व्यंग्य: वीर रस का व्यंग्यकार

धर्मपाल महेंद्र जैन

बिंदास: धर्मपाल महेंद्र जैन

कई सालों बाद गाँव लौटा हूँ, यहाँ भले कोई परिचित नहीं बचा पर अपरिचित लोग भी मिलने आ जाते हैं। अपरिचित लोग मीठा बोलते हैं, और धीरे-धीरे अपनी जड़ें बनाते हैं। परिचय घनिष्ठता में बदल पाए तब टांग खिंचाई शुरू होती है। ये तीनों लोग जो मेरी तरफ आ रहे थे 'ब्रांड न्यू' थे। पहले मिले होते तो बेशरम होते; इतना तो हर कोई मुझसे एक मुलाकात में सीख लेता है।
“जे राम जी की भैया, आप यहीं मिल गए” पहले सज्जन बोले। मुझे लगा, मैं उन्हें यहाँ नहीं मिलता तो वे मुझे ढूँढते टोरंटो आ जाते। मैंने कहा, “हाँ, कुछ दिन यहीं हूँ, आप बिराजिए।” वे सब एक दूसरे को बिठाते हुए बैठ गए। परस्पर समझ हो तो फायदा पूरी टीम को मिलता है।
दूसरे सज्जन शुरू हुए, “आप विदेश में रहते हैं, पर हिन्दी बोलते हैं।”
"हाँ, वहाँ जिन्हें हिन्दी आती है, वे हिन्दी बोलते हैं, बाकी अंग्रेज़ी बोलते हैं।"
“अपने यहाँ जिन्हें हिन्दी आती है, वे अंग्रेज़ी बोलते हैं। जिनको अंग्रेज़ी नहीं आती उनसे तो वे अंग्रेज़ी में ही बोलते हैं। हमको क्या, हम अपनी कहते हैं वे अपनी।” हम लोगों में सद्भावना इतनी ठूंसी हुई है कि सही भावना अंदर ही सुलगती रहती है।
“हमने सुना है, आप कविता करते हैं” तीसरा हाथ जोड़ कर बोला।
आज तक किसी ने इतने आदर भाव से नहीं पूछा कि मैं कविता लिखता हूँ।  इतना आदर पाकर मेरे रोम-रोम से कविता बाहर आना चाह रही थी, पर मैं आदमी बना रहा, एकदम कवि नहीं बना। मैंने विनम्रता से कहा, “जी मैं व्यंग्य लिखता हूँ।” 
“हमें वीर रस वाला चाहिए” वे बोले।
मेरा रचनाकार मन बेताब था। रचना पाठ किए बहुत महीने चढ़ गए थे। इसलिए मैंने कह दिया, “जी, मैं वीर रस का व्यंग्यकार हूँ। कुछ अर्ज करूँ?”
मेरे वचन सुन कर तीनों मेरे पाँव छूने लगे। मुझे लगा उन्होंने कई व्यंग्यकार देखे होंगे, पर वीर रस का व्यंग्यकार नहीं देखा होगा।
“आप कल ही अर्ज करना सबके साथ। आज तो आपने हमारी लाज रख ली, अपने गाँव की लाज रख ली। कल कवि सम्मलेन है और आज ठेकेदार कविराज का फ़ोन आया कि उनके वीर रस के कवि को चिकनगुनिया हो गया है। उन्होंने कहा कि आपके गांव में कोई वीर रस का कवि हो तो उसको श्रीफल दे कर रोका कर लो।” उन्होंने थैली में से श्रीफल निकाला और मेरे हाथ में रख दिया।
इच्छा हुई, उनसे पूछूँ कि शाल कब मिलेगी। शाल नहीं तो दुशाला ओढ़ा दें, मंच पर कल फ़ोटो खींचे तो कुछ सम्मान जैसा लगना चाहिए। कनाडा लौट कर बताने में प्रतिष्ठा बढ़ेगी कि भारत में लोगों ने बिना पैसे लिए सम्मान कर दिया। मैं और विनम्र हो गया, श्रीफल से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं, मैं तो मनुष्य हूँ, मेरी आत्मा और आत्मीय बन रही थी। मैंने पूछा - कल कहाँ आना है और कब?
"टेकरी पर पशु मेला भरा है, वहीं आना है, सब कवि शाम को वहीं भरेंगे।'
'आप पशु मेले में कवि सम्मलेन भरते हैं? मैंने आश्चर्य से पूछा।
"वहीं भरते हैं। मेले में हर साल बहुत पशु आते हैं। आप तो पहली बार आ रहे हैं।'
वे रुके, शायद कहना चाह रहे थे कि कविता सुनते हुए आदमी भाग सकता है; पशु सो सकता है पर भाग नहीं सकता। वह नारायण प्रिय नंदी है, टिकाऊ श्रोता है। पर वे ऐसा कुछ नहीं बोले, उन्होंने उत्साहित हो कर कहा “हमारे मेले में इस बार पशु राज्य मंत्री आ रहे हैं।”
“अच्छी बात है, अब तक आदमी पशु हुआ करता था, अब पशु भी राज्य मंत्री होते हैं।” 
"ना भैया, राज्य मंत्री तो आदमी ही होते हैं, पशु को राजनीति थोड़े ही आती है।"
मुझे अपने सामान्य ज्ञान के स्टेटस पर खेद हुआ। कुछ दिनों पहले प्रदेश सरकार से नाराज़ पाँच बाबाओं ने नर्मदा की परिक्रमा शुरू करने की घोषणा की तो सरकार डर गई। उसने पुण्य काम के लिए पाँच बाबाओं को एक साथ राज्य मंत्री बना दिया। साधु बाबा राज्य मंत्री होते हैं तो राज्य मंत्री पशु कैसे हो सकते हैं? मैंने सुधार करते हुए कहा 'अच्छा, तो जो बड़े मंत्री हैं, वे पशु हैं।'
'जेई समझ लो' वे गुस्सा करते हुए बोले।
मैं उनके भोलेपन पर हँस दिया तो हम सब ठहाके लगाने लगे। वे बोले 'बड़ी ठिठोली करते हो यार'। अब मैं भैया से यार बन गया था। अपने श्रोता बेतक़ल्लुफ़ हो जाएँ तो सुनने-सुनाने में मज़ा आ जाता है। बहुरिया ने भीतर से चाय भिजवा दी थी। सवेरे से यह मेरी दसवीं चाय थी। अंग्रेज़ों का आभार कि वे कप में चाय पीना सिखा गए, वरना परदादा लोटे में चाय पीते थे। दस लोटे चाय भारी पड़ जाती। 
“आप पशु मेले में कवि सम्मलेन क्यों करवाते हैं? कवियों के ये दिन आ गए कि पशुओं को कविता सुनाना पड़ती है।”
“अरे यार, बादशाह तुगलक के ज़माने से पशु मेले में कवि सम्मेलन हो रहे हैं। लोग दिन में पशु देखते हैं रात को कवि। दिन में मवेशी की ख़रीदी-बिक्री होती है, रात को मनोरंजन हो जाता है। अपने इलाके के मवेशी बचपन से ही कविता का आनंद ले रहे हैं। उनकी परवाह मत करो। आप तो वीर रस का माल तैयार रखो।”
'जी ठीक है, मेले में कौन-कौन से पशु आते हैं?" मैंने अपन ज्ञान अध्यतन करने के हिसाब से पूछा।
'सब तरह के आते हैं, मुर्रा भैंसें होती हैं, नागौरी बैल होते हैं, खच्चर, घोड़े, ऊँट, साँड सब।'
“साँड कौन खरीदता है भला! साँड तो खुले घूमते रहते हैं।”
“वे दिन गए, अब सरकार ख़ुद साँड खरीदती है।”
"क्यों, सरकार के पास साँड कम हैं क्या?"
“आप ठेठ विदेशी ठहरे। मेले में सैकड़ों विदेशी आते है। ओढ़नी, चूनर, घाघरे, चूड़ियाँ सब ख़रीदते हैं। हम उनके साथ खड़े हो कर सेल्फी लेते हैं, वे मवेशियों के साथ सेल्फी लेते हैं। मवेशी आप लोगों के लिए अजूबा है। आप क्या जानों साँड। भारत में सरकार हर गाँव में एक साँड रखती है।”
"मैं तो समझता था कि हर गाँव में एक सरपंच होता है।"
“ऐल्लो, सरपंच जी क्या साँड से कम होवे है।” एक निवेदक बोले तो दूसरे ने बात आगे बढ़ाई। “क्या लपेट के मारते हो भैया। बस कल वीर रस की कुछ सुना दइयो।”
"पक्का, वीर रस की सुन कर पशु तो नहीं फड़केंगे, पर लोग फड़क गए तो?"
“लोग सोमरस पी के ना फड़के तो वीर रस सुन के कुछ ना होनो। आप तो सुना दीजो। जानवर को का समझ में आवे है?”
"तो मेले में आदमी को समझ में आता है।" मैंने उत्सुकता से पूछा।
इस बार बड़ी जोर का ठहाका लगा। भैया ने खैनी निकाल ली और चूना मलने लगे। कहने लगे, तुम परदेसी भले हो गए, पर ये मिला के देने की गाँवड़ेली नहीं छोड़ी। मैं अब वीर रस में व्यंग्य लिख रहा हूँ, सोच रहा हूँ किससे शुरू करूँ उत्तरी कोरिया के किम जोंग से या चहेते ट्रंप से।

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