ पत्रिका में लघुकथा के परिंदों का कोना स्थाई स्तम्भ के रूप में प्रकाशित करती हैं जिसमे मुख्य रूप से तीन पन्ने लघुकथा के लिए सुरक्षित है। लघुकथा–टाइम्स, मासिक अखबार अपनी तरह की विश्व स्तर की पहली विधा–सम्मत अखबार निकालने जैसी साहसिक कदम के साथ मुख्य संपादक का कार्य करते हुए निरंतरता से विधा के विकास में योगदान दे रही हैं। चाहे किसी भी युग की बात हो जब भी बदलाव के लिए व्यवस्था के खिलाफ बिगुल बजाया जाता है तो जन-मानस तक पहुंच बनाने के लिए माध्यम हमेशा साहित्य ही बनता रहा है। हिन्दी गद्य साहित्य की कथा-साहित्य में प्रमुख रूप से उपन्यास, कहानी और लघुकथा का स्थान है जिसमें लघुकथा ही एक मात्र ऐसी विधा है जो अपनी सृजनात्मक शक्ति से भरपूर है। कथ्य के ईर्द-गिर्द घूमती कथानक का स्वरूप अपने में पूरे उपन्यास का सार सम्भालने की क्षमता रखता है। और इसी कलेवर को नए अर्थ देती है राजेंद्र वामन काटदरे की एकल लघुकथा संग्रह ‘अँधेरे के खिलाफ’।

भोपाल से ही घनश्याम मैथिल ‘अमृत’ प्रकाशित एकल लघुकथा संग्रह ‘....एक लोहार की’, उप संपादक लघुकथा टाइम्स- (अखबार)। अशोक मनवानी की प्रकाशित एकल लघुकथा संग्रह,  ‘मिथ्या मंजिल’। कपिल शास्त्री की प्रकाशित एकल लघुकथा संग्रह ‘जिंदगी की छलांग’। संतोष श्रीवास्तव द्वारा संपादित लघुकथा संकलन, ‘सीप में समुद्र’। डॉ. स्वाति तिवारी, संपादन लघुकथा संकलन ‘हथेलियों पर उकेरी गयी कहानियाँ’। अंजना छलोत्रे प्रकाशित एकल लघुकथा संग्रह ‘ऊँची उड़ाने’। डॉ.मोहन आनंद तिवारी की प्रकाशित एकल लघुकथा संग्रह ‘देश बिकाऊ है’। डॉ. जयजय राम आनंद की प्रकाशित एकल लघुकथा संग्रह ‘आनंद के आसपास’, डॉ. लता अग्रवाल प्रकाशित की  एकल लघुकथा संग्रह ‘मूल्यहीनता की संत्रास’, ‘लकी हैं हम’, ‘तितली फिर आएगी’ (बाल लघुकथा संग्रह)। डॉ. वर्षा चौबे की प्रकाशित एकल लघुकथा संग्रह ‘शिखर की ओर’। कल्पना विजयवर्गीय  की प्रकाशित एकल लघुकथा संग्रह ‘जीवन का प्रवाह’। महिमा श्रीवास्तव वर्मा द्वारा सम्पादित लघुकथा संकलन ‘लघुत्तम महत्तम’।  जया आर्य, भूपिंदर कौर बतौर लघुकथाकार एवं लघुकथा-समीक्षक लघुकथा शोध केंद्र भोपाल, आचार्य श्री रामवल्लभ, गोकुल सोनी, शशि बंसल, ऊषा जायसवाल, मुज़फ़्फ़र इकबाल सिद्दकी, नयना आरती काटनिकर, सुनीता प्रकाश, मधुलिका सक्सेना, कीर्ति गांधी, प्रवीण खरे,शामिनी खरे,आशा शर्मा,आशा सिन्हा कपूर,सुमन ओबरॉय,कांति शुक्ला, नीना सिंह सोलंकी,नीता सक्सेना, प्रतिभा श्रीवास्तव, विनीता राहुरीकर, विजया तैलंग, चंद्रकांति त्रिपाठी, मधु सक्सेना, कुमकुम गुप्ता, सरिता बघेला, रुख़साना सिद्दिकी, अर्चना मिश्रा, अर्पणा शर्मा, अशोक मनवानी, उषा सक्सेना, मोहन तिवारी, संजय पठारे शेष, कल्पना भट्ट, विनय कुमार सिंह, स्वाति तिवारी, सतीश चन्द्र श्रीवास्तव,   विनोद जैन, लक्ष्मी नारायण पयोधि, ऊषा सोनी, किरण खोडके, योगेश शर्मा, चरणजीत सिंह कुकरेजा, उषा सक्सेना, मिथलेश वामनकर, मेघा राठी, राहुल आसिफ, अनघा जोगलेकर, संतोष श्रीवास्तव, राजश्री रावत, दामिनी खरे इत्यादि लघुकथाकारों ने वर्तमान में लघुकथा लेखन में नवीन विचारों को अंतर्द्वंद के सहारे लघुकथा विधा को पुष्ट करते हुए अभिव्यक्त कर रहे हैं।

मेहरुन्निसा परवेज द्वारा उनकी पत्रिका ‘समरलोक’ में लघुकथा-विशेषांक निकला जा चुका है। भोपाल से ‘पहले अंतरा’ पत्रिका में संपादक नरेद्र दीपक द्वारा लघुकथाओं का स्थाई अंक के अंतर्गत निरंतरता लिए लघुकथा प्रकाशित की जा रही है। लघुकथा में सत्तर के दशक से वर्तमान परिप्रेक्ष्य तक में भोपाल में लघुकथा विधा पर हुए समस्त कार्य उल्लेख्नीय है।

डॉ. मालती बसंत ने अपने शोध आलेख में से इंदौर शहर को ‘लघुकथा की नर्सरी’ कह कर परिचय देती है। क्योंकि डॉ॰ सतीश दुबे द्वारा सन 1974 में 34 लघुकथाओं का संग्रह लाकर विधागत चर्चाओं को दिशा देने में वृहत काम हुआ था। उनके चार महत्वपूर्ण संग्रह ‘भीड़ में खोया आदमी’, ‘राजा भी लाचार है’, ‘प्रेक्षाग्रह’, और ‘समकालीन सौ लघुकथाएँ’ और डॉ॰ सतीश दुबे की प्रथम पुण्य-तिथि पर 'प्रेम के रंग' उनकी 55 लघुकथाओं का संग्रह प्रकाशित हुआ है।

इंदौर से ही सतीश राठी ‘तीसरा क्षितिज’, ‘मनोबल’, ‘समक्ष’ जैसी लघुकथा संग्रह देने के साथ ही पैंतीस सालों से ‘क्षितिज’ लघुकथा विधा की पत्रिका के संपादन कार्य को भी देख रहें हैं। पहली बार मध्यप्रदेश में लघुकथा विधा सम्मत कार्यों के तहत ‘क्षितिज’ मंच की ओर से अखिल भारतीय लघुकथा सम्मलेन 2018 करवाने का श्रेय भी उनको जाता है।

श्री सूर्यकांत नागर की ‘विष-बीज’, और ‘वात्सल्य (मराठी) लघुकथाएँ हिंदी और मराठी दोनों भाषाओँ में आयी है। आपने ‘तीसरी आँख’,’स्वर्ग में लाल झंडा’,कथा लोचन’ लघुकथा संकलन संपादित की है।

श्री अनंत श्रीमाली ‘क्षितिज’ और ‘मनोबल’ के सहयोगी संपादक। डॉ. श्यामसुन्दर व्यास की एकल लघुकथा संग्रह ‘कांकर-पाथर’। सुरेश शर्मा काली माटी लघुकथा संकलन और समानान्तर लघुकथा विशेषांक का संपादन।, वेद हिमांशु स्याह हाशिये के संपादन में लघुकथा संकलन को साकार करते है।

अपनी विशिष्ट शैली के कारण चैतन्य त्रिवेदी की लघुकथा संग्रह ‘उल्लास’ को किताबघर प्रकाशन का प्रतिष्ठित पुरस्कार ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान’ प्राप्त हो चुका है। अंतरा करवड़े निरंतरता से लघुकथा में दो दशक पूरा कर ‘देन उसकी हमारे लिए’ जैसी सशक्त लघुकथा संग्रह के साथ वर्तमान में नए-नए प्रयोगों के साथ लघुकथा में आमद दे रही हैं।

ज्योति जैन एकल संग्रह ‘जलतरंग’, ‘बिजुका’, चन्द्र सायता की एकल लघुकथा संग्रह ‘गिरहें’। डॉ.लीला मोरे की एकल संग्रह ‘सत्यमेव जयते’ सिद्ध करती है कि आज का युग यथार्थवादी युग है, क्योंकि अब काल्पनिक निष्क्रिय आदर्श की पैरवी पाठकों को मंजूर नहीं। वह जमीनी तौर पर प्रगति को समर्थन करता है। वर्तमान में पाठक अपने आस-पास जो देखता-सुनता है उसी से  जुड़े साहित्य को पढ़ना चाहता है। वह सामाधान के लिए सम्भावनाएँ तलाश करने के साथ ही नयी परम्पराओं को स्थापित करना चाहता है।

इंदौर से ही  स्व. राजेन्द्र कुमार शर्मा, रमेश अस्थिवर, चरण सिंह ‘अमी’, श्री एन. उन्नी., लीला मोरे, अखिलेश शर्मा, अशोक शर्मा भारती द्वारा संकलित लघुकथा पुस्तक ‘ तलाश जारी है’। बरखा शुक्ला, मीना पाण्डेय, रश्मि प्रणय वागले, डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्ला, वसुधा गाडगिल, मीरा जैन, कविता वर्मा, पुरुषोत्तम दुबे, प्रताप सिंह सोढ़ी, राम मूरत, वर्षा अग्रवाल, शील निगम, जितेन्द्र गुप्ता, कृष्णकांत दुबे, संजय कुमार डागा, सुरेश बजाज, डॉ. तेजपाल सोढ़ी, सुभाष जैन वीरचंद्र नरवाले, सत्यनारायण पटेल, रमेश जाधव, कांतिलाल ठाकरे, राज केसरवानी मधुरकर पंवार, महेश भंडारी, रमेश चन्द्र दुबे, ब्रजेश कानूनगो इत्यादि इंदौर में बतौर लघुकथाकार वर्तमान में भी लघुकथाकार एवं समीक्षक की सक्रीय भूमिका निभा रहें हैं।

गंज बासौदा से पारस दासोत के लिए जिक्र करते हुए श्री रामेश्वर कम्बोज ‘हिमांशु’ लघुकथा डॉट कॉम वेवसाईट पर प्रकाशित एक आलेख में कहते हैं कि, “पारस दासोत समय से आगे चलने वाले रचनाकार है। यह रचनाकार अवरोध–विरोध की ओर आँख उठाकर नहीं देखता। इसे चलने से मतलब है।“ पारस दासोत का लेखन लघुकथा-विधा पर ही केन्द्रित रहा है। आपने करीब सत्रह एकल लघुकथा संग्रह विधा को समर्पित किया है।

उज्जैन से विक्रम सोनी द्वारा लघुकथा विधा पर किये गए प्रयासों में उनके द्वारा सम्पादित त्रैमासिक पत्रिका ‘लघु आघात’ विशेष तौर पर उल्लेखनीय काम है। इसके आलावा संपादित लघुकथा संकलन छोटे-छोटे सबूत, पत्थर से पत्थर तक, मानचित्र और एकल लघुकथा संग्रह ‘उदहारण’ उल्लेखनीय काम हुआ है।

श्री बी. एल. आच्छा लघुकथा विधा के लिए आलोचना शास्त्र में एक नई चेतना जगाने का कार्य कर रहें हैं। संतोष सुपरेकर की चार एकल लघुकथा संग्रह ‘हाशिये का आदमी’, ‘बंद आँखों का समाज’, ‘भ्रम के बाजार में’, ‘हंसी की चीखें’ लघुकथा विधा में उल्लेखनीय पुस्तकें हैं। स्व. अरविन्द नीमा, राजेंद्र नागर ‘निरंतर’, मुकेश जोशी, शैलेन्द्र पराशर, स्वामी नाथ पाण्डेय, डॉ. शैलेन्द्र कुमार शर्मा , भागीरथ बडोले,  डॉ. प्रभाकर शर्मा, रमेश कर्नावट, श्री राम दवे, समर कबीर, मीरा जैन, कोमल वाधवानी प्रेरणा, आशागंगा शिरढोणकर, वाणी दवे, क्षमा सिसोदिया इत्यादि लघुकथाकारों की गंभीर और प्रभावशाली लघुकथाएँ दृष्टिगोचर है। सभी के द्वारा विभिन्न माध्यमों से लघुकथा निरंतर समृद्ध हो रही है। महेश्वर, खरगौन जिले से विजय जोशी ‘शीतांशु’ की दो लघुकथा संग्रह ‘आशा के दीप’, और ‘ठहराव में सुख कहाँ’ आ चुकी है।

लेखन में गहराई आंकने के सन्दर्भ में मेरा मानना है कि एक कुशल लघुकथाकार में मनोविश्लेष्णात्मक दृष्टिकोण का होना बेहद जरूरी है। इसी दृष्टिकोण के सहारे वह कथा के अंदर ही अंदर कई कथाओं को बुनते हुए अंतर बुनावट करता है। वैसे तो लघुकथा सीधी दो टूक बात कहने की विधा है लेकिन इस दो टूक बात में अकल्पनीय विस्तार की चरम परिणति लघुकथा को शक्ति सम्पन्न बनाता है और इसी रचनात्मकता की श्रृंखला में जबलपुर से मोहमद अतहर के द्वारा ‘अभिव्यक्ति’ लघुकथा को समर्पित पत्रिका प्रकाशित होती रही है। ककुभ एवं प्रतिनिधि लघुकथाएँ का संपादन करते हुए कुंवर प्रेमिल की चार लघुकथा संग्रह प्रकाशित हो चुकी है। उन्होंने कुछ लघुकथाओं का मराठी सिंधी, गुजराती और पंजाबी में अनुवाद भी किया है। प्रभात दुबे, अर्चना मलैया, प्रदीप शशांक, रमेश सैनी, सनातन कुमार बाजपेयी, ओमप्रकाश बजाज, पवन जैन, मधु जैन, आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’, शशि पुरवार, मिथलेश बिलगैयाँ, प्रभात दुबे, सुमनलता श्रीवास्तव, गीता गीत, प्रदीप शशांक, ठाकुरदास कुल्हारा, गुरुनाम सिंह रीहल, श्री राम ठाकुर दादा, सुरेन्द्र सिंह पवार, नीता कसार, छाया त्रिवेदी इत्यादि साहित्यकार लघुकथा में सक्रीय हैं।

दतिया से डॉ. कामिनी, दमोह से मनोहर शर्मा, पुष्पा चिले, बबीता चौबे, प्रेमलता नीलम, ओजेंद्र तिवारी, कटनी से राजा चौरसिया, मक्सी से अशोक आनन, छिंदवाडा से पवन शर्मा, गोवर्धन यादव, प्रभुदयाल श्रीवास्तव, शिवपुरी से चुन्नीलाल सलूजा, शेख शहज़ाद उस्मानी, राहिला आसिफ, ग्वालियर से डॉ. नरेन्द्रनाथ लाहा, आजाद रायपुरी, मंजू नागौरी, गिरजा कुलश्रेष्ठ, सीमा जैन, रतलाम से जय कुमार जलज, रमेश मनोहरा, विजय बजाज, प्रतिभा पाण्डेय, बालाघाट से राजेंद्र यादव, अजय पालीवाल, नरेश सेंधवा, आनंद बिन्थरे, प्रीति समकित सुराना, बैतूल से राम चरण यादव, अपराजिता अनामिका, बड़ नगर से राजमल दांगी, लोकेन्द्र सिंह कोट, मंदसौर से डॉ. रमेशचंद्र, महू से जगदीश प्रसाद तिवारी, खंडवा से गजानन देशमुख, विमल शुक्ल ‘भारतीय’, नीमच से ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’, टीकमगढ़ से रुखसाना सिद्दीकी, सागर से त्रैलोक्य रंजन शुक्ल, मंडला से शरद नारायण खरे, मनीष राय, कृष्ण गोप, सतना से परमलाल गुप्त, झाबुआ से सतीश वर्मा, रमा शंकर चंचल, धार से अर्जुन सिंह अंतिम इत्यादि लघुकथाकार यथार्थपरकता को विश्वसनीय तरीके से जीवन के सच्चाइयों को लघुकथा में कथ्य देने की कोशिश में लगे हैं क्योंकि वर्तमान समय में व्यस्त दिनचर्या होने के कारण अब समय इंस्टैंट डोज देने और लेने का है। जिस तरह भोजन की थाली सिमट कर डिनर प्लेट में आ गयी, उसी तरह परम्परागत लम्बी-चौड़ी कहानी में समय खपाने के बजाय पाठक अब 'टू द पॉइंट' कहने-सुनने का आदी हो रहा है। और यही नहीं बल्कि 'टू द पॉइंट' में ही उसे चरित्र और परिवेश से जुड़ा पूरा संदर्भ भी चाहिए जिसे लघुकथा अपने कलेवर में पूरी तरह समेटे हुए है। अर्थात कथा-साहित्य में लघुकथा अपने वजूद के साथ अब प्रथम पंक्ति में मजबूती से खड़ी दिखाई देती है। वर्तमान समय में लिखी जा रही लघुकथा का स्वरूप पूर्ण रूप से विकसित है। स्तर की जहाँ तक बात है तो जिन-जिन रचनाकारों ने लघुकथा के स्वरूप का गहनता से अध्ययन कर जानते-समझते हुए रचनाकर्म में लगें हैं, वे सब नयी शैली, नए शिल्प के साथ सार्थक लघुकथाएँ हिन्दी साहित्य को दे रहें हैं। लघुकथा के विकास में सोशल मीडिया की भी भूमिका महत्वपूर्ण है। जो काम पिछले कई दशकों में प्रिंट मीडिया नहीं कर पायी उसे सोशल मीडिया ने बड़ी आसानी से कर दिया। एक बहुत बड़ा पाठक वर्ग तैयार कर मीडिया ने लघुकथा को जन-जन तक घर-घर पहुँचाने का काम किया है। विधागत रूझान देखकर यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि आज लघुकथा पाठकों की प्रिय विधा के रूप में उभर कर आयी है। सच कहूँ तो मैं वर्तमान स्थिति को लघुकथा का स्वर्णिम युग मानती हूँ और सन 1900 से लेकर आज के स्वर्णिम काल तक में लघुकथा विधा में मध्यप्रदेश अग्रणी भूमिका निभा रही है।

5 comments :

  1. लघुकथा विधा के अतीत एवं वर्तमान से परिचित कराने के साथ ही साथ यह लेख उसके उज्ज्वल भविष्य का संकेत भी दे रहा है।
    आदरणीया कांता जी के महती प्रयास हेतु साधुवाद।

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    1. प्रोत्साहन हेतु आभार आपका

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  3. आदरणीया कान्ता जी का आलेख शोधपरक एवम।महत्वपूर्ण है ,ह्रदय से बधाई आभार सेतु सम्पादक मण्डल

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    1. प्रोत्साहन हेतु आभार आपका

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