धर्म की आड़ में तृतीयपंथी : ‘भंडारभोग’ और ‘चौडंकं’ उपन्यास के विशेष संदर्भ में

रामडगे गंगाधर पिराजी

शोधार्थी, हिंदी विभाग, तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारुर, भारत
सम्पर्क: gangap3377@gmail.com


राजन गवस कृत ‘भंडारभोग’ और ‘चौडंकं’ मूलतः मराठी उपन्यास हैं। जिसमें रूढ़ि-परंपराओं में जकड़े देवदासी प्रथा यानी कि जोगियों की कहानी है। अंधविश्वास में जीने वाले अधिकांश लोग किस प्रकार विचारहीन हो जाते है, इसका उदाहरण इन उपन्यासों में बख़ूबी से चित्रित किया गया है। किसी लड़के या लड़की के केश में कंघी करते समय अगर कठिनाई हो तो क्या उसे भगवान के लिए जोगी या जोगन बनाकर अर्पित कर देना चाहिए? लेकिन ऐसा घटित होता है। ऐसे लड़कों और लड़कियों को देवी येलम्मा के चरणों में अर्पण किया जाता था। आज भी यह प्रथा कम मात्रा में ही क्यों न हो लेकिन है। अशिक्षित लोगों में अंधविश्वास अधिक था। इन समस्याओं को घर में सहज रूप से सुलझाया जा सकता था लेकिन लोगों के अशिक्षित होने और अंधविश्वास को गले लगाने वालों का फायदा उठाते हुए धर्म के ठेकेदार इनकी समस्याएँ और भी उलझनों में डाल दिया। उनका पूरा जीवन बर्बाद कर दिया। देवी को अर्पित किए लड़के को ‘जोगी’ और लड़की को ‘जोगन’ कहा जाता है। असल में यह लोग घर-घर जाकर, अनाज मांगकर अपनी जीविका चलाते है। उसे ही ‘जोगवा’ कहते है। देवी की सेविका होने की वजह से, इन्हें खाली हाथ कोई नहीं लौटाता। यह लोग अपना संगठन बनाकर उसमें एक वरिष्ठ को अपना गुरु मानकर, उसके बताए रास्ते पर चलते हैं।

राजन गवस कृत ‘भंडारभोग’, ‘चौडंकं’ और चारुता सागर कृत ‘दर्शन’ ऐसी तीन साहित्यिक कृतियों के आधार पर मराठी में ‘जोगवा’ नाम से 2008 में फ़िल्म भी बनी है जिसके निर्देशक राजीव पाटिल हैं। फ़िल्म की शुरुआत घने अंधकार में तृतीयपंथियों की सभा से होती है। जिसमें अपने पंथ के लिए एक महिला को चुना जाता है; गुरुमाई के रूप में। इस फ़िल्म में यह दिखाया गया है कि किस प्रकार ये जोगन लोग अपनी जीविका चलाने के लिए येलम्मा देवी (रेणुका माता) की सेवा का मार्ग चुनते है और अपने पंथ का किस प्रकार से विकास करते है।
‘चौडंकं’ उपन्यास की नायिका सूली है। वह एक सामान्य घर की हँसती-खेलती, आठ-दस साल की एक नादान लड़की है। दिन भर की भागदौड़ और धूल-मिट्टी में खेलने की वजह से या किसी कारण वश उसके बाल उलझ जाते है; कंघी करने नहीं आती। जब उसकी माँ उसे नहलाकर कंघी करने बैठती है तो एक जगह उसके बाल उलझ जाते है। इसे अपशकुन मानकर उसकी माँ जब अक्कू जोगन के पास ले जाती है तो अक्कू जोगन उसे येलम्मा देवी का कोप बताकर सूली को आजीवन जोगन बनकर देवी की सेवा करने को कहती है। अक्कू जोगन को तो अपने पंथ का विकास करना था; बकरा खुद चलकर पास आये तो उसे बलि का बकरा तो बनाना ही था; सूली को अपने पंथ में शामिल जो करना था। जब उसके पिता सुबान इसका विरोध करने लगता है तो अक्कू जोगन उन्हें देवी का कोप और भय दिखाकर चुप करा देती है।

ठीक उसी प्रकार ‘भंडारभोग’ उपन्यास भी एक ऐसे ही रूढी-परंपराओं में जकड़े समाज का चित्रण है। जिसमें ग्रामीण परिवेश के लोग देवी यलम्मा के महात्म्य और जोगन की झूठी बातों पर अंधविश्वास कर बैठते हैं। देवी की बनी दासियाँ यानी कि जोगन, देवी के नाम पर लोगों में डर पैदा कर देती है। उसी डर का शिकार कथा नायक तायप्पा है। जिसे मजबूरन जोगी बनना पड़ा। तायप्पा को प्राकृतिक कारणों से पेशाब के माध्यम से खून निकल रहा था। वो एक बड़ी बीमारी से ग्रस्त हो चुका था। यह बीमारी इतनी मात्रा में बढ़ चुकी थी कि तायप्पा अंतिम सांसे गिन रहा था। ग्रामीण क्षेत्र में सुविधाएँ न मिलने के कारण शहर के एक बड़े अस्पताल में दाखिल कराया गया। इसी दौरान अक्कू जोगन का महात्म्य सुनकर तायप्पा की माँ कलव्वा उस जोगन के पास जाकर मन्नत मांगती है। तबीयत में सुधार हो जाने के बाद तानु सुतारिन, जो कि एक जोगन है, बार-बार कहती फिरती है कि यह सब देवी यलम्मा के महात्म्य से हुआ। तायप्पा की माँ कलव्वा भी इसी भ्रम में जीती है, जबकि तायप्पा शहर के अस्पताल में ठीक हुआ था। एक-दो सप्ताह बाद जब वह पूरी तरह ठीक होकर घर लौटता है तो उसके माता-पिता लोगों के बहकावे में आकर अक्कू जोगन के पास ले जाते है और अक्कू जोगन अपने नियम बताकर उन पर अपना अधिकार जमाती है।

परंपराएँ तथा प्रथाएं सूली और तायप्पा जैसे नादान, नासमझ बच्चों पर भी थोप दी जाती है। यह अंधविश्वास केवल और केवल एक भ्रम है। इन भोले-भाले लोगों के साथ-साथ बच्चे, स्त्रियाँ तथा बूढ़े भी इसकी चपेट में आ जाते हैं।
सच तो यह है कि किसी पुरुष में बच्चे पैदा करने की क्षमता न होना या कोई स्त्री बच्चे पैदा नहीं कर पाती या बच्चे को जन्म नहीं दे पाती है, उन्हें जोगी-जोगन बनाने की प्रथा थी। उन्हें आजीवन देवी की सेवा के लिए अर्पण कर देते थे। वे देवी-देवताओं और रुढ़ि-परंपराओं का सहारा लेकर जीवन बिताया करते थे। आज के संदर्भ में यह पारंपरिक प्रथा न रहकर एक व्यापार बन चुका है। अब इस प्रथा के सत्ताधारी लोग इस पंथ में सामान्य लोगों को भी बलि का बकरा बना रहे है। अंधविश्वास में डूबे विचारहीन लोग भी स्वयं पर या परिवार पर आए संकट का सामना करने की बजाय देवी का कोप समझकर अपना एक पुत्र या पुत्री को देवी के चरणों में अर्पण करने की मन्नत मांगता है। यह प्रथा बरसों से ऐसे ही चली आ रही है। यह प्रथा आज भी महाराष्ट्र तथा कर्नाटक सीमा के आस-पास के देहाती क्षेत्रों में देखने को मिलेगा।

तायप्पा को एक अच्छे अस्पताल में इलाज कराने की वजह से ठीक हो चूका था, न कि मन्नत मांगने से। लेकिन अक्कू और अन्य जोगन देवी का महात्म्य बताती है और तायप्पा को देवी यलम्मा का जोगी बनकर, जोगवा मांगकर सेवा करने का आदेश दे दिया। ऐसे नहीं करने पर देवी का रूद्र अवतार तथा कोप से घर-परिवार भारी संकट में पड़ जाने की धमकियाँ मिलती हैं। देवी के कोप से घर में दारिद्र्य न आये इसी डर से अंधविश्वास में डूबा तायप्पा का परिवार भी उसे जोगी बनाने के लिए राजी हुआ। अक्कू जोगन इनके साथ भी वही करती है जो सूली के माता-पिता के साथ किया था।

 ‘कहने के लिए तो जोगी बनना आसान है लेकिन जीवन बिताना बहुत कठिन। अगर वह मर भी जाए तो उसके मय्यत पर कोई नहीं आता। उसका स्पर्श भी बिच्छू के डंक मारने जैसा लगता है। उसका जीवन पूरी तरह अंधेरे में बीतता है। वह भी होता तो पुरुष ही है लेकिन एक जोगी और सामान्य पुरुष में जमीन आसमान का अंतर है।’
अक्कू जोगन तायप्पा को कंगन और साड़ी पहनाकर उसके गले में एक माला डालकर जोगी बना देती है। सूली को भी वही सब बाजे की धुन में हल्दी कार्यक्रम करवाकर उसके गले में मंगलसूत्र पहनाकर देवी की दासी यानि जोगन बना देती है और देवी येलम्मा के चरणों में अर्पित करती है। यह सब रस्म एक शादी की रीति-रिवाज की तरह ही किया जाता है। धर्म के आड़ में छुपे यह पाखंडी, सामान्य लोगों और सूली तथा तायप्पा के माता-पिता को अपने विचारों से बहका कर अंधेरे में रखती है। खुद को देवी की भक्त कहलाना, लोगों को अपनी और खींचना फिर उन्हें परंपराओं में जकड़कर उनमें डर पैदा करना इन लोगों की वास्तविक प्रवृत्ति है। अक्कू जोगन कहती है ‘ऐसा होना भी एक देवी का वरदान है जो हर किसी के क़िस्मत में नहीं होता। इनकी क़िस्मत अच्छी है, इसलिए इन्हें देवी की सेवा करने का सौभाग्य मिला।’

अक्कू जोगन तथा अन्य परिचित जोगन देवी के कोप से सर्वनाश हुए अन्य लोगों के उदाहरण दे-देकर उनके माता-पिता को भय दिखाने का काम करती हैं। उनके दिल में भय इस प्रकार घर कर बैठता है कि तायप्पा के माता-पिता उसे हर दिन साड़ी-ब्लाउज पहनने के लिए मजबूर कर देते हैं। हर माँ अपने बच्चों की ख़ुशी के लिए सब कुछ त्याग देती है। माँ की ममता उन पर न्योछावर कर देती है लेकिन तायप्पा की माँ देवी माँ के कोप से अपने परिवार पर बुरे संकट न आ जाए, इसलिए अंधविश्वासी बनकर तायप्पा को कहती है ‘देख तायप्पा आज से तेरी जिंदगी हमेशा साड़ी-ब्लाउज में ही कटेगी। मरने के बाद भी तेरी अर्थी इन्हीं कपड़ों में जायेगी।’
इन जोगन लोगों को न घर वालों का सहारा होता है न रिश्ते-नाते वालों का; बेसहारा, समाज और गाँव वालों से दूर अपना अलग से घर बनाकर रहते हैं। ठीक उसी तरह जिस प्रकार तृतीयपंथी (किन्नर) समुदाय रहता है। इनमें भी गुरु शिष्य वाली परंपरा भी होती है। इन दोनों समाज का जीवन एक समान ही है; अंतर केवल इतना ही है कि जोगन धार्मिक रूढ़ी-परंपरा, पारंपरिक रीति-रिवाज की आड़ में रहकर जीता हैं और तृतीयपंथी समुदाय अपने बनाये रीति-रिवाजों में बंदे रहकर जीवन बिताता है।

यह लोग भी जोगन की आड़ में तृतीयपंथी का ही एक प्रकार है। यमन्या इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। ग्रामीण परिवेश होने की वजह से इस बात पर पर्दा डाल दिया गया था। जोगन तृतीयपंथी न होकर भी उन्हीं की तरह जीवन जीने के लिए मजबूर है। शराब, वासना और भोग विलास की इच्छा होने की वजह से पुरुषों से संबंध बनाते हैं। जिनमें प्रमुख - पारव्वा, फुला, यमन्या और तानक्का हैं। तृतीयपंथी भी तो यही सब करते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यह लोग गाँव में शान से जीते हैं और शहर में रहने वाले किन्नर दर-दर भटकते फिरते हैं। इन लोगों को देवी की सेवा के नाम पर अनाज और पैसा आराम से तो मिल जाता है लेकिन एक किन्नर को ताली का सहारा लेकर पैसे वसूलना पड़ता हैं।

जोगन लोग धार्मिक रूढ़ी-परंपरा, पारंपारिक रीति-रिवाज की आड़ में अपनी रोटी सेकने का काम करते ही करते है साथ में सूली तथा तायप्पा जैसे सामान्य लोगों को शिकार भी बनाती है। उन्हें जबरन अपने जैसा बनाकर अपने पंथ का विकास करती है। धार्मिक प्रथाएं तथा रीति-रिवाज के दबाव में तायप्पा और सूली भी धीरे-धीरे उन्हीं की तरह बन जाते हैं; अंत में वे उनकी चंगुल में फंस जाते हैं। यहाँ तक की तायप्पा को गाँव के पुरुष लोग उसे स्त्री समझ कर भोग की वस्तु समझते हैं। गाँव का सख्या कहता है - ‘तायप्पा को जोगी बनाकर बहुत अच्छा किया, गाँव के लड़कों के लिए एक नियोजन हो गया।’ इसी तरह सूली को छेड़ने लगता है तो कहता है - ‘अरे, इसकी तो... शर्माती क्यों है?’

स्त्री रूप देखकर पुरुष-सत्तात्मक समाज की यह गलत धारणा बन जाती है कि स्त्री केवल एक भोग की वस्तु मात्र है। उसे गलत नज़रों से देखना, लिंगभेद से नीचा दिखाना, अपने पुरुषार्थ होने की वजह से उस पर अधिकार जमाये रखना, उसे अपना गुलाम बनाकर रखना आदि पुरुष के लक्षण बन गये हैं। यह सब जब तायप्पा को बांधे रखना चाहती है तो वह आग बबूला हो जाता है लेकिन आदत से मजबूर, आए परिस्थिति के संकट की वजह से वह लाचार था; किसी का विरोध नहीं कर पाता।

यमन्या एक पुरुष किन्नर है। तायप्पा को समझाते हुए वह कहता है - ‘जब मैं दस-बारह साल की थी तब अक्कू जोगन के पास आयी थी, तभी से शरीर पर साड़ी बांधने की आदत डाल ली थी। तब साड़ी कैसे पहनते है यह भी नहीं पता था। अपनी माँ, अपना बाप और अपना परिवार कोई किसी का नहीं होता। अपने लिए तो दो ही चीजें सही है - ‘पेट’ और ‘चमड़ी’ बस। हमउम्र के बच्चे खाने की चीजें देकर खेत में ले जाते थे। ... मेरा शोषण करते थे। मैं रोती-चिल्लाती तो मुँह पर हाथ दबा देते। ... इसीलिए बोल रही हूँ तायप्पा, जल्द से जल्द खुद को समझ और आने वाली हर समस्या को ताली बजाना सीख और कर भी क्या सकते है हम?’

यह लोग जोगवा मांगने के अलावा देवी येलम्मा के नाम से जागरण का भी काम करते थे। सूली इन सबसे अलग एक सामान्य लड़की होने के बावजूद भी घर-परिवार वालों से तंग आकर उनके साथ रहने चली गयी थी। धीरे-धीरे उसे भी नृत्य सिखाया गया और जागरण में विशेष नर्तकी के रूप में नृत्य कराया जाता। यह देवी का जागरण जागरण न होकर एक तमाशा था जो सूली जैसी नादान लड़की को समझ में नहीं आया।

जोगन लोगों में अपनी-अपनी बिरादरी का एक वरिष्ठ मालिक होता है। दूसरे गाँव के बिरादरी में रकमाप्पा था। वे भी जागरण करते थे। रकमाप्पा की बिरादरी में बना, म्हादबा, सिद्धव्वा, तंगव्वा और दो लोग थे। रकमाप्पा और म्हादबा पुरुष होकर भी स्त्री वस्त्र पहनते थे। रकमाप्पा और इन लोगों के बीच शारीरक संबंध भी होते थे।
रघु तानक्का के संगठन का गुरु था जिसमें सूली भी थी। वह पुरुष था इसलिए उसे परिवार बसाने का अधिकार था। उसकी बीवी और बच्चे भी थे। अपने परिवार के साथ दूसरे गाँव में रहता था लेकिन संगठन पर अधिकार ज़माने और अपनी वासना की भूख मिटाने के लिए बीच-बीच में इन लोगों के पास आता था। तानक्का को वह बहुत पसंद करता था; उसके साथ अनैतिक शारीरिक संबंध भी थे। इसी संदर्भ में यमन्या कहता है - ‘हम भक्तन यानि मंदिर का घंटा; कोई भी आओं और बजाकर जाओ।’

इनका घर घर न होकर एक ऐय्याशखाना था; दिन-दहाड़े गलत काम होते थे। फूला, पारव्वा, यमन्या के साथ-साथ तानक्का को भी रघु के साथ इस घर में वासना की भूख मिटाई जाती थी। परिवेश में ख़राब माहौल के कारण एक दिन सूली भी इसका शिकार हो जाती है। सूली बबन्या नामक लड़के से प्यार कर बैठती है; शादी भी करना चाहती है। वह नासमझ थी। जोगन की कभी शादी नहीं हो सकती। वह केवल किसी की रखैल ही बन सकती है।

सूली बबन्या को सचेत करती है। अगर घर वालों को अपनी बात पता चल गयी तो मुझे घर से निकाल देंगे लेकिन बबन्या उसे दिलासा देने लगता है ‘तू डरती क्यों है? मैं हूँ ना।’ गाँव में दूसरे घर में रखने का आश्वासन तो दिया लेकिन सूली जब शादी की बात करती है तो कहता है - ‘शादी हुई क्या, नहीं हुई क्या? तू तो मेरी ही है न? शेवंताक्का भी तो रहती है बाबुमामा के साथ, उसी तरह मैं भी तुझे रखूंगा।’ लेकिन जब वो गर्भवती बन जाती है तो शादी करने से मना कर देता है और कहता है - ‘भक्तन यानि गाँव का भोजन, कोई भी आओ पंगत में बैठो और हाथ धोकर चले जाओ।’ जब उसे अपनी इच्छा तृप्ति पूर्ण करनी थी तब उसे देवी की भक्तन नजर नहीं आयी? शादी की बात करते ही भक्तन दिखाई दी। सूली तो केवल यह समझकर उससे प्यार कर बैठी थी कि ऐसे बदत्तर जीवन जीने से अच्छा है, उससे शादी करके घर बसाये।

‘हरबा और तीन-चार व्यक्ति हाथ में तंबाखू मलते हुए चौराहे पर खड़े थे। सूली गाँव में जोगवा मांगने जाते समय वहाँ से गुजरती है तो सूली को देखकर वहाँ खड़े लोग चुहल करने लगते हैं। हरबा कहता है - ‘अरे, आज कल बबन्या कहीं दिखाई नहीं दे रहा?’ दूसरा कहता है - ‘बबन्या ने तो खेती करने के लिए जमीन तो अच्छी चुनी है’ तभी तीसरा कहता है - ‘अरे, वह भी उसके नाम कहाँ!’ तब हरबा कहता है - ‘फिर क्या तू भी जायेगा खेती करने?’ तीसरा व्यक्ति कहता है - ‘अब जाने से क्या फ़ायदा, खाद तो डल गया और फ़सल भी उग गयी।’ नाजायज संबंध से गर्भवती बनी सूली पर गाँव के लोग व्यंग्यात्मक रूप से हसीं उड़ाते हैं; उसे मजाक का पात्र बनाते हैं। इतना ही नहीं, गाँव की महिलाओं में सूली के बारे में चर्चा होती है तो वे भी यही कहती है। सुसा अपनी सहेली सखुवयनी को सूली के बारे में कहती है - ‘बबन्या तो एक लड़का है लेकिन उस रंडी को समझ में नहीं आता कि वह एक जोगन है। गाँव की फ़सल, कोई भी आओ जानवर चराओ... देवी की तो देवी की, इसे किस बात का डर? वो तो सब के लिए मुफ्त है। अब वो भी क्या कर सकती है, देवी के लिए खुले छोड़ दिया है। माँ-बाप ही नजर नहीं रख पाये तो बच्चे आवारगी करेंगे ही लेकिन सूली को अपने प्रति ईमानदार रहना चाहिए था, ऐसे गोबर नहीं खाना चाहिए था। रहेगी भी कैसे उसे भी तो कुछ चाहिए...।’

विशेष रूप से अगर कहा जाए तो अंधविश्वास मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी है। वह इसमें विचारहीन होकर रूढ़ि-परंपराओं में जकड़ जाता है। बिना कुछ सोचे-समझे उन मान्यताओं को अपना लेता है। धर्म की आड़ में छिपे ये जोगन सामान्य जनता में डर पैदा कर उनपर अपना आधिपत्य जमाते है। अपने पंथ का विकास करने के लिए इन नादान बच्चों को शिकार बनाते है। इसका उदाहरण उपर्युक्त उपन्यासों के माध्यम से पता चल जाता है।

आधार ग्रंथ

1. राजन गवस, ‘चौडंकं’, मेहता पब्लिशिंग हाउस, सदाशिव पेठ, पुणे, 1985
2. राजन गवस, ‘भंडारभोग’, मेहता पब्लिशिंग हाउस, सदाशिव पेठ, पुणे, 1988
3. फिल्म- मराठी फिल्म ‘जोगवा’ (2008), निर्देशक - राजीव पाटील

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