कविताएँ

-मुकेशकुमार

हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला

मौन

मौन होना
शालीनता नहीं ,
बल्कि कहीं न कहीं
तनाव की भी अभिव्यंजना है,
मौन एक आक्रमण की तरह है
जिसे मर्यादा के सहारे
आदमी ढोता रहता है,
और रण-क्षेत्र में हारकर
जैसे योद्धा रोता रहता है।

सभ्यता और संस्कृति का द्वंद्व
व्यंजित करता है एक नीरवता,
खामोशी और छटपटाहट,
जिसके दायरे में रहकर
बीज वह नवीनता के बोता रहता है,
मरती रहती है जिज्ञासाएँ,
विद्रोह-शक्ति देता है उसे मन
खुद समाज से अलग होकर
सत्ता से कुछ आस लगाएँ,
पर हर बार वह
अपने मौन में खुद को खोता रहता है!
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खेतों का सिपाही

पेट पालने की इच्छा,
परिवार पालने की इच्छा,
खुद को खेतों के प्रति समर्पित रखने की इच्छा,
जो वह रोज़ कड़कड़ाती लू में तपता है
व्यथा है उस किसान की
जो देश का अन्नदाता है;
क्या वह कभी नहीं थकता है?

राजमहलों को भी और फुटपाथ के लोगों को भी
रोज़ पालता है,
वही उसका दुख जो खुद चुप होकर रोज़ खामोशी से
उसे सालता है!
मैं इत्र की महक हूँ,
सरसों के लिए।
मैं लावे की दहक हूँ
क्रांति के लिए!
रोज़ चिलचलाती धूप, गेहूँ के डंठलों सी कटती है
तब जाकर मेरे हिस्से की रोटी हर थाली में बँटती है

वह भूमिवीर, मिट्टी से उपजा, उसी से उसका जन्म है
अगर किसान देश का अन्नदाता है
तो तभी भारत-भूमि भी 'वसुधैव कुटुंबकम' है ,
कुछ हमदर्दी है, जो मुझे खेतों से जोड़े रखती है
फसल की आवक ही उसे अपने में तोड़े रखती है
उसका अन्याय और सृजन-बीज की कटौती,
जो उसकी छाती को पीठ तक मरोड़े रखती है!

सबको खिलाने वाला, खुद भूखा ही सो जाता है
गर्मी के दिन, जाड़ों की रात फुटपाथ पर बिताता है
पर, किसान का संबंध मिट्टी से कभी टूट नहीं सकता
उसका बोया बीज, मिट्टी में बंजर छूट नहीं सकता
ऐसा धरती-वीरपुत्र ही 'खेतों का सिपाही' है।

हिंदी विभाग, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, समरहिल, शिमला (हिमाचल प्रदेश 171005)
पता: गाँव कड़ियाना, डाकखाना: लाना पालर, तहसील: संगड़ाह, जिला: सिरमौर (हिमाचल प्रदेश 173023) 
चलभाष: +91 858 071 5221

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