कविता: औरंगजेब बन गया हूँ

- विनोद बब्बर 



हाँ हम हैं भाई - भाई
आपस में करते हैं लड़ाई
पर हम दारा शिकोह औरंगजेब
सा युद्ध नहीं करते
मुराद और शुजा से
शतरंज के मोहरे भी नहीं बनते
शायद इसलिए क्योंकि हमारे पिता ने
रिसायत नहीं, छोटा सा घर बनाया
उसी घर में हमने खूब प्यार पाया।

एक दिन हमारी लड़ाई ने घर बाँट दिये
और बांट लिये माता-पिता भी
माँ मेरे साथ- पिता उसके साथ
नहीं, नहीं,
न कोई मेरे साथ, न भाई के साथ
दोनो छत्त पर बरसाती में
सर्दी और धूप चिलचिलाती में
एक इस पार अकेला
दूसरा उस पार अकेला
और दोनो के बीच
हमारे भाईचारे की दीवार
पास होते हुए भी दोनो बहुत दूर हैं
अपने ही बेटों के बीच वे दोनो मजबूर हैं

हमारे दिन अच्छे से कट रहे थे
हम खूब चटक-मटक रहे थे
आज अचानक बेटे ने पूछा-
पापा! औरंगजेब ने शांहजहाँ को
किले में बदहाल क्यों रखा था?
मैं  देने ही वाला था जवाब
कि मेरी नजर
अपनी ही छत्त की तरफ उठ गई
लगा जैसे यह धरती फट गई,
मेरी नैतिकता का जामा चिर गया
मैं अपनी नजरो में ही गिर गया

औरंगजेब को गलत बताते बताते
उस इतिहास को दोहराते-दोहराते
मैं झूठ के पुतले की तरह तन गया हूँ
आप यकीन करें, न करें
मैं खुद औरंगजेब बन गया हूँ!

(प्रथम जनवरी, 2019 को रचित)

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