इक्कीसवीं सदी में ‘घर’ और हिंदी कहानी

धीरेन्द्र प्रताप सिंह

शोध-छात्र (हिंदी), इलाहाबाद विश्वविद्यालय
चलभाष: +91 941 577 2386
ईमेल: dhirendrasingh250@gmail.com

मानव समाज की सभ्यता और संस्कृति की विकास यात्रा में आज इक्कीसवीं सदी में भी तीन बुनियादी जरूरतें अनिवार्य रूप से शामिल है- ‘रोटी, कपड़ा और घर’।

इतिहास के पन्ने पलटने पर यह ज्ञात होता है कि आज के मनुष्य की आदिम पीढ़ी ने भोजन के तलाश में पशु-पक्षियों का आखेट करना प्रारम्भ किया, तन ढकने के लिये वृक्षों की छाल एवं पत्तियों का उपयोग किया, मौसम की मार एवं जंगली जानवरों से सुरक्षा हेतु गुफाओं, कंदराओं एवं पेड़ों को अपना घर बनाया।

मानव सभ्यता के विकास क्रम में घरों का निर्माण विभिन्न रूपों एवं आकार-प्रकार में होता गया। घर बनाने के भौतिक उपादानों में घास-फूस से लेकर ईंट-पत्थर तक का प्रयोग किया जाने लगा। ऐसे में यह जिज्ञासा जन्म लेती है कि क्या घर केवल घास-फूस, ईंट-पत्थरों से निर्मित एक चाहरदीवारी और सर छुपाने की जगह भर होती है? तब तो इस लिहाज से कारागृह, स्कूल, अस्पताल, होटल या अन्य सभी स्थापत्य, जहाँ भी सर छुपाने की जगह मिलती हो वह सब घर ही कहे जायेंगे। यद्यपि, ऐसा है नहीं।

घर वह जगह होती है, जहाँ रिश्ते पनपते और परिभाषित होते हैं एवं एक दूसरे को जानने, समझने और जीने का भावनात्मक संबल मिलता है। जहाँ सपने और संस्कार पलते हैं। जहाँ मुक्ति का एहसास, सुख और सुकून मिलता है। जहाँ माँ की डाँट, तो ममता की छाँव भी मिलती है, पिता का कठोर अनुशासन तो सुख-दुःख का साथ भी मिलता है, भाई-बहन से झगड़ना भी होता है तो साथ में प्यार बाँटना भी। जहाँ आजादी के मायने और जीवन मूल्यों का निर्वाह और विकास होता है।

इस कल्पना मात्र से ही किसी का भी मन बेचैन हो जाता होगा कि हमसे हमारा घर किसी न किसी कारण हमेशा के लिए छिन जायेगा। ऐसा क्यों? वो इसलिए कि जिस मिट्टी में हम पले-बढ़े हैं, जिस घर के आंगन में हमने खड़ा होना, चलना और दौड़ना सीखा है, उसकी स्मृतियाँ हमारे अवचेतन में जड़ीभूत हो चुकी होती हैं। उससे हमेशा के लिये अलग होना, उन स्मृतियों को मिटा देना या कहा जाये कि अपने अस्तित्व को खत्म कर देने जैसा होता है। क्योंकि घर, जमीन का एक टुकड़ा या क्षेत्रीय पहचान भर नहीं होती अपितु हमारी सभ्यता और संस्कृति के विभिन्न तत्व उसी घर से सिंचित हुए रहते हैं।

यदि इक्कीसवीं सदी की बात करें तो घर सम्बंधित आँकड़े हैरान कर देने वाले हैं। बी.बी.सी वेब पोर्टल पर 19 जून 2017 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक ‘संयुक्त राष्ट्र संघ से जुड़ी शरणार्थी मामलों की एक संस्था ने कहा है कि इस समय पूरी दुनिया में 6.5 करोड़ बेघर लोग शरण माँगने को मजबूर हैं। संयुक्त राष्ट्र की वार्षिक रिपोर्ट में साल 2016 में शरणार्थियों की अनुमानित संख्या साल 2015 के मुक़ाबले तीन लाख ज्यादा है’।
वहीं ‘द वायर’ वेब पोर्टल पर 22 मई 2017 को प्रकाशित  नार्वे शरणार्थी परिषद (एनआरसी) के आंतरिक विस्थापन निगरानी केंद्र के हवाले से बताया गया कि भारत में संघर्ष और हिंसा के चलते 4,48,000 नये लोग विस्थापित हुए हैं। इसके अलावा क़रीब 24,00,000 लोग आपदाओं के चलते विस्थापित हुए हैं। यह आँकड़े और कहानी तो मानव समाज के उस हिस्से की थी, जो लोग धर्म, आतंक, युद्ध, अकाल, सूखा, बाढ़ या तथाकथित विकास के नाम पर उजाड़े, भगाए या अपना घर छोड़ने को विवश हुए हैं। इसके अलावा उन घरों को भी देखना होगा जहाँ के बुजुर्गों को उन के बेटों या परिवार वालों द्वारा ही घर से बाहर निकाल दिया जाता है। 1 मार्च 2013 को हिंदुस्तान न्यूज़ वेब पोर्टल पर प्रकाशित एक खबर बताती है कि आज 70 साल से अधिक उम्र के लगभग 75 फीसदी वृद्ध और 80 साल की उम्र पूरी कर चुकी 65 फीसदी महिलाओं को वृद्धाश्रम के हवाले किया चुका है। उन युवाओं को देखना होगा जो रोजगार  के अभाव में अपने घर से बेघर हैं। वो स्त्रियाँ और बच्चे भी इस विषय के संदर्भ में विचारणीय हैं, जिन्हें यौन शोषण, बाल मजदूरी सस्ते श्रम के लिए तस्करों द्वारा विस्थापित कर दिया जाता है।

    आधुनिक हिंदी कहानी के विकास क्रम में पहली कहानी माधव राव सप्रे की ‘एक टोकरी भर मिट्टी’ मानी जाती है। यह कहानी घर को ही केंद्र में रखकर लिखी गयी थी। कहानी में एक जमींदार साहब, एक बुढ़िया की झोंपड़ी और उसकी जमीन कब्जा कर लेते हैं। एक दिन जमींदार साहब, उस झोंपड़ी के सामने टहल रहे थे, तभी वह बुढ़िया एक टोकरी मिट्टी के लिए वहाँ आ जाती है।  यह देखते ही जमींदार साहब उसे नौकरों से भगा देने का आदेश देते हैं। बुढ़िया उनसे एक विनती करती है कि – ‘ जब से यह झोंपड़ी छूटी है, तब से मेरी पोती ने खाना-पीना छोड़ दिया है। मैंने बहुत-कुछ समझाया पर वह नहीं मानती। यही कहा करती है कि अपने घर चल। वहीं रोटी खाऊँगी। अब मैंने यह सोचा कि इस झोंपड़ी में से एक टोकरी-भर मिट्टी लेकर उसी का चूल्हा बनाकर रोटी पकाऊँगी। इससे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी।’  कहने का आशय यह है कि अपना घर ऐसा होता है कि यदि वह छूटा तो फिर कहीं वह भाव, वह स्नेह कहीं जुड़ नहीं पाता।

आज जब इस देश और दुनिया में पूञ्जी, बाजार एवं विज्ञापन का वर्चस्व है। रोजगार का संकट है। वाह्य दुनिया में संघर्ष पहले से अधिक हो रहा है। आर्थिक पहलू प्रधान हो चला है। भौतिक भव्यता ही पहचान का माध्यम बन रहा है। ऐसे में आज घर के मायने बदल गए हैं। प्रांजल धर अपने एक आलेख ‘घर का मतलब है क्या’ में लिखते हैं कि- ‘उदारीकरण और वैश्वीकरण की लहर में विचारों और तकनीकों से अधिक छवियों का प्रचार-प्रसार हुआ है। ये छवियाँ पूँजीवादी मुनाफ़े की होड़ को बढ़ाने वाली होती हैं और इन विशालकाय आवारा पूंजियों के गर्भ से निकला आधुनिक मीडिया घर की नितांत नई छवि गढ़ने में व्यस्त है। घर वह जो भव्य हो, जिसमें पूँजी की चौतरफा चमक- दमक दिखाई पड़ती हो’।

यदि घर को मात्र भौतिक आधार पर निर्मित करना हो तो आज बाज़ार हाथ खोले खड़ा है। वह घरों को सुंदर और सुख-सुविधा के संसाधनों से भरने में गैर-जरुरी चीजों उत्पादों को खपा रहा है। हम उसके गैरजरूरी उत्पादों के नियमित उपभोक्ता बनते जा रहे हैं। ऐसे में बाज़ार की जरूरतें और वस्तुएँ आमदनी की अपेक्षा खर्च और कर्ज दोनों को प्रतिदिन बढ़ा रहे हैं, जिस वजह से आज घरों में तनाव बढ़ रहा है। इस सन्दर्भ में अमरीक सिंह दीप की एक कहानी ‘एक कोई और’ का जिक्र स्वाभाविक है। कहानी का एक अंश इस प्रकार है कि- ‘अपनी माँगों को लेकर घर का कोई हिस्सा पीछे नहीं था। सब गला फाड़-फाड़कर चीख रहे थे- हमें टेलीफ़ोन चाहिए, पेजर चाहिए, कम्पूटर चाहिए, कार चाहिए, ड्राइवर चाहिए, माली चाहिये, नौकर चाहिए। हमें वह हर सुविधा चाहिये जो पूंजीपति, नेता और फ़िल्मी हीरो- हीरोइन भोग रहे हैं।’

अब तो अधिकांश घरों में बूढ़े माँ-बाप, घर में ही पराये होने लगे हैं। व्यर्थ का बोझ समझे जाने लगे हैं। आज की अधिकांश युवा पीढ़ी जिसमें कुछ आधुनिकता की अंधी दौड़ में तो कुछ रोजी-रोटी के तलाश में बेबस और लाचार हैं। जिनके पास अपने बूढ़े-माँ बाप के लिए ना तो अपना सुनाने और ना ही उनकी सुनने का अवकाश बचा है। यही कारण है कि वो अपने ही घर में बेघर हो जाते हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि यह स्थिति आज के ही समय और हिंदी कहानियों  में देखने को मिल रही है। ऐसा पहले भी देखने को मिलता था। तभी तो प्रेमचन्द की  ‘बूढी-काकी’, ‘बेटों वाली विधवा’ और भीष्म साहनी की ‘चीफ की दावत’ और  ज्ञानरंजन की ‘पिता’ आदि कहानियाँ, कालजयी कहानियों के रूप में दर्ज हैं।

हाँ, यह जरुर है कि तब ऐसी घटनाएँ किसी-किसी घर में देखने को मिलती थीं और आज बहुधा घरों में ऐसा होता दिख रहा है। क्योंकि आज की अधिकांश युवा पीढ़ी जिसमें कुछ आधुनिकता की अंधी दौड़ में तो कुछ रोजी-रोटी के तलाश में बेबस और लाचार हैं। जिनके पास अपने बूढ़े, माँ-बाप के लिए न तो अपनी सुनाने का और न ही उनकी सुनने का अवकाश बचा है। वे अपने परिवार के साथ लेकर किसी शहर में जा चुके होते हैं, और माँ-पिता अपनी जड़ों को छोड़ना नहीं चाहते। नतीजा यह होता है कि बुजुर्ग माँ-बाप घर में अकेले पड़ एकाकीपन को भोगते हैं। परिस्थितियाँ तब और बुरी हो जाती हैं, जब किसी घर में बुजुर्ग माँ या पिता को अकेले दिन काटना हो। अल्पना मिश्र ने अपनी एक कहानी ‘इन दिनों’ में इस चिंता को प्रगट किया है। यह कहानी एक ऐसे परिवार की है, जहाँ बेटा नौकरी के सिलसिले में परिवार सहित अमेरिका में रहता है। गाँव वाले घर पर केवल माँ-पिता जी रहते हैं। अचानक एक दिन माँ का देहान्त हो जाता है। बेटा अकेले ही चंद दिनों की छुट्टी में पिता के पास आता है। फिर समयाभाव का हवाला देकर माँ का क्रिया कर्म अधूरा ही पूरा करता है। पिता को यह पुश्तैनी घर छोड़ अमेरिका ले चलने को कहता है। वो मना कर देते हैं। फिर बेटा उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़कर वापस अमेरिका चला जाता है। कहानी इस टिप्पणी से आरम्भ होती है कि- ‘घर में रहकर बेघर होने का अहसास निश्चय ही बहुत कारुणिक है। रिटायर्मेंट के बाद उनकी जिन्दगी ऐसी हो गयी है जैसे अपनी उम्र गुजार रहे हों। उम्र गुजरने की स्थिति से लगभग हर बुजुर्ग को गुजरना पड़ता है। यह हर घर के अंदरूनी हालात की कहानी है’।
किसी घर के बुजुर्गों को भले ही दो वक्त रोटी न मिले, बच्चे सम्मान करें न करें या उनकी बात भले सुनी जाये न जाये, यह बात वो फिर भी सह सकते हैं, लेकिन यह कत्ई नहीं सह सकते कि उनके बच्चे, पुरखों से मिली घर रूपी धरोहर को बेच दें। पर क्या किया जा सकता है जब आज की युवा पीढ़ी उस धरोहर को लाभ-हानि की नजर से देखने लगे, उसका सौदा तय करने लगे तो बेबसी और पुत्र मोह में भारी मन से बुज्रुगों को उनका साथ देना पड़ता है। इस बेबसी को अखिलेश की कहानी ‘जलडमरूमध्य’ में देखा जा सकता है। कहानी में सहाय जी के लड़के ने तमाम दांव-पेंच और मान मनुहार से सहाय जी के मन न होने के बावजूद उन्हें विश्वास में लेकर उनके घर को बेच देता है। यह स्थितियाँ सहाय जी के लिए सन्निपात की भाँति होती है। इसी विषय को लेकर मालती जोशी की एक कहानी ‘साँझ की बेला, पंछी अकेला’ कहानी भी उल्लेखनीय है।

घर के सन्दर्भ में इसका एक पक्ष और विचारणीय है। जिस प्रकार किसी घर का कोई सदस्य या मुखिया अपने अधिकाधिक भोग- विलास की लालसा में घर उजाड़ या बेच देता है, फलस्वरूप वह बेघर हो जाता है। फिर दर-दर की ठोकरे खाता है। लेकिन उन लोगों का क्या दोष जो अपनी मेहनत मजदूरी से दो वक्त की रोटी खाते हैं, सुख हो या दुःख अपने घर में रहते हैं। और अचानक जब उन्हें यह कहा जाता हो कि अपना घर और गाँव खाली कर दो। यहाँ विकास कार्य होना है या यहाँ के प्राकृतिक संसाधनों पर अब सरकार या संगठन का अधिकार है। इसके बाद शुरू होता है, विकास के नाम पर विनाश का खेल। प्रकृति का अंधाधुंध दोहन। फिर भयंकर सूखा, बाढ़, भूकम्प एवं अन्य प्राकृतिक आपदाओं को झेलने को आमजन अभिशप्त। फ़लस्वरूप लोग अपनी घर की मिट्टी को सीने से लगाए भटकने को विवश हो जाते हैं। इस सन्दर्भ में रणेंद्र की कहानी ‘रात बाकी’, राधाकृष्ण की ‘कहानी और गैर क़ानूनी’, सूर्यनाथ सिंह की कहानी ‘जैसा है सो की’ पूरन हार्डी की ‘बुड़ान’ कहानी उल्लेखनीय है।

‘रात बाक़ी’ कहानी में बाँध के नाम पर एक गाँव खाली कराया जाना है। लोगों में आक्रोश है। क्षोभ है, दुःख है कि यदि बान्ध बना तो गाँव खाली होगा। घर छूट जायेगा। विस्थापन के नाम पर न जाने कहाँ और किस हालत में रखा जायेगा। मानो सब कुछ बिखर जायेगा। होता भी यही है। एक साजिश के तहत निरीह ग्रामवासियों को फँसा कर, पहले तो उनसे प्रतिरोध कराया जाता है। फिर सेना की सहायता से उनके घरों और लोगों को जला दिया जाता है। कहानी का एक अंश इस प्रकार है- ‘न केवल परती के पूरे हो चले घरों को ढहा दिया गया बल्कि बाँध की झोपड़ियों में आग लगाकर बच्चों, बूढों-औरतों को झोंक दिया गया। पुष्पा की आजी माँ को भी नहीं छोड़ा। चाला पच्चों भी जिन्दा जला दी गयीं। जो सामने आया, उस पर तलवार-चाक़ू की मार।’

अपने घर और अपनी मिट्टी से जब किसी व्यक्ति या उसके समूह को जबरन काट दिया जाता है तो वह दशा सच में बड़ी दुखदायी होती है। उस व्यक्ति या समूह की दशा उस पेड़ की भांति हो जाती है, जिसे उसके जड़ से काटकर कहीं और लगा दिया गया हो। इस व्यथा का वर्णन राधाकृष्ण की कहानी ‘क़ानूनी और गैर क़ानूनी’ में मिलता है। कहानी में एक गाँव को उजाड़ कर उन गाँव वालों को उसी गाँव में कोयला मजदूर बना दिया जाता है। कहानी के हवाले से- ‘नदी के इसी पार से सोना का मन बैठ गया। सामने उसका गाँव, वही अपना गाँव था, जहाँ उसका जन्म हुआ था, मगर उसे सब कुछ अजीब किस्म का मालूम हुआ। तमाम जंगल कटे हुए थे। वहाँ खेत तैयार हो गये थे। उनमें हल चलते हुए दिखलाई पड़े। एक असम्भव बात की भांति वहाँ अनेक विलायती टाइप के बंगले बने हुए नजर आये। जहाँ लोगों के घर थे वहाँ अब फ़ुटबाल खेलने का मैदान तैयार हो गया था। सारी बस्ती खिसककर दूर चली गयी थी जो अब दिखलाई नहीं पड़ती थी’।

एक डूब प्रभावित गाँव के माध्यम से घरों के उजड़ने की कहानी पूरन हार्डी ने अपनी कहानी ‘बुड़ान’ के माध्यम से की है। कहानी में दो लड़के खुद की बनाई हुई अपने नाव से डूबे हुए गाँव में घूमते हैं। दोनों अंदाज से अपने- अपने घरों के पास, अपने दोस्तों, गाँव वालों सबके घर के पास रुकते हैं। याद करते है उन घरों की मधुर स्मृतियों एवं लगाव को। महसूस करते हैं उस जगह की मिटटी को। एक लड़का गन्नू, दूसरे लड़के चोईं से कहता है- ‘कितनी अजीब बात है न चोईं! कि कल तक हम सब इस घर में रहते थे। सोते थे। चलते-फिरते, हँसते-रोते, लड़ते-झगड़ते थे और अब इस घर में मछलियाँ, केंकड़े, कीड़े-मकोड़े घूम-फिर रहे होंगे’।

      सूर्यनाथ सिंह की कहानी  ‘जैसा है सो की’ में एक एक्सप्रेस वे और बिजली परियोजना से एक गाँव के उजड़ने की कहानी है। कहानी के अंतिम हिस्से में एक बहुत ही महत्वपूर्ण पंक्ति है- ‘जिन्दा रहना है तो जैसे खेत बेचा, खुद को बेचना सीख लो। अभी तो उजड़ने-बसने का सिलसिला शुरू हुआ है’।

        घर के सन्दर्भ में यह पहलू विचारणीय है कि आज ‘मैं’ का भाव इतना बढ़ता चला जा रहा कि अनेक विनाशकारी हथियार और परमाणु बम अनवरत निर्मित किये जा रहे हैं । अनैतिक विस्तारवादी नीतियों ने, भोग की वृत्ति एवं हथियारों के घमंड में दो-दो विश्वयुद्ध हुए। जिससे लाखों लोग बेघर हुए। आज सीरिया सहित अनेक देशों में जो धर्म और नस्ल के नाम पर नरसंहार हो रहा है, उससे लाखों की संख्या में लोग विस्थापित हो रहे हैं, बेघर हो गये हैं। दरअसल बेघर होना केवल कुछ मानव समुदाय का स्थान परिवर्तन उनकी अपार पीड़ा के साथ भटकना भर ही नहीं होता अपितु किसी खास संस्कृति और सभ्यता का नष्ट होना भी होता है।

युद्ध की विभीषिका से पीड़ित लाखों लोगों के घरों की बर्बाद होती दास्तान को नासिरा शर्मा ने अपनी कहानी ‘गूंगे सपने’ में दर्ज किया है। यह कहानी सीरिया में आतंकवादी घटनाओं के सन्दर्भ में लिखी गयी है। कहानी के प्रारम्भ में लेखिका लिखती हैं कि- ‘दुनिया के सबसे आबाद शहर दमिश्क में धरती के नीचे से धधकता लावा आखिर फूट ही पड़ा, जिसकी खौलन का अंदाजा लोगों को अरसे से हो रहा था। दिल व दिमाग की यह धरती जो सियासत की धीमी-धीमी आँच से सुलग रही थी, उसने लपटों का रुप धरकर घरों में रहने वालों का सुख-चैन छीन लिया था। मौत के खौफ से वे सब बसे बसाये घर को छोड़कर दीवानावार, भाग रहे थे।’

          आज जब कंक्रीट के जंगलों में घर के नाम पर अपार्टमेंट की कतरनों में आदमी को ठूंसा जा रहा हो, मीडिया और सोशल साइट्स के मायाजाल में लोग उलझे हुए हों, अजनबियत बढ़ रही हो, लोगों के सामने पहचान का संकट खड़ा हो, लाखों लोग अन्यान्य कारणों से बेघर हो रहे हों, दुनिया में विकास, धर्म, भाषा, नस्ल के नाम के पर खूनी हिंसा हो रही हो,घर का अर्थ शरणार्थी शिविर के तंबू बन रहे हैं। ऐसे में घर की चिंता स्वाभाविक हो जाती है। घर की बदलती परिभाषा, उसके स्वरूप और किसी भी कारण से घर छोड़ने, छूटने या छीन जाने की पीड़ा को हिंदी कहानी ने बखूबी उठाया है।

संदर्भ: 
1.  www.hindisamay.com/content/788/1/माधवराव-सप्रे-एक-कहानियाँ-टोकरी-भर-मिट्टी.cspx, dos -27/01/2018
2- प्रांजलधर, घर का मतलब है क्या, नया ज्ञानोदय, साहित्य वार्षिकी, जनवरी 2016, पृ. सं.- 96
3- अमरीक सिंह दीप, एक कोई और, परमेश्वरी प्रकाशन, प्रीत विहार, दिल्ली – 92, सं.- 2011(प्र.), पृ.सं.-166
4- अल्पना मिश्र, इन दिनों, नया ज्ञानोदय, साहित्य वार्षिकी, जनवरी  2016, पृ. सं.- 127
5-  रणेंद्र, रात बाकी, रात बाकी एवं अन्य कहानियाँ,(कहानी संग्रह), राजकमल प्रकाशन,अशोक राजपथ, पटना, सं.- 2010(प्र.), पृ.सं.- 30
6- क़ानूनी और गैर क़ानूनी, राधाकृष्ण, गाँव-घर,(कथा- संचयन), सम्पादक- पंकज मित्र, राजकमल प्रकाशन प्रा. लि., दरियागंज, नई दिल्ली, सं.- 2014, पृ.सं.- 33
7- पूरन हार्डी, ‘बुड़ान’, कथा में गाँव,(कथा-संचयन), संपादक(सुभाष चंद कुशवाहा), संवाद प्रकाशन, मेरठ,  सं.- 2010, पृ.सं.- 287
8-  सूर्यनाथ सिंह, जैसा है सो की, नवागत पीढ़ी (21 वीं शती की कहानियाँ) (सं.- पुष्पपाल सिंह), 2013, हार्पर कालिंस पब्लिशर्स इंडिया, पृ.सं.- 237
9-  नासिरा शर्मा, गूंगे सपने, नया ज्ञानोदय, साहित्य वार्षिकी, जनवरी 2016, पृ. सं.- 104 

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