दो ग़ज़लें

- बलजीत बेनाम

सम्प्रति: संगीत अध्यापक
विविध मुशायरों व सभा संगोष्ठियों में काव्य पाठ। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित
विभिन्न मंचों द्वारा सम्मानित।
सम्पर्क: 103/19 पुरानी कचहरी कॉलोनी, हाँसी। चलभाष: +91 999 626 6210


ग़ज़ल 1

तब ख़ुशी का पल मयस्सर हो सका
अश्क जब आँखों से बाहर हो सका

भूल जाने का मैं वादा क्यों करूँ
भूल जाऊँगा तुझे गर हो सका

दिल में सबके वास्ते तू प्यार रख
यूँ कहाँ कोई समंदर हो सका

उस मकाँ में क़ैद थी मेरी अना
बारहाँ कोशिश से जो घर हो सका

तेरे जीने पर है लानत गर सुकूँ
दूसरों को दर-बदर कर हो सका।


ग़ज़ल 2

हमारा नाम आएगा तुम्हारे नाम से पहले
हुई है मौत क़ासिद की अगर पैग़ाम से पहले

कोई मुजरिम भी कर सकता है अपने जुर्म से तौबा
फ़क़त वो जाँच ले हर जुर्म को अंजाम से पहले

वहाँ के लोग तो दहशत के मारे होंगे ही साहिब
मुक़र्रर हो जहाँ भारी सज़ा इनआम से पहले

ज़रूरत जब तलक़ पूरी न कर पाऊंगा बच्चों की
भला कैसे मैं घर पर लौट जाऊँ शाम से पहले

ख़ुमारी में कहाँ होती बसर फिर क्या पता यारो
बहुत तुम याद आते हो मगर दो जाम से पहले।

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