कहानी: भेद-भाव की राजनीति


-देवी नागरानी

उस एक छोटे से पर्चे ने मुझे मेरी औक़ात की याद दिलाई और उस महान व्यक्ति की, जिसने समाज में अपनी जात के लिए, अपने देशवासियों को मूल सिद्धांतों की नीव पर उनके जीवन सुधार के लिए एक नया प्रतिष्ठान स्थापित किया। डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर आज भी मेरे ध्येय है और रहेंगे, जिनके पदचिन्हों पर चलकर मैं भी अपनी जात के लिए, अपने पिता की इच्छापूर्ति के लिए जितने क़दम आगे बढ़ाता हूँ, उससे कहीं ज़्यादा क़दम पीछे की ओर धकेला जाता हूँ। एक वो थे, एक मैं हूँ!
याद है वह दिन जब मैं मैट्रिक पास करके कॉलेज की दाखिला के लिए ऑफिस के बाहर लम्बी कतार में जाकर खड़ा हुआ। कहने कहलावाने के बहुत सारे यत्न किए। मेरे दादा, पिता और स्कूल के प्रधानाचार्य सुखीराम माधवन ने भी यही कहकर ज़मानत दी कि मैं एक ज़हीन, मेधावी शागिर्द हूँ, बिना ट्यूशन के खुद पढ़ाई करके 95% अंक ले पाया हूँ। पर कुछ भी नहीं हुआ, किसी की एक न सुनी। कॉलेज का ट्रस्टी जाना-पहचाना विशिष्ट आदमी था, पर ऐन वक़्त पर उसने भी अपना रुख बदलने में देर न की। यह सब मेरे साथ हुआ, क्यों हुआ कुछ समझ में आकर भी नहीं आया। आता भी कैसे?
और उस प्रयास का प्रतिफल मुझे कालेज में दाखिला न देकर, वहाँ के प्रतिनिधियों ने यह जतलाया कि मैं कमतर जात का पददलित हूँ। यहाँ दाखिला होनी संभव नहीं। दूसरा कारण दाखिला न मिलने का यक़ीनन यह भी रहा होगा, कि मैंने डोनेशन के नाम पर काला धन नहीं दिया। अपनी जात की कमतरी का लेबल अपने माथे से नहीं हटा सका। हाथ में थमा कागज़ यही जतला रहा था-दाखिला न मिलने की नकारात्मक उपाधी थी उसमें।
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परिवार के बीच में रहते, न कोई चालबाजी, न कोई शातिरपना देखा, न सीखा। न ही कभी बाहर और भीतर की दुनिया में कोई भेद-भाव जाना। अपने काम से काम रखने वाले परिवार भी कहाँ किसी चाहत को अंजाम देने की कोशिश करते हैं। सिर्फ़ उस एक चाहत के लिए, जो मेरे बाबा ने अपने सीने में पाल रखी थी कि मैं पढ़ लिख कर उनका, उनकी बिरादरी का, उनकी जात का किसी तरह उद्धार करने का प्रयास करूँ।
मैं जिस परिवार में पलकर बड़ा हुआ, वहाँ मेरे जागने से पहले मैंने माँ-बाबा को झाडू और टोकरी लेकर घर के बाहर जाते हुए, और भरी दुपहरी घर लौट कर अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए जुटते हुए देखा। कुछ और बड़ा हुआ तो शिक्षा के मैदान में खड़ा कर दिया गया, जहाँ भी दिक्कतें मेरी आसानियों को दुश्वार करती रहीं। और अब सिलसिलेवार यादों के पश्चात महसूस कर रहा हूँ कि अब वक़्त आया है कि मैं किसी न किसी तरह परिवार में सहकार देकर, पिता के उन बूढ़े कंधों का बोझ कम करूँ। याद आया बाबा का कहना-
‘ तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो, यह उम्र है पढ़ाई करने की, पढ़कर किसी ओहदे के क़ाबिल बनने की। जब क़ाबिल बन जाओगे तब मेरा हाथ बँटा पाओगे और आगे चलकर अपने परिवार का भी भार संभालकर हमारा और जाति का सहारा बन पाओगे।’
‘बाबा, पर मैं आपको इस तरह दिन रात मेहनत की चक्की में पिसते हुए नहीं देख सकता। आपकी सेहत भी दिनोदिन आपका साथ छोड़ती जा रही है। अब मैं मेट्रिक पास हूँ, कोई छोटी-मोटी नौकरी करके आपकी मदद कर सकता हूँ। इस समय मेरा कॉलेज पढ़ना इतना जरूरी नहीं, जितना आप को काम में हाथ बँटाना। बाबा आपने पिता व सारथी बनकर मुझे इस क़ाबिल बनाया है कि मैं शिक्षा की रोशनी में अपना भविष्य साफ़ देख पा रहा हूँ। मैं आपकी चाहत को अंजाम दूंगा, यह मेरा वादा है आपसे।’
‘आदित्य बेटे मैं चाहता हूँ कि तुम कॉलेज पढ़ कर कोई अच्छी नौकरी हासिल करो। तब कहीं जाकर हम भंगियों की जात वालों का सर उठाने लायक होगा। अपनी क़ाबिलियत से अनपढ़ बच्चों को इस गंदगी की दलदल से निकाल कर ज्ञान की रोशिनी में एक साफ़ सुथरी ज़िंदगी की राह पर ले जाओ। यही मेरी दिली तमन्ना है, यही ख्वाइश। इसी कारण मैंने बचपन में कभी तुझे यह झाड़ू लेकर, घर घर का कचरा उठाने के लिए अपने साथ नहीं लिया, और न ही तुझे मुन्सिपालिटी के स्कूल में दाखिला दिलाया।’
‘पर बाबा अब तो मैं हाई स्कूल पास हूँ, आपकी बताई राह पर चलने का हर प्रयास कर रहा हूँ। आपकी सहायता करना मेरी ख्वाइश है। और तो और मैं आपके सर पर लगी तोहमत के दाग़ को भी धोना चाहता हूँ। मैं अकेला ही इस हकीक़त का चश्मदीद गवाह हूँ... भले ही दुनिया माने या न माने…!’
‘बस बेटा बस, एक लफ्ज़ ज़्यादा न कहना… मैं सुन नहीं पाऊंगा।’
‘… पर बाबा जो गुनाह आपने किया ही नहीं है उसका बोझ अपने दिल दिमाग पर क्यों ढो रहे हैं। अब मैं बड़ा हो गया हूँ, सब कुछ साफ-साफ देख सकता हूँ, सच झूठ को परख सकता हूँ। आप उस अनचाही सोच को ज़हन से क्यों निकाल कर फेंक नहीं देते?’
‘बेटा ये गुलामी की जंजीरें जो कराए वह कम है। मेरी जात मेरे काम से पहचानी जाती है, मेरे ज़मीर की रोशनी से नहीं। यहाँ का तहसीलदार सफेद कपड़े पहन कर अपने शाही घर में बैठे बैठे हमारी गुरबत का नंगा नाच देखता है। उसकी गंदी नज़र गंदगी उठाने वाली बाल्टियों पर नहीं, उठाने वाली हमारी बहू-बेटियों पर रहती है, उनके गंदे कपड़ों की तहों में छुपे उनके शरीर पर होती है। यह सब हकीक़तें हमें उन औरतों के अश्कों की जुबानी मालूम होती हैं। सफ़ेद कपड़ों के पीछे उनकी काली नियत, काले कारनामे के चिट्ठे को नहीं छुपा पाती। उसने तुम्हारी मां की बेइज्ज़ती करके उसके नारीत्व को ललकारा। वह यह बर्दाश्त न कर पाई। एक दिन मौका देख कर उसने तहसीलदार को औताक में बंद करके, मिट्टी का तेल छिड़ककर उसे जिंदा जला दिया और फिर खुद को भी उस आग के शोलों में अर्पण कर दिया। हमारे समाज की औरतें कब तक यह अग्नि-परीक्षा देती रहेंगी?’
‘पुरानी बात को दोहरा कर इस तरह खुद को दुखी न कीजिए बाबा। अम्मा ने खुद को मुक्त कर दिया, पाप की भावना ने शायद उसके शरीर को पाप का भागीदार बना कर छोड़ा और उसने पापी को सज़ा देकर, खुद को भी उस आग में भस्म करते हुए अग्नि परीक्षा दी। पर अब ऐसा नहीं होगा....बाबा , नहीं होगा।’
‘मेरी एक बात हमेशा याद रखना बेटे, ज़ालिम का ज़ुल्म न कभी भूलना, न माफ़ करना। यह सरासर बुज़दिली होगी।’ कहते हुए आदित्य के पिता ने धोती के छोर से अपनी पीढ़ा को झटक कर लम्बी साँस ली।
‘यह सब तो ठीक हैं बाबा, पर मुझे इसमें अम्मा की कोई बुज़दिली दिखाई नहीं देती। वह तो अपने सतीत्व व् आत्मसम्मान का कुल हिसाब कुछ यूँ पूरा कर गई, जो बहुत ही दिलेरी का कार्य है, जिस पर गर्व किया जा सकता है।’ अब आदित्य की आवाज़ में आक्रोश शामिल रहा।
‘पर सभी गुनहगार को सज़ा देकर, अपने स्वाभिमान को भी स्वाहा करें, यह भी तो ठीक नहीं है न बेटा। हमारे इस गंदे क्षुद्र समाज में कितने बेगुनाह सज़ा भोगते हैं और कितने गुनहगार आज़ाद घूमते हैं, इसका कोई हिसाब नहीं। उनकी पहचान नामुमकिन है क्योंकि उनके तन पर मुजरिमों की या कैदियों की वर्दी नहीं होती। वे आज़ाद रहकर गुनाह कर रहे हैं, कौन उनको जंजीरों में बाँध रहा है?’
‘बाबा छोड़ो इन बातों को, गुनाह और बेगुनाही की दलदल में क्यों अपने आपको मैला कर रहे हैं? आपका इशारा मैं समझ रहा हूँ। आप चिंता न करें बाबा, मैं अपनी रहनी को अपनी करनी में शामिल करके अंधेरे से उजाले को चीर कर लाऊंगा।’
‘बेटा तेरी सदभावना मेरे लिए खुदा की ओर से आई हुई नियामत है। फिर भी सोच-समझकर किसी मुमताज़ जाने पहचाने शख्स या किसी बहुत ही बड़े इज्ज़त दार आदमी की मदद से गाँव में ही किसी कॉलेज में दाखिला लेकर आगे पढ़ने जाओ। मेरी ज़्यादा चिंता न करो।’
पिता के मनोभावों का आदर करते हुए आदित्य सोचने लगा, ठीक वैसे ही जैसे शायद बाबा का ज़हन सोच रहा था। अगर भंगियों की औलाद भंगी बनकर गाँव में सेठ, साहूकारों की गंदगी साफ़ करती रहेगी तो अपनी पहचान कैसे पा सकेगी? अपनी जात के कंधों से यह सलीब उतारने के लिए किसी को तो मसीहा बनना पड़ेगा, पीड़ियों से चल रहे इस पेशे को इल्म की रोशनी से उजगार करना होगा। हज़ारों बच्चों के माता-पिता यह काम करते करते जवानी से बुढ़ापे की दहलीज़ तक आ पहुंचे हैं। बस बड़ों के नक़्शे क़दम पर चलते-चलते वे भी समाज की गंदगी को उठाते रहेंगे, और यही विरासत शायद आने वाली पीढ़ी के साथ आगे दूर तक जाएगी।’ सोचते सोचते आदित्य का मन फिर नए जोश से भर गया। पिता के पाँव छूकर अपना नसीब आज़माने पैदल ही एक दिशा में चल पड़ा।
पढ़ने में तेज़, लिखने में माहिर, सोचने की तीक्ष्णता रखने वाला आदित्य अपने दिलो-दिमाग में एक सपना लिए हुए था। उसके ज़हन में अपने लिए, अपनी जाति के लिए, उनके उद्धार के लिए एक ऐसा सपना था जिसके पूरा होने से आने वाली पीढ़ी को फिर से नया जीवन जीने का अधिकार मिलता.
 अपनी काबिलियत से उसने स्कूल के प्रधानाचार्य सुखीराम माधवन का मन मोह लिया था। अपने ख़यालों की तर्जुमानी करते उसने अपने लिए कुछ न सही, पर अपनी जात के लिए कुछ करने की जिम्मेवारी को अपने कंधों पर उठाना चाहा। बस सोचते सोचते प्रधानाचार्य सुखीराम के घर की चौखट पार करते उसके पाँव आँगन में आकर रुके। उनके चरण स्पर्श के लिए झुकते ही उसने सुना...
‘अरे आदित्य यह क्या, तुम छुट्टियों में भी मेहनतकशी से बाज़ नहीं आते। कुछ आराम कर लेते, कुछ मन बहलाव् के लिए मौज मस्ती कर लेते। मैट्रिक का नतीजा तो निकला है, पर कॉलेज की दाखिला लेने में अभी 15 दिन बाकी है। आखिर तुम क्या करने की सोच रहे हो?’
‘सर मैं उसी काम से आपके सामने हाज़िर हुआ हूँ। आपको तो पता है, बाबा अपनी जात के सिरमोर हैं, भले समाज उन्हें गुनहगार समझे। लोग कहते हैं, बाबा ने ही यह सब कुछ करने के लिए अम्मा को भड़काया था!’
‘हूँ... हूँ...!’
‘अगर बाबा ने ऐसा चाहा भी हो, तो भी मेरी माँ ने भी तो अपनी जान गवाई।’
‘हाँ, यह तो है। जो हुआ वह नहीं होना चाहिए था। सच का सामना करना फिर भी मुश्किल है." कहते हुए सुखीराम जी ने एक लंबी सांस ली .
‘पर जो हुआ वह हुआ, अब आगे की परिस्थितियों को संभालना है। आप बीच की कोई राह...!’
‘...राह पेचीदा लगती है। सभी तहसीलदार, ठेकेदार एक मत विरुध खड़े हैं। उनका सोचना है कि बंधुओं की औरतें अगर इस तरह निर्णयात्मक बागडोर अपने हाथों में ले लेंगी तो इज्ज़त किसी की भी नहीं बचेगी।’
‘यह उनका विचार है, आप क्या सोचते हैं?’ अनगिनत सवाल आदित्य की आँखें लिए हुई थीं।
‘हाँ यह उनका विचार है। वे समाज के स्थापित स्तंभ है। कुछ भी कह सकते हैं, कुछ भी कर सकते हैं। ये स्कूल कॉलेज उन्हीं के दम से ही चल रहे हैं, इस सच्चाई को भी नकारा नहीं जा सकता।’
‘पर अपनी इज्जत के बचाव के लिए नारी जाति पर कलंक लगाना भी तो ठीक नहीं? गुनाह की गन्दगी में वे उतरें और सज़ा नारी जाति पाए, क्यों?’
‘समाज की रीति-रस्मों को बनाना-बिगाड़ना बड़े-बड़े सूबेदारों का काम है आदित्य, तुम्हारा-मेरा नहीं।’
‘पर सर, कोई तो उन्हें एहसास दिलाने वाला होगा कि नारी घर का मान, समाज की मर्यादा है, फिर चाहे वह किसी भी जाति की हो। क्या उनकी रक्षा करना हम मर्द जात का धर्म नहीं है?’
‘तुम धर्म-अधर्म की बात को छोड़ दो। यह बात उन्हें कौन समझाए?’ सुखीराम कहते कहते उसकी ओर निहारने लगे।
‘लगता है मुझे ही कुछ करना पड़ेगा सर। बस आप मुझ पर भरोसा रखिए और मेरी रहबरी करते जाइए।’ कहते हुए आदित्य ने प्रधानाचार्य सुखीराम के सामने अपनी तजवीज़ रखी, और उनको प्रणाम करते हुए बाहर निकल आया।
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चार साल गुजर गए। कॉलेज में दाखिला न मिलनी थी, न मिली। पर आदित्य ने हिम्मत नहीं हारी। दिन रात मेहनत करके अपने बस्ती के बच्चों को तालीम की रोशनी से मुखातिब किया। उन्हें पढ़ना लिखना सिखाने की कोशिश की। ज़ुल्म के सामने बगावत की आवाज ऊँची की, इस क़दर कि किसी भी घर या घर के बाहर का कचरा उठाना व् साफ करना बंद कर दिया। गाँव में हलचल मच गई, आग भड़की। इस हलचल में नारियों की सिरमोर रही ‘सुजाता’, प्रधानाचार्य सुखीराम माधवन की बेटी। वह आदित्य की हमउम्र थी, उसके साथ पढ़ते, उठते-बैठते, उसे पसंद भी करने लगी थी। यह बात सुखीराम जी से भी छुपी न थी। एक तरह से दो जवान दिलों के मिलन में उनकी हामी भी शामिल थी।

समाज सुधार की इस पहल में उनका भी सुजाता के माध्यम से यही योगदान रहा कि जाति भेद को रद्द किया जाय। समान अधिकार पाकर ही तो नौजवान पीढ़ी कुछ आगे बढ़ पायेगी। वर्ना शिक्षा का होना बेमतलब होता। समस्या हो और समाधान न हो, तो कोशिशें निराधार होने लगतीं हैं। इस नई समस्या का समाधान निकालने के लिए पंचायत मुकर्रर हुई। मंगलवार के दिन गाँव के बाहर मंदिर के सामने भीड़ जमा हुई। प्रधानाचार्य सुखीराम जी ने अपनी बेटी सुजाता का विवाह आदित्य के साथ संपन्न करने की ठानी ली। और तय किये गए दिन रीति रस्मों के साथ सम्पूर्ण किया। प्रधानाचार्य सुखीराम जी के निमंत्रण पर गाँव के कई जाने माने वरिष्ठ मान्यता प्राप्त लोग एकत्रित हुए। मगर भले घराने की बेटी का विवाह एक अछूत जात के लड़के से होता देखकर उलटे पाँव लौटने लगे। फिर भी समारोह में कोई भी विघ्न नहीं पड़ा, सभी बड़ी ही तन्मयता के साथ कार्य को संपन्न करने में लगे रहे।
पंचायत ने एकमत होकर फिर एक फैसला किया और प्रधानाचार्य को पैग़ाम भेजा कि अगले मंगलवार के दिन पंचायत में सुजाता को भी आदित्य के साथ गाँव से निकालने का हुकुम दिया जाएगा। मंगलवार के दिन पंचायत के पंच परमेश्वर, व् उनके मुरीद और तमाशा देखने वालों की भीड़ जमा थी। आदित्य भंगी परिवार का, सुजाता एक हिंदू परिवार की पढ़ी लिखी, सौम्य लड़की। ऐसी जात के लड़के से शादी कैसे कर सकती थी? उनकी शादी से समाज की अधोगति हो यह पंचों को स्वीकार न था। और यही निर्णय लेकर उस नव-दम्पति को गाँव से बाहर निकल जाने का आदेश दिया गया। इस आदेश के विरोध में सुजाता ने सभा के पंचों के सामने अपनी मर्जी का इज़हार करते हुए कहा – ‘मैं 18 साल की बालिग पढ़ी-लिखी लड़की हूँ, कानून के मुताबिक मैं अपना फैसला खुद करने के लिए मुख्त्यार हूँ। यह मेरी मर्ज़ी है कि मैं आदित्य के साथ शादी करूँ। वह भंगी जात का है पर भंगी नहीं है। एक पढ़ा-लिखा सुलझा हुआ इंसान है। जितनी सभ्यता और मर्यादा उसमें है, शायद ही किसी साहूकार के बच्चे में हो। मैंने अपनी इच्छा को उसके सामने रखकर उसे और अपने पिता को मनाया। अगर उन्हें कोई ऐतराज नहीं है तो किसी और को ऐतराज़ क्यों होना चाहिए? अब धर्म-रीति से, कानून से, हम दोनों पति-पत्नी हैं? किसी राजनीति का कोई भी शास्त्र इस गाँव में उपयोग न हो तो बेह्तार है। यह हम दोनों का फैसला है कि हम इस गाँव से कहीं बाहर नहीं जा रहे हैं, यहीं रहकर वही सब कुछ करेंगे जो अब तक करते आ रहे हैं। आपकी जात और हमारी जात में अब ज्यादा फर्क नहीं रह गया है, यह आप सभी जानते हैं। अपने अपने गरेबानों में झांक कर हर सवाल का जवाब खुद पाइए। यह जाति-भेद की राजनीति का खेल अब बंद कीजिए....!’
सरपंच निस्तब्ध! मुखिया मौन! फिर भी आदित्य की ओर देखते हुए एक सवाल उठाया गया-’ तुमने क्या समझ कर यह नाता कबूल किया? क्या तुम्हें अपनी जात याद न रही, या सभी सीमाओं को तोड़ने की ज़िद पकड़ ली थी?”
‘याद थी सरपंच साईं। यह भी याद है कि हमारी असली जात है इंसानियत, जो हर आदम की विरासत है। मैं पढ़-लिख कर अपनी जात को इस गंदगी से निजात दिलाने के लिए हमेशा से कुछ करना चाहता था। जब सुजाता ने मेरे सामने अपनी मर्जी रखी तो मुझे सोचने और गौर करने का मौक़ा मिला, और आदरणीय प्रधानाचार्य जी की अनुमति से यह निर्णय लिया। अब मर्यादा में रहकर सुजाता के साथ शास्त्र अनुसार शादी के बंधन में बंधा हूँ। मेरे मन में न कोई छल है, न कोई छलावा। है तो फ़क़त प्रधानाचार्य जी के परिवार के लिए आदर और सम्मान, जिन्होंने विशाल ह्रदय से मुझे स्वीकारा है। यह हमारी जाति के लिए गर्व की बात है। अब सुजाता मेरी धरम पत्नी, हमारे घर की गृहलक्ष्मी और मर्यादा है।’ ऐसा कहकर आदित्य ने अपनी जगह से उठकर सुखीराम जी से चरण छूकर आशीर्वाद लिया, फिर अपने पिता से आशीर्वाद मिलते ही उनके गले लग गया।
पंचायत के मुखिया यह आचरण देखकर पथरा से गए। अब सुजाता के पिता ने उठकर पंचों की ओर रुख करते हुए कहा- ‘मुझे इस रिश्ते के लिए मंजूरी देने में कोई ऐतराज़ न था। आदित्य, एक सुशील, संस्कारी और सुलझा हुआ सभ्य, पढ़ा-लिखा क़ाबिल इन्सान है। अब तो वह मेरा जमाई और हमारी बिरादरी का सदस्य बन गया है। वह भंगी नहीं है, मेरी बेटी का सम्माननीय पति है, हमारे परिवार का सदस्य!’
पंच आंखें फाड़-फाड़कर प्रधानाचार्य सुखीराम की ओर देख रहे थे। आदित्य ने अपने दोनों हाथ जोड़कर पंचों को नमन करते हुए कहा- ‘मैं आदरणीय सुखीराम जी का सदैव कृतज्ञ रहूंगा, जिन्होंने मेरा जीवन सुधारने की खातिर यह कदम उठाने में मेरा साथ दिया। जाति-भेदभाव को दूर करके मुझे अपने गले लगाया। अपनी बिरादरी में शामिल करके मेरा और मेरी जात वालों का मान बढ़ाया है। यह एक बेमिसाल क़दम है जो इतिहास में दर्ज होगा। आपके सामने भी मेरी हाथ जोड़कर यही प्रार्थना है कि आप भी इस पावन कार्य के यग्य में हमें अपने आशीर्वाद का अभिदान दें। एक और घोषणा आज सभी के सामने कर रहा हूँ –‘यह कि आज के बाद कोई भी भंगी या उसके परिवार वाले न आपके घरों के भीतर सफाई करेगा, और न बाहर ऑफिस में। सब अपना अपना काम खुद करेंगे, ताकि ऊँच-नीच जाति के फासले कम होकर मिटने लगें। हम सब एक से हैं और एक से अधिकार लेकर एक नव-निर्माणित युग का आरंभ करते हैं। आप ने मुझे अपनाया है इसके लिए आप सभी को फिर से प्रणाम करता हूँ।’
पंचों के पास कहने के लिए कुछ भी न था। अपने कपड़े झटककर खड़े हुए और अपनी अपनी औकात की पोटली अपने सर उठाकर चलते बने।
आदित्य ने अपने ससुर सुखीराम जी के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और सुजाता ने आदित्य के पिता के चरण स्पर्श करके ‘सौभाग्यवती हो’ का आशीर्वाद पाया।
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यह एक मिसाल थी जो समाज से बीच पनपते भेद भाव की दीवारों के बीच की दरारों को सिकुड़ने में मददगार रही। जात की पहचान के ‘ताज’ कितने सरों पर चढ़े और कितने ही सरो से उतरे। आखिर सभी आपस में दूध-शक्कर की तरह घुल मिल जाएंगे, इस बात की खुशबू हवाओं को मदहोश करती रही। नौजवान पीढ़ी के साथ एक नए युग का आरंभ हुआ जिसका जश्न मनाना लाज़मी रहा। तो चलिए शामिल होते हैं महफ़िल में, क्योंकि मौका भी है, माफ़ी भी है, तो आइये, आपका स्वागत है!

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