पुस्तक समीक्षा: दर्द जब असहनीय हो जाए ...


- शेख उस्मान

शोधार्थी, अंग्रेजी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, हैदराबाद - 500007
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‘दर्दजा’ उपन्यास विश्व के मानचित्र और उन मानचित्र में स्त्रियों की दशा एवं दिशा को उजागर करता है। इस उपन्यास में दक्षिण अफ्रीका, केनिया, इथियोपिया, सोमालिया आदि देशों की मज़हबी रूढ़ियों में कैद स्त्रियों की दारुण कथा को तथा सुन्नत जैसी अमानवीय प्रथा को केंद्र में रखा हैं। यह उपन्यास दक्षिण अफ्रीका के 28  देशों और मध्य व दक्षिण अमेरिका के कुछ जातीय समुदायों की कुत्सित प्रथा को पाठक के सम्मुख प्रस्तुत करता है। एक ऐसी प्रथा जिसको पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं जिसे एफजीएम  (फीमेल जेनिटल म्यूटिलेशन) कहा जाता है। जो प्रथा औरतों को औरत होने की शिक्षा (सजा) देता है, इसी शिक्षा के विरोध में यह उपन्यास लिखा गया है। माहरा  जैसी  करोड़ों औरतों के दुख-दर्द एवं चीखों को केंद्र में रखकर उन सबके दर्द को महसूस करने का प्रयास किया हैं जिनका सुन्नत बाल जीवन में यानी मात्र 7-8 साल की उम्र में किया गया हो। यह उपन्यास स्त्री विमर्श की अगली कड़ी को खोलने में महती भूमिका निभाते हुए दिखाई देता है और जो औरतें नस्ल, या मजहब के नाम से पिसती हैं उनकी स्थिति के पर्ति चेतन करते हुए मनुष्य की संवेदनाओं को झकझोरता है। जयश्री रॉय ‘दर्दजा’ में ‘सुन्नत’ का प्रसंग दिखाते हुए कहती हैं कि “फिर मैंने देखा था उसके हाथ में ब्लेड का वह टुकड़ा जो दूसरे ही पल मेरी नर्म त्वचा में जाने कहाँ तक उतर गया था। मेरी आँखों के आगे अचानक बिजली के नीले-पीले फूल-सा कुछ कौंधा, और मैं हलक फाड़ कर चिल्लाती चली गयी थी।”

  इस दर्द को औरत समझ सकती हैं, इनकी यातनाएँ असहनीय हैं। इतना दर्द कि प्रकृति भी डर जाए। इस अमानवीय प्रथा में औरत जन्म लेना उसका सबसे बड़ा अभिशाप माना जाता है, क्योंकि यहाँ एक औरत ही दूसरी औरत को दर्द एवं यातनाएँ देती हैं। धर्म, या मजहब के नाम पर उसके कोमल अंग को चीर-फाड़ दिया जाता है। इसका चित्रण इस उपन्यास में बड़े ही मार्मिक ढंग से किया गया हैं - “उसने अपने गंदे हाथों के लम्बे नाखून मेरे भीतर खुबा दिये थे। दर्द के अथाह समुद्र में डूबते हुए मैंने महसूस किया था, वह अपने नाखूनों से मुझे नोच-खसोट रही है, चीर फाड़ रही है, कुतर रही है! उस समय आग की सलाइयाँ सी मेरे जांघों के बीच चल रही थीं।”   यह उपन्यास सुन्नत जैसी घिनौनी एवं स्त्रीविरोधी प्रथा पर सोचने के लिये बाध्य करता हैं, क्योंकि स्त्री समाज का आधा हिस्सा होती हैं, स्त्री के अभाव में समाज की कल्पना नहीं की जा सकती तथा वह सृष्टि की निर्माता होती है। उसे धर्म के नाम पर पीड़ा देना उचित नहीं है। स्त्री की सुन्नत हो जाने के बाद उसके यातनाओं का वर्णन करना शायद ही किसी के बस की बात हो, क्योंकि खेलने-कूदने की आयु में मासूम बच्ची की सुन्नत करके उसे अधमरा छोड़ दिया जाता है। इस संदर्भ में माहरा कहती हैं कि “मेरी कमर से नीचे का हिस्सा नरक बन गया है, एक धधकता हुआ कुंड। ऐसे जल रहा हैं कि जैसे किसी ने ताजे जख्म पर नमक छिड़क दिया है।”  स्त्रियों का दर्द यहीं नहीं थमता क्योंकि यह तो उनकी यातनाओं की शुरुआत है, जब स्त्री की सुन्नत की जाती है तब उसकी परेशानी या यातनाएँ और बढ़ जाती हैं। उनकी सबसे बड़ी समस्या पेशाब की हैं क्योंकि उनका गुप्तांग पुरी तरह से बंद कर दिया गया है माचिस की तीली बराबर छेद में से ही एक-एक बूंद पड़ता हैं, तब होती हैं स्त्री होने की यातनाएँ। इस संदर्भ में लेखिका कहती हैं कि - “बड़ी दीदी जमीन पर एक छोटा गड्ढा बना देती जिसमें एक करवट लेटकर पेशाब करना पड़ता। एक-एक बूंद, 15-15 मिनट तक! अंत तक मैं इतनी निढाल हो जाती कि मेरी आखों के आगे अंधेरा छाने लगता।”  क्या स्त्री इसी दर्द के लिए  पैदा हुई हैं? जहाँ स्त्री के गुप्तांगों से खेला जाता है, उनकी तकलीफ यह समाज कब समझेगा? उन्हें इस दुःख के समुद्र से कब बाहर निकलेगा? इन्ही प्रश्नों को केंद्र में रखकर इस कुत्सित प्रथा के विरोध में यह उपन्यास खड़ा होता है।

जिस देश अनमेल विवाह किया जाता है उस देश का समाज समृद्ध एवं आदर्श समाज की कोटी में कैसे आएगा? लेकिन अफ्रीका तथा अन्य देशों में यह प्रथा आग की तरह फ़ैल चुकी हैं। इस संदर्भ में लेखिका कहती हैं कि “बंजारों की बेटियों की अधिकतर यही नियति होती हैं। अपने माँ-बाप के घर चार-पाँच साल की उमर में कड़ी मेहनत करती हैं, और थोड़ी बड़ी होने पर अच्छे पैसे या जानवरों के बदले किसी रईस बूढ़े से ब्याह दी जाती हैं। ससुराल में फिर बच्चे जनने, मवेशियों को सम्हालने और अपने बूढ़े पति की सेवा करने में उनकी जिन्दगी कट जाती हैं।”  क्या स्त्री पैदा बस इसीलिये होती हैं कि वह पुरुष द्वारा बनाये गए इस बवंडर में फँसती जाए या अपने पूरे जीवन क्रम में किसी न किसी की नजरों तले ही उसका विकास हो, या कोई रईस स्त्री के बदले वह कुछ धनराशि देकर उस मासूम फूल से खिलवाड़ करे? यह प्रथा अमानवीय हैं क्योंकि इसमें समाज या देश का विकास असंभव हैं। अनमेल विवाह होने की वजह से अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता हैं। बच्चियों का विवाह किसी धनवान बुजुर्ग से कराने वाला समाज पाप का भागीदार पहले ही हो चुका हैं, इसके पश्चात भी यह समाज नहीं रुका वह स्त्रियों के गुप्तांगों से खेलने लगा यह प्रथा किसी भी देश के लिए फलदायक साबित नहीं हो सकती। इस प्रथा के कारण स्त्रियों को अनेक बीमारियों का सामना करना पड़ता हैं, इसी कारण उन्हें भीड़ वाली जगहों से अलग-थलग रखा जाता हैं। इस संदर्भ में जाहिदा खाला कहती हैं कि - “ये वे स्त्रियाँ हैं जिन्होंने बहुत कम उम्र में बचे पैदा किये थे। प्रसव के दौरान उनका अविकसित शरीर हमेशा के लिए कहीं न कहीं से जख्मी हो गया है। खास कर उनके मूत्राशय।”  इस कारण खेलती हुई बच्चियों को जबरन स्त्री बना दिया जाता हैं, जो कली अभी तक खिली ही नहीं उसे तोड़ दिया जाता हैं। इसी कारण स्त्रियों पर पुरुष सत्ता के अनेक अत्याचार ढाये जाते है। सुन्नत प्रथा स्त्री के लिए पृथ्वी का नरक मानना चाहिए, क्योंकि शैशवावस्था में जिसको जीवन से कोई सरोकार नहीं हैं जिसका संबंध सिर्फ आजादी से हैं, उन्हें अपने मजहब के नाम पर सुन्नत करके अधमरा कर दिया जाता हैं यह कहाँ का न्याय है और कहाँ का मजहब? क्या स्त्री का जन्म दुःख सहने के लिए होता हैं? उन्हें अनेक सोपानों में तरह-तरह का दुःख दिया जाता हैं इस संदर्भ में लेखिका कहती है कि “दुख तो अनगिनत हैं औरत  के भाग्य में, मगर तीन दुःख खास है - एक तो सुन्ना, दूसरा जब शादी की रात उसे फिर सम्भोग के लिए काट कर खोला जाता है और तीसरा जब बच्चा जनने के लिए उसे प्रसव के समय काटा जाता हैं।”
 इतनी अमानवीय पीड़ा को सहना बहुत ही कष्टदायक होता हैं। लेकिन स्त्रियों के लिए पुरुष प्रधान समाज में अनेक नियम लादकर उनके विकास को अवरुद्ध किया जाता हैं। सुन्नत (एफजीएम ) जैसी प्रथा के देश विश्व के मानचित्र पर धब्बों की तरह दिखाई देते हैं। इन देशों में स्त्रियों के सुन्नत-सम्बंधी कारणों से उत्पन्न अनेक बीमारियों के चलते स्त्रियों की मृत्यु हो जाती है इस संदर्भ में लेखिका कहती हैं कि - “विश्व स्वास्थ्य संगठन के हिसाब से 14 करोड़ औरतें जिसमें दस करोड़ दस लाख अफ्रीकन औरतें है, इस प्रथा का शिकार हुई हैं। इसकी वजह से औरतों को दर्द के साथ रक्तस्राव, मूत्रमार्ग का इन्फेक्शन, जख्म का इन्फेक्शन, खून में जहर फैलना, टेटनिस, हेपेटाइटिस तथा एचआईवी आदि हो जाता है।”  यहाँ मजहब के नाम पर पुरुषों द्वारा शोषण किया जाता है, शरीर से खिलवाड़ किया जाता है तब भी यहाँ स्त्रियाँ खामोश बैठी है इतनी यातनाएँ दी जाती हैं, फिर भी स्त्री सदियों से चुप होकर सहती आ रही हैं। यह प्रथा स्त्रियों को पवित्र रखने के लिए की जाती है। क्या सुन्नत ही स्त्रियों की पवित्रता की रक्षा करेगा? इसी सवाल को केंद्र में रखा गया है। पुरुषों की पवित्रता पर कोई ध्यान क्यों नहीं देता? स्त्री के गुप्तांगो से खिलवाड़ ईश्वर के प्रति गद्दारी माननी चाहिए क्योंकि ईश्वर ने तो पुरुष एवं स्त्री को ठीक धरती पर भेजा लेकिन उनके शरीर पर मजहब के नाम पर चाकू चलाया जाता हैं? क्या ईश्वर उनसे नाराज नहीं होगा? लेकिन पुरुष मानसिकता की जड़े बहुत अन्दर तक जा चुकी हैं उन्हें स्त्री चार दीवारों के भीतर ही दिखाई देनी चाहिए, इसलिए उनपर मजहबी रुपी छापा लगाया जाता है, इस प्रथा के विरोध में बोलने वाली स्त्री को समाज से बहिष्कार कर दिया जाता है। इस सन्दर्भ में माहरा की माँ कहती है - “नेक औरतें हमेशा अपने जिस्म से पाक रहती हैं। माँ होने के लिए, एक जान को धरती पर लाने के लिए उसे अपने शरीर का उपयोग करना चाहिए, न कि हवस के लिए...।”  स्त्री से पुरुषों का लगाव होता है, उन्हें अपने अधीन देखने में पुरुष सुख का अनुभव करता हैं। सदियों से विश्व के मानचित्रों में स्त्री शोषित रही है, उन्हें पुरुषों की तुलना में कम आँका गया हैं। उन पर अनेक तरीकों से अन्याय एवं अत्याचार हो रहे हैं। स्त्रियों को मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा गया है। इतना ही नहीं उन्हें सुन्नत जैसी कुत्सित प्रथा में जकड़ दिया गया है। इसलिए स्त्रियों को जागृत करने के लिए हुये अनेक आन्दोलनों में देशी-विदेशी संस्थाओं एवं समाजसेवकों का महत्वपूर्ण योगदान दिखाई देता है। इन्होंने यह समझाया है कि स्त्रियों का दुःख दर्द समाज के पुरुषसत्ता द्वारा थोपा गया है जिसे स्त्रियाँ कभी भी उतार कर फेंक सकती है। इस सन्दर्भ में मेम कहती है कि “जरूरी नहीं है कि औरत हैं तो दर्द सहना ही पड़ेगा। बहुत से दर्द कुदरत ने नहीं, इंसान ने औरत के लिए पैदा किये हैं। इंसान अपनी बनाई हुई तकलीफों का शिकार है। दुनिया की आधी से ज्यादा तकलीफें मनुष्य ने खुद अपने लिए पैदा की हैं। जिस दिन वह चाहेगी, यह दुनिया बेहतर हो सकती है, इसके अधिकतर दुःख मिट सकते है।”  इतना समझाने के पश्चात भी परम्परागत विचारों की स्त्रियों में कोई परिवर्तन नहीं दिखाई देता है, उनके विचारों में परिवर्तन की चिंगारी दूर तक भी नजर नहीं आती हैं। इस सन्दर्भ में साबीला की दादी कहती है कि - “औरत खता की पुतली होती है। वह बार-बार गुनाह करती है। उसके फितरत में वफा नहीं होती। इसलिए उस पर यक़ीन नहीं किया जा सकता। उस पर नजर रखनी पड़ती है।”  इसी मानसिकता वाली स्त्रियों के कारण आज भी स्त्री कहीं न कहीं शोषित हो रही है, और जो प्रथाएँ चल रही है इन्हीं के कारण। पुराने खयालात की स्त्रियाँ चाहती हैं कि आने वाली स्त्री भी उनके विचारों से प्रभावित होकर उनके आधीन रहें इसीलिए उस स्त्री पर कुछ विचार एवं रिवाज थोपे जाते हैं, और उन्हें सलाह दी जाती है कि औरत को अपनी पवित्रता की सूचना देनी है, और इसके लिए उसकी सुन्नत अनिवार्य है। इस सदर्भ में साबीला की दादी कहती हैं कि - “औरत का जिस्म पाप का गढ़ है। जहाँ इच्छाएँ जन्मती हैं, उत्तेजना पैदा होती है, उस हिस्से को शरीर से अलग कर देना ही भला। औरत खता की पुतली होती हैं, हव्वा की बेटिया...।”  पवित्रता, और कौमार्य का जिम्मा केवल स्त्रियों पर क्यों? क्योंकि समाज में पुरूषों की सत्ता हावी है इसीलिए नहीं, कुछ स्त्रियों की परम्परागत मानसिकता के कारण आज भी स्त्रियाँ बन्धनों में बंधी हुई हैं इस सन्दर्भ में साबिला की दादी कहती है कि - “औरत होकर इतना मुँह चलाना अच्छा नहीं लडकियों। अपनी औकात में रहना सीखो वर्ना बहुत दुःख उठाने पड़ेंगे। एक बात और भी समझ लो तुम सब, यौन सुख सिर्फ पुरूषों के लिए होता है, जबकि स्त्रियों के लिए इसका एकमात्र उद्देश्य मातृत्व होना चाहिए।”  इसी मानसिकता के कारण आज भी स्त्रियाँ यातनाएँ झेल रही है। स्त्रियों का विकास करना है तो उन्हें जागृत कीजिए, उन्हें परम्परागत बन्धनों को तोड़ने के लिए प्रोत्साहन देना आवश्यक है। उन्हें समाज की घृणित प्रथाओं से बाहर निकलना होगा।

 अफ्रीका के कुछ हिस्सों में स्त्रियों पर बलात शोषण किया जाता हैं, उनकी चीख-पुकार रेगिस्तान की वादियों में दफ़न हो जाती है। इन देशों में अनमेल विवाह का भी चलन है, इसी कारण स्त्रियों का पूर्णरूप से विकास होने से पूर्व ही उनका विवाह किसी रईस बुज़ुर्ग से कर दिया जाता है। स्त्रियों की पवित्रता का प्रमाण उसे सुहागरात के दिन देना पड़ता है, लेकिन पुरुषों के कौमार्य के प्रमाण की कोई आवश्यकता नहीं होती। स्त्री के सुहागरात के पश्चात बिस्तर पर पड़े खून की तरफ सभी का ध्यान आकर्षित हो जाता है इस संदर्भ में लेखिका कहती हैं कि - “सभी उन्हें इस बात की बधाई दे रहे थे कि उन्होंने अपनी बेटी की बहुत बढ़िया परवरिश की है, तभी तो सुहाग की सेज तक वह कुंवारी पहुँची है। बिस्तर पर पड़ा इतना सारा खून इसी बात की गवाही देता है।”  यही है स्त्री की पवित्रता का प्रमाण? मान लीजिए सुहाग की सेज पर खून न होता तो क्या वह पवित्र नहीं होती? ऐसी बात नहीं है क्योकिं आज विज्ञान ने इस भ्रम को तोड़ दिया है। लेकिन आज भी सुहाग की सेज पर ही सभी का ध्यान आकर्षित रहता है। इसका प्रमाण तो हमें अनेक आत्मकथाओं एवं फिल्मों में दिखाई देता है। लेकिन खून निकलते समय उस स्त्री को कितनी यातनाओं का सामना करना पड़ा होगा इसपर समाज के किसी भी व्यक्ति का ध्यान नहीं जाता यहीं सबसे बड़ी विडंबना है। सुन्नत करने की वजह से स्त्रियों को अनेक बीमारियों का खतरा होता है उन्हें अलग-अलग तरीके के इन्फेक्शन भी होते है। कुछ ऐसी बीमारियाँ होती हैं जिनका इलाज भी नहीं होता इसी कारण ज्यादातर स्त्रियों की मृत्यु हो जाती है, इसी वजह से माहरा की बहन मासा की भी मृत्यु हो थी। इस सन्दर्भ में मेम कहती है कि-“ यह सुन्ना की वजह से हुआ है... जब गंदे और खून लगे औजारों से इस तरह काटा-चीरा जाता है, हजार तरह की दूसरी बीमारियों के साथ एड्स हो जाने का भी खतरा रहता है।”  स्त्री के जीवन का अंतिम लक्ष्य क्या पुरुष की हवस को मिटाना अथवा माँ बनने तक ही सीमित हो गया है। अफ्रीका तथा दुनिया के कुछ देशों में यह प्रथा आज भी कहीं न कहीं जीवित हैं। स्त्रियों का सुन्नत करना और उसे सी देना यह भयानक त्रासदी दायक प्रथा है, इसके विरोध में प्रत्येक मनुष्य को जागृत करना तथा इस कुत्सित प्रथा की जड़े उखाड़ फेंकना ज़रूरी है। ‘सुन्नत’ एक बुरी प्रथा है जिसकी वजह से बच्चे रोगी पैदा होते हैं, इसलिए ज्यादातर बच्चों की मृत्यु हो जाती है इस संबंध में लेखिका कहती हैं कि - “सुन्ना और उससे बुरी तरह से बंद पड़ गए योनि मार्ग की वजह से जाने कितने बच्चे जन्म से पहले या बाद में मारे जाते हैं। ख़ासकर हमारे जैसे दूर-दराज के इलाकों में...।”

समय के अनुसार समाज, रुढियों तथा प्रथाओं में परिवर्तन हो जाता है इसी प्रकार की एक नई वैज्ञानिक सोच हम इस उपन्यास में देख सकते है। माँ जो नरक रूपी यातनाएँ भोग रही हैं, वह यह नहीं चाहती कि उसकी बेटी भी इस कुत्सित  प्रथा का शिकार हो जाए इस सन्दर्भ में माहरा कहती है कि - “मैं चाहती थी जीवन का यह नर्क, यातनाओं का अथाह संसार मुझ पर ही ख़त्म हो जाये। कभी मुझसे गुजर कर मेरी बेटी तक न पहुँचे। इसकी उदास, मलिन छायाएँ कभी उसके चेहरे की निर्दोष रेखाओं को जटिल गुंजल में परिवर्तित न कर पाये। जीवन का सारा संत्रास मुझ तक आकर थम जाए।”  आज माँ अपनी सन्तान को इस नरक से दूर रखना चाहती है, वह जान चुकी है कि सुन्ना किसी भगवान की देन न होकर इसी समाज की उपज है। अफ्रीका तथा अन्य देशों में इस प्रथा के खिलाफ आवाज उठाया जा रहा है, क्योकि यह प्रथा किसी मजहब से जुड़ी नहीं है। लोग अज्ञान के कारण इस प्रथा को अपनाते है इस सन्दर्भ में माहरा कहती है कि - “मेम ने ही बताया था कि यह सिर्फ मुसलमानों में ही नहीं कुछ देशों के ईसाइयों तथा अन्य जातियों में भी प्रचलित है... मेम ने ही यह भी बताया था कि इसमें कुछ भी मजहबी नहीं है। लोग अपनी अज्ञानता में इसे एक धार्मिक रीति मान लेते है, जबकि इसका धर्म से कुछ लेना-देना नहीं हैं।”  इस कुप्रथा से आजादी हेतु अनेक संगठन तथा समाज सेवकों की अहम् भूमिका है तथा जयश्री रॉय कृत ‘दर्दजा’ उपन्यास की भी। आज भी अफ्रीका तथा अन्य देशों के वीरान जंगलों में करोड़ों स्त्रियों की आवाज को सुन्नत करते समय दबाया जा रहा है। इन स्त्रियों को हमारी सहानुभूति की नहीं बल्कि उनके अधिकार की और हमारे सहयोग की जरूरत है। माहरा जैसी स्त्रियाँ इस समाज की प्रथाओं से निरंतर लड़ रही है। इनका संघर्ष अभी ख़त्म नहीं हुआ। इन्हें दर्द की असीम गहराइयों में आज भी धकेला जा रहा है इनकी आवाज़ सुनने के लिए कान से ज्यादा हृदय की आवश्यकता है।

संदर्भ सूची

1. जयश्री रॉय, दर्दजा, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली सन 2015, पृष्ठ -15
2. वही पृष्ठ  16
3. वही पृष्ठ  16
4. वही पृष्ठ  18
5. वही पृष्ठ  26
6. वही पृष्ठ  29
7. वही पृष्ठ  32
8. वही पृष्ठ  38
9. वही पृष्ठ  35
10. वही पृष्ठ  44
11. वही पृष्ठ  45
12. वही पृष्ठ  45
13. वही पृष्ठ  77
14. वही पृष्ठ  78
15. वही पृष्ठ  86
16. वही पृष्ठ  99
17. वही पृष्ठ  112
18. वही पृष्ठ  133

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