साहित्य के समाजशास्त्र में समाज के अध्ययन का अर्थ एवं इसका महत्त्व

-संजय कुमार 

शोधार्थी, पीएचडी (हिंदी), जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली


साहित्य का समाजशास्त्र नाम लेते ही विभिन्न आलोचकों के भिन्न-भिन्न मतों से हम घिर जाते हैं। साहित्य के समाजशास्त्र में समाज के अध्ययन के अर्थ के संदर्भ में कुछ मूल प्रश्न हमारे सामने उपस्थित होते है जैसे –
किसी साहित्य के निर्माण में समाज की क्या भूमिका होती हैं?
किसी रचना की जड़ें समाज में कितनी समायी होती है?
किसी रचना में युग की प्रभावशाली विचारधारा का रचना की अंतर्वस्तु और रूप पर क्या प्रभाव पड़ता है?
तथा कोई रचना किस प्रकार तथा किस सीमा तक अपने समाज को प्रभावित करती है?

साहित्य के समाजशास्त्र में समाज के अध्ययन के अर्थ का संदर्भ जब हम लेंगे तो इन मूलभूत प्रश्नों को ध्यान में रखना होगा। विभिन्न समाजशास्त्री आलोचकों व विचारकों ने भी संभवतः इन्हीं प्रश्नों को ध्यान में रखा होगा। अधिकांश समाजशास्त्रियों का मानना है कि किसी रचना के अंतर्वस्तु में ही समाज व्यक्त नहीं होता अपितु रचना के प्रत्येक स्तर पर अर्थात उसकी अंतर्वस्तु संरचना ,शिल्प और भाषा में भी समाज की अभिव्यक्ति होती हैं। समाजशास्त्र समाज के अध्ययन का शास्त्र है। व्यक्तियों के समूह को समाज बनता है। व्यक्ति अकेले में जीवन व्यापन नहीं कर सकता। सामाजिक पूर्णता प्राप्त करने के लिए उसे अपने आप को समाज से जोड़ना ही पड़ता है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है उसे दूसरे व्यक्तियों के सहचर्य की आवश्यकता होती है। स्पष्ट है कि सहचर्य में अंतर व्यवहार निहित रहता है। अंतर-व्यवहार ही व्यक्तियों को एक दूसरे से साथ जोड़ता है और सामाजिक संबंधो का निर्माण करता है सामाजिक सम्बन्ध ही समाज का आधार है समाजशास्त्र इसी का ही वैज्ञानिक रंग से अध्ययन करता है इसीलिए समाजशास्त्रीय दृष्टि से साहित्य की अध्ययन पध्दति विकसित हो रही है जो साहित्य के समाजशास्त्र का एक अंग है। “साहित्यिक समाजशास्त्र का लक्ष्य कृति की केवल व्याख्या नहीं हैं। यह काम तो दूसरी आलोचना पद्धतियों में भी होता है। उसका लक्ष्य साहित्यिक कृति की सामाजिक अस्मिता की व्याख्या करना है। साहित्यिक कृति की सामाजिक अस्मिता रचना के सामाजिक संदर्भ और सामाजिक अस्तित्व से निर्मित होती है। इसीलिए साहित्य के समाजशास्त्र में उस पूरी प्रक्रिया को समझने की कोशिश होती है जिसमें कोई रचना साहित्यिक कृति बनती है।”1 जाहिर है कि साहित्य का समाजशास्त्र समाज से सम्पूर्ण साहित्य प्रक्रिया पर एक कृति से अनेक स्तरीय प्रत्यक्ष तथा परोक्ष सम्बन्धों के विश्लेषण में सुनिश्चित दृष्टि पर जोर देता हैं।

मैनेजर पांडेय लिखते है, “आज के साहित्यिक समाजशास्त्री रचना की अस्मिता को स्वीकार करते हुए समाज से उसके संबंध का विश्लेषण करते है। लेकिन समाज से रचना की संबंध भावना या समाजशास्त्रीय संबंध भावना का स्वरूप और उसकी खोज की प्रकिया अब भी जटिल समस्या बनी हुई हैं 2 आज के समय में साहित्य और साहित्यकार की वही स्थिति नहीं है जो सामन्ती समाज में थी। आज साहित्यकार की बदलती स्थिति पर विचार करे तो यह बात समझने में देर नहीं लगेगी कि सामन्ती समाज में जो स्थिति कालिदास, कबीरदास, बिहारी, भूषण की थी यही आज के लेखक की नहीं हैं।

“समाज में साहित्य की सत्ता और स्थिति का एक और पक्ष है। वह व्यापक सामाजिक ढाँचे से अनेक रूपों में जुड़ा होता है। वह सामाजिक प्रक्रिया के आर्थिक, राजनीतिक और विचारधारात्मक व्यवहारों से प्रभावित होता हैं और उनको प्रभावित भी करता है। साहित्य में समाजशास्त्र के कैसे संबंधों का अध्ययन होता है। इस अध्ययन के लिए कुछ विचारक साहित्य को एक सामाजिक संस्था मानते है। वे कहते है कि जैसे दूसरी सामाजिक संस्थाएँ सामाजिक प्रक्रिया में बनती है और उसे प्रभावित करती है वही स्थिति साहित्य नाम की भी हैं।”3 इस तरह समाजशास्त्रीय दृष्टि में साहित्य और समाज की स्थिति बदलते परिवेश के साथ बदलती चली जा रही है
साहित्य के समाजशास्त्र के विकास में प्रमुख पाश्चात्य साहित्यिक समाजशास्त्रियों की भूमिका अहम रही है। जिसमें इतोलित अडोल्फ़ तेन, लिओ लवेंथल, लूसिए गोल्डमान और रेमण्ड विलियम्स प्रमुख है। भारतीय समाजशास्त्रियों ने सम्पूर्ण भारतीय समाज के परिप्रक्ष्य में जो विचार रखे है उससे पता लगता है कि समाज की समस्यओं की जड़ तक यह गये थे जिसके समाधान हेतु निरंतर प्रयासरत रहे है जिसमें अग्रणी आंबेडकर, गाँधी थे।

साहित्यिक समाजशास्त्री लिओ लावेंथल ने साहित्य को ही मनुष्य की चेतना और सामाजिक मूल्य व्यवस्था को जानने का एक महत्वपूर्ण स्रोत मानकर कहा, “आधुनिक समाज में संस्कृति को जानने की कुंजी साहित्य है और साहित्य को समझने की कुंजी मध्यवर्ग के समाज की मानसिकता की जानकारी हैं।”4

साहित्य के समाजशात्र में समाज के अध्ययन की एक और दिशा हो सकती है। साहित्य रचना का समूचा व्यवहार कल्पना का क्रिया व्यापार है, जीवन जगत के बोध, यथार्थ की चेतना, चरित्र निर्माण, भाषा की भंगिमा का विकास सब कुछ कल्पना के सहारे होता हैं, रचनाकार कल्पना के माध्यम से पहले, दूसरे के अनुभव जगत में प्रवेश करता है बाद में कृति के माध्यम से पाठकों को अपने अनुभव का सहयोगी बनाता है। कल्पना साहित्य में एक वैकल्पिक व्यवस्था का विरोध करती है। कल्पना की यह भूमिका साहित्य व समाज के सम्बंध में विचारणीय है।
साहित्य में समाज की सत्ता और स्थिति का एक और पक्ष है वह व्यापक सामाजिक ढाँचे से अनेक रूपों में जुड़ा होता है। समाजशास्त्र की तरह साहित्य का भी मुख्य सरोकार होता है मनुष्य का सामाजिक जगत उस जगत के प्रति उसकी अनुकूलता और उसे बदलने की इच्छा। रिचर्ड होगार्ट ने लिखा “साहित्यिक साक्ष्य के बिना समाज का अध्ययन करने वाला कोई भी व्यक्ति सामाजिक जीवन की पूर्णता से अनभिज्ञ ही रहेगा।”5

फ्रांसीसी दार्शनिक लुई द बनोल ने कहा, “किसी राष्ट्र के साहित्य को ध्यान से पढ़कर यह बताया जा सकता है कि उसकी जनता किस प्रकार की थी?” 6 साहित्य की रचना प्रक्रिया के अध्ययन से सामाजिक जीवन के संबंधों की खरी पहचान की जा सकती है। साहित्यकार के भाव जगत का निर्माण सामाजिक जीवन के साथ उसके सम्पर्क से होता है। उसके विचार आदि इसी सामाजिक जीवन की उपज है। ऐसी परिस्थिति में साहित्य समाज से विच्छिन्न नहीं रह सकता। साहित्य में समाज अपनी गहरी पैठ रखता है वह साहित्य के सभी रूपों और पक्षों को समग्रता में समझने पर जोर देता हैं साहित्य के समाजशास्त्र की मुख्य प्रवृत्ति समग्रतावादी है। जिसमें लेखक, पाठक और रचना की भी भूमिका होती है।

साहित्यकार समय-समय पर समाज के शासन व्यवस्था, राजनीतिक, ऐतिहासिक आदि मामलों में जरूरी हस्तक्षेप करता है, निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है साहित्यकार समाज से तटस्थता का कितना ही दावा क्यों न करें, सामाजिक जीवन से ग्रहण प्रभाव व उसकी अभिव्यक्ति की झलक उसकी रचना में प्राप्त हो ही जाता है।


संदर्भ ग्रन्थ सूची
1. साहित्य और समाजशास्त्रीय दृष्टि, मैनेजर पाण्डेय ,आधार प्रकाशन, संस्करण 2016, पृष्ठ संख्या 12
2. वही, पृष्ठ संख्या 16
3. वही, पृष्ठ संख्या 38
4. साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका, मैनेजर पाण्डेय, हरियाणा ग्रन्थ अकादमी,पंचकूला, पृष्ठ संख्या 63
5. साहित्य और समाजशास्त्रीय दृष्टि, मैनेजर पाण्डेय, आधार प्रकाशन, संस्करण 2016, पृष्ठ संख्या 20
6. हरिशंकर परसाई: व्यंग्य की व्याप्ति और गहराई- वेद प्रकाश, साहित्य भंडार प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2013 पृष्ठ संख्या 7

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