कहानी: समझौते

उषा राजे सक्सेना

उषा राजे सक्सेना


रिफ़त उन्हें ज़्यादा नहीं जानती है। पर उनमें कुछ ऐसा है जो उसे उनकी ओर खींचता है। वे अक़्सर सुबह सैर के समय उसे एक मोड़ पर मिल जाती हैं। सुबह सात बजे सैर करते हुए टूटिंग लाइडो पहुँच, झील का एक चक्कर लगा कर, वापस जाते समय वे एक मोड़ पर “बाय-बाय” कहते हुए उससे अलग हो जाती है।

उनका व्यक्तित्व शांत और सौम्य है। जब पहली बार रिफ़त उनसे मिली तो वे उसे इस क़दर अच्छी लगीं कि देर तक वह उनके बारे में सोचती रही। रिफ़त ने उनके आने का समय नोट कर लिया वह लाइडो उसी समय पहुँचती जब वे गेट के अंदर दाखिल हो रही होतीं। वह उन्हें देख जल्दी-जल्दी क़दम बढ़ाती उनके साथ हो लेती। 

आमतौर पर वे कम ही बोलतीं है। रिफ़त ही उन्हें अपने बारे में बताती रहती है। रिफ़त के मन में उनके उनके नपे-तुले वाक्य और उन वाक्यों में अंतर्निहित अर्थ, उनके जीवन-दर्शन और अनुभव की गहराइयों को कुछ इस तरह खुलासा करते हैं कि रिफ़त का मन करता है कि वह उन्हें और अधिक जाने विशेष कर व्यक्तिगत स्तर पर। परंतु न जाने क्यों वे स्वयं को सदा अबोले पर्तो के भीतर रखती हैं। इसलिए रिफ़त उनके साथ होते हुए भी उनके और अधिक निकट नहीं जा पाती है। वे अधिकतर निर्लिप्त सी, कुछ दूरी बनाए रखती है। 

उम्र में रिफ़त उनसे कोई सात-आठ साल छोटी होगी पर वे हमेशा उसे आप कह कर ही संबोधित करती हैं। रिफ़त सोचती है कितना अख़लाक है उनमें, छोटों को भी “आप” जैसे आदर सूचक संबोधन से संबोधित करती हैं।
उन्होंने रिफ़त से उसका नाम और परिचय कभी नहीं पूछा। रिफ़त ने ही एक बार जब उन्हें अपना नाम और परिचय बताने के बाद उनका परिचय जानना चाहा तो कुछ सोचते हुए उन्होंने कहा, “परिचय में क्या रखा है रिफ़त। हम रोज़ सुबह मिलते है। एक साथ क़दम से क़दम मिला कर सैर करते है। आप और हम अच्छे ख़ासे वाकिंग पार्टनर हो गए है। आप हर रोज़ ज़िंदगी के किसी न किसी मसाइल पर बातें करती रहती हैं। धीरे धीरे हम यूँ ही एक दूसरे को जान-पहचान जाएँगे।”

रिफ़त अपनी महत्वाकांक्षाओं और ज़रूरतों के दबावों, जीवन-मूल्यों के टकराहटों, सामाजिक मान्यताओं और इंसानी फितरतों के मसाइल पर बातें करती-करती उनसे अपनी व्यक्तिगत उलझने भी बयां कर जाती है। वे अक्सर उसके उद्वेलित मन की अच्छी थाह लेते हुए उसे सहज करते हुए कहतीं, “देखिए रिफ़त, जब हम अपने समाज से अलग हो कर दूसरे समाज में आते हैं तो हमारे जीवन-मूल्यों में टकराहटें होनी शुरू हो जाती है। हर छोटे-बड़े समाज की अपनी मान्यताएँ होती हैं। नए और विकसित समाज में इंसान को अपने छोड़े हुए समाज के बहुत सारे संकीर्ण मान्यताओं और परंपराओं से उबरने के लिए बहुत सारे समझौते करने पड़ते हैं। ये समझौते प्रिज्म की तरह होते हैं। इनके अलग-अलग शेड्स होते है। क्या अच्छा है और क्या बुरा है का द्वंद्व सनातन है। इंसान की सोच, उसके परवरिश, सामाजिकता और ज़रूरतों पर आधारित है। नए समाज में अपनी ज़िंदगी को सफल बनाने और खुश रहने के लिए इंसान को खुद अपनी शर्तें तय करनी होती हैं और उन पर अमल करते हुए जीना होता है। आप समझदार हैं। इन बातों को अच्छी तरह समझती हैं।”
वे हमेशा ऑबजेक्टिवली बातें करती हैं रिफ़त ने उन्हें कभी सब्जेक्टिव होते नहीं देखा। वह एकाग्रचित, उनकी बातें सुनने और उनको समझने के साथ ही उनके भीतर चलते हुए संघर्ष को भी जानने की कोशिश करती है। रिफ़त का दिल तो चाहता है कि उसकी तरह वे भी अपने सुख-दुख  उससे खुल कर बांटे पर वे अपने आप को ख़ुद में बड़ी खूबसूरती से समेंटे रखती है।
क्या है उनके व्यक्तित्व में जो रिफ़त को उनके और अधिक निकट जाने के लिए उकसाती है। एक बार उनकी आँखों में एक अनाम सी उदासी आकर पल भर को ठहरी थी उस वक्त रिफ़त का मन हुआ कि वह उन्हें कुरेदे, पर उनके व्यक्तित्व की शालीनता और सादगी ने उसे रोक दिया। रिफ़त सोचती है, शायद उन्हें भी इस मुल्क में अच्छी और माइनेखेज़ जिंदगी जीने के लिए अपने व्यक्तिगत जीवन में अनेक और अंतहीन विषम समझौते करने पड़े होंगे। जैसे उसे अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व को क़ायम रखने के लिए अपने-आप में, अपने स्वभाव में, अपने लाइफ़ स्टाइल में  विषम बदलाव लाने पड़े है। वह भी तो अपनी जाती ज़िंदगी की हवा किसी को नहीं लगने देती है। रिफ़त का अवचेतन मन कहीं गहरे में खुद को उनसे आइडेन्टीफ़ाइ करने लगता है।

रिफत सोचती है उसका खुद का अपना जीवन क्या कुछ कम कॉमप्लीकेटेड है। ये मरा मुल्क ही ऐसा है। वे सच कहती हैं, पूरब और पच्छिम क्या कभी आपस में घुल-मिल सकते हैं? वह जो कुछ खास मूल्य और तौर-तरीक़े मुल्क से लेकर यहाँ आई थी जिसे वह और उसके पुराने ख़यालातों की अम्मी बेहद क़ीमती समझती थी, उसने उन्हें सालों- साल संभाले रखा पर वे जाने कब और कैसे इस खूबसूरत शहर के खूबसूरत जीवन स्तर और परिवेश की हलचल में गुम हो गए, उसे पता भी नहीं चला। वो तो उनकी बातों का असर रहा है कि वह हर वक़्त अपने को रैशनालाइज़ किए रहती है वर्ना अब तक वह भी उस कमज़ोर तबियतवाली सफ़िया और प्रफुल्ला की तरह पगलों के अस्पताल स्प्रिंग-फ़ील्ड में दाख़िल हो चुकी होती। सही बात है किसी ग़ैर मुल्क में सिर्फ़ अपने दम पर खुद को जमाए रखना आसान नहीं होता है, मशक्क़त करनी पड़ती है।

उस दिन जब रिफ़त आराम कुर्सी पर अधलेटी सी सुबह के वक्त उनके बारे में सोच रही थी कि अचानक उसकी चचेरी बहन शाहीन ने दरवाज़े की घंटी बजार्ई। बाहर हल्की-हल्की बारिश के साथ तेज़ हवा चल रही थी.
जल्दी-जल्दी चलने से शाहीन की साँस फूल रही थी। गोरा रंग उत्तेजना के कारण लाल हो रहा था। दरवाज़ा खोलते ही हॉल में पड़े सोफ़े पर धम्म से गिरते हुए शाहीन बैठ गई।

“सब खैरियत तो है?” उसकी हालत पर ग़ौर करते हुए रिफ़त ने पूछा.
पास रखे टिशू-बॉक्स से, टिशू निकाल कर भीगे चेहरे को पोछते हुए वह रिफ़त से बोली, “एक गिलास ठंडा पानी पिलाइये बाजी, गला सूख रहा है।”

पानी पी कर, गिलास कोस्टर पर रखते हुए बोलीं, “आपको याद है न बाजी, स्ट्रेथम शापिंग सेन्टर की बग़ल वाली गली, बैक्मीड एवेन्यू और नुक्कड़ का वह खूबसूरत मकान जो उस समय सेल पर लगा हुआ था।”
“हाँ... हाँ, क्यों? क्या हुआ? बिजली गिर पड़ी उस पर क्या?” शाहीन की
खिंचाई करने में रिफ़त को मज़ा आता है। 

“ओहो! आप तो मज़ाक करती हैं बाजी। आपको बेहद पसंद था न वह मकान किसी वक़्त। आप उसे खरीद तो नहीं सकती थीं पर उस मकान पर आप एक तरह से फ़िदा ज़रूर हो गई थीं। बार-बार उस तरफ़ से निकलतीं सिर्फ़ उसे देखने के लिए इसलिए बता रही हूँ।” उसने कुछ रुक कर रिफ़त के चेहरे की ओर देखते हुए कहा, “मालूम है बाजी, एक मोहतरिमा ने उसे ख़रीद लिया है। अभी हाल ही में तीन चार दिनों पहले, दो बेहद खूबसूरत जवान बेटियों के साथ उस घर में मूव कर गई है। क्या तो गाड़ी है उनके पास? लिमोज़ीन है या कि जैगुअर, मुझे ठीक से मालूम नहीं है। शायद उन्होंने एक अँग्रेज़ शोफ़र भी लगा रखा है। लगता है कोई मर्द नहीं है घर में, एक अकेली औरत दो जवान बेटियों के साथ रहती है उस मकान में... लगता है रुपया पैसा बहुत है उन लोगों के पास।”

“ओहो, तो क्या हुआ शाहीन? क्या औरतें मकान नहीं ख़रीद सकती हैं? क्या औरतें जाती तौर पर रईस नहीं हो सकती हैं? आज के ज़माने में औरतें इतनी लाचार नहीं हैं। मैंने भी तो मकान ख़रीदा है और तूने भी तो...।” रिफ़त ने उसे एसे ही कर्रा किया, “किसी की बढ़ती देख कर तू हमेशा जली है कमबख़्त। ग्रो अप!”

“वो बात नहीं बाजी आप समझी नहीं हैं। फ़ाइव हड्रेड थाउज़ैण्ड का मकान कोई ऐसे ही नहीं ले लेता है। मेरे सुनने में आया है वो लोग किसी...” कहते कहते वह रिफ़त के चेहरे पर आए भावों को देख कर खिसियानी-सी चुप हो गई।

रिफ़त ने शाहीन की कुछ ज़्यादा ही खिचाई कर दी थी। वह निरुत्साहित सी हो गई। शाहीन चाह रही थी बाजी उसकी बातों में रुचि लें और उससे आगे की कैफ़ियत पूछें। उसकी आँखों में कुछ और कहने की बेताबी पूरी तरह से झलक रही थी। पर रिफ़त के पास उस समय, वक़्त नहीं था ऑफ़िस जाने का समय हो रहा था।

रिफ़त जानती है कि शाहीन बेहद अकेली हैं उसके पास फ़ालतू की बातों के लिए ढेरों समय है। शाहीन का शौहर फ़रहान शुरू से मनचला रहा है। उसने शाहीन के साथ निकाह करने के पहले से ही गोरी रखी हुई थी और अब वह उस गोरी के साथ दूसरे मकान में रहता है। शाहीन के पास तो वह तभी आता है जब गोरी महीने से होती है या उसका बिरयानी और मुर्ग-मुस्सल्लम खाने को दिल करता है। तीन-चार दिन उसके साथ रहने के बाद वह क़मीना लुँगी उतार, पैंट पहन कर, उसे बाय कर देता है, अगले महीने तक के लिए। शाहीन शुक्रगुज़ार है कि वह शादी-शुदा है। माना कि उसका शौहर उसके पास कुछ ही वक्त के लिए आता है पर आता तो है न। खुदा ने उसे एक ही औलाद बख़्शी है और वह भी मानसिक विकलांग। फिर भी शाहीन अपनी किस्मत को कभी कोसती नहीं है। वह फ़रहान को नापसंद भी नहीं करती है परंतु वह उस पर अपना दबदबा रखती है। वह उसे तभी घर में आने की इजाज़त देती है जब वह बिना पीए हुए आता है, वरना उसे बैरंग लिफ़ाफे की तरह लौटा देती है। पहले तो फ़रहान बड़ा लाल-पीला होता था, पर बाद में उसे शाहीन के आगे झुकना ही पड़ा।

शाहीन के शौहर को लार टपकाते उसके लड़के से बेहद नफ़रत है पर शाहीन को अपने बेटे से बेहद मुहब्बत है। वह लड़के के साथ काउंसिल स्टेट में उन दो कमरों के फ्लैट में अकेली रहती है। ज़िदंगी में इंग्लैंण्ड आने के सिवा शाहीन ने और कोई सुख नहीं देखा है। शादी से पहले सौतेली माँ ने उसकी जान हलकान कर रखी थी। अब शौहर सीने पर मूंग दल रहा है, पर उसकी परवरिश ने उसकी फितरत कुछ इस तरह की बना दी है कि वह सबकुछ सहने के साथ खुदा का शुक्र भी अदा कर देती है और हर वक्त हँसती रहती है।

रोज सुबह-सवेरे शाहीन के लड़के को काउंसिल-स्कूल-बस “पिक” कर लेती है। घन्टे दो घंटे घर की सफ़ाई-सुफ़ाई, नहाना-धोना, खाना पीना और फिर उसके बाद उसके पास और कोई काम नहीं होता है। अकेली है कोई खास सहेली भी नहीं बनाई है उसने। घर-घर घूमती, पास पड़ोस की ख़बरें इधर-उधर पहुँचाती है। काउँसिल से इतना पैसा मिल जाता है कि उसके अपने और लड़के के खाने-पीने और कपड़े-लत्ते के साथ लिपिस्टिक और बुंदे बालियों के लिए पैसे भी निकल आते हैं। शाहीन के शौहर को लड़के की कोई परवाह नहीं है क्योंकि वह जानता है सरकार उसके “मेंटली रिटार्डेड” लड़के और शाहीन की पूरी व्यवस्था करती है। खाने-पहनने, दवा-दारू की कमी इस देश में किसी को यूँ भी नहीं है। इंग्लैंण्ड वेलफ़ेयर स्टेट जो है। फिर खाने और पहनने के सिवा औरत की भला कोई और ज़रूरत होती है क्या? थोड़ी बहुत जो जिस्मानी ज़रूरत होती है वह महीने के उन चार दिनों में वह पूरी कर ही देता है जब उसकी गोरी को महावारी होती है। 
पिछले शनिवार को रिफ़त जब ख़रीददारी के लिए स्ट्रेथम गई तो गाड़ी सायास बेकमीड एवेन्यू में पार्क किया। वाकई बेकमीड एवेन्यू के उस मकान और पूरे बगीचे का काया-कल्प हो गया था। रिफ़त को लगा ये लोग कुछ और ही किस्म के लोग हैं, उन लोगो की पसंद ख़ासे ऊँचे दर्ज़े के अमीर-उमराव और नवाबों जैसी।

मकान के आगे के बागीचे का लैण्डस्केप बदल गया था। पेड़ वहीं के वहीं थे पर उनके चारों ओर फूल और पौधों की ऐसी सुंदर क्यारियाँ और झाड़ियाँ लगा दी गई थीं कि उनके ऊपर एक नया निखार आ गया था। आउट हाउस के पीछे पैशन फ़्लॉवर, बॉगनवेलिया और जैस्मिन की लतरों को लकड़ी की चपटे छड़ों पर चढ़ा कर एक ख़ूबसूरत स्क्रीन-सा बना दिया गया था जिसके पीछे वह गोल स्वीमिंग-पूल जो पहले घास-फूस से भर गया था अब नील-सागर सा सूरज की रोशनी में छलक रहा है। वहीं स्वीमिंग पूल के किनारे बड़ी-बड़ी छतरियों के नीचे गद्देदार रंग-बिरंगी आरामदेह, धूप सेकने वाली कुर्सियों के साथ ड्रिंक रखने की सफ़ेद टेबल भी रखी हुई थी।

कोने-कोने में बिखरा ऐशो-आराम कोठी में रहने वालों के ऊँची पसंद को अभिव्यक्त कर रहा था। लंबे, ऊँचे आयरन गेट पर रिमोट कन्ट्रोल के तार लगे हुए थे। गेट के पास ही लकड़ी का बना कैनेल था जिसमें आग-से दहकते आँखों वाला बुलडॉग अधमुंदी आँखों से आते-जातों को देखा करता था। चारों तरफ़ अच्छी खासी सिक्यूरिटी थी। स्ट्रेथम के आम घरों में ऐसी सिक्यूरिटी नहीं होती है पर इस तरह के ख़ास घरों की बात कुछ और ही होती है।

इधर-उधर झाँक कर उसने देखा कोई नज़र नहीं आया। सिर्फ़ झर-झर, कल-कल पानी के बहने और चलने की आवाज़ के साथ रंग-बिरंगे फूल मस्ती से झूमते हुए घर में रहने वालों के “लैविश लाइफ़ स्टाइल” की कहानियाँ कह रहे थे।
अब रिफ़त को भी उस घर में रहनेवालों के प्रति कुछ उत्सुकता सी होने लगी थी। उसे शाहीन का इंतजार होने लगा।

ऐसे ही कुछ दिनों बाद एक रात जब वह नार्थ लंदन से लौटते हुए बैक्मीड एवेन्यू से गुज़री। तो उसने देखा उस घर का हर ख़ूबसूरत हिस्सा फ़्लड-लाइट की रहस्मयी नीली रोशनी में सराबोर, अद्भुत परी-महल सा लग रहा है। ऊँचे आयरन गेट के पीछे, सफ़ेद जैगुअर कार का दरवाज़ा खोले, हैट लगाए छः फ़ुटा अंग्रेज़ शोफ़र अदब से खड़ा है।

दो खूबसूरत लड़कियाँ, संगेमरमर-से तराशे बदन पर चुस्त “वेट-लेदर लुक”  की “हिप-हाई जीन्स” और “वाई शेप” खुले गले की वैसी ही छोटी-छोटी चोलियाँ पहने कार मे बैठने जा रही हैं। जीन्स और चोली के बीच से उनकी सफ़ेद बताशे-सी पतली कमर झाँक रही थी। नाभि और कान में पहने जवाहरात कार की तेज़ रौशनी में बिजली के फूल से जगमगा उठे। पल भर को रिफ़त की आँखें चौंधिया-सी गई। दृश्य इतना अद्भुत था कि उसका  दोस्त जो गाड़ी चला रहा था, स्वतः ही गाड़ी की स्पीड हल्की कर दी। रिफत ने गर्दन घुमा कर देखा तो वे यानी उसकी “वाकिंग-पार्टनर” लाल हाउस-कोट पहने सीढ़ियों पर, लड़कियों को “बाय” करने की मुद्रा में खड़ी थीं। वही सौम्य, वही शालीन व्यक्तित्व। वही खड़े होने का शान्दार अंदाज़।

बेटियाँ किसी पार्टी में जा रही होंगी और वे उन्हें वहाँ खड़ी “बाय-बाय” कर रही होंगी रिफ़त ने सोचा। 

इन खूबसूरत चेहरों को शायद उसने कहीं देखा है? मॉडल होंगी? किसी मैगज़ीन में फ़ोटो देखी होगी? रिफ़त अभी चकित सी यही सब सोच रही थी कि लड़कियों को देख कर ड्राइविंग सीट पर बैठे उसके दोस्त रशीद के चेहरे पर एक अजब-सी मर्दानी खिलंदड़ी रौनक आ गई। कुछ उत्तेजित-उत्सुक सा ज़ेरेलब मुस्करा कर, रिफ़त की ओर देखते हुए बोला, “मालूम है रिफ़त, ये खूबसूरत बलाएँ ज़रीना और क़रीना है। वेरी सक्सेसफ़ुल बिज़नेस विमेन। कई नामों से बिज़नेस करती हैं, जैसे रीटा-गीटा, जिया, सिया, शब्बो-अप्पो वगैरा-वगैरा। इनका असली नाम तो कोई जानता ही नहीं है। बट दे आर वेरी गुड न्यूड आर्टिस्ट। एक्सपर्ट इन स्ट्रिपटीज़, टैंगो, न्यूड, सालसा, टेबल एन्ड बेली डान्स अलॉग विद कत्थक एन्ड मुजरा। दे आर अवेलेबल, दे कैन कम टु एनी हाउस विद हाई क्लास सेक्यूरिटी टु परफ़ार्म एन्ड चार्ज ब्लडी फ़िनॉमिनल फ़ी... अभी भी कहीं शो देने जा रही होंगी।” कहते हुए उसने दाहिने हाथ की तर्जनी कॉलर की गोलाई में उत्तेजना से फिराई फिर टाई की नॉट ठीक करते हुए बोला, “सिटी ऑफ़ लंडन की स्टूडेंट रही हैं। पढ़ी लिखी, बेहद स्मार्ट और रिजर्व्ड।  ये लड़कियाँ ज़बरदस्त सौदा करती है। सुनते है अच्छे घराने की होते हुए भी आजकल गुरबत में है। लोगबाग कहते है, मैडम सिंथिया पेन - “द क्वीन ऑफ़ रेड लाइट ज़ोन” इनकी सरपरस्त है। बड़े-बड़े पॉलिटीशियन, इंडस्ट्रियलिस्ट्स से इनके संबंध है। इसीलिए तो इतनी सेक्यूरिटी है इनके घर में..।” कहते हुए उसने सिगरेट का धुआँ रिफ़त के चेहरे पर फेंकते हुए उत्तेजित हो आँख मारी, आँखों के साथ रिफ़त का दिल भी बुरी तरह जल उठा। उसने मन-ही-मन उसे एक भद्दी सी गाली दी।

“बॉडी-गार्ड साथ चलते हैं। हाँलाकि यह सब ख़ालिस नखरे ही होंगे। और ज़्यादा कड़क फ़ी लेने के, एक रात में तकरीबन आठ-दस हज़ार पौंड तो ये आसानी से कमा ही लेती हैं। सच बात तो ये है कि ये लड़कियाँ बहुत ऊँचे किस्म की कॉल-गर्ल्स हैं। बड़ी डिमांड में हैं ये लड़कियाँ। ये जवान हैं, खूबसूरत हैं, ग़जब की अदाकारी है इनमें। लोग गड्डी के गड्डी पाउँड इन पर यूँ लुटाते है जैसे कि झर्र-झर्र बारिश की बूँदें गिर रही हों।” उसने यह सब, कुछ ऐसे ख़ास कामुक अंदाज़ में कहा कि रिफ़त किलस कर रह गई। मर्द के लिए औरत बस एक ही मायने रखती है। उसके मुँह का स्वाद कच्चे करेले सा कसैला हो आया.
“हूँ, तुम्हे कैसे पता? तुमने इनकी कोई परफ़ारमेंस देखी है क्या?”
पर वह अपनी रौ में बहे जा रहा था। रिफ़त के आवाज़ में आई कड़वाहट उस तक नहीं पहुँची... “तुम्हें नहीं मालूम। हाल ही में डाक्टर बिसारिया ने अपने घर में एक शो कराने के लिए इन्हें बुलाया था। ख़ास उस समय जब उसकी बीबी अस्पताल में बच्चा जन रही थी। ये ही दोनों आई थीं शो करने के लिए। अपने जानने वाले तक़रीबन सभी खाते-पीते घरवाले, दिलफेंक रईसों ने शिरक़त की थी। दस हज़ार पाऊंड का एडवान्स पेमेंट हुआ था, कैन यू बिलीव इट? मुजरा, बेली-डान्स, स्ट्रिपटीज तीनों डान्स ज़बरदस्त ड्रेस बदल-बदल कर पूरे इलेक्ट्रॉनिक इफ़ेक्ट के साथ परफ़ार्म किया था उनके ड्राइंगरूम में। क्या एक्साइटिंग परफ़ारमेन्स थी! बिजली सी मचल रही थी बेपर्द जवानी! जिस्म था कि इलास्टिक¬क्या गजब की शोख़ अदायगी थी! ...और वह संजय निहलानी वह तो बस बिल्कुल मुँह बाए बुत बना बैठा रहा। साला शर्मा तो पहले ही धुत हो गया था। हाँ कुदैसिया और गुप्ता ने उनके साथ खूब ठुमके लगाए। बाक़ी और लोग तो बस बैठे-बैठे बीस-बीस के नोट लुटाते रहे। पर क्या मज़ाल कोई उन्हें छू तो ले। दो बॉडी-गार्ड यमदूत की तरह अंदर की ओर दरवाज़े पर सारे टाइम मुस्तैदी से खड़े रहे। यूँ अपने आप को आर्टिस्ट कहतीं हैं दोनों। पोर्न हैं पोर्न, कॉल-गर्ल्स, अवेलेबल एवरी नाइट।” वह ठठा कर, कामुकता से भरी व्यंग्यात्मक हँसी हँसा।

रिफ़त पहले तो चुपचाप सुनती रही फिर घायल शेरनी सी गुर्राती हुई बोली, “तो फिर आर्ट को आर्ट की तरह देखना सीखो। लड़कियाँ प्रोफेशनल डान्सर हैं। तुम्हारे ही नियत में खोट है। अच्छा करती हैं जो बॉडी-गार्ड रखती हैं। वर्ना तुम जैसे लोग तो उन बच्चियों को कच्चा चबा जाओ, अपनी इज्जत तो नहीं नीलाम होने देती हैं न!” वह खौलती हुई तल्ख़ और बेहद खूँखार आवाज़ में गुर्राई।

उसने उसके बिगड़ते मूड का अंदाज़ा लगा लिया, इसलिए चुप हो गया। वर्ना अभी और बकता। “ब्लडी फ़ेमिनिस्ट” वह होठों ही होठों में बुदबुदाया।
रिफ़त का मन बार-बार उनकी लौट रहा था। वे कितनी सौम्य, शालीन और नफ़ीस हैं। कितनी गहराई और कितना फ़लसफ़ा है उनकी बातों में। कितनी ऊँची तहज़ीब हैं उनकी। झूठ बोलता है यह मक्कार, बदबख्त, हरामी...। पर सामने खड़ा नग्न यथार्थ उसके दिमाग पर हथौड़े चला रहा था। क्या यही वजह है जो वे, इतनी रिज़र्व रहती हैं? ... वह खिसयाई-सी उन्हें जानने और समझने की मन-ही-मन बेहिसाब कोशिश करती रही। ये लड़कियाँ ऊँचे दर्ज़े की आर्टिस्ट हैं। कमज़र्फ दुनिया चाहे जो सोचें। मेहनत करती हैं। काम करती हैं। एनटरटेनमेंट उनका बिज़नेस है। चोरी-ठगी और खून खराबा तो नहीं करती है।

रिफ़त का दिमाग बेतरह बौखला रहा था। उसका यह दोस्त, उसका “लिव-इन पार्टनर”। कितने अर्से से वह उसके साथ “कोहिबिट” कर रहा है। “ओपन रिलेशनशिप” है। घर के सारे ख़र्चे फिफ्टी-फिफ्टी। आना-जाना ज़्यादातर साथ। दोनों का अपना-अपना अलग व्यक्तिगत जीवन है। फिर भी बदबख्त कई बार खुली-खुली बातें करके अपनी बेहूदी मर्दानगी दिखाने से बाज़ नहीं आता।

रिफ़त का सिर भन्नाने लगा, अचानक उसे शाहीन याद आ गई। या अल्लाह! यह कैसी दुनिया है! शाहीन का शौहर फ़रहान गोरी के महावारी के दिनों में उसे नोचने आ धमकता है। मर्द की जात हर शै में जीती हुई क्यों लगती है। ऐसी क्या बात है कि औरत क्यों हमेशा खुद को हारा हुआ और कमज़ात महसूस करती है।

मर्दों की तरह औरतें क्यों नहीं अपनी शर्तें खुद तय करती हैं। जिस्मानी ज़रूरतें तो मर्द और औरत दोनों की एक सी होती हैं। औरत को भी अपनी शर्तों पर जीना चाहिए और वह अपनी शर्तों पर जी सकती है। शाहीन कमज़ोर नहीं है। वह भी तो धाकड़ी से, एक तरह से अपने ही शर्त पर जी रही है। जब उसका दिल चाहेगा फ़रहान पर रोक लगा देगी। और मैं, मैं तो अपनी शर्तों पर जी ही रही हूँ। 
बाइस साल की थी रिफ़त, जब मामू के साथ एमबीए की डिग्री लेने लंदन आई थी। आज उस बात के बारह साल हो चुके हैं। मामू उससे कोई तीन-चार साल ही बड़ा था। थोड़े ही दिनों बाद मामू की दोस्ती जूलिया के साथ हो गई। जूलिया मामू के कमरे में मूव कर गई। दोनों काफ़ी दिन साथ रहे फिर जूलिया का मन मामू से ऊब गया और एक दिन वह उसकी ज़िंदगी से ऐसी गई कि फिर दुबारा उसकी सूरत ही नहीं दिखी। मामू बहुत दिनों तक बदहवास रहा, फिर धीरे-धीरे संभला। उसका वीज़ा भी ख़त्म हो गया था, सो वह अन्डर-ग्राऊंड हो गया। अपने मुल्क वापस जाने के नाम से उसे दहशत होने लगती थी। अंत में परमानेन्ट बनने के लिए उसने अपनी उमर से दुगनी उमर की स्कॉटिश औरत के साथ घर बसा लिया जिसके चार बच्चे पहले आदमी से थे। अब वह स्कॉटलैंड में रहता है। रिफ़त से अब उसका ज्यादा संबंध नहीं रह गया। बस क्रिसमस पर गिफ़्ट के साथ एक कार्ड आ जाता है। उस स्कॉटिश ने उसकी नाक में ऐसी नकेल पहना दी कि सही हो गया मामू।

उसी बीच थोड़े ही दिनों बाद शाहीन भी टेलीफ़ोन पर निकाह करा के बड़े दबदबे के साथ लंदन आ गई। पहाड़ से गिरी, खजूर में अटकी। कुछ दिनों तक तो मियाँ ने कज़न-कज़न कह कर घर में रखा। फिर जब असलियत खुली तो गोरी ने उधम मचाया। शाहीन ने भी उसे धमकाया, डर के मारे शाहीन के मियाँ ने उसे एक अलग किराए का कमरा लेकर दे दिया। शाहीन के पेट में बच्चा था, मकान मालिक को जब पता चला कि वह पेट से है तो उसने उसे कमरा खाली करने को कहा। शाहीन ने फ़रहान को हड़काया। फ़रहान ने किसी तरह एक वकील दोस्त की मदद से उसे काऊंसिल का एक फ्लैट दिलवा दिया। शाहीन को विकलांग बच्चा हुआ तो काऊंसिल ने उसे और भी बहुत सी सुविधाएँ प्रदान कर दी। ग़रीबी से तो वह बिल्कुल ऊपर उठ गई। शाहीन ने ज़िंदगी से समझौता कर लिया और अब अपने मन मुताबिक अपने घर में रहती है।

रिफ़त अपने आस-पास जितना देखती है उतना ही वह उलझन में पड़ जाती है। यह कैसी अच्छी ज़िंदगी है जो बुरी नहीं है पर फिर भी अपने देसी लोग इसे बुरी नज़र से देखते हैं। वह अपनी खुद की ज़िंदगी को क्या कहे? हमेशा अच्छी कटी पर फिर भी घुटन होती रही। स्टूडेन्ट वीज़ा खतम होते ही उसे सिविल सर्विस में नौकरी मिल गई। बॉस अच्छा था उसके साथ वह थोड़े दिन रही फिर उसकी मदद से उसे रिहाइशी वीसा मिल गया। अब उसने अपना मकान खरीद लिया, पिछले दो साल से उसका पार्टनर रशीद उसके साथ को-हिबिट कर रहा है। रशीद के पास घर नहीं है। एक तरह से वह उस पर एहसान कर रही है पर लोग घर उसका नहीं रशीद का समझते हैं।   

कभी-कभी पलट कर वह अपने मुल्क की ओर देखती है। तो सोचती है क्या रखा है वहाँ सिवाय अम्मी के? वह भी बस थोड़े ही दिनों की मेहमान हैं। कई बार वापस जाने की सोची पर जा नहीं पाई। अम्मी के फ़ोन और शाहीन की मौज़़ूदगी कभी-कभी बीते दिनों की याद दिला देता है। शादी के बंधन की ज़रूरत उसे अभी तक महसूस नहीं हुई। जब अकेलापन खलेगा या ममता ज़ोर मारेगी तो मुल्क जा कर अपनी पसंद से अनीस ख़ाला के लड़के या किसी और अच्छे-भले लड़के के साथ ब्याह करके उसे यहाँ ले आएगी। बकौल अम्मी के लड़कों की कोई क़मी नहीं है, सभी उससे शादी करने के लिए कमर-कसे तैयार बैठे हैं! वह सोचती है जल्दी क्या है? तमाम उम्र पड़ी है। वह अम्मी और रिश्तेदारों की पकड़ से हज़ारों मील दूर बैठी अपनी ज़िंदगी अपने शर्तों पर जी रही है।

अचानक उसका मन फिर अपनी वाकिंग-पार्टनर की ओर लौट गया।

कई दिनों बाद कल शाम शाहीन फिर आई थी। आते ही बोली, “बाजी, शाहिद आज स्कूल के साथ सी-साइड गया है। बड़ा एक्साइटेड हो रहा था। उसके लंच बॉक्स के लिए शामी क़बाब बनाए थे। चार टिकियाँ आप के लिए लाई हूँ। चाय का वक़्त हो रहा है कहें तो अदरक वाली चाय बनाऊँ?” रिफ़त के जवाब का इंतज़ार किए बिना ही वह किचन में चाय बनाने चली गई।

चाय का सिप लेते हुए रिफ़त ने शाहीन से पूछा कि सब ठीक-ठाक चल रहा है जवाब में शाहीन ने सिर हिलाते हुए कहा, “ख़ुदा का फ़जल है बाजी।” उसने ऊपर आसमान की ओर देखते हुए बिना कोई संदर्भ बनाए अपनी आदत के अनुसार कहने लगी, “पता नहीं सच है कि झूठ, बाजी, सुनने में आया है उस खूबसूरत घर के लोग ज़लालाबाद स्टेट के मालिक थे। लड़कियों को यहाँ किसी बड़े पब्लिक स्कूल में पढ़ने को भेजा था। पैसों की कमी की वज़ह से लड़कियाँ पढ़ाई के साथ-साथ फैशन मॉडलिंग करने लगीं। ज़मीन्दारी को दीमक तो पहले से ही लगी हुई थी। ज़मीन्दार को बीमारियों ने ऐसा घेरा कि डाइलिसिस के लिए लंदन आना पड़ा। अब लाइफ़ सपोर्ट मशीन पर लंदन-ब्रिज अस्पताल के इन्टेन्सिव केयर में हैं। प्राइवेट इलाज और लंबी-लंबी फ़ीसें। लड़कियों ने इलाज के लिए पढ़ाई छोड़ दी है। सुनते है, अब मॉडलिंग के साथ ब्लू फिल्मों में काम करतीं है।”

“चल हट।” रिफ़त ने कहा, “ख़ुराफ़ाती कहीं की, न जाने कहाँ-कहाँ से चंडू खाने की ढूँढ लाती है। कुछ ढंग के काम किया कर। इस तरह एक दिन तू ज़रूर किसी-न-किसी मुसीबत में फंस जाएगी। मुँह पर लगाम लगा। जो मन में आया बक दिया।” उसने शाहीन को ममता भरी डाँट बताई...

“नहीं, बाजी सिर्फ़ आपको बता रही हूँ। मुझे तो खुद उन लोगों पर रहम आता है। उस घर में खाना बनानेवाली गुजरातन ने मुझे बताया है। मकान इन लोगों का ख़ुद का नहीं है। उन ब्लू फिल्म वालों ने दिया है जिनके लिए ये काम करतीं हैं।” कहते हुए जाने के लिए उसने जैकेट उठाया। उसके बेटे के वापसी का समय हो रहा था।

“खुदा हाफ़िज।” कहते हुए रिफ़त ने दरवाज़ा बंद कर के लंबी साँस ली।
उसका मन फिर उनकी ओर लौट गया और वह सोचने लगी, “या खुदा! क्या यह सच है? अल्लाह! उनके दिल पर क्या गुज़रती होगी। मुसीबतों से निजात पाने के लिए इंसान को न जाने कैसे-कैसे समझौते करने पड़ते है। और कई बार तो इंसान को “बैड एन्ड वर्स” में से एक को चुनना ही पड़ता है। बाप के तीमारदारी के लिए इतनी लंबी रक़म, ये लड़कियाँ, शायद सिर्फ इसी पेशे से पैदा कर सकती थी। यही उनकी सहूलियत थी। दुनिया में कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं है बस इन्सान की सोच उसे अच्छा या बुरा बनाती है, रिफ़त ने सोचा, आख़िर क्यों औरत को ही अपनी पसंद, अपनी सहूलियत, अपनी मजबूरियों के लिए बुरी औरत के ख़िताब से नवाज़ा जाता है। आखिर कब तक वह अपने वजूद के लिए मर्दाने नज़रिए की मोहताज रहेगी। और... उसकी आँखों में उनकी तंगदस्त और दुःख भरी जिंदगी की रीलें सिनेमा की तरह खुलती चली जाती होंगी ...। शायद उन्हें नींद नहीं आ रही होगी वे उसी शान्त और सौम्य मुद्रा में ऊपर खिड़की के पास खड़ी बच्चियों के सही सलामत घर आ जाने की ख़ुदा से दुआ मांगते हुए, आए वक़्त से समझौता करती, तिल-तिल मरते पति के जीवन की भीख माँग रही होंगी।

रिफ़त का मन उनके लिए सदाशयता से भर उठा ...

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