मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी

मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
(04 सितम्बर 1923- 20 जून 2018)

आफ़ताब अहमद


मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी समकालीन युग में उर्दू गद्य के सबसे प्रतिष्ठित हास्य-लेखक माने जाते हैं। उर्दू आलोचक डॉक्टर ज़हीर फ़तेहपुरी ने लिखा है “ हम उर्दू हास्य के यूसुफ़ी-युग में जी रहे हैं।” उर्दू के हास्य-कवि सैयद ज़मीर जाफ़री ने उन्हें उर्दू साहित्य का मुस्कराता हुआ दार्शनिकऔर आलोचक मुहम्मद हसन ने सतरंगे लम्हों का ताजदारकहा है। उनकी रचनाओं के अंश साहित्यिक गोष्ठियों व निजी महफ़िलों  में पढ़े जाते हैं। मित्रगण फ़ोन पर उनके वक्तव्यों का आदान-प्रदान करते हैं। उनके जुमलों को बार-बार दोहराकर कविता की मानिंद उनका आनंद लिया जाता। पाठकों के दिलों में अपने प्रति जितना प्रेम और सम्मान मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी ने पैदा किया है संभवतः किसी अन्य उर्दू हास्य लेखक ने नहीं किया। उन्हें पाकिस्तान के सबसे बड़े साहित्यिक सम्मानों, सितारा-ए-इम्तियाज़ (1999) और हिलाल-ए-इम्तियाज़ (2002) से सम्मानित किया जा चुका है। सन 2014 में पाकिस्तान जियो-न्यूज़ ने बज़बान-ए-यूसुफ़ीनामक एक धारावाहिक शुरू किया जिसमें यूसुफ़ी अपनी रचनाओं के अंश पढ़कर दर्शकों को सुनाते हैं। उनकी लोकप्रियता के कारण ही यह धारावाहिक बनाया गया क्योंकि साहित्य प्रेमी अपने प्रिय लेखक की रचनाओं को उनकी आवाज़ में सुनने के इच्छुक थे।  
  
यूसुफ़ी की रचनाएँ
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी की सबसे उत्कृष्ट रचनाएँ आब-ए-गुम (1990)  और ज़र्गुज़श्त (1976) हैं। उनकी पहली दो रचनाएँ 'चिराग़ तले' ( 1961) और 'ख़ाकम बदहन' (1969) हैं। 'चिराग़ तले पहली रचना है। यह तेरह हास्य-निबंधों और रेखाचित्रों का संग्रह है जो 1961 में प्रकाशित हुआ। विषयवस्तु की दृष्टि से यह हल्की-फुल्की और साधारण रचना है। लेकिन कलात्मकता की दृष्टि से यह संग्रह उर्दू के हास्य साहित्य के क्षितिज पर एक नए सूर्य का उदय था। इसने अतिशीघ्र आलोचकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कराया। उस समय के उर्दू के प्रख्यात आलोचक मजनूँ गोरखपुरी “चिराग़ तले” और यूसुफ़ी की दूसरी पुस्तक “ख़ाकम बदहन*(1969) के सन्दर्भ में लिखते हैं : 
यूसुफ़ी की लेखनी जिस चीज़ को भी छूती है उसमें नई उपज और उठान पैदा कर देती है। उनका कोई वाक्य या वाक्यांश ऐसा नहीं होता जो पढ़ने वाले के विचार और दृष्टि को नई रोशनी न दे जाता हो। यूसुफ़ी एक हास्य-लेखक की हैसियत से एक नई पाठशाला हैं और उनके दोनों संग्रह हास्य-लेखन में एक नया अध्याय हैं। समकालीन हास्य-लेखकों को यूसुफ़ी की रचनाओं में उर्दू हास्य-लेखन के लिए नए शुभ-शगुन मिलेंगे। “


क्रिकेट
यह एक हास्य निबंध है जो मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी की पहली पुस्तक ‘चिराग़-तले’ के तेरह खटमिट्ठे निबंधों में शामिल है। यह मिर्ज़ा (अब्दुल वदूद बेग) का रेखाचित्र भी है, जिसमें मिर्ज़ा के क्रिकेट प्रेम और इस खेल के पक्ष में और दूसरे खेलों के ख़िलाफ़ उनकी दलीलों से हँसी और व्यंग्य की फुलझड़ियाँ छोड़ी गई हैं यहाँ यह सूचना महत्वपूर्ण हो सकती है कि मिर्ज़ा अब्दुल वदूद बेग और प्रोफ़ेसर क़ाज़ी अब्दुल क़ुद्दूस एम.ए.बी.टी. गोल्डमेडलिस्ट, जिन्हें लेखक ‘मिर्ज़ा’ और ‘प्रोफ़ेसर’ के नाम से उद्धृत करते हैं, यूसुफ़ी साहब के मित्र या हमज़ाद (छायापुरुष) के रूप में उनकी हर रचना में मौजूद होते हैं। यूसुफ़ी साहब अपनी टेढ़ी-मेढ़ी व उलटी-सीधी दलीलें, अनोखे विचार, उत्तेजक व अकथनीय बातें मिर्ज़ा और प्रोफ़ेसर के मुँह में रखकर कहते हैं। ये दोनों किरदार हमें हमारी परंपरा के सुप्रसिद्ध किरदार मुल्ला नसरुद्दीन की याद दिलाते हैं। इस निबंध में यूसुफ़ी की रचना शैली की चमक हर क़दम पर उजाला किये हुए है और हम इसके प्रकाश में अपने समय के मानव मन की झलकियाँ देख सकते हैं। मज़ाक़ की फुलझड़ियों के बीच बहुत से दार्शनिक संकेत छोड़े हैं जो यूसुफ़ी साहब का ख़ास रंग है।



*ख़ाकम बदहन: अर्थात मेरे मुँह में ख़ाक - कोई बड़ी या गुस्ताख़ीपूर्ण बात बोलने से पहले विनम्रता के तौर पर यह बोलते हैं।

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