बाज़ारवाद की पीड़ा का कोलाज: ममता कालिया का ‘दौड

किरण ग्रोवर
किरण ग्रोवर

आज मनुष्य सभ्यता के उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ चहुँ ओर बाज़ार ही बाज़ार है। समकालीन दौर में वस्तुएँ बोलती हैं और इन्सान चुप्पी साधे हुए है। समय के साथ बाज़ार की चमक और गति बढ़ती जी रही है। वस्तुओं की बढ़ती संख्या के साथ साथ वस्तुओं की टकराहट महासमुद्र तैयार कर रही है। विश्व बाज़ार के आतंक ने स्वाभाविक व सामान्य को हाशिए पर धकेल दिया है। आज ऐसा दौर है कि जब बेचने वाला ज्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाना चाहता है। बाज़ार में सिर्फ़ खरीदने व बेचने वालों का बोलबाला है। मानवीय मूल्यों को ताक पर रखा जा रहा है और मानवीय संवेदनाएँ आहिस्ता आहिस्ता बाज़ार की संवेदनाओं में तबदील होने लगी हैं। आज कीमत के परे किसी भी चीज़ का न तो मूल्य है और न ही अस्तित्व। केदार नाथ सिंह ने लिखा है कि ‘लगभग छह सौ साल पहले कबीर ने इस दुनिया को हाट कहा था-पूरा किया बिसाहुणा, बहुरि न आवौ हट्ट। आज कबीर की वाणी सौ प्रतिशत सच लग रही है, जब हम समाज और सम्बन्धों को बाज़ार में तबदील होते देख रहे हैं।’

भूमण्डलीकरण की बाज़ारवादी व्यवस्था और उपभोक्तावादी संस्कृति की नई लहर ने हसरतों में उफान तो लाई है लेकिन रोटी, कपड़ा, मकान शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी अत्यावश्यक सुविधाएँ भी बिकाउ हो जाने के कारण अतृप्त इच्छाओं को मुँह चिढ़ाती नज़र आ रही है। बढ़ती महत्वाकांक्षाओं और अनियिंत्रित अभिलाषाओं की गड़बड़ी ने गरीब को बुनियादी अधिकारों से वंचित कर दिया है। उपभोक्तावाद और सूचना क्रान्ति की अन्धी दौड़ ने हमारे पारस्परिक प्रेम व सद्भाव की गाँठ ढीली कर दी है। वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण के चमकीले नारों के पीछे हमारी मानवीय संवेदना को ग्रहण लग चुका है। बाज़ारवाद हमारे चारों ओर मायानगरी की भान्ति व्याप्त है। इसका विरोध व धिक्कार करने के बावजूद भी हम उसी में जीने के लिए अभिशप्त हैं। बाज़ारवाद के दौर में आप बाज़ार जाते नहीं बल्कि बाज़ार की चीज़ें आपका पीछा करती हैं। बाज़ार आपकी जीवन शैली व शक्ल का उपहास करके आपमें हीन भावना भर देता है, जब तक आप उस बाज़ार से जुड़ नहीं जाते। विपणन धूर्तता का पर्याय बन चुका है। निदा फ़ाज़ली की राय में बाज़ार ने एक नई संस्कृति का गठन किया है, कभी शब्दों की अहमियत होती थी, आज शब्द हाशिये पर चले गये है। क्रिकेट का बल्ला, राजनेता का चेहरा व उनका भाषण संस्कृति के चेहरे बन चुके हैं।1

तकनीकी विकास के साथ साथ जैसे हमारे सपने यथार्थ से विमुख हो रहे हैं वैसे बाज़ार हमारे मनोमस्तिष्क पर हावी हो रहा है। पारम्परिक बाज़ार जरुरतों का सौदागर था पर आधुनिक बाज़ार सपनों का सौदागर बन कर उभरा है। बच्चों की अदाओं को निर्देशकीय पटुता से आकर्षक बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है जिससे बच्चों का शैशव अंधकार में विलीन हो रहा है। नारी शरीर की बारीकी से पड़ताल की जा रही है। नारी को ढकने की असफल कोशिश आम आदमी के दिमाग में अलभ्य सपने बुन रही है जो सपने सामाजिक विकृतियों के रूप में परिलक्षित हो रहे है। बाज़ारवाद की दुखद परिणति है कि भविष्य के लिए नूतन चिन्ताओं का निर्माण कर रहा है।2  एक समय था जब यह माना जाता था कि
 जब आवै सन्तोष धन, सब धन धुरि समान।
 साई इतना दीजिए जामे कुटुम्ब समाय।

कबीर की ये पंक्तियाँ लोगों के सम्मुख आदर्श रचती थी परन्तु मगर आज की पीढ़ी के धन सिद्धान्त को आदर्शवादी धरातल मिला है।3 बाज़ारवाद हर व्यक्ति के जीवन को अन्दर तक प्रभावित कर रहा है। हमारे दैनिक जीवन पर बाज़ारवादी संस्कृति हावी हो गई है। बाज़ारवाद ने कुछ खास वर्ग के लोगों का ही भला किया है और आम जनों के लिए यह एक विभीषिका बनकर आया है।4आज पूरी दुनिया पर बाज़ारवाद का संकट गहराता जा रहा है। बाज़ार बहुत तेज़ी के साथ प्राकृतिक व गैर प्राकृतिक संसाधनों पर कब्ज़ा जमाता जा रहा है। उत्पादन शक्ति से लेकर उत्पादित वस्तु तक सभी बाज़ारवाद की गिरफ्त में शामिल हो गये हैं, यहाँ तक की इन्सान भी बाज़ार की एक वस्तु बनकर रह गया है।5 बाज़ारवाद ने आज विश्वधर्म को आर्थिक रूप से जोड़ दिया है पर रागात्मक सम्बन्धों को उधेड़ दिया है। किसानों व मज़दूरों की हालत पर कौन से लेखक अपनी कलम घिसा रहे हैं। आज महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों में परम्परागत पाठ्यक्रम पढ़ाये जा रहे हैं जिससे वर्णव्यवस्था को बढ़ावा मिल रहा है। शोधकार्य भी केवल छात्रवृत्ति व प्रमोशन प्राप्ति के लिए किया जा रहा है। प्रकाशन संस्थान भी नामांतर कर नये नये संस्करण निकाल कर मुनाफ़ा कमा रहे हैं। इक्कीसवीं सदी का समय व समाज आधुनिक उपकरणों से लैस है। बाज़ारवादी संस्कृति का निर्बन्ध फैलाव इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता।6 मूल्यों की विविधता के बीच कुछ ऐसे मूल्यों की तलाश हो जो विविधता के बावजूद भी विभिन्न मानव समूहों और संस्कृतियों के शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व को स्थापित करने की कोशिश हो।

मानव जीवन में आ रही याँत्रिकता को समाप्त करने के लिए साहित्य ही अध्ययन व अध्यापन का विषय बनकर उभरा है। समाज मानव जीवन के अतीत, वर्तमान व भविष्य की संभावनाओं का केन्द्र होता है जिसे व्यक्त करना साहित्यकार का सामाजिक और लेखकीय दायित्व होता है।7 जिस प्रकार साहित्य व जीवन का निर्विवाद सम्बन्ध है उसी प्रकार साहित्यकार और उसके समाज का पारस्परिक सम्बन्ध भी निर्विवाद है। बाज़ार हमेषा था और हमेषा रहेगा किन्तु मानव निर्मित होकर भी यदि मानव पर हावी हो जाये तो समाज के सचेतक साहित्यकार की मुख्य भूमिका हो जाती है कि वे बाज़ार के खतरों के प्रति आम आदमी को सचेत करें।8

महिला लेखिकाओं ने बाज़ार की विद्रूपताओं का पर्दाफ़ाश किया है। उन्होंने बाज़ारवाद की अमानवीयता को परत दर परत उधेड़ दिया है। उनका मानना है कि ऐसा असंवेदनशील समय आज से पहले कभी नही था जब बाज़ार के नियम सामाजिक मूल्यों पर हावी हो गये हों। बाज़ारवादी शक्तियाँ अपनी ताकत से महाशक्ति बनकर बाज़ार के तिलस्म का सृजन कर मनुष्य को मनुष्य रहने नहीं देती और उसे हृदयहीन मशीन में परिणित कर उत्पाद बना देती है। ममता कालिया का ‘दौड़’ उपन्यास 21 वीं सदी के आर्थिक उदारीकरण व युवा पीढ़ी की बदलती मानसिकता का परिणाम है। वर्तमान दौर में ‘दौड़’ उपन्यास ने नव धनाढ्य वर्ग की नई पीढी के चरित्र के माध्यम से हिंदी साहित्य में एक प्रतिमान कायम किया हैं। सुशिक्षित और संस्कार युक्त चरित्र रेखा व राकेश को अपने पुत्र पवन व सघन की बाज़ारवाद की अन्धी दौड़ में संवेदनहीन, मूल्यहीन व नैतिकता विहीन जीवन शैली रास नहीं आती। निजी जीवन में भी व्यावहारिकता को महत्त्व देने वाला पवन माता-पिता की असहमति को रौंद कर स्टैला जैसी अत्याधुनिक व संगणकीय दुनिया की नारी से वैवाहिक सम्बन्ध कायम करता है। स्टैला बाज़ारवाद की नीतियों को आत्मसात् करती हुई कामयाबी की दौड़ में पवन की भागीदार बनती है। पवन स्टैला के बारे में कहता हे कि जो गुण हैं इस लड़की के उन्हें देखो। कम्प्यूटर विज़र्ड हैं ये, इसके पास बिल गेट्स के हस्ताक्षर से चिट्ठी आती है।9 छोटा पुत्र सघन भी ताईवान में साफ्टवेयर कम्पनी में नियुक्ति पाता है। अपने बेटों की दौड़ रेखा व राकेश को असहाय स्थिति में धकेल देती है। दौड़ उपन्यास बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद एवम् व्यावसायिकतावाद की दौड़ में विनष्ट मानवीय सम्बन्धों का मूर्तरूप है। व्यावसायिकता से आजीविकावाद पैदा होता है जोकि पारिवारिक सम्बन्धों को और सम्बन्धों की भावात्मकता को मृतप्राय कर देता है।

ममता कालिया जी ने प्रस्तुत उपन्यास में महानगरीय मानसिकता का सूक्षमता से चित्रण किया है। उपन्यास के लगभग सभी पात्र षिक्षित एवं रोजगार प्राप्त है। उपन्यास के माता-पिता रेखा व राकेश बच्चों के बाहर चले जाने के बाद अकेले हो जाते है। माता-पिता अच्छा जीवन सुख से बिताने के बजाय कल आने वाली समस्याओं से भयभीत हो जाते है। बच्चे जब पास रहते है तब कडवी बाते कहकर उनका दिल दुखाया जाता है और जब वे दूर चले जाते है तब उनकी चिंता करते रहते है। आधुनिक युवकों के बारे में लेखिका कहती है, ‘‘अनिवासी और प्रवासी केवल पर्यटक और पंछी नहीं होते बच्चे भी होते है। वे दौड-दौडकर दर्जी के यहाँ से नए सिले कपडे लाते है, सूटकेस में अपना सामान और कागजात जमाते है। मनीबेल्ट में अपना पासपोर्ट, वीजा और चंद डॉलर रख रवाना हो जाते है अनजान देश, प्रदेश के सफर पर माता-पिता को सिर्फ स्टेशन पर हाथ हिलाते छोड़कर।10 आधुनिक युवकों की वास्तविकता का यह वर्णन यथार्थ, मार्मिक और स् हदयस्पर्शी लगता है। जीवन संघर्ष बच्चों के लिए सहज और चुनौतीपूर्ण है मगर वही माता-पिता के लिए बोझ बना हुआ है। समकालीन बाज़ार व्यापक होकर मनुष्यता का हनन कर रहा है। उदारीकरण ने भारतीय बाज़ार को ताकत प्रदान कर युवा वर्ग के लिए सिमसिम का द्वार खोल दिया है। ममता कालिया ने विवेच्य़ उपन्यास में बाज़ारवाद की अन्धी दौड़ का विस्तृत वर्णन किया गया है। बाज़ार के वशीभूत होकर युवा आत्मिक रिश्तों को ताक पर रख रहे हैं। पवन के एम.बी.ए. के अंतिम वर्ष में चार-पाँच कंपनियाँ उनके संस्थान में आती हैं। पवन पहले इंटरव्यू में चुना जाता है। पवन घर से अठारह सौ किलोमीटर दूर अहमदाबाद में नौकरी के लिए जाने की बात घर में बताता है तब माँ -बाप नाराज हो जाते हैं। वह चाहते थे कि पवन वहीं उनके पास रहकर नौकरी करें, पर पवन उनसे कहता है - ”यहाँ मेरे लायक सर्विस कहाँ ? यह तो बेरोजगारों का शहर है। ज्यादा-से-ज्यादा नूरानी तेल की मार्केटिंग मिल जाएगीं, माँ बाप समझ गये थे कि उनका शिखरचुंबी बेटा कहीं और बसेगा। लेकिन फिर भी पिताजी पवन से कहते हैं कि दिल्ली तक भी आ जाओ तो? सच दिल्ली आना-जाना बिलकुल मुश्किल नहीं है। रात प्रयागराज एक्सप्रेस से चलो, सवेरे दिल्ली। कम-से-कम हर महीने तुम्हें देख तो लेंगे या कलकत्ते आ जाओ। वह तो महानगर है।’11 लेकिन पवन के माथे पर आधुनिक होने का भूत सवार है। वह पापा से कहता है- ”पापा मेरे लिए शहर महत्त्वपूर्ण नहीं है, कैरियर है। अब कलकत्ते को ही लीजिए। कहने को महानगर है पर मार्केटिंग की दृष्टि से एक दम लध्दड़। कलकत्ते में प्रोडयूसर्स का मार्केट है, कंज्यूमर्स का नहीं। मैं ऐसे शहर में रहना चाहता हूँ जहाँ कल्चर हो न हो, कंज्यूमर कल्चर जरूर हो। मुझे संस्कृति नहीं उपभोक्ता संस्कृति चाहिए, तभी मैं कामयाब रहूंगा“12 पवन का जीवन विषयक दृष्टिकोण साफ है कि, ‘मंजिलों के लिए संघर्ष तो करना ही पडेगा। उसकी लाइन में चलते रहना ही तरक्की है। वह जिस दुनिया में है वहाँ एथिक्स नहीं प्रोफैशनल एथिक्स की जरुरत है।’13 पवन के ये विचार युवा पीढी के लिए सिर्फ़ कामयाबी सम्बन्धी विचार हैं जोकि बाज़ारवाद की देन है। पवन के बारे में पिता राकेश के विचार समाज को सचेत करने वाले है, ‘पवन के बहाने एक पूरी की पूरी युवा पीढ़ी को पहचानो।ये अपनी जड़ों से कट कर जीने वाले लड़के समाज की कैसी तस्वीर तैयार करेंगे।14 आज मनुष्य कर्तव्यों, मूल्य मान्यताओं और जरुरतों को नज़र अन्दाज़ करता हुआ बाज़ार के नियमों से संचालित होने लगा है। ममता कालिया का ‘दौड़’ उपन्यास उपभोक्तावाद, भूमंडलीकरण और उत्तर-आधुनिक समय का दर्दनाक आख्यान है। खगेन्द्र टाकुर ने लिखा है कि ‘दौड़ लघु उपन्यास है, लेकिन आकार में ही लघु है, यह कथा, कथ्य, चरित्र, शिल्प, शैली और भाषा आदि के समन्वित रूप में यह आज की एक महान रचना है।’

माँ बेटे के गहन रिश्ते में भी बाज़ारीकरण घुस आया है। समकालीन दौर में मानव महंगा उपहार देकर स्वयं हल्का होना चाहता है। पवन की माँ रेखा जब पुत्र और बहू को मिलने सौराष्ट्र जाती है तो दोनों माँ को खुश करने के लिए महंगे दाम की चद्दर उपहार स्वरूप देते हैं तो रेखा इन्कार कर देती है तब पवन के शब्दों में ‘आपको पता है हमारे तीन हजार रुपये इस गिफ्ट पर खर्च हुए हैं। इतनी कीमती चीज़ की कोई आपको कद्र नहीं आपको।’15 जब बच्चे माँ बाप के पास घर आते हैं तब अपनी बदलती मानसिकता का प्रकाशन करते हैं, ‘जाने के दिन उसने माँ के नाम बीस हज़ार का चैक काटा, माँ हमारे आने से आपका बहुत खर्च हुआ है, यह मैं आपको पहली किश्त दे रहा हैं। वेतन मिलने पर और दूंगा।’16 बच्चे माता पिता के ममत्व का मोल लगाने लगे हैं, जोकि बाज़ारवाद का ही प्रतिफल है। पाश्चात्य कॉलोनी के गुप्ता दम्पत्ति अपने अनुभव के आधार पर बच्चों की सच्चाई का कथन करते है तब रेखा और राकेश उसे मानते नहीं है। अपने बच्चों पर भरोसा होने के कारण उन्हें लगता है कि बच्चे कुछ नई बाते सीखकर अपने देश वापिस आ जाए। विदेश जाकर बच्चे वहाँ के ऐशोआराम और पाश्चात्य संस्कृति अपनाते है। उन्हें अपने देश, अपना शहर, अपना घर जेल की तरह लगता है। दोनों बच्चे नौकरी की वजह से दूर जाने के बाद राकेश और रेखा को अपना घर वनवास की तरह लगता है, ‘‘ रामायण की कथा में पिताजी बच्चे को वनवास भेजते है मगर आधुनिक काल में बच्चे विदेश जाते है और माँ-पिता जी वनवास भुगतते है। कालचक्र को उल्टा घुमाया जा रहा है।17 कॉलोनी में सभी माँ बाप की यही हालत थी। ममता ने इस कॉलोनी का नाम बुड्ढा-बुड्ढी कॉलोनी रख दिया है। युवा समीक्षक कृष्ण मोहन ने लिखा है कि बीसवीं सदी के अन्त में भारतीय समाज के सबसे गहरे सांस्कृतिक संकट का आख्यान है ‘दौड़’। हमारा समाज ऐसे चैराहे पर खड़ा है जहाँ से एक रास्ता बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की चरत उपभोक्तावादी संस्कृति के अन्धें कुएँ को जाता है तो दूसरा संस्कार, सुरक्षा और सामन्ती सामुदायिकता की पुरानी खाई की ओर। दोनों एक दूसरे की कमज़ोरियों से ताकत पाते हैं। तीसरा रास्ता मिलता ही नहीं - ऐतिहासिक मुकाम को दर्ज़ करने वाली, तरल आवेगो और गहरे मानवीय संस्पर्श से बुनी गई कथा है, ‘दौड़’। इस दौड. की कॉलोनी में अकेली रह रही माँ जब स्वर्ग सिधार जाती हैं तो विदेश से उनका पुत्र आने के बारे में असमर्थता जताता है। उस समय कॉलोनी वासी श्रीमती सिद्धू कहती हैं, ‘मैं किसी को बेटा बनाकर सारे काम करवा लूँ। ऐसा भी कभी हो कि रेडीमेड बेटे मिल जायें यह भी कहाँ मुमकिन हैं। बाज़ार में सब चीज़ मोल मिलती है, पर बच्चे नहीं मिलते। ऐसा ही पता होता कि पच्चीस बरस पहले परिवार नियोजन क्यों करते। होने देते और छः बच्चे। एक न एक तो पास रहता।’18 इस उपन्यास में ममता जी ने मनुष्य के पारंपरिक संबंधों की परंपरा और वर्तमान संबंधों के अंतराल की सूक्ष्म पड़ताल करके बाज़ारवाद की अंधी दौड़ का प्रतिपादन किया है।
अतः ममता कालिया का ‘दौड़’ सही रूप में वर्तमान युग के भूमंडलीकरण से प्रभावित समाज का यथार्थ चित्रण करनेवाला सशक्त उपन्यास है। आधुनिक युग की युवा पीढी उंचा वेतन पाने की लालसा में याँत्रिक बन गई है। वे करिअर और नौकरी को जीवन का अंतिम उद्देश्य मानने वाली युवा पीढी पारिवारिक जिम्मेदारियों से दूर भाग रही है। दो पीढ़ियों के बीच वैचारिक और सांस्कृतिक संघर्ष तीव्रता से आधुनिक पीढी पर प्रभाव छोड रहा है। आज के मनुष्य की कहानी है जो बाजार के दबाव-समूह, उनके परोक्ष-अपरोक्ष मारक तनाव, आक्रमण और निर्ममता तथा अंधी दौड़ में नष्ट होते मनुष्य के आसन्न खतरे में पडे मनुष्यत्व को उजागर करती है। वनवास काट रहे माता पिता की पीड़ा, असमर्थता का वास्तविक कोलॉज है, ममता कालिया का दौड़ उपन्यास जोकि बाज़ारवाद, उपभोक्तावाद, व्यावसायिकतावाद, आजीविकावाद का प्रतीक है।

सन्दर्भ ग्रन्थः-
1. https://www.livehindustan.com/news//article1-story-55262.html
2 . http://www.rachanakar.org/2007/12/blog-post_10.html
3 . https://rsaudr.org/show_artical.php?&id=8545
4. https://khabar.ndtv.com/news/literature/book-review-mall-mein-kabootar-1695590
5. https://loksangharsha.wordpress.com/tag/
6. https://www.pravakta.com/hindi-literature7/
7. https://ajayanurag.wordpress.com/tag/
8. http://www.weekandtimes.com/archives/35621
9. ममता कालिया, दौड़ पृ 69।
10. वही पृ 2-3।
11. वही पृ 11।
12. वही पृ 40-41।
13. वही पृ 45।
14. वही पृ 54।
15. वही पृ 4-5।
16. वही पृ 65।
17. वही पृ 24-25।
18. वही पृ 47-48।

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