काव्य: मयंक शुक्ला

(1) मुस्कुराते जाइए

ग़म उठाते जाइए और मुस्कुराते जाइए
इश्क़ जब कर ही लिया है तो निभाते जाइए

प्रेम अंगारों की दावत, सत्य हर सुख से अदावत
जीतता है सत्य इक दिन, रह गयी है बस कहावत
आज घायल हैं हवाएँ, ढो रहीं रोती सदायें
है कुचल जाने का डर तो किस तरह गर्दन उठाएँ
पर किसी को प्रेम का दीपक जलाना ही पड़ेगा
स्याह नफ़रत की बुलंदी को झुकाना ही पड़ेगा
आप जलते जाइए इसको जलाते जाइए
ग़म उठाते जाइए और मुस्कराते जाइए

माना सफ़र आसाँ नहीं, माना डगर थोड़ी कठिन है
माना कि रातों के क़फ़स से झाँकता लाचार दिन है
माना कि चिड़ियों के चहकने पर लगी पाबंदियां
माना कि दिल की हाट में छाई हुई हैं मंदियाँ
लेकिन अडिग, अविचल, अटल आधार होता प्रेम का
डर के गहनों से नहीं शृंगार होता प्रेम का
दिनकर के माथे पर जमीं जो धूल उसको पोछना है
इश्क़ की राहों पे अब ना हारना है,जीतना है
मिल ही जाएगा मकां, बस राह चलते जाइये
ग़म उठाते जाइए और मुस्कराते जाइए

उम्र भर चुभती रहेगी इश्क़ तो ऐसी चुभन है
ख्वाब क्या नींदें जला दे इश्क़ में ऐसी तपन है
इश्क़ ग़म का नाम दूजा पर मैं इतना जानता हूँ
है भले ही दर्द फिर भी दर्द की दिल को लगन है
आसमां सर पे न होगा और पैरों में ज़मीं
फूल भी ख़ुशबू न देंगे,चाँद सूरज रौशनी
जब किनारे न मिलेंगे, घेर लेगी तीरगी
साथ जब कोई न देगा तब मिलेगी ज़िन्दगी
राह-ए-उल्फ़त का अजब सा लुत्फ़ लेते जाइए
ग़म उठाते जाइए और मुस्कराते जाइए

(2) उससे अगले जनम का वादा है...

उससे अगले जनम का वादा है

चाँद पूरे शबाब पर होगा चाँदनी रक्स कर रही होगी
रात के नर्म-नर्म होठों से रागिनी सी फिसल रही होगी
जहाँ पर लफ्ज़ बेमानी होंगे सिर्फ़ अहसास के मानी होंगे
जहाँ न आयतों की बांग लगे, जहाँ न मन्त्र सुनाई देंगे
जहाँ पे सिर्फ़ चलेगी दिल की, वहीँ पे मिलने का इरादा है
उससे अगले जनम का वादा है

जहाँ न तोल के रखना हो क़दम, जहाँ न साँसे भी मर्ज़ी से मिलें
जहाँ न हँसने पर हो पाबन्दी, जहाँ रोने की भी आज़ादी हो
कोई जज़्बात न सीने में दफ़न होता हो
गुलों सा खिलने का इरादा है
उससे अगले जनम का वादा है

तेरे चेहरे से रौशनी पीकर तमाम रातों का सूद उतरेगा
दिल में जो ज़ब्त पड़ा सदियों से कोई दरिया मचल के निकलेगा
तेरी प्यारी चराग़ सी आँखें, मेरे हर दर्द को शिफा देंगी
आने वाली हज़ार सदियों को जावेदां मायने वफ़ा देंगी
मुक़द्दस इश्क़ का इरादा है
उससे अगले जनम का वादा है

तुम्हारी हसरतें रहीं दिल में हमारी आरज़ू रही दिल में
ख़्वाब मिलकर कभी सजाये थे आज वो टूटते हैं तिल-तिल में
मगर न तोड़ पायेगा हिम्मत वार दुनिया का थोड़ा ख़स्ता है
आग जब ज़ोर से भड़कती है, इश्क़ भी ज़ोर से बरसता है
इश्क़ की सल्तनत आबाद रहे, बात इतनी सी हमको याद रहे
प्यार में नफ़रत से दम ज़ियादा है
उससे अगले जनम का वादा है!

(3) सतरंगी जीवन

खिड़कियाँ खोलो रौशनी आने दो,
सीली-सीली यादों को मुस्कुराने दो,
बेड़ियों को हवाओं से दिल लगाने दो
खिड़कियाँ खोलो रौशनी आने दो।

देखो वह किताब फड़फड़ा के कहती है,
मेरे हर पन्ने पर एक नया रंग है,
जीवन को जीने का ये मेरा ढंग है
आँसू से लिपटा कोई लम्हा रोता है
खुशियों के दरिया में कोई डुबोता है
पर मैंने सबको सहेजा है प्यार से
साधारण दिन भी हैं मुझको त्यौहार से।

मेहमान किरणों को अन्दर आ जाने दो
सीली-सीली यादों को मुस्कुराने दो
खिड़कियाँ खोलो रौशनी आने दो

ओ पत्ते! जब शाख़ों पर है
मजबूती का जश्न मना
टूट गया तो हवाओं के संग
आज़ादी का जश्न मना
कोई रंग दिखाये जीवन
उसमें अपना रंग मिला
फ़ीका-फ़ीका क्या जीना है
जीवन को सतरंग बना
अँधेरों को सूरज के गहने पहनाने दो
खिड़कियाँ खोलो रौशनी आ जाने दो।

(4) ... बस थोड़ा और

सब्र का पढ़ ले ककहरा, कुछ न सुन बस हो जा बहरा
बीन ले जज़्बों के तिनके, फूँक दे जब हो अँधेरा,
राह में जो डर सताए,
लौटने की दिल में आये,
पीठ अपनी थपथपा कर कह ज़रा
... बस थोड़ा और

संघर्ष को गाने की कीमत सब चुका पाते नहीं हैं,
आज मौका गर लगा है भर के जी तू गुनगुना ले,
सुर अगर कुछ गड़बड़ायें
साज़ तुझसे रूठ जाएँ
चूम कर सरगम का माथा कह ज़रा
... बस थोड़ा और

शूल को तू फूल कर ले,
इक ज़रा सी भूल कर ले,
सीप बनकर अश्रु पी ले,
मोतियों के ख़्वाब जी ले,
बेसबर गुमनामियों को नाम देकर कह ज़रा,
... बस थोड़ा और

हाथ जो पत्थर उठाये दिख रहे हैं
तालियाँ बन जायेंगे कल,
चोट खाए पस्त पंछी फडफडाते दिख रहे हैं,
मुक्त हो आकाश में उड़ जायेंगे कल
आज लेकिन हर जख़म को छील दे तू,
और सनक की इस पतंग को ढील दे तू,
दर्द को फिर लौ दिखाकर कह ज़रा,
... बस थोड़ा और।

(5) ज़िन्दगी तो जश्न है

ज़िन्दगी तो जश्न है तो जश्न की तरह जियो
ज़िन्दगी की बाज़ियों को ज़िन्दगी से जीत लो
एक लम्हा कितनी सदियाँ जी के आया है इधर
एक पल में इसकी सारी सदियाँ तुम निचोड़ लो
ज़िन्दगी तो जश्न है तो जश्न की तरह जियो

इस तरह न होश का लिबास ओढ़ना कभी
बेहोशियों में जो मज़ा है वो न तुम उठा सको
समन्दरों से इस कदर न जोड़ लेना रास्ते
कि इश्क़ में जो आग है वो मुँह से न लगा सको
दूर जब उजास हो, टूटने को साँस हो
अखण्ड आस में जियो हर एक साँस में जियो
ज़िन्दगी तो जश्न है तो जश्न की तरह जियो

हवा का रुख किधर भी हो मगर तू दिल से काम ले,
जो साथ छोड़ दें सभी तो अपनी बाँह थाम ले
न सोच काफ़िले की तू, ख़ुद अपना काफ़िला है तू
सफ़र में है मज़ा तभी, जो भीड़ से जुदा है तू
रुख हवा का मोड़ दे, निशान अपना छोड़ दे
ख़ुदा भी वाह कर उठे जियो तो इस तरह जियो
ज़िन्दगी तो जश्न है तो जश्न की तरह जियो

ज़िन्दगी में मौत है तो मौत भी तो जश्न है
है मौत जश्न आख़री तो जश्न ये मना चलो
और इस तरह मनाओ तुम कि मौत को भी गर्व हो
ज़िन्दगी की श्रेष्ठता का चूर-चूर दर्प हो
जब तुम्हें ये ज़िन्दगी मिलाये मौत से कभी, तो
सर उठा के बात कर सको कुछ इस तरह जियो
ज़िन्दगी तो जश्न है तो जश्न की तरह जियो।

व्यवसाय: विद्यार्थी
निवास: बिल्हौर (कानपुर), उत्तरप्रदेश, भारत
संपर्क: +91 700 782 1082

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।