कविताएँ

आर बी भण्डारकर

आर बी भण्डारकर


अखबार *


 अखबार!
न्यूज पेपर;
बहुत कम बोला जाता है समाचार पत्र;
रोज सवेरे यत्र, तत्र प्रायः सर्वत्र
दस्तक देता है।

अलसाये हों या स्फूर्त
नियमित टीवी देखते हों
या श्रवण-सुख देता हो रेडियो
पर मन उतावला रहता है
इस अखबार के लिए ही।

इसमें छाए रहते हैं विज्ञापन,
अक्सर
दुर्घटनाओं, चोरियों, हत्याओं
बलात्कारों का दिखता है ज्ञापन;
फिर भी हम क्यों रहते हैं बेचैन
पढ़ने के लिए अखबार।

क्योंकि
अखबारों में मिलता है
उपभोग की जिंसों का प्रचार,
बाजार-भाव, अर्थ व्यवस्था की चाल;
वैवाहिक विज्ञापन,
छोटे छोटे रोज़गारों की सूचनाएँ।
किसी की कहानी, लघुकथा
तो किसी की कविताएँ।

इनमें होते हैं उपयोगी आलेख
जिनमें होता है देश और राज्य के
रुखों का, दिशाओं का, दशाओं का
विश्लेषणात्मक उल्लेख।

किन्ही किन्हीं अखबारों में होते हैं
जीवन-रहस्यों, जीवन-मूल्यों, आदर्शों को उदघाटित करने वाले लेख
जिनसे प्रकाशित होता है मानव जीवन
और इनसे ही बचा रहता है
और पतन के गर्त में जाने से वह।

अखबारों में होता है बहुत कुछ वह
जिससे हम सजग,
सावधान तो हो ही सकते हैं;
अखबारों में होता है, हो सकता है
बहुत कुछ;
निर्भर करता है पाठक पर
वह क्या देखना, पढ़ना चाहता है
क्या देखता, पढ़ता है।
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        * हम भी हैं माँ के दुलारे *


हम भी हैं इंसान।
आश्चर्य यह कि जग ने
मुझ में जड़े लूला, लँगड़ा, काना, अंधा, सूरा
विकलांग और दिव्यांग जैसे उपनाम;
और अपने से
बिल्कुल अलग कर दिया हमें।

हम पूछते हैं
कौन होते हैं आप ऐसा करने वाले?
नाम, उपनाम, संबोधन तय करने का हक तो
माता, पिता का होता है;
वे तो नहीं पुकारते, तुम्हारे दिए यह नाम,
तुम्हारे ये सम्मान;
वे तो मुझे पुकारते हैं-
मेरा राजा बेटा या मेरी रानी बिटिया
राजू या राजकुमारी
राजकुमार या नैन दुलारी।

उन्हें तो मुझमें दिखते है हॉकिंग,
सुधा चन्द्रन, रवींद्र, गिरीश, शेखर,
एच रामकृष्णा, प्रीति, सतेंद्र, अरुणिमा
एडीशन, हेलेन किलर, मर्ली मेटलिन ही।

तुम्हारी दृष्टि क्यों है कुंठित?
दोस्तों!
मैं नहीं हूँ किसी पर भार
स्वयं कर लेता हूँ अपनी सम्हार,
मैं भी हूँ परमात्मा का
देव-दुर्लभ उपहार।

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