भारतीय किसान: आत्महत्याएँ और साहित्य

वंदना शर्मा

शोधार्थी -  हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय, हैदराबाद

भारत एक कृषि प्रधान देश है। समस्त व्यवसायों की रीढ़ कृषि है जिससे कच्चा माल और खाद्यान प्राप्त होता है। देश की लगभग 54.6 प्रतिशत आबादी कृषि से अपनी आजीविका चलाती है। मानसून की अनियमितता, सूखा, अकाल, फसलों की उचित कीमतों का अभाव में भारत भर में सैकड़ों किसान प्रतिवर्ष आत्महत्याएँ करने पर मजबूर हो रहे है। किसानों का शोषण करने वाले बिचौलिए अपने हितों को महत्व देने के लिए किसानों पर अमानवीय उत्पीड़न करते हैं जिसके कारण किसान आत्महत्या करने जैसा विभत्स कदम उठाते है। अधिकांश भारतीय किसान अशिक्षित और गरीब है इसीलिए वे अपने अधिकारों की मांग उचित समय पर नहीं कर सकते।

नेशनल क्राइम ब्यूरो की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में वर्ष 2014 में 5650 और वर्ष 2015 में 8007 किसानों ने कर्ज के बोझ से परेशान होकर आत्महत्या कर ली है; इस भयावह तस्वीर का भयावह चेहरा और भी है। ब्यूरो के एक अन्य आंकड़े के अनुसार देश में पिछले 21 वर्षों में 3 लाख 18 हजार किसानों ने आत्महत्याएँ की हैं। ब्यूरो के ही आंकड़े के अनुसार प्रति 41 मिनट में एक किसान आत्महत्या कर रहा है। हमारे देश में हुकूमत करने वाली सरकार सत्ता में आने से पूर्व किसानों के हितों के लिए लम्बे-चौड़े  वादे तो करती है लेकिन बाद में उन मुद्दों पर कोई अमल नहीं किया जाता है। हर आई.ए.एस. अपने बेटे को आई.ए.एस. बनाना चाहता है हर राजनीतिज्ञ अपने बेटे को राजनीतिक और हर उद्योगपति अपने लाड़ले को उद्योगपति बनाना चाहता है लेकिन दुर्भाग्य से एक किसान अपने कलेजे के टुकड़े को किसान नहीं बल्कि सरकारी कर्मचारी बनाना चाहता है। महात्मा गांधी ने कहा था कि यदि भारत को समझना होगा वहाँ के खेत और किसानी को समझना होगा। यदि किसान मजबूत होगा तो देश अपने आप मजबूत हो जाएगा।

आज हम सभी के समक्ष प्रश्न यह है कि भारतीय किसान क्या इतना कमजोर दिल रखता है कि वह थोड़ी सी परेशानी आने पर आत्मघाती बन जाता है किंतु यह बात सरासर गलत है। किसान इतनी आसानी से अपनी इहलीला समाप्त नहीं करता है परिस्थितियाँ उसे यह सब करने पर मजबूर कर देती है सही मायनों में किसान आत्महत्या नहीं करता है बल्कि उसकी हत्या होती है। अपना वोट बैंक बढ़ाने के नाम पर किये गए वायदे और सही लागत नहीं मिल पाने की पीड़ा से दुखी होकर भारतीय किसानों को दुर्गति का शिकार होना पड़ता है। धरतीपुत्र जिस फसल को कड़ी मेहनत से तैयार करता है और जब उसे बाजार में बिक्री हेतु लाया जाता है तो उसकी मूल लागत भी वह वसूल नहीं कर पाता है। कोटा का एक युवा किसान जब अपनी फसल लेकर बाजार में गया तो वाजिब दाम नहीं मिलने के कारण उसे दिल का दौरा पड़ गया और उसकी वहीं मृत्यु हो गई। मंदसौर में आंदोलन कर रहे किसानों पर भी गोलीबारी करना सरकार के अधिनायकत्व की और इशारा करती है जिसमें उन्हें अपनी उचित मांगे रखने का भी अधिकार नहीं है। इन सब बातों से हम सबके मन में यही प्रश्न उठता है की कब किसान की दशा सुधरेगी? क्या किसान की आत्महत्या करने का सैलाब कभी थम पायेगा? किसान के लिए सबसे बड़ी समस्या यह है कि उन्हें अपनी उपज का उचित लाभकारी मूल्य नहीं मिल पा रहा है उनकी लागत की दोगुनी आय का उनका सपना अधूरा रह गया है

1. भारतीय किसानों के आत्महत्या करने के पीछे कई कारण हैं:-
2. सरकार की किसानों के प्रति उदासीनता, उनके हितों के लिए कार्य करने में मनमाना आचरण
3. अपनी फसल की लागत के हिसाब से उचित मूल्य प्राप्त न होना।
4. अकाल, सूखा, महामारी, अतिवृष्टि-अनावृष्टि आदि प्राकृतिक आपदाओं के प्रकोप से फसल को नुकसान।
5. उपज में वृद्धि के लिये लिया गया कर्ज न चुका पाने के कारण भी किसान  ऐसा कदम उठाने को मजबूर हो जाता है।
6. किसानों को उचित साधन उपलब्ध नहीं होना, खाद-रसायन आदि की कमी से उत्पादन में कमी के कारण भी किसान को आत्महत्या करने के लिए विवश कर दिया जाता है।

उपर्युक्त सभी कारणों के अतिरिक्त और भी कई कारण जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान समय में भारतीय किसान की यह दशा है।

भारत आजाद होने से पहले किसान स्वयं अपने परिवार के साथ खेती एवं पशुपालन का कार्य कर आजीविका चलाता था, तब से लेकर आज तक उसकी स्थिति में कोई खासा परिवर्तन देखने को नहीं मिले हैं। कृषकों के परिवार रहन-सहन, उत्पादन एवं उत्पादन के साधनों के आधार पर हम यह अनुमान लगा सकते है कि भारतीय किसान किस प्रकार का जीवन यापन करने पर मजबूर था और आज भी लगभग उसकी यही स्थिति बनी हुई है।
कृषि कार्य करने के औजार- पहले किसान अपने परिवार के साथ स्वयं के साधनों से खेती करता था जिसमे मुख्यत: बैलगाड़ी, हल, कुळी, बीज बोने का हल, चड़स जिससे सिंचाई की जाती थी इन्हीं साधनों से हकाई-जुताई की जाती थी जिसमें अत्यधिक परिश्रम की आवश्यकता जान पड़ती थी। वर्तमान समय में इन साधनों में काफी बदलाव आया है, जिसमें अधिक लागत लगती है।

किसान का घर:- किसान अपने घर मिट्टी से तैयार करता है। उसकी छत् खजूर एवं लकड़ी के पाट से बनायी जाती थी। किसानों के खेत में होने वाली फसल गेहूँ, जौ, चना दालें, ज्वार तिल, मूंगफली, मक्का, अलसी आदि का उत्पादन होता था। यह फसलें उगाने में अधिक खर्च नहीं था। बीज घर का पैदा किया हुआ होता था उसे बीजोपचार करके रखा जाता था जिसका प्रयोग अगली फसल हेतु किया जाता था। किसानों का भोजन अधिकांशत: सामान्य होता था। मक्का दलिया जिसे छाछ के साथ खाते थे, रोटी जो तथा चने की बनाई जाती थी।
माल-बेचान:- अधिकांश कृषि उपज वस्तु-विनिमय के रूप में आदान-प्रदान की जाती थी। लेकिन वर्तमान समय में इसका स्वरूप मुद्रा पर निर्भर करने लग गया है।

कर्ज:- उस समय किसानों पर सरकार और बैंकों का कर्ज बहुत कम था। किसान सरकारी कर्ज लेने से कतराता था, उसकी वसूली में भी किसानों को बेइज्जत करके कर्ज वसूला जाता था। कुछ किसान साहूकारों से कर्ज लेते थे और साहूकारों के चंगुल से यह कभी कर्ज के बोझ से ऊपर नहीं उठ पाते थे। आज भी उनकी यही स्थिति है लेकिन इसका स्वरूप बदल गया है अब किसान बैंकों के ऋण से आजीवन मुक्त नहीं हो पाता है।

यदि साहित्य में किसानी जीवन की वास्तविकता की बात की जाए तो हिंदी साहित्य के अंतर्गत एक समृद्ध परम्परा रही है। इस परंपरा को वास्तविक रूप से आरंभ करने का श्रेय प्रेमचंद को जाता है जिन्होंने गोदान के होरी के माध्यम से सभी भारतीय किसानों को हमारे सम्मुख खड़ा कर दिया है। ‘गोदान’ को किसान जीवन की ट्रेजडी कहा गया है जिसमे सामंत वर्ग के अन्याय, अत्याचार और शोषण के चलते किसान को अपना जीवन दाव पर लगाना पड़ता है; आज वही कार्य सत्तासीन लोग कर रहें है। शासन प्रणाली बदल गई, देश आजाद हो गया फिर भी किसानी जीवन एक ही ढर्रे पर चला आ रहा है, बदहाली।

प्राचीन समय में खेती को उत्तम श्रेणी का कार्य माना जाता था। लेकिन आज किसान की दयनीय दशा से खेती उत्तम से निम्न श्रेणी की और आ गई है।  “उत्तम खेती, मध्यम व्यापार, नीच चाकरी”

गोदान से लेकर आज तक हिंदी साहित्य में ऐसे ढेरों उपन्यास लिखे गए है जिनमें कृषक जीवन की विभीषिका से पर्दा उठाया गया है लेकिन इन सभी में किसानों की समस्याओं को सुधारने पर कोई प्रकाश नहीं डाला गया। प्रेमचंद ने किसान को पहली बार साहित्य का विषय बनाया। उनके कथा-साहित्य में किसान जीवन के विभिन्न पक्षों का चित्रण हुआ है। भारत का सबसे बड़ा वर्ग किसान रहा है, भारतीय किसान की कृषि संस्कृति का मूलाधार है। किसान के बिना भारतीय संस्कृति का कोई भी विश्लेषण अधूरा ही होगा। यह बात बार-बार दुहराई गई है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। लेकिन कृषि के रक्षकों की रक्षा का प्रयास हम नहीं कर पा रहे हैं। प्रेमचंद ने इस कृषि व्यवस्था के कर्ता-धर्ता किसान को अपने उपन्यासों और कहानियों का मुख्य विषय बनाया। उनके पहले तथा उनके बाद किसी भी रचनाकार ने इतने विस्तार से किसान को आधार बनाकर हिंदी साहित्य सृजन नहीं किया।

    प्रेमचंद के उपरांत नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु, संजीव, रणेंद्र, विवेकीराय आदि लेखकों ने अपने लेखन में कृषक जीवन को रेखांकित किया। नागार्जुन प्रमुख आंचलिक उपन्यासकार हैं, जिन्होंने ‘बलचनमा’, ‘रतिनाथ की चाची’, ‘बाबा बटेसर नाथ’, ‘जमनिया का बाबा’, ‘दुःखमोचन’, ‘कुम्भीपाक’ आदि उपन्यासों के माध्यम से ग्रामीण-देहात जीवन की अभिव्यक्ति करने का प्रयास किया है। इन सब में ‘बलचनमा’ में कृषक जीवन की खुलकर अभिव्यक्ति हुई है। प्रेमचंद के बाद भारतीय कृषकों की वास्तविक स्थिति का उद्घाटन इसमें हुआ है। रेणु ने मैला आँचल के माध्यम से किसानी जीवन की वास्तविक स्थिति का कच्चा चिट्ठा खोल कर रख दिया है। ‘मैला आँचल’ को प्रथम आंचलिक उपन्यास होने का गौरव प्राप्त है जिसमें पहली बार ग्रामीण जीवन को बेपर्दा किया गया है। बाद में ‘परती परिकथा’, ‘पलटूबाबू रोड़’, ‘कितने चौराहे’ आदि में भी ग्रामीण, देहात जीवन की अभिव्यक्ति का प्रयास किया है। संजीव ने अपने ‘फाँस’ उपन्यास के माध्यम से किसानी जीवन में होने वाली दुर्दशा की ओर हमारा ध्यान केन्द्रित किया है जिसमें बताया गया है कि किसानों की जिन्दगी फाँस है या फांसी। इसमें आत्महत्या के विरुद्ध जमीनी आत्मबल प्रदान करने वाली चेतना का चित्रण किया गया है। सूखे की मार और कुछ प्रकृति के साथ अनाचार के कारण सीधे-सादे किसानों की जिंदगी कर्ज और सूखे के बोझ तले इस तबाही में आत्महत्या की तरफ बढ़ती गई। संजीव ने उपन्यास में बहुत ही ज्वलंत मुद्दे को उठाया है और शायद हिंदी में पहली बार  प्रेमचंद के ‘गोदान’ के बाद किसानों और गाँव की पूरी जिंदगी का दर्द और कसमसाहट सामने आई है।

उपर्युक्त विवरण से से स्पष्ट है कि वर्तमान समय में किसानों की दशा और दिशा दोनों पर ही हमें विचार करने की आवश्यकता जान पड़ती है। भारतीय किसान की ख़राब आर्थिक स्थिति के कारण की जाने वाली आत्महत्याओं के कारणों की पड़ताल करना उनके हितों की रक्षा करने की दृष्टि से अपेक्षित है। हिंदी साहित्य में समय-समय पर कृषक जीवन में व्याप्त द्वन्द्वात्मक तनाव और जीवन जीने के लिए किये जाने वाले संघर्ष की अभिव्यक्ति होती रही है। साहित्य अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है इसीलिए आगे भी इस बात की आशा रहेगी कि इनके जीवन पर व्यापक रूप से प्रकाश डाला जा सके।

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