कविताएँ: मुहम्मद हनीफ़

मुहम्मद हनीफ़

- मुहम्मद हनीफ़

तुम चुप क्यों?

सृष्टि के साथ जन्मदात्री
तुम्हारी करुणा अतुलनीय
तुम स्वंय गंगा
लहरें चूमती तुम्हें
तुम एक सम्पूर्ण जीवन
तुम हो वस्तुतः
एक आयाम
एक व्योम
एक नभ, नव विहान
फिर तुम चुप क्यों?
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उस घनी छाँव में

        उस घनी छाँव में कैद है
        बचपन की धुंधली यादें
        रस्ते गुजरते जन की भीड़
        जेठ की दुपहरी में पागुर
        करते गायों के झुंड
        कोयल की सुरीली कूक
        झींगुर की शहनाई
        हवा का एक सुनहला गीत
        उस घनी छाँव में--
उस घनी छाँव में कैद है
आशाओं की एक दीप
उम्मीद की एक किरण
भावी जीवन की एक साँस
समय की अशेष कल्पनाएँ
उस घनी छाँव में---
             उस घनी छाँव में
             अब वह छाँव नहीं रहीं
             केवल कल्पनाएँ सोती हैं
             पत्तियों पर--
             गीत गाती हैं दर्द के
             फुनगी पर बैठीं
              तितलियाँ, भौरें--
             बेरुखी से उखाड़ी गयी
             जड़ों पर चीखतीं
             सम्वेदनाएँ--
             पुकारती, चिल्लाती
             जख्मों को दिखातीं
             टहनियों में आँसुओं को
             पोंछतीं--
             ह्रदय की पीड़ाएँ
            उस घनी छाँव में।
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आखिरी तस्वीर

माँ, तुम्हारी तस्वीर
मेरी आँखों में कैद है
वह तस्वीर, जबकि तुम्हारी भी
आंखों में आंसू थे
मेरी ही आंखों की तरह।
यकीन मानो, तुम आज भी
मेरे साथ-साथ साये की भांति
चलती रहती हो हर पल, हर क्षण
भले ही तुम दिखती नहीं।
शीशे के पास खड़े
मेरे चेहरे में तुम चुप
खड़ी हो जाती हो
लगता है, मेरी पलकों पर
तुम बैठी हो।
मेरे हर कदम, हर सोच में
तुम्हारी बातें अनायास
आ जाती है याद
सचमुच तुम कहीं नहीं हो
या फिर रगों में बसी हो।
माँ... तुम्हारी आखिरी तस्वीर
काश आखिरी नहीं होकर
पहली हुई होती
सांसारिक माया-मोह को त्यक्त
खो जाता
तुम्हारी ही आँचल
एक बार फिर।
और भूल जाता
सब कुछ...
तुम्हारी एक मुस्कान में
निर्निमेष।
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वसंत

जब आम की टहनी पर कोयल
कोई मर्म गीत गाये
सखुए की सूखी डाली पर झींगुर रट लगाए
नीम की पत्तियों में छिपा पंछी अपना पंख फैलाए
आसान है यह कहना वसन्त आ गया
खेतों के मटर सूखने लगे
चना बाड़ी से उखड़ने लगे
प्याज की क्यारी फटने लगे
आसान है यह कहना वसन्त आ गया
हवा की नमी में गुलाब नाचते हों
नदियों को रजकण जाँचते हों
पलाश के पराग में मधु नया गीत गाता हो
आसान है कहना बसन्त आ गया|
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