कहानी: मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा...

- (सुश्री) शरद सिंह

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निहारिका घर लौटी। स्वभावतः उसने अपनी पत्र-पेटी को खोल कर देखा। मात्र एक लिफाफा था उसमें। निहारिका ने झुंझलाते हुए पत्र-पेटी बंद की और स्वयं से पूछा कि आखिर वह और किस पत्र की प्रतीक्षा कर रही है? वह कौन-सी चिट्ठी उस पेटी में रखी हुई देखना चाहती है? न तो उसके मन के पास इसका उत्तर था और न मस्तिष्क के पास। उसने अनमनेपन से दरवाज़े का ताला खोला और घर में प्रविष्ट हो गई। मौसम गरम हो चला था। पंखा चालू कर दिया। एक पल मन किया कि बैठ कर सुस्ता ले फिर दूसरे ही मन ने कहा कि पहले एक कप चाय बना ली जाए उसके बाद ही बैठने के बारे में सोचे।

यदि माँ घर पर होतीं तो वे बिना कहे ही रसोईघर जा पहुँचतीं और चाय बनाना शुरू कर देतीं। लेकिन माँ तो बनारस गई हैं भाई के पास। वैसे अकेलेपन से निहारिका को कोई शिक़ायत नहीं रहती है। रहे भी कैसे? अब तो अकेलेपन की आदत पड़े वर्षों व्यतीत हो चुके हैं। लेकिन माँ को निहारिका के अकेलेपन की चिन्ता रहती है इसीलिए वे कही भी जाती हैं तो शीघ्रातिशीघ्र लौटने को उतावली रहती हैं। भले ही निहारिका और माँ के बीच वार्तालाप बहुत ही सीमित होता है। दोनों में परस्पर असीम प्रेम हो कर भी दोनों के बीच एक अदृश्य दीवार खड़ी रहती है। यह दीवार न तो उम्र के अन्तर की है, न तो रुष्टता की और न ही दोनों अंतर्मुखी थीं। यह एक प्रकार का मानसिक तादात्म्य ही थ कि दोनों एक-दूसरे की आवश्यकताओं और मनोदशा को भांप जाती थीं। इसी तादात्म्य ने उन दोनों के बीच संवादों आवश्यकता को दोयम बना दिया था। उनकी बातचीत उस समय भी सीमित शब्दों में होती जब माँ दूसरे शहर गई हुई होतीं और वहाँ से फोन कर के निहारिका का हाल-चाल पूछतीं।

‘सब ठीक है न निहू ?’ माँ पूछतीं।

‘हाँ, यहाँ सब ठीक है। तुम चिन्ता मत करो।’ निहारिका कहती। ‘आराम से आना’ कहना चाह कर भी नहीं कह पाती। वह जानती थी कि इन शब्दों का कोई अर्थ नहीं है। इन्हें कहना औपचारिकता ही होगी। माँ अपनी इच्छानुसार गई हैं और अपनी इच्छानुसार आ भी जाएंगी, वह भी शीघ्रातिशीघ्र। शायद माँ को लगता है कि निहारिका अभी भी एक छोटी बच्ची है जो अपनी देख-भाल स्वयं नहीं कर सकेगी या फिर अकेले घर में डर जाएगी, सहम जाएगी।

माँ के इस तरह के उतावलेपन पर निहारिका को कभी खीझ आया करती थी लेकिन अब कोई विचार नहीं उठते।

निहारिका ने चाय का प्याला मेज पर रखा और सोफे पर पीठ सटा कर बैठ गई, कालीन पर।

‘हर समय तो कुर्सी पर टंगे रहना पड़ता है, कम से कम घर में तो ज़मीन पर, पैर फैला कर बैठा जा सकता है।’ निहारिका मुस्कुरा कर कहती जब उसकी भाभी उसे टोंकती। अब तो भाभी भी यहाँ नहीं हैं।

निहारिका ने चाय का प्याला उठाने के लिए हाथ बढ़ाया तो उसे वह लिफ़ाफा दिखाई दे गया जिसे वह पत्र-पेटी से निकाल कर लाई थी। उसने लिफ़ाफा उठा लिया। प्रेषक के स्थान पर प्राचीन इतिहास विभाग, डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर का पता पढ़ कर वह उसे उलझन-सी हुई। उसने लिफ़ाफा खोला। उसमें एक आमंत्राण-पत्र था।

‘एलुमनी मीट’ उस इन्विटेशन कार्ड पर सबसे ऊपर यही लिखा था। सन् 1998 के सभी छात्रों को आमंत्रित किया गया था। देखा जाए तो शिक्षण-सत्र बहुत पुराना नहीं चुना गया था, मात्र बीस वर्ष पहले का। ‘एलुमनी मीट’ के लिए बीस साल बहुत अधिक नहीं होते हैं लेकिन आजकल की इस भागती-दौड़ती ज़िन्दगी में बीस दिन पहले की बातें ही दशकों पुरानी लगने लगती हैं।

‘एलुमनी मीट!’ यानी उस समय के सभी विद्यार्थी आएंगे? नेहा, रुमी, लक्ष्मी, हरदीप, सुहैल, व्योम... और... और क्या... वो... वो भी आएगा?

‘नहीं! उस तक तो इन्विटेशन शायद पहुँच ही न पाया हो... क्या पता वह इस समय कहाँ हैं... दुनिया के किस छोर में है? क्या विश्वविद्यालय वाले उसे ढूंढ पाए होंगे? यदि ढूंढ भी लिया होगा तो यह आवश्यक नहीं है कि वह निमंत्रण स्वीकार करे ही। वह तो व्यस्तताओं से घिरा रहता होगा, हमेशा की तरह।’ निहारिका ने अपने मन को समझाया। एक साथ दो विचार निहारिका के मन में कौंधे-एक तो यह कि वह इस मीट में न आए तो अच्छा है और दूसरा यह कि वह आए ताकि निहारिका उसे एक बार फिर देख सके।

निहारिका देख सके कि वह कितना बदल गया है। क्या वह पहले से मोटा हो गया होगा? गंजा? दुबला? या पहले से अधिक स्मार्ट? उन दिनों उसे अपनी सज-धज पर बड़ा नाज़ हुआ करता था। निहारिका और उसका मूल विषय एक ही था किन्तु विशेषज्ञता का विषय भिन्न था। निहारिका को मूर्तिकला और स्थापत्य कला में रुचि थी और उसने ये दोनों विषय चुने थे जबकि वह शिलालेखों और पुरालिपियों में दिलचस्पी रखता था। ब्राह्मी और पालि उसने अपनी मेहनत से सीख रखे थे। निहारिका एक प्राध्यापिका और एक इतिहासकार बनने का सपना देखती थी जबकि वह पुरालेख विशेषज्ञ बनना चाहता था और लंदन का रॉयल एल्बर्ट संग्रहालय एवं मिस्र का कैरो संग्रहालय उसके सपने के कार्यस्थल थे, जहाँ वह ढेरों-ढेर पुरालेख बांचना चाहता था और उनकी नए ढंग से व्याख्या करना चाहता था।

वह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस से आया था। उसका नाम तो था विवेक लेकिन निहारिका उसे ‘रंगरेज’ कहती थी।

‘तुम इतनी अच्छी यूनीवर्सिटी छोड़ कर यहाँ क्यों आए?’ निहारिका ने पूछा था।

‘ये भी अच्छी है!’ विवेक ने कहा था।

‘हाँ, यह भी अच्छी है लेकिन बी.एच यू. तो आखिर बी. एच. यू. है। यहाँ ये बेहतर फेकैल्टी होगी वहाँ!’

‘सो तो है लेकिन फेकैल्टी का अच्छा होना ही मायने नहीं रखता है, पढ़ने वाले की लगन पर निर्भर रहता है कि वह अच्छी यूनीवर्सिटी में पढ़ कर भी गधा निकलता है या सामान्य यूनीवर्सिटी में पढ़ कर भी जीनियस बनता है।’विवेक ने कहा था।

‘तुम्हें तो दर्शनशास्त्र लेना था।’ निहारिका हँसी थी। फिर पूछा था, ‘सच बताओ, यहाँ मन लग रहा है?’

‘मन का तो पता नहीं लेकिन दिल लगाने की कोशिश कर रहा हूँ!’ कहते हुए विवेक भी हंस दिया था।

विवेक कुछ समय छात्रावास में रहा फिर किराए का एक कमरा ले कर सिविल लाइन्स के क्षेत्रा में रहने लगा। सागर के सिविल लाइन्स को सागर का कनॉटप्लेस कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा। लेकिन इसमें थोड़ा सुधार कर के इसे कनॉट प्लेस के साथ-साथ चौपाटी भी कह सकते हैं। अर्थात् कनॉट प्लेस और चौपाटी का काम्बो पैक। एक ओर एक छोटा-सा मॉल, किराने से लेकर कपड़ों और इलेक्ट्रॉनिक्स तक की दूकानें। दूसरी ओर एक कतार से खड़ी चाट की दूकानें। जो हमेशा चटखारे लेते ग्राहकों से खचाखच भरी रहतीं। उन ग्राहकों में अधिकतर युवा होते, विश्वविद्यालय और कोचिंग सेंटर्स पढ़ने वाले। हाँ, शाम को कई ग्राहक सपरिवार भी पहुँचते।

‘कितना अच्छा और सक्सेसफुल धंधा है! यदि मैं इपीग्राफिस्ट नहीं बन सका तो चाट की दूकान खोल लूंगा।’ विवेक बड़े जोश से कहा था।

‘वाह! व्हाट ए कॉम्बीनेशन! इपीग्राफिस्ट नहीं तो चाट वाले भैया! इरादा बुरा नहीं है!’ विवेक की चाटवाले के रूप में कल्पना कर के ही निहारिका ठठाकर हंस पड़ी थी।

निहारिका को कभी-कभी सोच में पड़ जाती कि इतना खिलंदड़ा-सा दिखाई देने वाला लड़का अपने ऊंचे-ऊंचे सपनों को कैसे पूरा करेगा? विवेक बनारस के एक व्यवसायी परिवार का सबसे छोटा बेटा था। उसका सबसे बड़ा भाई बनारसी साड़ियों के निर्यात का काम देखता था और शेष दो भाई पिता का हाथ बंटाते थे। विवेक के पिता चाहते थे कि विवेक पढ़-लिख कर अपने बड़े भाई के साथ साड़ियों के निर्यात के काम में जुट जाए। लेकिन विवेक तो किसी और ही रास्ते पर चलने के लिए बना था। यूं तो उसे गर्व था अपने पारिवारिक व्यवसाय पर किन्तु वह स्वयं उसमें प्रवृत्त नहीं होना चाहता था। विवेक चाहता तो कैरो और लंदन अपने बड़े आराम से जा सकता था, व्यवसायी के रूप में लेकिन उस पर तो इपीग्राफिस्ट बनने का भूत सवार था। बनारस में उसे पैतृक व्यवसाय की ओर खींचने का पूरा प्रयास किया जाता जिससे वह मानसिक दबाव महसूस करता। इसीलिए उसने बनारस से बाहर रह कर पढ़ने का फैसला किया। उसके सामने दो विकल्प थे, एक दिल्ली का और दूसरा सागर का। इन दोनों स्थानों पर उसके कई मित्रा पहले ही पहुँच चुके थे। दिल्ली में भी परिवारवालों के दबाव से पीछा नहीं छूटता इसलिए उसने सागर को चुना।

‘मैं तो इस शहर को देखते ही इस पर फ़िदा हो गया था।’ विवेक ने कहा था।

‘और विश्वविद्यालय?’ रुमी ने पूछा था।

‘यदि शहर अंगूठी है तो विश्वविद्यालय इसका नगीना है।’ विवेक ने प्रभावित स्वर में कहा था।

चकित रह गई थी निहारिका यह उपमा सुन कर। ऐसा तो उसने खुद भी नहीं सोचा था, कितनी सुन्दर प्रशंसा!

‘तुम तो कवि हो!’ निहारिका बोल पड़ी थी।

‘नहीं मैं रंगरेज हूँ!’ विवेक ने कहा था।

‘रंगरेज? व्हाट यू मीन?’ निहारिका और रुमी एक साथ बोल उठी थीं।

‘हाँ, हमारे यहाँ बनारसी साड़ियों पर पॉलिश का भी काम होता है। निहारिका, तुम उस दिन बता रही थीं न कि तुम्हारी माँ की बनारसी साड़ी पर चाय के दाग़ लग गए थे और तुमने उसे ड्राईक्लीन कराया तो पूरी साड़ी का रंग फीका पड़ गया है... ’

‘हाँ, वो माँ की फेवरेट साड़ी है। पिताजी की यादें जो सिमटी हैं उसमें।’ निहारिका बता बैठी थी।

‘ओ.के.! मैं दो दिन बाद घर जा रहा हूँ। मुझे दे देना वो साड़ी, मैं उसे पॉलिश करा दूंगा। एकदम नई दिखने लगेगी।’ विवेक ने रुमी और हरदीप को अनदेखा करते हुए सीधे निहारिका से कहा था।

‘क्या सचमुच?’ उत्साहित हो उठी थी निहारिका। वह जानती थी कि वह साड़ी उसकी माँ के लिए कितना अधिक महत्व रखती है। वस्तुतः स्मृतियाँ अपने बने रखने का आधार ढूंढ ही लेती हैं। माँ के लिए पिताजी की स्मृतियाँ यदि उस साड़ी के तानो-बानों में न रची होतीं तो किसी कंगन में लिपटी रहतीं, किसी फोटो में, नहीं तो किसी ऐसी निर्जीव वस्तु में जो पिताजी ने अपने प्रेम में पाग कर माँ को उपहार में दी होती। संभवतः स्मृतियाँ व्यक्ति से कहीं अधिक उसके व्यवहार, उसकी भावनाओं और उसके व्यवहार की होती हैं। प्रेम-भावना की स्मृति सबसे तीव्र और कालजयी होती है। प्रेम-भावना किसी भी निर्जीव वस्तु को सजीव बना देती है। तभी तो निहारिका ने कई बार छिप कर माँ को उस साड़ी से बातें करते भी देखा था। मानो माँ पिताजी से बातें कर रही हों।

माँ की उस अमूल्य साड़ी की सुन्दरता लौट आने की कल्पना से ही निहारिका उत्साहित हो उठी थी। फिर भी उसके मन के किसी कोने में एक संदेह जाग उठा था।

‘साड़ी और ख़राब तो नहीं हो जाएगी?’

‘नहीं! चिन्ता मत करो!’

‘ध्यान से वसपय ले आना, भूलना नहीं!’

‘नहीं भूलूंगा!’

‘माँ की सबसे प्रिय साड़ी है इसीलिए... .’

‘रंगरेज हूँ, कपड़ाचोर नहीं! समझीं निहारिका मैडम! सो फॉर गॉड सेक, डोन्ट वरी एबाउट साड़ी!’ विवेक झुंझला उठा था।

‘ठीक है, रंगरेज साहब! ठीक है!’ निहारिका ने उसका मूड ठीक करने की दृष्टि से हंस कर कहा था,‘किसी दिन अगर तुम्हारे घरवालों को पता चल गया कि तुम खुद को रंगरेज कहते हो तो वे लोग तुम्हारी बैंड बजा देंगे!’

‘बात तो ठीक है तुम्हारी लेकिन उन्हें पता कैसे चलेगा? तुम बताओगी उन्हें?’

‘हो सकता है... यदि किसी दिन तुमने मुझसे चतुराई दिखाने की कोशिश की तो... ’

‘चतुराई दिखाने की कोशिश? अरे, मैं तो जन्मज़ात चतुर हूँ। कोई शक़?’ वह भी हँसा था।

वह सचमुच चतुर था, बुद्धिमान था। उसने अपनी बुद्धि का सबूत दे दिया था परीक्षा परिणाम के रूप में। निहारिका और विवेक दोनों प्राविण्य सूची में पहले और दूसरे स्थान पर आए थे। मात्र एक अंक का अन्तर था दोनों के अंकों में।

‘काश! यह तुम्हारा एक अंक मुझे मिल गया होता!’ चटकते स्वर में विवेक ने कहा था। उस स्वर को सुन कर चौंकी थी निहारिका। क्या निहारिका के पहले स्थान पर आने की खुशी नहीं है विवेक को?

‘तुम ले लो यह नंबर!’ निहारिका ने मुस्कुरा कर कहा था।

‘वह तुम्हारे हिस्से का है, मेरे नहीं। और मैं किसी से उसका कुछ भी नहीं छीनता हूँ... कुछ भी नहीं!’ अनमनेपन से बोला था विवेक ने।

‘दुखी हो?’

‘नहीं!’

‘लग तो रहा है!’

‘तुम्हें भ्रम हो रहा है।’ विवेक ने अपने दुख को नकारते हुए निहारिका से पूछा था,‘अब आगे क्या इरादा है?’

‘पीएच.डी. करूंगी... और तुम?’

‘मैं भी! पीएच.डी. तो करना ही पड़ेगी। विशेषज्ञता की पहली सीढ़ी वहीं से तो शुरू होगी।

सब कुछ स्पष्ट था विवेक के सामने। वह पहले से तय कर के बैठा था कि उसे क्या करना है और कहाँ जाना है?

‘तुम क्या करोगी पीएच.डी. के बाद?’ विवेक ने पूछा था।

‘नेट भी ट्राई करूंगी... मुझे टीचिंग लाईन में जाना है।’ निहारिका ने भी यह जताने का प्रयास किया कि उसका रासता भी पहले से तय है।

‘हाऊ बोरिंग! तुम एक अच्छी आइकनोग्राफर बन सकती हो! आई स्वेयर, तुम्हें मूर्तियों की लिपि पढ़ना आता है।’ विवेक ने निहारिका की प्रशंसा करते हुए कहा था। अच्छा लगा था यह सुन कर निहारिका को। अपनी प्रशंसा भला किसे अच्छी नहीं लगती? फिर कोई अपना प्रिय व्यक्ति प्रशंसा करे तो प्रसन्नता बढ़ कर दूनी हो जाती है। एक ही आकाशगंगा में हज़ार चन्द्रमा और हज़ार सूरज चमते दिखाई देने लगते हैं।

विवेक क्या सचमुच ‘प्रिय व्यक्ति’ था निहारिका का? यह प्रश्न निहारिका ने अपने-आप से सैंकड़ों बार किया था। यह प्रश्न निहारिका के मन में उठना नहीं चाहिए था लेकिन उठा। कारण था विवेक का अबूझ व्यवहार।

पीएच.डी. के लिए आवेदन करने और एम.ए. का परीक्षा परिणाम आने से कई माह पहले निहारिका को विवेक प्रिय लगने लगा था। हंसमुख, खिलंदड़ा विवेक सभी को प्रिय था, विद्यार्थियों से ले कर प्राध्यापकों तक को। जब से विवेक ने निहारिका की माँ की साड़ी में पॉलिश करा कर दिया था तब से निहारिका को लगने लगा था कि विवेक उसकी ओर कुछ विशेष ध्यान देता है। अच्छा लगा था निहारिका को यह महसूस कर।

उस दिन विश्वविद्यालय के किसी कर्मचारी का निधन हो जाने के कारण शोक-सभा के बाद छुट्टी घोषित कर दी गई। सभी विद्यार्थी अपने-अपने घर लौट गए। निहारिका भी लौटने लगी।

‘थोड़ी देर रुको!’ विवेक ने उसे रोका था।

‘क्यों?’

‘यूँ ही!’

‘लेकिन... ’

‘क्या नहीं रुक सकतीं?’ विवेक ने इस भाव से कहा कि निहारिका रुक गई।

वे दोनों विश्वविद्यालय परिसर में घूमते-घामते पुस्तकालय की सीढ़ियों पर जा बैठे। पुस्तकालय भी बंद था। पुस्तकालय की लम्बी, पतली सीढ़ियों पर बैठ कर सामने उस रास्ते को देखना अच्छा लग रहा था जो विश्वविद्यालय की पहाड़ी से उतने का दूसरा रास्ता था। इस रास्ते को मज़ाक में ‘लव साईट’ कहा जाता था। क्यों कि घने जंगल की अनुभूति कराता सघन पेड़-झाड़ वाला रास्ता प्रेमी छात्र-छात्राओं के एकान्त-मिलन का स्थल था। सुन्दर, मनोरम रासता। हरियाली और प्रेम का साझेदार।

क्यों रोका है विवेक ने मुझे? निहारिका ने उस रास्ते की ओर देखते हुए सोचा।

‘वो देखो! वो वहाँ... उस पेड़ के नीचे अगर तुम खड़ी हो जाओ तो बिलकुल शालभंजिका जैसी दिखोगी।’

‘वो पेड़ शालवृक्ष नहीं है... माई डियर रंगरेज!’ निहारिका ने भी चुहल किया।

‘अच्छा ये बताओ कि शालभंजिका यक्षिणी थी या कोई बौद्धयुगीन रानी?’

‘बौद्धयुगीन रानी? ओह नो! शालभंजिका तो शालभंजिका थी, बस्स!’

‘फुलिश आन्सर!’

‘सो, यू केन एक्सप्लेन इट!

‘मुझे लगता है कि सिद्धार्थ के जन्म के समय उनकी माँ को जिस प्रकार वृक्ष के नीचे खड़ी हुई बनाया गया है, उसी से प्रेरित हो कर शालभंजिका बनाई गई।’

‘मे बी! बट आई एम नॉट श्योर! मुझे लगता है कि दोनों में ऐसा कोई साम्य नहीं है। यूँ भी शाल भंजिका का अर्थ है शाल वृक्ष की शाखा को तोड़नेवाली... न कि उसके नीचे खड़ी होने वाली। सिद्धार्थ की माँ मायादेवी शाल वृक्ष के नीचे विज्ञाम करने के लिए खड़ी हुई थीं... कुछ लोग उसे अशोक का वृ़क्ष भी मानते हैं।’ निहारिका ने उत्तर दिया और सोचने लगी कि क्या यही बातें करने के लिए विवेक ने उसे रोका है? ये बातें तो पूरी क्लास के सामने भी की जा सकती हैं। फिर आज, इस समय ही क्यों?

‘खजुराहो गई हो?’ विवेक ने पूछा।

‘हाँ, कई बार! वहाँ ऐसी कोई मूर्ति है?’

‘नहीं, लेकिन वहाँ एक से बढ़ कर एक मूर्तियाँ हैं।’

‘तुम क्या सोचती हो कि खजुराहो में काम संबंधी मूर्तियाँ क्यों बनाई गई?’

‘गहन जीवन दर्शन है उसमें... पहले तमाम सांसारिकता से निर्लिप्त या संतृप्त हो जाओ फिर मोक्ष को प्राप्त करो। इसीलिए मंदिरों की बाहरी दीवारों पर मिथुन मूर्तियाँ हैं किन्तु गर्भगृह में देवता स्थापित हैं।... तुम गए हो खजुराहो?’ निहारिका ने पूछा।

‘नहीं! अभी नहीं, किन्तु यहाँ से जाने से पहले एक बार जाऊंगा जरूर!’

विवेक के सागर से जाने की बात सुन कर निहारिका उदास हो गई थी। शायद विवेक ताड़ गया।

‘तुम भी मेरे साथ चलना!’ अचानक विवेक ने निहारिका का दायाँ हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा।

‘कहाँ?’

‘जहाँ भी मैं जाऊँ!’

‘तुम कहाँ जाओगे?’

‘शायद पहले दिल्ली जाऊंगा या फिर सीधे लंदन... देखो, क्या होता है... अभी तो एम.एम. पूरा करना है, फिर पीएच.डी. फिर कहीं जा कर असली रास्ता शुरू होगा।’

‘हाँ, अभी बहुत समय है।’

‘देखना मैं जल्दी से जल्दी अपनी पीएच. डी. पूरी कर लूंगा।’ विवेक ने कहा था। वह उतावला था दुनिया के सामने खुद को साबित करने के लिए।

‘कम से कम अठारह माह तो लगेंगे ही।’

‘मैं इससे भी कम समय में कर लूंगा और स्पेशल परमीशन ले कर अपना शोध समय से पहले ही जमा कर दूंगा।’ विवेक ने गंभर स्वर में कहा था।

ज़िन्दगी में अभी से सब कुछ इतना ठोंक-बजा कर क्यों? कुछ अपने-आप भी होने दिया जाना चाहिए। निहारिका को ऊब महसूस होने लगी थी।

‘चलो, उठो! अब चला जाए!’ निहारिका ने कहा और अपना हाथ छुड़ा कर उठ खड़ी हुई थी।

निहारिका के भीतर जाग उठी प्रेयसी विवेक की सांसारिक बातें सुन-सुन कर व्याकुल हो उठी थी। प्रेम की आंच संवेगों को ठीक उसी प्रकार तपाने लगती है जैसे आग पर पानी से भरा पतीला चढ़ा दिए जाने पर आग की आंच पहले पानी की निचली सतह को गरम करती है और फिर गरम जल-कण ऊपर उठते हुए शेष जलकणों को भी तपा देते हैं, ब्वायलिंग प्वाइंट तक। यदि आँच वैसी ही बनी रहे तो पानी खौलने लगता है और भाप बन कर पतीले को छोड़ कर ऊपर उठ जाता है ताकि किसी बिन्दु पर जा कर बादल में बदल जाए और फिर जल-कण बन कर बरस जाए। भले ही पतीले का पानी बादल नहीं बन पाता है किन्तु वह प्रयास तो करता है बादल बनने का। वह आंच की प्रतिष्ठा को कम नहीं करना चाहता है। वह जता देना चाहता है कि आँच सब कुछ कर सकती है। तनिक भी आंच नहीं थी विवेक की बातों में, निहारिका को लगा।

‘मेरे कमरे में चल कर एक कप चाय पियोगी? मेरे हाथों की बनी चाय... !’ विवेक ने स्वयं भी खड़े होते हुए पूछा।

‘मैं सोचती हूँ कि अब घर जाऊँ!’ निहारिका ने उकताए हुए स्वर में कहा।

‘चली जाना। जहाँ इतनी देर, वहाँ कुछ देर और सही!’

‘ठीक है!’ निहारिका मना नहीं कर सकी और बेमन से विवेक के साथ चल पड़ी।

दोनों ही पैदल थे। रास्ते में दायीं ओर बोगनबिलिया के सुन्दर फूलों वाले मध्यम ऊंचाई के पेड़ बहुत सुन्दर लग रहे थे। कोई और दिन होता तो निहारिका उन फूलों की प्रशंसा करती नहीं थकती लेकिन उस समय उसका मन उचाट था।

विवेक के कमरे में पहुँच कर निहारिका इकलौती कुर्सी पर बैठ गई। विवेक ने हीटर जलाया और उस पर चाय का पानी चढ़ा दिया।

‘मैं बना दूँ?’ निहारिका ने पूछा।

‘अरे नहीं, मैं बना रहा हूँ न!’ विवेक निहारिका के सामने आ खड़ा हुआ और बोल उठा,‘या तो तुम मुझे अपने रंग में रंग लो या तुम मेरे रंग में रंग जाओ, निहू!’

विवेक के बदले हुए स्वर में ‘निहू’ संबोधन सुन कर निहारिका चौंकी। इस नाम से तो उसकी माँ ही उसे पुकारती है, और दूसरा कोई नहीं।

‘तुम भले ही रंगरेज बन जाओ लेकिन मैं रंगरेजन नहीं हूँ, विवेक!’ निहारिका ने अपने कंधे पर से विवेक का हाथ हटाते हुए कहा और वह खड़ी हो गई।

‘अरे बैठो!, मैं तो मज़ाक कर रहा था।’ विवेक ने खुद को और अपनी बात को सम्हाला।

निहारिका बैठ गई। वह स्थिति को और भद्दा नहीं बनाना चाहती थी। उसने मूर्तियों में हमेशा एस्थेटिक्स अर्थात् सौंदर्यतत्वों को ही देखा है लेकिन उसे लगा कि उसके स्वयं के जीवन के इस पहले अनुभव में रत्ती भर सौंदर्य तत्व नहीं था। किसी खण्डित मूर्ति में बचे हुए सौंदर्य जितना भी नहीं।

उसके दिन के बाद दोनों के बीच हँसी-मज़ाक और भविष्य की योजनाओं की बातें तो बहुत हुईं लेकिन प्रेम की भावना पर विराम लगा रहा। दोनों ने एम.ए. पूरा किया, फिर पीएच. डी. का काम शुरू किया। लगभग यही वह बिन्दु था जहाँ से दोनों के रास्ते अलग-अलग होने लगे। यद्यपि उन्हें इसका पता भी नहीं चला।

‘उस दिन हम दोनों एक दूसरे के रंग में रंग गए होते तो मेरा यहाँ से जाना आसान हो जाता!’ सागर से जाने से पहले विवेक ने निहारिका से पूछा था।

‘नहीं विवेक, तब और कठिन हो जाता! क्यों कि तब हमारी देह तो रंग जाती लेकिन मन अछूता रह जाता।’ निहारिका ने उत्तर दिया था। उसके मन में यह पंक्ति कौंध गई थी-‘मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा।’

‘तुम ठीक कहती हो!... वैसे मैं एक दिन आऊंगा, तुम्हें अपने रंग में रंगने के लिए... जल्दी ही!’ विवेक ने कहा था।

विवेक नहीं आया।

वह आता भी कैसे? उसकी मंज़िल का रास्ता सागर से हो कर नहीं गुज़रता था। उसे इतिहास की नई व्याख्या जो करनी थी। विवेक अपने रास्ते पर चलता हुआ बहुत दूर निकल गया। इतना दूर की संपर्क की सीमा से भी ओझल ही हो गया।

निहारिका के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए। भाई-भाभी अलग दूसरे शहर रहने चले गए। माँ बीमार पड़ गईं। लम्बी बीमारी के बाद जब वे स्वस्थ हुईं तब तक निहारिका का मन बदल गया और उसने प्राध्यापक बनने के बदले स्वतंत्रा लेखिका बनने का निर्णय लिया। समाजसेवा से भी जुड़ गई।

वर्षों बाद इस ‘एलुमनी मीट’ के आमंत्राण ने निहारिका के मन को रोमांच और कौतूहल से भर दिया।

‘जाना ही होगा इस मीट में!’ निहारिका ने तय किया।

एलुमनी मीट का दिन आ ही गया। निहारिका नियत समय पर कार्यक्रम स्थल पर पहुंची। उसे देख कर प्रसन्नता हुई कि वहाँ नेहा, लक्ष्मी, सुहैल और व्योम उपस्थित थे। सुहैल पहले की अपेक्षा मोटा हो गया था। लक्ष्मी अपनी बेटी को साथ लाई थी। लक्ष्मी पर प्रौढ़ावस्था स्पष्ट रूप से झलक रही थी। जबकि नेहा और व्योम लगभग पहले जैसे ही दिख रहे थे, प्रथमदृष्टि में ही पहचान में आने योग्य। नेहा के साथ उसका पति आया था। नेहा ने बताया कि उसका पति सिंचाई विभाग में मुख्य अभियंता है और वह स्वयं इन्दौर के एक कन्या महाविद्यालय में प्राध्यापिका है।

‘तुम्हें अख़बार, पत्रिकाओं में पढ़ती रहती हूँ!’ नेहा ने चहक कर कहा। निहारिका मुस्कुरा दी। उसका मन किया कि नेहा से कहे, मेरे लिखे हुए में ‘मैं’ नहीं मेरे आस-पास की दुनिया होती है... मुझे तो कभी पढ़ा ही नहीं गया।

व्योम बिहार के दरभंगा का रहने वाला था। वह एम.ए. कर ने के बाद ही वापस चला गया था। वहाँ उसने खादी ग्रामोद्योग में नौकरी कर ली थी। अच्छे पद पर था। इतिहास विषय प्रतियोगी परीक्षाओं के विषय के रूप में ही उसके काम आया। और भी विद्यार्थी आए थे किन्तु निहारिका के ग्रुप में नेहा, रुमी, लक्ष्मी, हरदीप, सुहैल, व्योम और विवेक ही थे। हरदीप और रुमी के बारे में किसी को जानकारी नहीं थी कि वे इन दिनों कहाँ रह रह हैं। विवेक के बारे में भी नेहा, लक्ष्मी, सुहैल और व्योम - ये चारां नहीं जानते थे।

परस्पर मिल कर सभी को बहुत प्रसन्नता हुई। अनेक यादें ताज़ा हो गईं। सभी ने बारी-बारी माईक पर आ कर अपने अनुभव, अपने संस्मरण साझा किए।

इसके बाद विभाग के वर्तमान विभागाध्यक्ष ने घोषणा की कि ‘विभाग के ज़रूरतमंद छात्रों की सहायता के लिए हमारे पुराने छात्र जो कि न्यूयार्क से आए हैं, डॉ. वी. के. सिंह ने एक लाख की अनुदान राशि विभाग को दी है।’

कौन डॉ. वी. के. सिंह? किसी का भी ध्यान नहीं गया। औपचारिकता में तालियाँ बजा दी गईं। उसी समय निहारिका के मोबाईल पर मैसेज़ टोन बजी। कहीं माँ ने तो कोई मैसेज नहीं किया? निहारिका ने सोचा और मैसेज बॉक्स खोल कर देखा। संदेश पढ़ कर उसके हाथ से मोबाईल छूटते-छूटते बचा।

‘अरी ओ, रंगरेजन! डू यू रिमेम्बर योर रंगरेज? आन्सर इमीडिएटली... ’ संदेश में लिखा था। इसका मतलब कि विवेक वहीं कहीं आस-पास था।

‘विवेक’ कहीं ‘वी. के. सिंह’ तो नहीं? हाँ, विवेक कुमार सिंह... ठीक तो है... निहारिका की आंखें उसे ढूंढने लगीं।

उसी समय माईक पर विभागाध्यक्ष ने कहा,‘अब मैं डॉ. वी.के. सिंह से आग्रह करूंगा कि वे भी अपने संस्मरण, अपनी बातें हमसे शेयर करें... प्लीज़ कम..डॉ. वी.के. सिंह... ।’ तालियों की गड़गड़ाहट से मिलनस्थल गूंज गया।

ओह, ये तो विवेक ही है! चश्मा लगने लगा है... चाल-ढाल में कुछ योरोपियन और कुछ अमरीकन लहज़ा आ गया है। पहले से अधिक स्मार्ट दिख रहा था वह।

‘हैलो गाईज़! माई ओल्ड स्कूल टीचर्स एण्ड ओल्ड स्कूल फ्रेंण्ड्स ! आई एम आलसो एन ओल्डी ब्वाय... ’ विवेक की बात सुन कर सभी हँस पड़े। इसके बाद उसने निहारिका सहित सभी को चौंका दिया, ‘एण्ड... मेरी रंगरेजन निहारिका!’

एक बार फिर हँसी का फव्वारा फूट पड़ा। जो छात्र निहारिका को ‘रंगरेजन’ के स्पेशल नाम से नहीं जानते थे वे इधर-उधर दृष्टि घुमा कर निहारिका को ढूंढने लगे। लक्ष्मी ने निहारिका को चिकोटी काटी। शायद वह सोचती रही होगी कि विवेक और निहारिका के बीच ‘कुछ ऐसा-वैसा है’।

निहारिका मुस्कुरा दी। उसे यह सोच कर अच्छा लगा कि विवेक उसे भूला नहीं है। फिर वह यह जानने को उतावली हो उठी कि विवेक अब उसके बारे में क्या राय रखता है? इसी उधेड़बुन में विवेक का उद्बोधन उसे सुनाई ही नहीं पड़ा।

दोपहर के भोज के समय विवेक उसके सामने आ खड़ा हुआ।

‘तुमने मेरे एस.एम.एस. का जवाब नहीं दिया!’ विवेक ने कहा।

‘जब तक जवाब देती, तुम तो डायस पर आ चुके थे।’ निहारिका बोली।

‘चलो, इस भीड़ से बाहर चलें!’

‘ठीक है!’ निहारिका को भी वहाँ मज़ा नहीं आ रहा था। ऐसा लग रहा था मानो सैकड़ों गौरैयें एक कमरे में छोड़ दी गई हों... हर तरफ बातों का शोर।

‘वैल, वेट ए मिनट! मैं तुम्हें अपनी लाईफ पार्टनर से मिला दूँ... यह पहली बार इंडिया आई है।... मीट माई ओल्ड फ्रेण्ड निहारिका... एण्ड, ये है शर्लीन... मेरी जीवनसंगिनी!’ विवेक ने परिचय कराया।

शर्लीन बहुत सुरुचिपूर्ण और सुन्दर लगी। उसकी पंजाबी मिश्रित अमेरिकन हिन्दी से ही समझ में आ गया कि वह अमेरिका में बसे पंजाबी परिवार की है।

विवेक ने बताया वह न्यूयार्क के एक निजी संग्रहालय में क्यूरेटर है और शर्लीन भी वहीं असिस्टेंट क्यूरेटर कम रिसर्चर है। इपीग्राफिस्ट बनने के जिस जुनून में विवेक ने अपना घर, अपना देश छोड़ा था, वह जोश धन के प्रभुत्व तले कहीं दब कर रह गया।

‘तुम कैसी हो? क्या इसी यूनीवर्सिटी में हो?’ विवेक न पूछा।

‘नहीं! मैंने नौकरी नहीं की... बस, किताबें लिखती हूँ!’ निहारिका ने बताया।

‘स्ट्रेंज़! इंडिया में क़िताबें लिख कर पेट भरा जा सकता है?’ विवेक ने चकित हो कर पूछा।

‘मुझे पूरे भारत का पता नहीं लेकिन मेरा काम चल जाता है... मैं रंगरेजन जो हूँ... खुद को ही अपने रंग में रंग लिया है।’ निहारिका ने मुस्कुरा कर कहा।

‘ओह!’ विवेक के मुँह से निकला। ऐसा लगा जैसे सहानुभूति में डूबा हुआ ‘ओह’ हो। निहारिका के मन में कुछ चटक-सा गया। वह विवेक के बदले शर्लीन से बातें करने लगी। अपने प्रति विवेक की राय का उसे पता चल चुका था।

एलुमनी मीट समाप्त होने के बाद निहारिका घर लौटी। पता नहीं क्यों उसे पत्र-पेटी की ओर देखने की भी इच्छा नहीं हुई।

ऐसा क्यों? उसने अपने आप से पूछा।

उसे किसके पत्र की प्रतीक्षा रहती थी जो आज नहीं है? इस प्रश्न का उत्तर भी उसके मन ने ही दे दिया... विवेक तो रंगरेज भी नहीं निकला जो किसी और के मन को अपने रंग में रंग पाता... ‘मन न रंगाए, रंगाए जोगी कपड़ा’... और स्वयं निहारिका?... .उसका अवचेतन तो विवेक की स्मृतियों में ही रंगा रहा... निहारिका को याद आ गया विवेक का एस. एम. एस. ‘अरी ओ रंगरेजन!’... और वह मुस्कुरा दी।

2 comments :

  1. बधाई मेडम । आपकी कहानी अच्छी लगी । एक अच्छी कथा लेखिका होने के साथ साथ सामयिक सरस्वती का आप बेहतर संपादन भी कर रही हैं ।

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  2. बधाई मेडम । आपकी कहानी अच्छी लगी । एक अच्छी कथा लेखिका होने के साथ साथ सामयिक सरस्वती का आप बेहतर संपादन भी कर रही हैं ।

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