संस्मरण: मेघ

प्रियांकी मिश्रा

- प्रियांकी मिश्रा


हृष्ट पुष्ट गठन की रौबदार काया, उतनी ही रोबीली आवाज, सर पर बेतरतीब खिचड़ीनुमा बाल, उम्र का हिसाब बैठाती, सफेद-काली दाढ़ी, उसी रंगत के घोंसलेनुमा केशों की बढ़त, हाथों और पैरों की स्थूलकाय उँगलियाँ, वैसी ही गोलाई समेटे, छोटी सी नाक, और प्लास्टिक के जूते, चरवाहे की उसकी छवि को भली-भांति परिभाषित करते थे। रही-सही कसर उसकी मैली-कुचैली धोती और मारकीन की गंजी से पूरी हो जाती थी।

स्थानीय बोलचाल की भाषा में थेथर के नाम से पहचानी जाने वाली झाड़ी की डंडियाँ उन दिनों पशुओं के साथ साथ बच्चों पर भी समान रूप से प्रयोग होती थीं। वैसे तो थेथर का अर्थ है, जिद्दी - मतलब, जो काटने पर पुनः उग आये। पर इसका उचित प्रयोग करके हर जीव से अड़ियल बनने की राह से सुरक्षित रहने की आशा की जाती थी - दोपाया हो या चौपाया।

वही छड़ी लहराती थी विभूति तिवारी के हाथों में, और उसी छड़ी के बल पर मुहल्ले के सारे मवेशी उसके काबू रहते थे। पर, उसका यह नाम 'विभूति तिवारी' तो पास के सात गाँवों में शायद ही कोई जानता हो। वैसे भी, इस नाम से तो किसी संभ्रांत व्यक्ति की तस्वीर उभरती थी। उसके लिये तो उसका चलंतू नाम ही सर्वथा उपयुक्त था, लक्कड़ तिवारी। इस अनर्गल से शब्द का तो अर्थ समझना भी कठिन था। लगता था जैसे किसी ने बड़े विचार के बाद उसको इस प्रकार पुकारा होगा, पर अब तो लोग बाग उसका असली नाम विस्मृत कर चुके थे। विशेष रूप से बच्चों को उनका नाम, संयुक्ताक्षर पर तनिक ज्यादा जोर देकर, गाना सा गाते हुए पुकारने की आदत सी हो गयी थी। यह भी आश्चर्य की बात है कि जहाँ सारे मुहल्ले में किसी बड़े को बिना किसी सम्मान सूचक विशेषण के संबोधित करने की कल्पना भी दुष्कर हो, वहाँ लक्कड़ तिवारी अपने नाम से आगे कभी न बढ़ पाए। बड़े-छोटे, हर उम्र के बालक उनके मुरीद थे और उनको नाम लेकर बुलाने के पीछे यही मनोविज्ञान रहा होगा कि ज्यादा प्रिय लोगों के लिए आदरसूचक शब्द नहीं निकलते हैं।

बाह्य आवरण मात्र एक छलावा है, इसका इससे सटीक उदाहरण हो ही नहीं सकता। उसके व्यक्तित्व के किसी भी कोने से यह तय कर पाना मुश्किल था कि यह इन्सान इतनी धन-संपत्ति का मालिक होगा। पूरे इलाके के सारे मवेशी एकत्रित कर, रोज उनको पीछे के जंगलों में चराने के लिए ले जाना और फिर शाम ढलने से पहले वापस लाकर, नियत दरबों में बाँध देना, यही पेशा था उसका। खेती बाड़ी भी करता या करवाता रहा होगा वह, पर पशुसेवा का यह कार्य उसने शायद समाज से, विशेष कर, बच्चों से जुड़े रहने के लिए चुना था।

घूमते-घामते, हर अहाते की छोटी बड़ी घटनाओं से वाकिफ रहता था वह। आवश्यकता पड़ने पर यथासंभव मदद भी करता था। मुहल्ले की औरतें उस पर तरस खाकर जो भी उसके सामने धर देतीं, बड़े प्रेम से घुटनों के बल बैठकर, अपनी धोती समेट कर, चाव से ग्रहण करता। मुनिया की माँ प्रतिदिन भात पसाकर, माँड़ में नमक मिलाकर एक गहरी सी थाली में ढक कर, कुएँ की जगत पर छोड़ देती थी। उस घर से उसकी वही पगार थी। किसी किसी दिन वही पीकर वह सारा दिन गुजार दिया करता था।

उधर वह बैठ कर माँड़ की चुस्कियाँ लेता, इधर कुँए की मुंडेर पर बैठे बच्चे इंतजार में मुँह ताकते रहते। आखिर उनके मनोरंजन का साधन था वह।

मुनिया कहती, "ए लक्कड़ तिवारी, गाना गाव न हो।" पीछे-पीछे सारे बच्चे ज़िद करते, कोरस में वही गुनगुनाते, "ए लक्कड़ तिवारी ...."। उसे भी शायद बड़ा आनंद मिलता था बच्चों को इंतजार कराने में। अपनी अधपकी मूँछों में लटकी माँड़ की बूंदों को अपनी हथेलियों से पोंछता हुआ, वह मंद मंद मुस्कान बिखेरता, कभी-कभी अपनी झूठी नाराजगी जाहिर करता। बच्चों पर भय दिखाने की भी चेष्टा करता। "हई, बुलावइथी सारंगी बाबा के, सब के बोरा में धर के ले जइहैं।" थोड़ी देर के लिए बच्चों की बोलती बंद हो जाती थी। उस बोरे में बंद होने के भय से सूखे पत्तों की तरह थर थर काँपते थे तब। मुनिया की माँ बड़ी प्रफुल्लित होती इस तरह के वार्तालाप से। मुनिया की आजी जब गाँव से चावल की मीठी गुड़ वाली रोटी भेजती, लक्कड़ तिवारी के हिस्से में एक रोटी तो अवश्य आती थी। बच्चे तो यूँ भी रोटियों पर घात लगाये बैठे रहते।

बच्चों के साथ उसका रिश्ता ऐसा था जैसे कि पतंग के साथ डोर। जिधर-जिधर वह घूमता, बच्चे उसके पीछे-पीछे घूमते।

कई दिनों तक प्यारे-प्यारे मनुहार के बोल सुनने के बाद कभी-कभी वह बच्चों पर मेहरबान होता। उस दिन मेघ बरस उठते थे जैसे। भरे हुए घन रीत जाते थे शीतलता देने हेतु। गठीला शरीर, वैसे ही भारी भरकम राग में वह गाने की चेष्टा करता, "नाच मेरी बुलबुल, कि पैसा मिलेगा ..."। पैरों की थाप दे दे कर, एक हाथ की फैली सी उंगलियाँ अपने सर पर, और दूसरे हाथ की उँगलियाँ कमर पर रख, लक्कड़ तिवारी, तब झूम झूम कर नाचता और उसके साथ नाचते सारे बच्चे। उनकी मनोहारी हँसी तब एक दूसरे में यूँ घुल-मिल जाती जैसे आसमान में बादल।

कुछ अरसे बाद... एक दिन, धान के खेत में क्षत-विक्षत अवस्था में मृत शरीर मिला था उसका। गाँव वालों ने उसके पुराने, प्लास्टिक के जूतों से शिनाख्त की थी उसकी। शक था कि जमीन्दारी प्रथा से नफ़रत करने वाले नक्सल जिम्मेदार थे इस दुःखद घटना के लिए। वह था भी तो एक ज़मींदार, अकूत जमीन-जायदाद का मालिक। उसका चला जाना तो खैर एक रहस्य ही बन कर रह गया। कई बेटियाँ थीं उसकी, अलग अलग गाँवों में ब्याही हुई। कौन सी बेटी मुड़कर आई है आज तक, पिता की संपत्ति में हिस्सा लेने? सो, वैसा ही कुछ उसके साथ भी हुआ। पत्नी तो बरसों पहले ही भगवान को प्यारी हो चुकी थी। भाई-भतीजों ने बड़ी आसानी से सब कुछ गटक लिया। अंत हो गया एक कोमल हृदय जीवन का, जिसकी सादगी और दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने की नीयत ईश्वर को निहायत पसंद आई होगी, तभी तो अपने पास समय से पहले ही बुला लिया उसको।

मेघ का एक विशेष चरित्र होता है। भर कर खाली हो जाना ही उसकी परिणति है, और उसके लघु जीवन का उद्देश्य भी। लक्कड़ तिवारी भी तो एक बादल ही निकला। बच्चे तो जीवन पर्यन्त उस क्षणिक आनंद के सागर की स्मृतियाँ समेटते रहे, वह स्वयं अंतर्धान हो गया। उस दिन मेघ पूरा बरस गया, अपने अस्तित्व का कण कण मिटा दिया, सारे मेह लुटा दिये, उस मरुभूमि में फिर कभी न लौटने को।

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