पुस्तक समीक्षा: मनःस्थितियों का मुखर प्रस्फुटन है "सहेजे हुए अहसास"

सहेजे हुए अहसास (काव्य संकलन)
कवयित्री- प्रगति गुप्ता
प्रकाशन- अयन प्रकाशन, नई दिल्ली
मूल्य- ₹ 250/-
संस्करण- प्रथम, 2018
------------------------------------------------

समीक्षक: सुविधा पण्डित

 हिंदी साहित्य के भावी सशक्त स्वरूप के लिए सुदृढ़, विवेकपूर्ण आलोचना आवश्यक है।साहित्य के और विकसित व परिमार्जित रूप के लिए आलोचना को भी अधिक परिष्कृत होते जाना होगा। सृजन के सापेक्ष आलोचना के समक्ष भी चुनौती है कि वह रचनात्मकता व रचनाकार की संभावनाओं को समझ कर उसे उत्कृष्ट से उत्कृष्टतम के लिए प्रेरित कर सके। किसी कृति के साथ सुसंगत न्याय कर पाने के लिए ज़रूरी है न केवल साहित्य की वैचारिक समझ, बल्कि समाज की वैचारिकी को समझना भी ज़रूरी है, तभी साहित्य व समाज दोनों के लिए आलोचना की उपादेयता सिद्ध हो सकेगी।

 प्रगति गुप्ता का प्रस्तुत काव्य-संग्रह "सहेजे हुए अहसास " एक संवेदनशील मनुष्य की अलग अलग अवसरों पर बनी मानसिकताओं एवं मनःस्थितियों का मुखर प्रस्फुटन है। इसमें विभिन्न सामाजिक, पारिवारिक रिश्तों के प्रति संवेदना के स्वर हैं, वहीं जीवनगत अनुभवों को विचारों व भावों की यथेष्ट गहराई के साथ प्रस्तुत किया गया है।

 कविताओं में समकालीन कवयित्रियों की भांति प्रेम व रुदन के गीत ही नहीं, बल्कि स्त्री की आंतरिक चेतना से विद्रोह के स्वर भी बुलंद हुए हैं। पुरुष वर्ग से स्त्री के समान समर्पण की मांग की है तो समाजिक विसंगतियों पर भी लिखा है।.... "स्वयं को हृदय से समर्पित कर अब यह पहल तुम करो "

 वस्तुनिष्ठ यथार्थ व मनोवैज्ञानिक यथार्थ का समन्वय कई कविताओं को पुनः पढ़ने के लिए बाध्य करता है। "जाकर भी खुद को छोड़ जाना, इतना भी आसान कहाँ होता है"

 ये अतुकांत कविताएँ छंदानुशासन में भले ही न बंधी हों पर पाठक को बांध कर रखने की सामर्थ्य से युक्त हैं। "नहीं बनना चाहती उस रिक्त स्थान की भरन जो सिर्फ ज़रूरत पर ही पूर्णता दे, बनना चाहती हूँ वो पूर्ण विराम जहाँ बहुत कुछ पूर्ण होता लगे।"

 सबसे प्रभावी बन पड़ी और मेरी अत्यधिक प्रिय कविता "हादसे मुझे भी हिला देते हैं" में प्रगति जी ने अपनी अनुभूतियों को मौलिक गहराई और ऊंचाई के साथ अभिव्यक्त किया है कि मन पँक्तियों के साथ एकाकार हो जाता है।" कुछ दीवारें पूर्णतः ढह जाती हैं, कुछ को खड़े रह कर ही सब सम्भालना पड़ता है।" ऐसी प्रतीकात्मकता प्रभावित करती है।

 वर्तमान समाज की असंगत आधुनिकता और तथाकथित प्रगतिशीलता पर कवयित्री ने बखूबी बेबाक कलम चलाई है।" यह आधुनिकता कैसी" में लिव इन रिलेशन और स्वार्थपरक, मौकापरस्त छिछले रिश्तों पर विक्षोभ व्यक्त किया है।"आधुनिकता की बलिवेदी पर इन्होंने रिश्तों को नाम देने से पहले ही नकारा है।" ऐसी दर्दीली मानसिकता ही, "अवसाद तो कभी आत्महत्या बन सामाजिक विघटन को जन्म देती है।"
 रिश्तों में नाटकीयता को सदैव नकारा गया है, पर कवयित्री ने अभिनय की नवीन व्याख्या कर रिश्तों में अभिनय की आवश्यकता को सामने रखा है, "बखूभी निभाना एक सफल अभिनय पर ही टिका है।" कवयित्री की अंतर्दृष्टि "अब न बँधुंगी" में यथोचित स्वर पा गयी। कवयित्री ने स्वार्थविहीन रिश्तों को जिया है, "अपेक्षाओं और सीमाओं में बंध कोई सम्बन्ध ही नहीं।"

 पुरुषत्व का स्त्रीत्व के प्रति उपेक्षा भाव सृजन का आधार बनता है, "जितना उफनोगे, उतना ही नया, गहरा कुछ रच दूंगी।"

 "बयाँ" कविता उनके अभिव्यकि कौशल, भाषा क्षमता व शब्द सामंजस्य की अद्भुत मिसाल है, "कुछ अनाम रिश्तों की पीड़ा स्वयं की पीड़ा बन जाती है।" / "ज़ख्म जड़ों पर लगते हैं और टहनियाँ सूख जाती है।"
 भाभी, माँ, बहू, बेटी पर सार्थक, मौलिक सृजन किया गया है। बहू के लिए उत्कृष्टतम पँक्तियाँ उनके सम्वेदना स्तर की उच्चता व पवित्रता का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।"चलते फिरते सारे घर मे मुस्कराहटें बिखेरती हैं/खोजती है मुझमे अपनी माँ को कहीं।"

 समाज के सम्माननीय किंतु उपेक्षित वर्ग वृद्धों की वास्तविक दशा को उकेर कर करुणा भाव जगाया है, "उठा लेता है अनायास ही अपनी लाठी को अवलम्ब के लिए"।

 रिश्तों की टूटन का दर्द कलम से शब्द बन कर बह रहा है, "तेरे छूटने का ज़ख्म तो भर गया पर दर्द अभी बाकी है" सन्देह, शक, भ्रम रिश्तों को चटखा देते हैं इसे बेहतर ढंग से प्रदर्शित किया है। परम्परा निभाती, तीज त्योहारों की मान्यताओं को पूरा करती नारियाँ, "चारों ऋतुओं को समेट स्वयं में यह नारी मन/हर मिनट, हर पल देखो/कैसे बिखरा बिखरा जाए।"

 संग्रह की प्रत्येक कविता उनके जिये हुये, वास्तविक अहसास हैं जिन्हें हृदय सहेज कर रखा था, वे ही काव्य की सरिता के रूप में प्रवाहित हुए हैं।

 सभी कविताओं का अंत एक ही प्रकार की शैली से हुआ है। ऊब से बचने के लिए इसमें विविधता का होना अधिक आकर्षक होता। फिर भी ये कविताएँ हृदय का स्पर्श करने में समर्थ हैं और प्रभाव छोड़ती हैं।इसके लिये कवयित्री साधुवाद की पात्र हैं।उन्हें भविष्य के लिए अशेष शुभकामनाएँ।

------------------------------------
समीक्षक: सुविधा पंडित, विज्ञान में स्नातक, हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर बी एड, पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित। कविता लेखन, चित्रकला, आलेख, समीक्षा लेखन में रुचि व प्रवृत्त। कई सम्मान प्राप्त।

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।