व्यंग्य: कबीरा खड़ा बजार में

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

क्या मालूम कबीरदासजी ने कौनसा बाज़ार देखा था। तब भिंडी बाजार या ज़वेरी बाज़ार नहीं थे। पर उन्होंने क्या खूब कहा - 'कबीरा खड़ा बजार में, सबकी माँगे खैर।'  इन दिनों बाज़ार में सबकी बजती है, सबकी जेब कटती है। शुक्रिया कबीरजी आपने हम सबकी खैर की दुआ माँगी। हमने तो आप जैसी सोच वाले रचनाकारों को अब हाशिए में धकेल दिया है।

इस सदी में हर चीज बाज़ारीकरण के दौर में है, आदमी से लेकर उसका पाजामा तक। चीज छोटी हो या बड़ी, खरी हो या खोटी, बस पैकिंग जानदार हो, कवर शानदार हो। अब माल के पहले डिब्बे की चमक बोलती है। चुनाव परिणाम के पहले पार्टी का घोषणा-पत्र बोलता है। घोषणा-पत्र न बोले तो जमानत ज़ब्त होने में क्या देर लगती है। राजनेता बाज़ार में आएँ उसके पहले उनका बखान शुरू हो जाता है। नारे लगते हैं - हमारा नेता कैसा हो, कोई नहीं कहता -'चोर, उच्चकों जैसा हो।'  जनता सच जानती है कि बहुत से राजनेता इन विशेषणों पर खरे उतरते हैं। बाज़ार और चीजों के साथ भी ऐसा ही है। नेता बाज़ार में है, चुनाव के बाज़ार में वोट बिक जाते हैं, पूंजी के बाज़ार में चीजों के बदले आदमी बिक जाता है। 
जनता सोचती है 'वसुधैव कुटुंबकम्' मतलब सारी दुनिया अपना घर हो, कहीं आने-जाने के लिए पासपोर्ट, वीज़ा न लेना पड़े। परन्तु राजनीति सत्ता के बारे में सोचती है। वह जनता की लगाम कस कर पकड़ रखना चाहती है। उसने दुनिया का वैश्वीकरण नहीं किया, सिर्फ बाज़ार का वैश्वीकरण किया है – ग्लोबल मार्केटस्, केपिटल मार्केटस्। आम राजनेता, अमेरिकी राजनेता जैसे धूर्त, चीनी राजनेताओं जैसे चालबाज़ और उत्तरी कोरिया के राजनेताओं जैसे अगड़म-बगड़म नहीं हुए तो फिर क्या राजनीति! ग्राम पंचायत के पंच या नगर पालिका के पार्षद का ही चुनाव जीतना हो तो पुतिन या ट्रंप को 'फॉलो' करना पड़ता है।

बाज़ारीकरण के दौर में पूंजी में बड़ी वृद्धि हुई है, पूंजीपति बढ़े हैं, दिलों को दौरे पड़ रहे हैं और दिल छोटे हो गए हैं। सारे बड़े नोट नए हो गए हैं, सारा गंदा धन पवित्र हो गया है। काला धन ऑफ़-शोर जा-जा कर सफ़ेद हो गया है। बाज़ारीकरण ने दिमाग़ का कबाड़ा कर दिया है। अब घड़ी का ख्याल आता है तो रोलेक्स दिखती है। टाइम तो वह भी वैसा ही बताती है जो पाँच सौ रुपये की घड़ी बताती है। और, घड़ी कुछ भी समय बताए, कहीं पहुँचने में एक-डेढ़ घंटा लेट हों तभी तो प्रतिष्ठा की बात है। टाइम देखना इसलिए ज़रूरी नहीं है कि समय से पहुँचना है। टाइम देखना इसलिए ज़रूरी है कि लेट पहुँचना है, प्रतिष्ठा से पहुँचना है। अपना महत्त्व भले ही खोखला है, उसे डमरू बजा-बजा कर बताना ज़रूरी है। 

मर्सिडीज़ या जेगवार कार का सपना देखना अलग बात है। लेकिन आम बाज़ारियों ने अपना नाम जनमानस के दिमाग़ में इस कदर ठूँस दिया है कि आटा फलाँ ब्रांड का चाहिए  तथा दाल फलाँ ब्रांड की। कपड़ों का ब्रांड तय, और जूतों का भी। दाँत चमकाने के लिए दन्त-कांति चाहिए और बाल चमकाने के लिए केश-चंगा। हमारी ज़रूरतों और आदतों पर पिशाचों का साया पड़ गया है। तीन साल के बच्चे को अब झुनझुना नहीं, आई-पैड थमाना पड़ता है। बच्चों को यदि माँ-बाप पसंद करने की सुविधा मिले तो अस्सी प्रतिशत माँ-बाप रिजेक्ट हो जाएँ।

बाज़ारवाद में मॉल अब लालसा केंद्र बन गए हैं। जय हो क्रेडिट कार्ड की। उधारवाद बहुत उदार हो गया है। जो मर्जी आए खरीद लो। नहीं चाहिए तो भी खरीद लो, बाद में 'सेल' में मिले न मिले। आज नहीं खरीदा तो यह जन्म अकारथ चला जाएगा। कल किसने देखा, आज में जियो और ठप्पे से उधार लेकर जियो। कल आम चुनाव आएँगे, तो झाँसा पार्टी ज़रूर वादा करेगी कि उनकी सरकार बनी तो वे सब कर्जे माफ़ कर देंगे। क्रेडिट कार्ड के कर्जे भी माफ़ हो जाएँगे। लोकतंत्र में राजनेता मनभावन वादे कर सकते हैं। यह राजनीति का अपराधीकरण है या अपराधियों का राजतिलक!

मॉल में टोपी पहना कर बेचने की कला आनी चाहिए। बाज़ार मतलब मुनाफा कमाने की जगह। बड़ा बाज़ार यानि बड़ा मुनाफा, और मॉल मतलब मालामाल। छोटे कारोबारियों को मॉल-संस्कृति कच्चा चबा गई है। शुरू-शुरू में जनता ख़ुश हुई थी कि चीजें सस्ती मिलेगी। चीजों का रंग-रूप बदल गया, कीमतें बहुत बढ़ गईं, पर डिस्काउंट का टैग लग गया। उल्टे बाँस बरेली को। दिमाग़ शातिर होने के बावजूद डिस्काउंट को बचत समझने लगा है। रहस्यमयी दुकानदार ज़्यादा मुनाफा कमाने लगे हैं। वाह रे चालक बाज़ार, कैसा धूर्त कर्म, चित भी तेरा पट भी तेरा।

हर मॉल में खाने-पीने के लिए फूड कोर्ट होते हैं। वे फास्ट फूड और स्लो फूड बेचते हैं। फास्ट फूड जल्दी बनता है, और धीरे-धीरे आदमी को फैलाता है। घर से टिफिन ले कर आने वालों को यहाँ अपना डिब्बा खोलने में शर्म आती है। यहाँ घर का खाना खाकर गँवार कहलाना है क्या! माँ-बहनों को यहाँ पीज़ा और नूडल्स खाना, छप्पन भोग जैसा लगता है। दुनिया की आधी आबादी भूखों मरती हैं, पर फूड कोर्ट में खाना खाने वाले कई लोग आधा खाना कचरे में डालते हैं। वे इसे कहते हैं दरियादिली। यह भोग-विलास, विकास है या सामूहिक विनाश की और बढ़ते शुरूआती क़दम! यदि हमने सामाजिक अर्थशास्त्र बनाया होता तो हम इसे कहते उपभोक्ता पागलपन।

ऑन-लाइन शॉपिंग ने महाआलसी लोगों को भी जेबें खाली करने पर मज़बूर कर दिया है। ऊँगली घुमाई कि आधुनिक जिन्न हाज़िर। 'मेरे आका, एक चीज खरीदिए, दो मुफ़्त में लीजिए। बस आप क्रेडिट कार्ड का नंबर तैयार रखिए, दुनिया आपके क़दमों में।' बेचारे पुरुष इसी बात में खुश है कि शॉपिंग बैग ढोने के अवांछित काम से मुक्ति मिली। जेब तब भी ढीली होती थी, पर उसमें गरिमा नहीं थी। 

आज सुबह से पाँच वर्षीय नाती ज़िद कर रहा है, उसे लॉलीपॉप चाहिए। मैंने उस पर दशकों पुरानी तकनीक आजमाई, कहा – ‘दुकान पर लॉलीपॉप ख़त्म हो गए।’ उसने अपने आई-पैड पर गूगल खोला, लॉलीपॉप लिखा और परिणाम सामने कर दिए। बोला, नाना यहाँ आर्डर कर दो, पापा यहीं से सामान बुलाते हैं। मेरे पाँवों-तले की ज़मीन खिसकती लगी। अच्छा है, बैंक वालों को किसी ने यह कु-कारोबारी प्रस्ताव नहीं दिया कि माँ-बाप की जमानत पर बच्चों को क्रेडिट कार्ड पकड़ा दो, अन्यथा बच्चे तो इतने होशियार हो गए हैं। एक ज़माना था, बाज़ार, बाज़ार में हुआ करता था। अब तो बाज़ार ऊँगली की नोक पर है, किचन में है, बेडरूम में है और लिविंग रूम में है। मोबाइल पर चौबीसों घंटे खुला है, बाज़ार से कहाँ बचोगे। सिर्फ एक चीज ख़रीदने पर कितना कुछ मुफ़्त है यहाँ। न आपको कुरियर का ख़र्च देना है, न पैकिंग का। 

फ़िज़ूलख़र्ची का आलम यह है कि हम हमारे दिमाग़ का रिमोट, सेल्समेन के हाथ थमा देते हैं। वह हमारी पसंद की प्रशंसा करता है, और हम बाग-बाग हो जाते हैं। मन ही मन कह उठते हैं दिल चीज क्या है आप जान लीजिए, और हमारा क्रेडिट कार्ड स्वतः अवतरित हो जाता है। इन दिनों, चीज की उपयोगिता के बारे में सोचना कंजूसी है। चीज में सोशल स्टेटस बढ़ाने का दम होना चाहिए बस। नए से नया मॉडल हमारे साथ सेल्फी में फेसबुक पर हो, लोग जिज्ञासा से देखें और तारीफ़ करें। हम तारीफ़ के बहुत भूखे हैं। सामान कुछ दिनों में पुराना, उबाऊ और कॉमन हो जाएगा, पर हमें मॉर्डन बने रहना है। चीजों का क्या है, हम और नई ख़रीद लेंगे, पुरानी फेंक देंगे। हमें क्या फ़र्क पड़ता है, नया ख़रीदो, पुराना फेंकों। हमें तो 'लैंड फिल' करते हुए ज़मीन को कचरे से पाट देना है। आज में जीना है तो ज़मीन खोदिए, अनाज उगाइए, खनिज निकालिए, ज़हर फैलाइए और चैन से जी लीजिए अपनी ज़िंदगी। कल, जो कुछ हज़ारों साल बाद आएगा, अपनी पीढ़ियाँ ज़मीन खोदेगी तो उन्हें मिलेगी 'लैंड-फिल' से पाटी गई धरती; धुंध-धुएँ और ग्लोबल वार्मिंग से धधक रही धरती। आज से कुछ हज़ारों साल पहले जन्मे लोग गँवार, कंजूस और अंगूठा छाप थे जो हमारे लिए इतनी सुन्दर धरती छोड़ गए। अब अगर ये धरती ख़त्म हो जाये तो क्या है?  हम तो अब तक के सबसे बुद्धिमान, धनी और टैकी (तकनीकी) लोग हैं, धरती को उजाड़ कर चाँद और मंगल ग्रह पर बसने की सोच रहे हैं।
_________________________________________
ईमेल: dharmtoronto@gmail।com फ़ोन: + 416 225 2415
सम्पर्क: 1512-17 Anndale Drive, Toronto M2N2W7, Canada

No comments :

Post a Comment

We welcome your comments related to the article and the topic being discussed. We expect the comments to be courteous, and respectful of the author and other commenters. Setu reserves the right to moderate, remove or reject comments that contain foul language, insult, hatred, personal information or indicate bad intention. The views expressed in comments reflect those of the commenter, not the official views of the Setu editorial board. प्रकाशित रचना से सम्बंधित शालीन सम्वाद का स्वागत है।