लघुकथाएँ - सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

सुरेंद्र अरोड़ा

सुरेंद्र अरोड़ा


फेवर

"एक फेवर करोगी?"
"हाँ कहो।"
"आज के बाद तुम मुझसे सम्पर्क करने का प्रयास नहीं करोगी।"
"ये क्या मांग रहे हो?"
"वही जो बरसों पहले मांग लेना चाहिए था।'
'"क्या किया है मैंने! वह मांग रहे हो जिसे दे भी दूँ तो भी निभा नहीं पाऊंगीं और तुम मुझ पर फिर से झूठ बोलने की तोहमत जड़ दोगे।'
"तो क्या पत्थर हूँ मैं कि जब चाहे अपने अंतःस्थल की मजबूरियों में मुझे स्वीकार लो और अगले ही पल अपनी किन्ही और मजबूरियों का हवाला देकर दुत्कार दो। चेतना रहित जड़ हूँ क्या जो मुझ पर तुम्हारी किसी बात का कोई असर नहीं होता?
"मत कहो ये सब। मुझे खुद ही नहीं पता लगता कि क्या करूँ और क्या न करूँ। तुम्हें अपना भी नहीं सकती और तुम बिन रह भी नहीं पाती। मैं तुम्हें वो कुछ नहीं दे सकती जो तुम्हें मिलना चाहिए और तुम जब किसी गहरे अवसाद में खो जाते हो तो वह भी मुझसे सहन नहीं होता। ये सच है कि मैं तुम्हें कुछ भी कह लूँ पर मैं ही तुम्हें भूल नहीं पाती।"
"जो गलतियाँ अनजाने में हो जाती हैं, उनके परिणाम से बचने का उपाय तो ढूंढा जा सकता है पर जो भूल पूरे होशोहवास में जानबूझ कर की जाती है, उसके दुष्परिणाम तो हमें भुगतने ही पड़ते हैं। मैं अब और अधिक नहीं सह सकता। समय की धूल सारे रिक्त स्थान भर देगी। जो खाली जगह तुम मुझे अचानक दे देती हो, उसे भरने में मुझे जो कुछ झेलना पड़ता है, वो सब अब मेरी सामर्थ्य से बाहर है। जैसे ही मैं खुद को संभालता हूँ तुम फिर से मुझे अस्थिर कर देती हो। इसलिए सिर्फ एक एहसान और कर दो कि मुझसे सम्पर्क की कोई भी कोशिश नहीं करोगी।'
"चुप हो जाओ। और अधिक परीक्षा मत लो मेरी। मेरे अंदर जितनी जगह तुम्हें मिली है, उसे ही स्वीकार लो। इससे मुझे मेरी जिंदगी के बाकी दिन नसीब हो जायेंगे। मेरा न सही मेरी बेटी संगीता का ही ख्याल कर लो। मुझे उसे भी बड़ा करना है। अगर इस दुनिया से असमय चली गयी तो उसके जन्म का जिम्मेदार उसका बाप मेरे बाद उसका क्या ख्याल रखेगा, उसके अनुमान से ही कांप जाती हूँ। जो व्यक्ति घर में सिर्फ होटल वाली सुविधाएँ पाने के लिए कदम रखता हो, उससे क्या उम्मीद करूँ?"
"इस तरह की बातें करके मुझे कब तक निरुत्तर करती रहोगी?"
"कुछ भी दोष दे लो पर यही मेरा सच है कि मैं वह नहीं कर सकती जो तुम चाहते हो ... पर हाँ, तुमसे दूर भी नहीं जा सकती। तुमसे बात जरूर करूँगीं और ... और तुम जानते ही हो कि तुमसे बात न करने की ठान भी लूँ तो तुम भी सुकून से कहाँ जी पाओगे।"
 उसके शब्द, उसके अंदर ही सिमट कर रह गए। वह अपनी जगह से एक इंच भी नहीं खिसक पाया।

उदासी

"कभी कभी ऐसा क्यूँ हो जाता है कि बिना वजह हमे उदासी घेर लेती है?"
"आज तुम उदास हो क्या?'
"उदास तो नहीं पर खुशी भी महसूस नहीं कर पा रहा।'
"मेरा साथ तो तुम्हें पसन्द है और मैं तुम्हारे साथ हूँ। फिर भी तुम उदास हो। कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम्हारा मन मुझसे भर गया है?"
"ऐसी बातें मत करो। इससे मेरी उदासी बढ़ जायेगी।"
"फिर तुम भी उदास होने की बात मत करो।'
"यार! एक बात बताओ, जिंदगी क्या सिर्फ हमारी-तुम्हारी दिनचर्या का नाम है?"
"ऐसा क्यों सोच रहे हो? हम हर दिन उन सारे लोगों से मिलते हैं, जिनसे हमें कोई न कोई काम होता है। बेमतलब तो किसी से बात नहीं की जा सकती न।'
"बस इसे ही जिंदगी कहते हैं क्या?"
"और क्या होती है जिंदगी? आज ऐसा क्या हुआ जो नहीं होना चाहिए था और ऐसा क्या नहीं हुआ जो होना चाहिए था।कुछ समझ नहीं आया। आखिर कहना क्या चाहते हो?"
"यही कि वो आदमी कितनी शिद्दत से जिन लोगों की जिंदगी के गड्ढे भरने की कोशिश कर रहा था, वो उसी गड्ढे में गिरकर मर गया जिसे उन लोगों ने उसे भरने नहीं दिया। मतलब उसे जबर्दस्ती मार दिया गया।"
"तो क्या इसीलिए उदास हो?"
"क्या मेरी उदासी के लिए ये वजह काफी नहीं है कि उस आदमी ने जिन लोगों के लिए गड्ढों को भरने की कोशिश की वही उसकी मौत का कारण बन गए!"
"समझ में नहीं आ रहा कि तुम्हारे साथ रहकर, तुम्हें पहले से ज्यादा प्यार करूँ या तुम्हें तुम्हारी कँकरीली उदासियों के बीच छोड़कर किसी सरपटी नरम राह की राहगीर बन जाऊँ?"
"अच्छा तो यही होगा कि तुम कोई नरम राह चुन लो।'
"तुम्हें पता भी है कि हर नरमी को कठोर धरातल की जरूरत होती है। नहीं तो वह नरमी कुछ देर बाद धँसकर गड्ढा बन जाती है। और हाँ, तुम्हारी उदासियों से वो आदमी जिन्दा तो नहीं हो जायेगा न। इसलिए उदासियाँ-वुदासियाँ छोड़ दो।"
"समझ नहीं पा रहा कि क्या करूँ?"
"उठो और उसकी तमाम कोशिशों के बाद भी जो गड्ढे भरे नहीं जा सके, उसकी वजहें खोजो और उन्हें भरने की कोशिश भी करो। फिर देखना वो आदमी फिर से जिन्दा हो उठेगा।'
वह स्नेहसिक्त मुद्रा में उसे देखने लगा।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।