कविता: सोचा नहीं था

पुष्पिंदरा चगती भंडारी

- पुष्पिंदरा चगती भंडारी


सोचा नहीं था
इस तरह की मुलाकात होगी
जिसके लिए
उम्र के तीन दशक से भी
लम्बा इंतजार किया।।

हर बार जब इस लम्हे को सोचता था तो लगता था बरबस खींचकर
गले से लगा लेंगी मुझे
और मैं आँसुओं से गीला कर दूंगा दामन उनका
कुछ झगड़ा भी करूंगा
और कुछ जिद भी
पर आखिर मान ही जाऊंगा
माँ का मान भी तो रखना होगा ।।

पर जो मुझसे मिलने आईं
वह राजमाता थी पांडवों की
महारानी थी कुरुवंश की
मेरी माँ नहीं थी,
वह तो अर्जुन की माँ थी ...

काश अधिकार से कहा होता वह सब जिसकी याचना की उन्होंने
शायद मैं खुशी से हार जाता
अर्जुन से ... अपने अनुज से
भूल जाता सारे अपमान
जो उसके हाथों हुए मेरे ।।

पर जब उन्होंने कहा साथ चलो
मैं युधिष्ठिर और बाकी सब को
समझा दूंगी तो कलेजा छलनी हो गया
वह सिर्फ अर्जुन की जिंदगी मांगने आई थीं,
मुझे अपनाने के लिए नहीं ;
इतने वर्षों तक जो राज़ रखा
आज भी किसी को बिना बताए आई थीं!

किस तरह अपने सर को संभाला
उन चरणों में गिरने से
खुद को समेटा,
किरचों में बिखरने से।

खुद को याद दिलाये
दुर्योधन के असंख्य उपकार ...
बस मुट्ठियाँ भींच  कर रह गया
उनके सदैव पाँच पुत्र रहेंगे
यही कह सका उन्हें।

फिर उनको देखने की ताब न ला सका
वापिस जल में स्नान हेतु उतर गया।

उस दिन लोगों से सुना
अंगराज देर तक जलक्रीड़ा में रहे
उनके नेत्र भी
गुड़हल के फूलों जैसे
लाल हो गए थे...

3 comments :

  1. आदरणीय पुष्पा चागती भण्डारी जी की कविता तमाम उन बन्धों को तोड़ गई जो कर्ण को कभी कभी मात्र योद्धा तक सीमित रखते थे।भाव पर अधिकार हर पीड़ा का होता है बस बहने को मार्गचाहिए।वो मार्ग इस कविता ने सुलभकरा दिया कर्ण को।साधुवाद।....मनीषा त्रिपाठी।

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  2. Pushpindra Chagti BhandariJanuary 9, 2019 at 12:39 AM

    आपके स्नेह एवम मान का सस्नेह धन्यवाद मनीषा त्रिपाठी ,
    बहुत शुक्रिया आपने पढ़ने का समय निकाला

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  3. Congratulations
    Pushpindera madam for such an amazing n emotional journey of karna. His emotions,honesty, love, hatred were so clear from your poem. Hope to have more of your collection in Sithu

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