पुस्तक समीक्षा: क्या तुमको भी ऐसा लगा? (शैलजा सक्सेना)

पुस्तक 'क्या तुमको भी ऐसा लगा?'; लेखक: शैलजा सक्सेना; समीक्षक: समीर लाल ’समीर’
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काव्य संग्रह: क्या तुमको भी ऐसा लगा?
लेखिका: शैलजा सक्सेना
प्रकाशक: हिन्दी राइटर्स गिल्ड, मिसिसॉगा, कनाडा
प्रकाशक ईमेल: hindiwg@gmail।com
लेखिका ईमेल: shailjasaksena@gmail।com
मूल्य: $ 10 (अमेरिका व कनाडा)
'पुस्तक बाजार’ से डाउनलोड करके ईपुस्तक $3 में निम्न लिंक पर पढ़ी जा सकती है: http://pustakbazaar।com/books/view/2
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डॉ शैलजा सक्सेना कनाडा के हिन्दी साहित्यजगत की जानी मानी हस्ती हैं। शैलजा जी की कलम के अलावा उनके नाटकों के मंचन में कुशल परिकल्पना, निर्देशन और अभिनय, टीवी पर विशेष कार्यक्रम का संचालन, कनाडा के हिन्दी प्रेमियों के लिए हिन्दी राईटर्स गिल्ड का नेतृत्व आदि, न जाने कितनी प्रतिभाओं का समावेश है उनके सौम्य व्यक्तित्व में।

शैलजा जी नियमित अनेकों पत्र-पत्रिकाओं में छपती आई हैं। अन्तरजाल पर उनकी शानदार उपस्थिति अनेक मंचों के साथ साथ कविता कोश जैसे उत्कृष्ट मंच पर भी है।

शैलजा जी से परिचय हुए डेढ़ दशक से अधिक का समय बीता। बहुत बार उनको सुनने का मौका मिला। उनकी कवितायें पढ़ने का मौका मिला। हर बार एक नई गहराई, एक अलग दृष्टिकोण और अपने मन के उठते भावों की एक अलग अंदाज में बयानी और कविता खत्म हो जाने पर एक प्रश्न चिन्ह: क्या तुमको भी ऐसा लगा?’
बस! ऐसा ही कुछ तो है शैलजा जी के काव्य संग्रह ’क्या तुमको भी ऐसा लगा?’ यूँ तो हर कविता आपको सोचने को मजबूर करेगी कि यह भी एक नजरिया है बात रखने का। उनकी कविताओं के विषय में कुछ भी कहने से बेहतर है कि आप खुद उन्हें पढ़कर देखें। मैं उनके 79 कविताओं के काव्यसंग्रह से तीन कवितायें यहाँ दोहरा रहा हूँ और मुझे विश्वास है मात्र इन तीन कविताओं को पढ़कर ही आप अपने आप को नहीं रोक पायेंगे इनका पूरा काव्य संग्रह प्राप्त कर पढ़ने से।
-1-
हवा खराब है
शहर की हवा,
गंधाती है धूल से, मसालों से, मिठाइयों से, गरीबी से।।!
चीखती है हज़ारों आवाज़ों में।।
ठेलों की, भिखामंगों की, बाबुओं की,
कार, रिक्शा, सायकिल, मंदिर, मस्ज़िद, गुरुद्वारे के भोंपुओं में।
सब होड़ में हैं कि
हवाओं पर किसका अधिकार हो सब से ज़्यादा!
हवा,
घबरा कर छुप जाना चाहती है जंगलों में,
पर…। वे तो कट चुके हैं!
हवा,
घबरा कर छुप जाना चाहती है पहाड़ों और हवेलियों के पीछे,
पर…।। वे तो ढ़ह चुके है!
बौराई सी घूमती है हवा आसरे को
पर कट-फट कर रह जाती है हज़ारों आवाज़ों में!
गंधा कर रह जाती है
अनचाही गंधों में।।!
और आदमी कहता है
“हवा खराब है आजकल की”॥

-2-
मौन का परिणाम
तुमने सही को
गलत कहा,
गलत को सही, कहना पड़ा
मुझे भी वही,
शब्द को दी नहीं, अर्थ की सहमति
संस्कारों ने दी नहीं
मुँह खोलने की अनुमति
हर बार बहस की स्थिति से बचती रही
और सच्ची भावनाओं के आसपास
पाँव दबा चलती रही।
झगड़े की आशंका
अनेक सच्चाइयों को
कर देती है मौन
झूठ को
सब जानते हैं पर झूठ से लड़े कौन?
दुनिया की पंचायत में
हर बार प्रश्न यही रहा
और मौन के परिणाम को
हम सबने सहा।

-3-
कनाडा में बसंत
हवा,
अपनी बासंती अँगुलियाँ
डैफोडिल्स और ट्यूलिप की खुश्बुओं में डुबो,
लिख रही है धूप को निमंत्रण,
अप्रैल के आखिरी पन्नों पर।।।

धूप बेखबर खेल रही है,
आँख मिचौली बादलों के संग।

उधर हवा,
पेड़ों को जगाती हिमनिद्रा से,
घास को मुस्कुराने का आदेश देती,
कलियों का मस्तक सूँघती,
पाँव दबा, महकती, छलकती,
फिर रही है यहाँ से वहाँ,
पाहुन धूप के आने की तैयारी में जुटी।
अप्रैल के आखिरी पन्नों पर।।।

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