पुस्तक समीक्षा: रश्मि रविजा कृत बंद दरवाजों का शहर

बंद दरवाजों का शहर

कहानी संग्रह
लेखिका: रश्मि रविजा
प्रकाशक: अनुज्ञा बुक्स, दिल्ली
मूल्य: ₹ 200/-


समीक्षक: समीर लाल ’समीर’

रश्मि रविजा, हिन्दी लेखन में आज एक जाना पहचाना नाम हैं। ब्लॉग जगत, अखबार, रेडियो, पत्रिकाओं, पुस्तक मेला, लिटरेरी फेस्टिवल आदि हर तरफ उनकी कहानियाँ विस्तार पा रही हैं। मैंने उनके पहले उपन्यास ’काँच के शामियाने’ पर भी सेतु के इसी कॉलम में एक डेढ़ साल पहले बात की थी। मैने उस वक्त भी उनके जिन्दा लेखन का जिक्र किया था।

रश्मि रविजा से बहुत पुराना परिचय है। ब्लॉग के माध्यम से हुआ था। कमेंट आदि ही माध्यम रहे बातचीत के मगर उसकी कहानियाँ, संस्मरण, आलेख पढ़कर लगता कि कोई अपना अपने आस पास को लिख रहा है, वह भी इतना जिन्दा लेखन कि रेलयात्रा की बात करे तो स्टेशन पर बिकते पकौड़ों की महक नथुनों में समाने लगे और कभी एक दर्द को उजागर करे तो आँख स्वतः नम हो आये।

समीक्षक: समीर लाल
मुझे याद आता है कि जब मैं ’द काईट रनर’ पढ़ रहा था तब मैं  उसके लेखक ’खालिद हुसैनी’ की लेखन कला का मुरीद हो गया था। वे लिखते नहीं, शब्दों से जिन्दा चित्र बनाते नजर आते हैं। अगर वे गुलाब के बाग के बारे में लिख रहे हैं तो न जाने क्यूँ जेहन गुलाब की खुशबू से भर जाता है। द काईट रनर पढ़ने के बाद जब उस पर बनी मूवी देख रहा था तो सब कुछ ऐसा लगता कि देखा हुआ है। जबकि मूवी किताब के विवरण के आगे बहुत कमजोर थी। वाकई एक एकदम जिन्दा लेखन।

वही अहसास मुझे रश्मि के लेखन से गुजरते हुए होता है। हाथ में उसका नया कहानी संग्रह है ’बंद दरवाज़ों का शहर’ जो उसने बड़े प्यार से भेजा है अपने समीर दा के पास बस पढ़ने को और वही अहसास कि हर एक पात्र को जी रहा हूँ और ठीक वहीं खड़ा हूँ जहाँ से कहानी उग रही है। उसे तो शायद ज्ञात भी न हो कि मैं उस पर कुछ लिखने जा रहा हूँ।

किताब का शीर्षक 12 कहानियों वाले इस कहानी संग्रह की एक कहानी का शीर्षक भी है। यह कहानी महानगर के जीवन में ऊँची-ऊँची गगनचुंबी इमारतों की बात करती है जिसमें हर इमारत में मानो एक एक गाँव की आबादी भरी हो। मगर गाँव से ठीक उलट हर फ्लैट का बाशिंदा अपने अपने फ्लैट में कैद है और अपनी ही दुनिया में मशगूल। ऐसे ही किसी बंद दरवाजे वाले फ्लैट के भीतर दिन भर घुटन भरी जिन्दगी गुज़ारती एक गृहणी की कहानी और उस घुटन से बाहर निकलने के लिए उसने जो राह चुनी, उसकी कहानी। हर मोड़ पर कहानी अपने सच को बयाँ करती है। आपसे प्रश्न करती है और आप निरुत्तर से अगले प्रश्न की तरफ बढ़ जाते हैं। कहानी खत्म होती है। आप आसमान की तरफ नजर उठा कर जीने लगते हैं, इतने खुले आसमान के नीचे इतनी घुटन का अहसास और उससे निजात पाने के लिए उठाया कदम, सही है या गलत? उस पात्र को जीते हुए आप निश्चित ही कह उठेंगे कि और क्या रास्ता था उसके पास?

मैं यहाँ इस किताब की किसी भी कहानी का राज उजागर कर 12 कहानियों को 11 नहीं करना चाहूँगा। किन्तु यह भी तय है हर कहानी अपने आप में एक पूरा उपन्यास है, समाज के कितने ही पहलुओं को छूता हुआ। लघु और महा उपन्यास कौन जाने! उपन्यास हो सकता है किसी की नजर में पृष्ठ संख्या या शब्द संख्या के आधार पर बनता हो मगर मेरी नजर में यह कहानियाँ आसमान सा विस्तार लिये हैं और वही उन्हें उपन्यास बनाता है। कौन सा ऐसा पहलू है जिसे रश्मि की कलम नहीं छू रही है इस संग्रह में।

वे जिस पटल पर लिखना शुरू करती हैं, लगता है कि उसे पढ़ते हुए आपको अपने में समाहित कर लेता है। आप उसकी उपस्थिति को अनुभव करते हैं। पात्र और पात्रों के नाम भी एकदम अपने से, अपने एकदम आस पास के। खुशियाँ, दर्द, सोच सब कुछ अपने आस पास का। भाषा शैली ऐसी कि न कोई बनावट का जामा और न ही कोई अपने आपको शीर्षस्थ साबित करने के लिए भाषा की क्लिष्टता। एकदम बोलचाल की भाषा। सहजता की ऐसी इन्तहा कि यह डर भी नहीं कि साहित्य के ठेकेदार कहीं टोक न दें कि यह क्या, बार बार बोलचाल में अंग्रेजी के शब्द क्यूँ इस्तेमाल कर रही हो? मसलन पोते को क्रेच छोड़ना, उसे इग्नोर करना, बट रोहन लव्स यू, मैनर्स की बात, लाइफ सिक्यूरिटी जैसे ढेरों उदाहरण पूरी किताब में मिलेंगे मगर वही तो रश्मि की शैली को जुदा बनाते हैं औरों से, और उस प्रवाह को जिन्दा रखते हैं जो एक जिन्दा लेखन की रीढ़ है। उर्दू के शब्दों का इस्तेमाल भी अंग्रेजी की ही तरह इत्मीनान से किया है जैसे कि उनकी कहानियों के शीर्षक ही देखें: ’दुःख सबके मश्तरक, पर हौसले जुदा’ या ’खामोश इल्तिज़ा’। एक शेर इसी कहानी से:
दुःख सबके मश्तरक हैं, पर हौसले जुदा
कोई बिखर गया तो कोई मुस्करा दिया

रश्मि हर कहानी में अपने लेखन की तासीर से मुस्करा रही है और वही अहसास बच रहा है मेरे पास सार में।
12 कहानियाँ जो इस संग्रह में हैं उनके शीर्षक ही आपको किताब पढ़ने के लिए आकर्षित करने के लिए काफी हैं। देखें:
’अनकहा सच’, ’अनजानी राह’, ’कशमकश’, ’खामोश इल्तिज़ा’, ’दुःख सबके मश्तरक, पर हौसले जुदा’, ’दुष्चक्र’, ’पराग तुम भी...’, ’पहचान तो थी, पर पहचाना नहीं’, ’बंद दरवाज़ों का शहर’, ’बदलता वक़्त’, ’होंठों से आँखों तक का सफर’, ’चुभन, टूटते सपनों के किरचों की’।
लेखिका रश्मि रविजा

हर कहानी के पात्रों के नाम के चयन में भी न जाने कितनी एहतियात बरतती हैं कि लगता है अरे! वही है क्या यह, जिसे मैं जानता हूँ? शालिनी, सचिन, नमिता, तन्वी और इन्हीं जैसे कितने ही नामों के इर्द गिर्द बुनी हुई न जाने किस किस मुद्दों को उठाती यह कहानियाँ। कभी गाँव पहुँच जाती तो तो कभी शहर तो कभी महानगर तो कभी दो बहनें आ जाती है, तो कभी प्रेमी और कभी एकाकी मन की व्यथा कथा। सब कुछ एक साथ, एक किताब में।

मेरा दावा है कि यह किताब और इसकी कहानियाँ ऐसी हैं कि बस आप इसे उठायेंगे और एक ही सिटिंग में खत्म कर जायेंगे। मगर इस किताब से ऊगे प्रश्न और सोच को सुलझाने में आपको न जाने कितनी ऐसी ही सिटिंग लग जायेंगी। किन्तु फिर भी अनेकों अनसुलझे, अनुत्तरित प्रश्नों के दरमियाँ आप बार बार इस किताब तक लौटेंगे और फिर फिर गुजरेंगे उन कहानियों से एक नया प्रश्न जगा लेने के लिए। सुलझाना आपके बस में न होगा!

किताब की सुन्दर जिल्द देखकर कहने को मन करता है कि ऐसी किताबों की जिल्द नहीं हुआ करतीं, इनके आसमान होते हैं।

मुझे बहुत ज्यादा उम्मीद है कि रश्मि की कलम अब वो खुद चाह कर भी नहीं रोक सकती अर हम सब रूबरू होते रहेंगे लगातार कितने ही नये आसमानों से जो आयेंगे रश्मि की किताबों की शक्ल में लगातार।

मेरी बहुत शुभकामनायें हैं और स्वार्थ भी कि रश्मि लगातार ऐसे ही रचती रहें और हम हर बार ऐसे ही डूबते रहें।

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