कहानी: क्या खोया क्या पाया?

प्रदीप उपाध्याय

प्रदीप उपाध्याय 


आज वे तीस साल के बाद मिले थे । रोहित हाल ही में अमेरिका से अपने बेटे, पुत्रवधू, पोते और माता-पिता की स्मृति के साथ अपनी सम्पत्तियों के व्यवस्थापन और अपने सपने पूरे करने हेतु स्वदेश लौटा था। अब यहाँ की सम्पत्ति की देखभाल करने वाला कोई नहीं था। चचेरे भाईयों के अपने व्यवसाय थे। उनके पास भी कहाँ इतना समय था कि वे उसके मकान और जमीन की देखरेख कर सकें। हालांकि वे इस बात का जरूर ध्यान रखते थे कि कोई सम्पत्ति पर अवैध रूप से कब्जा न कर लें।

    वैसे विदेश में रहकर भी उसने काफी पैसा कमाया था। बेटा और बहू दोनों ही डॉक्टर हैं। वे दोनों भी देश में लौटकर सेवा देना चाहते हैं। बेटे की परवरिश भी रोहित के माता पिता ने ही की थी तो संस्कार तो मिलने ही थे। उसे कभी इस बात का आभास ही नहीं होने दिया कि वह दत्तक पुत्र है। रोहित तो तलाक होने के पाँच वर्ष बाद ही वर्ल्ड बैंक का प्रोजेक्ट मिलने के बाद अमेरिका चला गया था और दो वर्ष बाद ही बच्चे के साथ अपने माता पिता को भी वहीं आने के लिए रजामंद कर लिया था। रोहित ने अपने आप को पूरी तरह से काम में झोंक दिया था और उसके माता-पिता ने बच्चे की परवरिश में। वैसे भी वे भीतर से टूट चुके थे। रोहित का दर्द कब तक देखते। रोहित दूसरी शादी के लिए तैयार नहीं था और रानू को भुला भी नहीं पाया था। इसी के चलते परिवार में उदासी और घुटन बनी रही। वह तो अच्छा किया कि रोहित ने बच्चा गोद ले लिया जिसके भविष्य के सपने बुनने लगा और उनका भी मन लग गया फिर भी उनके मन में इस बात की फाँस तो रही कि रोहित का अपना कोई बच्चा नहीं था, अपना खून तो अपना ही होता है। हाँ, रोहित ने कभी इस बात का आभास नहीं होने दिया। इसी के चलते दस वर्ष ही उन्होंने वहाँ रोहित के साथ गुजारे और छह माह के अंतराल से दोनों ही दुनिया से रुखसत हो गए।

    रोहित की आँखें भर आई थीं उन दिनों का स्मरण करते हुए। वैसे रोहित अपनी पैतृक सम्पत्ति को बेचना भी नहीं चाहता था क्योंकि इनके साथ उसकी यादें जुड़ी थीं - यादें भी तीन पीढ़ियों की। उसे याद है कि उसके दादाजी ने अपना खून-पसीना एक कर इतनी सम्पत्ति अर्जित की थी। जिसे खून पसीने से सींचा जाए उसे आसानी से छोड़ा भी तो नहीं जा सकता क्योंकि भावनात्मक रूप से जुड़ाव ऐसा हो जाता है कि लगता है कि जड़ें बहुत गहरे तक समा गई हैं। उसके दादाजी की इच्छा भी यही थी कि सभी आकर इसी शहर में साथ-साथ रहें।

    पिताजी की सरकारी नौकरी थी और लगभग दस वर्षों से राजधानी में ही रह रहे थे। उच्च पद के कारण पद-प्रतिष्ठा तो थी ही। यहीं पर रहकर रोहित को भी सरकारी नौकरी मिल गई थी। रानू और रोहित दोनों की नौकरी एक साथ ही तो लगी थी। साथ साथ नौकरी करते करते कब वे एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो गए और कब यह आकर्षण प्रेम में परिणीत हो गया, इसका अहसास तो तब हुआ जब रोहित पर उसके दादाजी ने विवाह के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया और उसे लगा कि अब अधिक दिनों तक टाला नहीं जा सकता है तब उसने अपने प्रेम सम्बन्धों की बात परिवार के सामने रख दी। उसकी खुशी की खातिर दादाजी सहित सभी परिजनों ने सहमति दे दी थी। दादाजी चाहते थे कि पिताजी सेवानिवृत्ति के बाद इसी शहर दमोह में आकर सभी के साथ रहे और रोहित भी अपनी नौकरी छोड़कर व्यवसाय संभाले। मम्मी-पापा को छोटा शहर रास नहीं आ रहा था। उनकी इच्छा जबलपुर में बसने की थी।

    रोहित अपने उन दिनों की याद कर रहा था जब दादाजी उन्हें शीघ्र दमोह आने के लिए कह रहे थे और पिताजी सेवानिवृत्त होने के बावजूद टाल रहे थे। उन्होंने रानू से भी बात की थी। रोहित और रानू ने उच्च शिक्षा के अध्ययन के चलते नौकरी छोड़ दी थी। रोहित इन्दौर से और रानू जयपुर से पी जी कर रहे थे। ऐसे में रानू ने अपनी परीक्षा का बहाना कर दो वर्ष ऐसे ही निकाल दिये । रोहित स्वयं अनिर्णय की स्थिति में था लेकिन जब हृदयाघात के कारण अचानक दादाजी चल बसे तब पिताजी ने उनकी अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए दमोह में ही बसना उपयुक्त समझा। रोहित का अपने दादाजी से बहुत ज्यादा लगाव था और उसे इस बात का बहुत अफसोस रहा कि उनके जीवन काल में वह उनके पास आकर नहीं रह सका। रोहित ने अपनी किशोरावस्था से ही बहुत सपने देखे थे, वह बुज़ुर्गों के लिए वृद्धाश्रम खोलने के अलावा मानसिक रूप से अविकसित बच्चों के लिए भी बहुत कुछ करना चाहता था और इसीलिये उसने अपने दादाजी और माता-पिता से इसके लिए सहमति प्राप्त कर ली थी कि एक ट्रस्ट बनाकर अपनी चल-अचल सम्पत्ति को उसमें लगा दे और अपने सपनों को दिशा दे और इसी कारण से जबकि वह पिछले पच्चीस वर्षो से विदेश में रह रहा था बावजूद इसके उसने अपनी इस सम्पत्ति को नहीं बेचा बल्कि इसके रखरखाव और नवनिर्माण पर ही सम्पत्ति के मूल्य से ज्यादा व्यय कर दिया। अब जब वह वापस लौटा  तो पुत्र के आग्रह पर सम्पत्ति के सदुपयोग का वर्षों पुराना ख्वाब पूरा करने जा रहा था।

     आज जब वे आमने सामने बैठे थे तो रोहित को वह समय याद आ रहा था जब उन दोनों ने इसी तरह आमने सामने बैठकर  जिन्दगी का कठोरतम निर्णय लिया था। तब मर्मान्तक पीड़ा के दौर से दोनों को ही गुजरना पड़ा था उस कठिन निर्णय के पूर्व अंतिम बार रोहित ने पूछा भी था कि क्या तुम महानगर और अपने पैरेंट्स का मोह त्यागकर मेरे साथ चलने को तैयार हो! वहीं दमोह में रहकर हम एक ट्रस्ट बना लेंगे और जनसेवा का संकल्प लेकर काम करेंगे तब रानू ने स्पष्ट  इंकार कर दिया था और कहा भी था कि तुम्हारे सिद्धांत और आदर्श की बात आज के समय में पागलपन से अधिक कुछ नहीं हैं। मैं पूरी तरह प्रेक्टिकल हूँ और अपने कैरियर पर फोकस्ड हूँ बाकी बातें मेरे लिए सेकण्डरी है। मैं तो चाहूंगी कि तुम भी उस अंधकार से बाहर निकलो और अपने कैरियर पर फोकस करो। वैसे भी तुम मल्टी टैलेंटेड हो लेकिन तुम और तुम्हारे परिवार के लोगों की अति रूढ़िवादी सोच के कारण तुम अपना भविष्य तबाह कर रहे हो।

    तब रोहित ने प्रश्न भी किया था कि क्या सरकारी नौकरी पा लेना और पदोन्नति पाते जाना ही भविष्य है और फिर जीवन में हम दो हमारे दो के अलावा किसी के लिए कोई जगह है भी या नहीं!

    इस पर रानू आक्रोश में आ गई थी और तुनककर कहा था कि तुम मुझे समझोगे नहीं और वैसे भी  हम दोनों की राह अलग अलग है। हमारे विचार कभी एक हो नहीं सकते तो बेहतर यही होगा कि तुम अपनी राह चलो और मैं अपनी।

    ऐसा वार्तालाप पहले भी उनके बीच होता रहा था। हालांकि उनके विवाह को चार वर्ष हो चुके थे किन्तु प्रेम विवाह के बावजूद उनमें आपसी समझ विकसित नहीं हो पाई थी। इसीलिए परिवार के दबाव के बावजूद उन्होंने सन्तान के बारे में अभी तक सोचा भी नहीं था। एक कारण यह भी था कि दोनों एक दूसरे का विश्वास भी अर्जित नहीं कर पाए थे। लोग रोहित को ताने भी देते थे कि यह सब अन्तर्जातीय और प्रेम विवाह का परिणाम है लेकिन वह अपने मित्र अंकुर का उदाहरण देता था जिसने स्वयं अपने से उच्च वर्ण की लड़की से प्रेम विवाह किया था और सफल दाम्पत्य जीवन जी रहे थे।

    रोहित ने सम्बन्धों को बनाए रखने के लिए बहुतेरे एकतरफा प्रयास किये थे, इस उम्मीद में कि रानू को कभी तो समझ आएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वैसे रोहित चाहता था कि रानू भी उन्हीं के साथ आकर रहे, यहीं दमोह में लेकिन रानू नहीं चाहती थी कि वह छोटे से शहर में रहकर अपना भविष्य खराब करे। उसकी प्राथमिकता स्वयं का कैरियर बनाने की ही तो रही थी। फिर उसके माता पिता भी यहीं थे। उसका सर्कल भी यहीं था तब फिर वह कैसे यहाँ से जा सकती थी। वह महानगरीय चकाचौंध से कैसे अछूती रह सकती थी। ऐसे में दोनों ही अपनी अपनी जिद पर अड़े हुए थे और किसी का हस्तक्षेप भी बर्दाश्त नहीं कर रहे थे।

    सीधी सी बात थी कि दोनों के मध्य अहम का ही तो टकराव था। एक अपने माता पिता और परिवार को छोडने को तैयार नहीं था तो दूसरी अपने करीयर को ही प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए बैठी थी। शायद उन दोनों ने ही बीच की राह निकालने का ईमानदार प्रयास नहीं किया वरना ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसका कोई समाधान न हो। पहले भी जब दोनों अपने भविष्य की योजना पर बात करते तो उनमें आपस में तू तू-मैं मैं होकर झगड़ा इतना बढ़ जाता कि दोनों के मध्य कई कई दिनों तक बातचीत बन्द हो जाती और अहम के चलते बातचीत के लिए पहल करने के लिए कोई तैयार नहीं होता। रोहित को स्मरण हुआ कि दो बार तो अंकुर और उसकी पत्नी ने दोनों को समझाइश देकर उनमें समझौता करवाया था लेकिन ढाक के वही तीन पात। इनके झगड़ों के कारण इधर रोहित के माता पिता परेशान। उनका सोचना था कि दोनों परिजनों से भले ही दूर रहें लेकिन आपस में तो प्रेम भाव से रहे। उधर रानू के परिजन भी चिंतित। दोनों को अलग रहते हुए समय बीतता ही जा रहा था और इसीलिए जब दोनों ने मिलकर निर्णय लिया तो अलगाव ही चुना क्योंकि दोनों ही परिस्थितियों से समझौता नहीं करना चाहते थे और अपनी अपनी जिद पर अड़े हुए थे। इसके बाद भी रोहित ने यह सोचकर कि शायद रानू को समझ आ जाए, छह माह तक और इंतजार किया किन्तु अन्ततः आपसी रजामंदी से उन्हें तलाक ही लेना पड़ा।

     रोहित के लिए यह फैसला मुश्किल था और इसी कारण उसका कामकाज में मन नहीं लग रहा था। परिजनों का उसपर दूसरी शादी का बहुत दबाव था लेकिन वह अब दूसरी बार शादी नहीं करना चाहता था। माता-पिता की इच्छा की खातिर उसने एक बच्चा जरूर गोद ले लिया था। लेकिन यहाँ उसका मन नहीं लगा। जैसे ही उसको विदेश में अवसर मिला, वह यहाँ से चला गया और बाद में माता पिता को भी वहीं बुला लिया था।

आज फिर तीस साल पहले बिछुड़ने का घटनाक्रम उनके सामने था। रोहित ने अपने बारे में तो सब बता दिया। जब उसने रानू के बारे में जाना तो और भी दुखी हुआ। रानू ने बताया कि अकेली महिला के लिए जीवन कितना दूभर होता है। यह दोनों के बीच हुए तलाक के बाद जाना। बाहर वाले तो ताने देते ही थे, घर-परिवार के लोग और रिश्तेदारों ने भी कोई कोर कसर नहीं रखी। भाई तो पहले ही अलग हो चुका था । माता पिता ने भी उसके भविष्य का ध्यान रखते हुए दूसरी शादी के लिए दबाव डाला। पहले तो उसने बहुत टालने की कोशिश की लेकिन दुनिया भर के तानों से परेशान होकर उसने सजातीय व्यक्ति से शादी के लिए हाँ कर दी। जिससे शादी की, शुरुआत के दिन तो हँसी खुशी बीते लेकिन जब उसे मालूम पड़ा कि उन्हें संतान सुख नहीं मिल सकता तो उनमें लड़ाई-झगड़े होने लगे बाद में उसने शराब पीना शुरू कर दिया और कुछ ही समय में अपना लिवर खराब कर लिया, बहुत कोशिश की लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका। इधर रानू का ध्यान भी नौकरी से भटकने लगा जिससे उसका करीयर भी खराब हो गया। जो सपना उसने देखा था, उसे वह पूरा नहीं कर सकी।

अब जब दोनों ही अपनी अपनी राम कहानी सुना चुके तो इस वार्तालाप के बाद दोनों के ही मन में यह प्रश्न था कि अलग होकर उन्होंने क्या खोया और क्या पाया! दोनों एक दूसरे की नम आँखों में जैसे पढ़ रहे थे कि अलग होकर शायद पाया तो कुछ नहीं, एक दूसरे को खोया ही है और आँखों की नमी से पश्चात्ताप साफ झलक रहा था लेकिन अब तक शायद बहुत देर हो चुकी थी।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।