काव्य: अभिषेक कांत पाण्डेय

अभिषेक कांत पाण्डेय
*प्रेम व ब्रह्माँड*

नहीें है कोई आयाम
न दिशा ब्रह्माँड का 
प्रेम भी है दिशाविहीन आयामहीन
दोनों में है इतनी समानता
जैसे ब्रहमाँड के रहस्य
जानता हो प्रेमी
रात रात जाग गिन जाता है अनगिनत तारे कितना गहरा है संबंध प्रेमी व ब्रह्माँड में
तभी तो प्रेमी करता है  प्रेमिका से
चांद सितारें तोड लाने की बातें।
बिलकुल उस ब्रह्माँड  वैज्ञानिक की तरह
वह जान लेना चाहता है
हर ग्रह के चांद, सितारों को
अपनी प्रेयसी के लिए ।
गढता है एक नयी कविता
खंगालता है नभ,
मंडल के पार के असंख्य ग्रह नक्षत्र सितारों को
प्रेम के अनंत रस से
समेट लेना चाहता है
ब्रह्माँड -उत्पत्ति की अनंत ऊर्जा को
क्योंकि वह जानता है
गाडपार्टिकल ने ऊर्जा को बदला है पदार्थ में
और वह जानता है
यह तथ्य-
ऊर्जा का संचार जिसमें सौ प्रतिशत है
वही प्रेमी है।
ब्रहमाँड का जन्म महाविस्फोट के  1 सेकंड के अरबवें समय में,
प्रेम भी इतने समय में होता है,
प्रेमीयुगल नव ब्रह्माँड सरीखा।
प्रेम रचता हर बार नया ब्रहमाँड,
प्रेम सत्य है
ब्रह्माँड भी सच है
एंटी मैटर
उस नफरत की तरह है
ब्रह्माँड को अस्तित्व में आने नहीे देता था।
बस एक सैकेंड में
एंटी मैटर के बराबर से थोडा अधिक,
पाजिटिव मैटर रूपी प्रेम ने रच दिया ब्रहमाँड
उस नफरत रूपी एंटी मैटर के खिलाफ
अस्तित्व में आया  कई ब्रह्माँड
जिनमें एक हमारा सूरज, धरती।

लैला-मजनू, सोनी-महिवाल उनके किस्से
अभिज्ञानशकुतंलम्, जूलियस सीजर
इस ब्रह्माँड की देन है
देखो ब्रहमाँड की और
हर तारें में संचारित  प्रेम
ग्रह करते हैं प्रणय परिक्रमा।
दूर आकाश गंगा की रंगीन रोशनी
प्रेम उत्सव मनाती सी
सीखाती इंसानों को प्रेम करना।
***

हुकूमत की धूप

किताबों में कैद गुजरा वक्त
बेइंतहा ले रहा है।
कुछ कतरन यूं
हवा से बातें कर रहें
बीतने से पहले पढ़ा देना चाहते हैं
हवा को भी मेरे खिलाफ बहका देना चाहते
इस मिट्टी की मिठास
पानी के साथ
मेरी खुशबू बता देना चाहती है।
बे परवाह है इस हुकूमत की धूप
अमीरों के घर पनाह लेती है।
झोपड़ी का चिराग
खेतों तक रौशनी फैला देती है
भटके भ्रमजाल में राहगीर
रास्तें में संभाल लेती है।
रौशनी अंधेरे को चीरती
बगावत की लौ जला देती है।
***

माँ

कोख से जन्म लेते ही
ब्रह्माँड भी हमारे लिए  जन्म ले चुका होता है
जिंदगी का यह पहला चरण
माँ की  सीख के साथ बढता चलता
लगातार अपडेट होते हम
माँ की ममता
थाली में रखा खाना
हमारी हर ग्रास में माँ प्रसन्न होती
हम अब समझ गये
माँ जन्म देती है
धरती माँ खाना देती है
माँ का अर्थ पूर्ण है,
हमें जीवन देती
और सिखाती है जीना।
हर माँ वादा करती है कुदरत से
हर बच्चे में माएं भरती जीवनराग
लोरी की सरल भाषा में।

तोतली बातें समझनेवाली भाषा वैज्ञानिक माँ
माँ मेरी डाक्टर भी
माँ मेरे लिए ईश्वर भी,
माँ सिखाती सच बोलना।
आटे की लोई से लू लू, चिडिया बनाना
चिडचिडाता जब मैं, माँ बन जाती बुद्ध
समझ का ज्ञान देती।
नानी  की घर की और
जानेवाली ट्रेन में बैठे ऊब चुके होते हम
शिक्षक बन समझा देती रोचक बातें
कैसे चलती ट्रेन, कैसे उड़ान भरता हवाई जहाज।

अब मेरी माँ
नानी भी है दादी भी
बच्चे बोलते अम्मा
तब अपने बच्चों में मुझे अपना बचपन नजर आता।
सच में माँ ही है
माँ के हाथों का खाना आज भी  लगता है
दिव्य भोजन
इंद्र का रसोईया
नहीें बना पाता होगा
माँ से अच्छा भोजन।
माँ तुम्हारी वजह से ब्रह्माँड को जाना
इस दुनिया के  इस समय का साक्षी बना हूँ,
मेरे पास माँ है।
***


बैक स्पेस

अभी अभी एक वोटर ने
दुख प्रकट किया
व्हाट्सएप ग्रुप पर
खूब किया मंथन
इस बार वह धरातल पर रहकर दुखी
खिसक चुकी थी उसकी जमीन
पर कुछ रोज पहले
वोट उसने आम की महिमा पर कुर्बान किया था
पेपर गैंग सॉल्वर
तंत्र का हिस्सा बन।

उसकी मेहनत पर पानी फेर चुके थे
आए दिन होता प्रदेश में वैसा ही खेल
जैसा उनके प्रतिद्वंदी राजनीतिगण खेलते थे
माया के बिना  अखिलेश को समझना
योगी होना है
भ्रमहीन वह युवक
पर मजाक नहीं बनना चाहता था सोशल मीडिया पर
पर एक बात समझ में था उसके अंदर
वह लोकतंत्र के अधिकार को जानता था
पर दो शब्दों के मंत्र में
वह मंत्रमुग्ध व आत्ममुग्ध हो चुका था।
पर आज वह पेपर आउट के कारण
उसकी मेहनत व सपने भेंट चढ़ गई
नाकामयाब हुक्मरान के हाथों
सोशल मीडिया पर कह नहीं सकता
मजाक बन जाता
अपने लोगों के बीच।
मेहनती है वह
पर उसे-
अब भ्रष्ट तंत्र में उसके मेहनत का फल
मिलने वाला नहीं
क्योंकि उसने दो शब्दों के एवज में
चुन लिया उन लोगों को
जिन्हें नहीं था सरोकार।
सकारात्मकता लिए वह सारे ग्रुपों से लेफ्ट हो चुका/
दोबारा कामयाब मेहनत के लिए
खोज रहा था बैक स्पेस।
***


जेसीबी का हृदय परिवर्तन

'जेसीबी' खोदता-तोड़ता
पुरानी फिल्मों का
जाना पहचाना खलनायक
बुलडोजर का सगा भाई
अब भ्रष्टाचार की जड़ को
उखाड़ फेंकने के लिए तैयार
बदल गया अपना जेसीबी
कुछ दिनों से राजनीतिक प्रयोग से ऊबकर
लिया उसने समाजिक फैसला
उसका हृदय परिवर्तन
साक्षात ब्रह्म है
अपने राजनीतिकरण से आक्रोशित
जेसीबी ने लिया प्रण
वह जन के लिए वजन उठाएगा
वह जन के लिए निर्माण करेगा
वह भ्रष्टाचार की पहचान
अपने भरकम टायरों से करेगा
हर निर्माण की ईट बालू सरिया से
पूछेगा अपनी भाषा में
उसके बनाने में किन भ्रष्ट हाथों का हाथ
जेसीबी तैयार करेगा दस्तावेज
अंत लड़ेगा भ्रष्ट खलनायकों से
अपने दम पर
न्याय माँगेगा न्यायालय से।
***

बूढ़ा पार्क

हमारे पास का तालाब
पाटकर
विकास के नाम पर
पार्क में बदल दिया गया
पार्क कुछ महीनेभर तक जवान था,
फिर बेगैरत इंसानों ने
बूढ़े बाप की तरह छोड़ दिया
उसके हाल पर।
आज पार्क जर्जर हो गया
वहाँ भोंकते कुत्ते
उस तालाब को याद करते
मैंने नजर दौडा़या
दिखायी दिया तालाब की कुर्बानी
असल में पर्यावरण की कुर्बानी।

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