धैर्य, औदार्य, संतुलन, और अनुशासन सम्पादक के अनिवार्य गुण हैं


प्रख्यात साहित्यकार डॉ. हरीश नवल से अनुराग शर्मा की वार्ता


... आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी दोनों संस्थाओं के अतिथि वक्ता होते थे उसी तरह हरीश नवल दोनों ओर के समर्थक श्रोता। हरीश नवल सारी बातचीत के बाद मनुष्यता के पक्ष में खड़े दिखाई देते थे। दोनों प्रकार के विचार अपने पथ में हाई रहते थे पर कोई हाथापाई नहीं होती थी। चर्चाएँ-चर्चाएँ, बस चर्चाएँ और चर्चाएँ। कोई आवाज़ ऊँची नहीं करता था सब विचारों को ऊँचा करते थे। आउटडोर की ये चर्चाएँ, कक्षाओं से कहीं ज़्यादा ज्ञानवर्धक होती थीं, क्योंकि हर कोई पढ़ कर आता था और बोलता था तो बड़े आत्मविश्वास के साथ बोलता था।

हरीश जी में वह आत्मविश्वास मैंने उन्हीं दिनों में देखा। कम बोलते थे और बोलने से पहले तोलते थे। जो कहना चाहते थे उसके लिए शानदार सी भूमिका बनाते थे। उस पूरी फेंटी में यूँ तो हर मित्र के अलग-अलग गुण थे पर हरीश नवल की यह बात मुझे पसंद आती थी कि वे अपना तर्क रखते समय दृढ़ और निश्चयात्मक होते थे।

- अशोक चक्रधर (8 जनवरी 2007 को नवल जी की षष्टिपूर्ति पर)

अनुराग शर्मा: हरीश जी, नमस्कार। सबसे पहले अपने बचपन, और तत्कालीन परिवेश के बारे में कुछ बताइये।

डॉ नवल: भारत की स्वतंत्रता से कुछ पहले 8 जनवरी 1947 को नकोदर पंजाब में मेरा जन्म हुआ। तीन भाई बहन - एक बड़े भाई, एक छोटी बहन, और मंझला मैं। पिता स्वर्गीय हरिकृष्ण नवल अंग्रेज़ी के अखबार फ़ौजी में पत्रकार थे। 32 वर्ष की अल्पायु में जब वे दिवंगत हुए, माँ मात्र 27 वर्ष की थीं ...

अनुराग शर्मा: सॉरी, ... क्या मैं जान सकता हूँ उन्हें क्या हुआ था?

डॉ नवल: पिता सदर दिल्ली कॉङ्ग्रेस के अध्यक्ष थे, छात्र सेनानी थे, सदा खादी पहनते थे, केके बिरला उनके साथी थे। सुनते हैं कि वे बहुत प्रभावशाली वक्ता थे। भारत के विभाजन के बाद नवनिर्मित पाकिस्तानी क्षेत्रों में हो रहे नरसंहार से बचकर आने वाले परिवार अपनी जान और अस्मिता बचाकर भारत और जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रों में आ गये थे। भारत पहुँचने वाले परिवार तो सुरक्षित हो गये लेकिन जब पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण किया तो पश्चिमी पंजाब से बचकर मीरपुर आये सिख और हिंदू शरणार्थियों के साथ पाकिस्तान वाली कहानी दोहरायी गयी। पिताजी मीरपुर से पाकिस्तान ले जायी गयी स्त्रियों की वापसी के लिये भरसक प्रयत्न करने वाले दल की अगुआई कर रहे थे। विकट गर्मियों के दिन, निरंतर काम किया - आवाजाही, यात्राएँ ... उन्हें लू (हीट स्ट्रोक) लग गयी थी। सभी प्रयास किये, लेकिन ... नेहरू जी ने रीथ भेजा था।

दादाजी पंडित त्रिलोकनाथ 'आज़म जलालाबादी' अपने समय के प्रसिद्ध चिकित्सक और प्रसिद्ध स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के सहयोगी रहे थे। वे तिबिया कॉलेज के प्रमुख थे। उन्हीं के साये में, दिल्ली में मेरा पालन-पोषण हुआ। वे कई राजाओं के चिकित्सक थे, जो धन मिलता था उससे पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद, और भगत सिंह की एचआरए / एचएसआरए की आर्थिक मदद करते रहे थे। सायमन कमीशन के विरुद्ध हुये प्रदर्शन में भाग लिया था। कंधे पर तब सैनिक संगीन के घाव लगे थे, जिनके निशान बाद में हमने भी देखे।


अनुराग शर्मा: आज की आपकी सफल साहित्यिक यात्रा क्या बचपन से ही शुरू हो गयी थी?

डॉ नवल: बचपन में ही, सोने से पहले दादी या माँ से कहानी सुनने के बजाय मैं उनसे पूछता था किस विषय पर कहानी सुनाऊँ, वे विषय देते थे और मेरी कहानी शुरू हो जाती थी।

स्कूल में ही मैं छपने लगा था। कम उम्र में ही मुझे आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी, जैनेन्द्र कुमार, देवेंद्र सत्यार्थी, महादेवी वर्मा, आचार्य किशोरीदास वाजपेयी, डॉ विजयेन्द्र स्नातक, आचार्य चतुरसेन शास्त्री, प्रकाश पंडित, और यशपाल जैन जैसी विभूतियों का आशीर्वाद मिला। साहित्य यात्रा समय के साथ रोचक होती गयी। बाद में जब हम कॉलेज में थे तब जैनेंद्र कुमार जी ने राकेश जैन, सुरेश ऋतुपर्ण और मुझे मित्रत्रयी का नाम दिया और साप्ताहिक हिंदुस्तान में, तत्कालीन नवनियुक्त सम्पादक मनोहर श्याम जोशी ने 'मित्रत्रयी' को पत्रिका में स्थान देना आरम्भ किया।

अनुराग शर्मा: व्यंग्य क्या शुरू से आपकी पसंद था?

डॉ नवल: नहीं, मैंने भी कविता से शुरुआत की। स्कूल के दिनों में ही अपने सहपाठी राकेश जैन के साथ जैनेंद्र कुमार जी से मिलना हुआ। उन्होंने मेरी कविता सुनकर कहा कि मैं हास्य व्यंग्य अच्छा लिख सकता हूँ। कालांतर में डॉ विजयेंद्र स्नातक को सुना कि "कोई एक विधा जो अपने सर्वथानुकूल लगे, चुन लेनी चाहिये। तब मैंने कविता, व्यंग्य, नाटक के स्थान पर केवल 'व्यंग्य' को विधा के रूप में अपने लेखन हेतु चुन लिया। धर्मवीर भारती जी ने ज्ञान चतुर्वेदी, प्रेम जन्मेजय और मेरी तिकड़ी को नव-व्यंग्यत्रयी का नाम दिया।


अनुराग शर्मा: थोड़ी देर आपसे बात करते ही मैं यह कह सकता हूँ कि आपसे मिलने वाला कोई भी व्यक्ति आपके उल्लास से प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकता। इसके बारे में भी कुछ बताइये।

डॉ नवल: (हँसते हुये) मैं सदा से ऐसा नहीं था ...


अनुराग शर्मा: (टोकते हुये) फिर भी, कोई सीक्रेट तो है। बता दीजिये, हम सबके काम आयेगा

डॉ नवल: छोटी-छोटी बातें हैं, जैसे - सुबह अमृत वेला में उठकर ध्यान करना, शाकाहारी भोजन, सात्विक विचार, सरल जीवन शैली, आदि। आत्मोन्नति के लिये मैं आत्मनिरीक्षण को महत्वपूर्ण मानता हूँ। छठी कक्षा में मैंने डायरी लिखना शुरू कर दिया था। अब अनियमित है लेकिन दीर्घकाल तक आत्मनिरीक्षण के उद्देश्य से नियमित लिखता रहा। देश-काल के अनुसार विभिन्न समाज नैतिकता की परिभाषा, उसके पैमाने अलग-अलग तय करते हैं, लेकिन कुछ मूलभूत सूत्र सदा समान रहते हैं। महात्माओं ने हमें इतने सुंदर कालजयी, सार्वभौमिक सिद्धांत दिये हैं। गांधीजी ने आत्मवृत्त, सत्य, परीक्षण, और परिष्कार की बात की है। गोस्वामी तुलसीदास ने "दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान" कहकर एक सरल दोहे में जीवन दर्शन हमारे सामने रख दिया है।


अनुराग शर्मा: अच्छी-बुरी बातें हम सभी पढ़ते-सुनते-देखते हैं। बहुत कुछ समझते हैं, फिर भी सबका व्यक्तित्व अलग-अलग होता है। कैसे सीखें? पढ़ने और डायरी लिखने के अतिरिक्त अन्य सुझाव?

डॉ नवल: अनुराग भाई, इच्छा, सामर्थ्य, देश, काल, संस्कार, परिवेश, शिक्षा, नैतिकता की परिभाषा, आदि सभी की अपनी-अपनी भूमिका है। जीवन में शांति की कामना सबका ध्येय है। कोई डिस्को जा रहा है और कोई कीर्तन करने, लेकिन उस संगीत के माध्यम से दोनों ही आनंद की खोज में हैं। सचेत रहें, जैसे जाति-भाषा-क्षेत्र आदि पर आधारित खराब चुटकुले, स्त्रियों से सम्बंधित मज़ाक आदि से सायास दूरी रखना अच्छी बात है।

मेरे जीवन में हिंसा, मांसाहार, सुरापान आदि से बचना एक अच्छी आदत रही। योग, अनुशासन हर किसी के लिये लाभप्रद हैं। घर-परिवार में रमना अच्छा है। साथ बैठकर खाना, बातचीत करना। तन-मन भी ठीक रहता है।

अपने जैसे विचार वाले मित्र बनाना, उनसे मिलते रहना, अपनी समीक्षा में उनकी सहायता लेना, एक दूसरे की सहायता करना जैसे साधन तो हम सब अपना सकते हैं। स्वयं को सुधारें, दूसरों का सम्मान करें। जीवन में एक और सिद्धांत अपनाया जा सकता है, उपदेश देने के बजाय सहायता दे, दिग्दर्शन करें - Teach, don't preach।


अनुराग शर्मा: मैंने तो इतनी सी बातचीत में ही काफ़ी कुछ सीख लिया। क्या आप जीवनशैली भी 'टीच' करते हैं?

डॉ नवल: अमेरिका में धनंजय कुमार की संस्था Renew में हैपिनैस पर चर्चा में बुलाया गया हूँ, इनसा के हू एम आई कार्यक्रम में विचार रखे हैं, रोटरी क्लब में आनंद पर बात की है। एपीजे स्कूल में मुझे बच्चों से एथिक्स पर बात करने के लिये बुलाया गया। मैंने कहा कि इस विषय पर बच्चों से पहले मैं अभिभावकों से बात करना चाहूंगा। वह दिन और आज का दिन - छह साल से हर साल नये सैशन में अभिभावकों को सम्बोधित करता हूँ।


अनुराग शर्मा: एक व्यक्ति जिसने आपकी सोच को इस दिशा में ढाला हो?

डॉ नवल: दरियागंज दिल्ली का 'जैन हायर सेकेंडरी' स्कूल - पंडित धर्मभानु सुकुमार जी मेरे हिंदी के शिक्षक थे। प्रधानाचार्य भी उनके पाँव छूते थे तो हम बच्चों को आश्चर्य होता था। इंग्लिश के शिक्षक की अनुपस्थिति में अंग्रेज़ी की कक्षा भी उसी प्रवीणता से लेते थे जैसे हिंदी की। स्कूल की साहित्य सभा 'वाणी परिषद' के संचालक थे। उनसे जीवन में बहुत कुछ मिला। उन्होंने मेरे जीवन में आशा, चिंतन-मनन, स्वाध्याय, और लेखन की प्रवृत्तियों का विकास किया। लेखन विधिवत होने लगा। मैंने डायरी लिखना आरम्भ किया, एक पत्रिका में निरंतर छपने लगा। पहले मुझे गुस्सा जल्दी आ जाता था। उनसे योगाभ्यास सीखा, मन निर्मल हुआ और जीवन आनंदमय हो गया।


अनुराग शर्मा: सुकुमार जी को प्रणाम। उन्होंने आपको दिशा दी और आपने न जाने कितने अन्य जन को। योग, अध्यात्म आदि को सामान्यतः संसार से विमुख करने वाला माना जाता है। इसने आपको संसार से विमुख तो नहीं किया?

डॉ नवल: नहीं, योग ने शुचिता दी। कोई संसार को मिथ्या कहे लेकिन जीवन मेरे सामने सत्य है। हमारा अस्तित्व इसी संसार में है, उससे विमुखता कैसी? वह तो युगधर्म से मिसमैच होगा। मैंने टीवी पर विशुद्ध धन कमाने के लिये काम किया। लेकिन जीवन भर यह सदा ध्यान रहा कि जितना चाहिये, उतना कमाएँ, और अञ्जस से कमाएँ - कभी ग़लत न करें। कमलेश्वर - मेरे टीवी गुरु - ने कहा कि यहाँ पैसा बहुत है, यश नहीं, प्रेमचंद, अमृतलाल नागर, सभी साहित्य में वापस चले आये क्योंकि यश सर्वोपरि है।


अनुराग शर्मा: जीवन में शुचिता अपनाने के कारण कभी कोई बाधा सामने आयी?

डॉ नवल: आयीं तो, लेकिन उनका सामना किया। एक अवसर इसलिये गया क्योंकि उसके अधिकारी को भोजन में चिकन और सुरापान की अपेक्षा थी। एक अन्य स्थान पर न पीने पर कठिन स्थिति आयी तो कहना पड़ा कि एक दुखद कारण से मैं आज के दिन नहीं पीता।


अनुराग शर्मा: देश-विदेश में शिक्षण, युवा ज्ञानपीठ सहित अनेक पुरस्कार और सम्मान, प्रिंट, रेडियो, टीवी में महत्वपूर्ण कार्य, विश्व हिंदी सम्मेलन की संयोजक समिति सहित अनेक संस्थानों में सहभागिता, डेढ़-दो हज़ार से अधिक रचनाएँ, अपनी तीस पुस्तकों सहित 90 पुस्तकों में उपस्थिति के साथ हिंदी तो एक तरह से आपकी पहचान ही है। हिंदी से इतर कौन सा विषय आपका प्रिय है? उसके बारे में कुछ बताइये।

डॉ नवल: पत्रकारिता भी है, लेकिन वह तो हिंदी में ही मानी जा सकती है। एक विषय के रूप में थ्येटर, रंगमंच मेरा विषय है। मैंने रंगमंच पर शोध किया है, मोहन राकेश के नाटकों पर कार्य किया है, मंचन भी। विशाल भारद्वाज, इम्तियाज़ अली, वाणी त्रिपाठी, अर्जुन रामपाल मेरे शिष्य रहे हैं। अर्जुन रामपाल बहुत गम्भीर थे। आशीष विद्यार्थी का एडमिशन मैंने किया था। आज भी याद है उसने एक निराश छात्र का अभिनय कितनी खूबसूरती से किया था।


अनुराग शर्मा: किसी एक विशेष घटना के बारे में बताइये

डॉ नवल: एक बार कॉलेज के एक समारोह में पंडित रविशंकर मुख्य अतिथि के रूप में आने वाले थे। आयोजन से पहले विशाल भारद्वाज रोज़ मेरे पास आकर एक स्वागत गीत लिखने का अनुरोध करता था, और मैं टाल देता था। फिर एक दिन वह मेरे पास आया, एक कागज़ देकर बोला, "सर गीत मैंने लिख दिया है, आप इसे पूरा कर दीजिये।" मैंने देखा तो कागज़ पर दो शब्द दोहराये गये थे - 'स्वागत नमन, स्वागत नमन'। हम दोनों ही हँसने लगे। उसकी लगन और उत्साह देखकर मैंने स्वागत गीत लिखा, उसने संगीत दिया और रेखा बंसल (जो आज रेखा भारद्वाज हैं), देवासेन गुप्ता आदि ने उसे गाया। इन लोगों ने उसके लिये डिस्क बनवाई और बोस सिस्टम की व्यवस्था की। समारोह के दिन रविशंकर जी ने जैसे ही सदन में प्रवेश किया शानदार संगीत के साथ स्वागतगान बजने लगा। वे वहीं रुक गये और बोले, "यह गीत चलने तक हम अंदर नहीं जायेंगे।" फिर विशाल और मेरे बीच सीढ़ी चढ़ते हुये उन्होंने गीत की प्रशंसा की तो विशाल ने कहा, "सर ने लिखा है।" मैंने कहा, "जो आपने सुना, वह इसका संगीत है।" और फिर रविशंकर जी ने हम दोनों की पीठ पर हाथ रखकर कहा, "बड़प्पन क्या होता है? अब मैं इसे पहचान गया। इसने कम्पोज़ किया लेकिन वह बताने के बजाय बताया कि गुरुजी ने लिखा है। आपने अपनी बात कहने के बजाय बताया कि विशाल ने कम्पोज़ किया है।"

और मंच से रविशंकर जी ने विशाल भारद्वाज को इंगित करते हुए कहा कि यदि यह बालक ऐसी ही विनम्रता रखेगा, और यही लगन रहेगी, तो बड़ा संगीतकार बनेगा ... और ऐसा ही हुआ। आज वह विख्यात है।

याद आया कि विशाल भारद्वाज का प्रेम प्रसंग तब रेखा से चल रहा था। स्वागतगान में उसने आग्रह से एक पद रेखा के लिये भी लिखवाया था।


अनुराग शर्मा: एक अच्छा गुरु अपने छात्रों के जीवन को अनेक प्रकार से प्रभावित करता है। छात्रों की सफलता गुरु की निष्ठा की कसौटी भी होती है। कुछ नया, जो आपने वहाँ किया?

डॉ नवल: कॉलेज में नाटक रंगमंच की दो बड़ी संस्थाएँ थीं, एक हिंदी नाट्य संस्था, इब्तिदा और दूसरी अंग्रेज़ी की 'इंगलिश ड्रामेटिक सोसायटी'। दोनों संस्थाओं में हिंदी और संस्कृत ऑनर्स के विद्यार्थी प्रायः नही लिये जाते थे, क्योंकि उनमें कम आत्मविश्वास होता था, जिसका कारण उनकी धनहीन आर्थिक स्थिति थी। इस पर मैंने रंग निर्देशक अरविंद गौड़ के मार्गदर्शन में हिंदी और संस्कृत के विद्यार्थियों के लिये 'अभिरंग नाट्य संस्था' निर्मित की जिसने विश्वविद्यालय में अपना विशेष स्थान बनाया जो आज भी है।


अनुराग शर्मा: अल्पायु में ही पिता का वरदहस्त आपके ऊपर से हट गया। जिस बीमारी के नाम से कँपकँपी छूटती है, आपने सफलतापूर्वक उस कैंसर का सामना किया है। साहित्य की लगभग सभी विधाएँ, पत्रकारिता, सम्पादन, रंगमंच, रेडियो, टीवी, सिनेमा, आदि विविध माध्यम, इन सब में इतने लम्बे समय तक उत्कृष्ट कार्य किया, सम्मान पाये, पहचान बनाई; आचार्य द्विवेदी से परसाई जी और फिर सभी समकालीन विभूतियों के प्रियपात्र रहे। मैं आपसे पूछने वाला था कि क्या यह सब चमत्कार है या एक डिवाइन प्लैन - यह सब कैसे होता है। लेकिन अब तक की वार्ता के बाद इस प्रश्न की आवश्यकता मुझे नहीं लगती। तो भी सेतु के पाठकों के हित में इतना अवश्य जानना चाहूंगा कि कैंसर के बारे में कैसे पता लगा और फिर उस मोड़ के बाद की एक अलग सी यात्रा आपने कैसे पूरी की?

डॉ नवल: सन 2012 में एक कंधा उतर गया, कुछ समय बाद दूसरा भी। बेटी के पास अमेरिका आना था तो सूटकेस भी उठाये नहीं जा रहे थे। सामान्य जाँचों में कुछ भी पता नहीं चला, कोई असामान्यता नहीं मिली। बाद में जब तक पता चला, कैंसर मेरुदण्ड तक पहुँच चुका था, तंत्रिकाएँ भी प्रभावित हो चुकी थीं। सर्जरी ही एकमात्र समाधान था। रीढ़ की हड्डी का कुछ भाग काटकर टाइटेनियम बार लगायी और फिर रेडियो थेरेपी की। जीवन की सम्भावना नहीं थी किंतु दृढ़ इच्छाशक्ति और पूर्व-नियंत्रित जीवनशैली ने बचा लिया।

2014 में सर्जरी के बाद तो चलने जैसी सामान्य प्रक्रिया भी फिर से सीखनी पड़ी। एक बार मेरे मन में आया कि मैं तो सब कुछ सही करता रहा। सभी व्यसनों से मुक्त अनुशासित जीवन जीता था, फिर ऐसा क्यों हुआ। डॉक्टर से कहा तो उन्होंने मेरी रिकवरी की गति पर ध्यान दिलाकर कहा कि उसी अनुशासन के कारण ही सब फिर से अच्छा हुआ है।

कवि मित्र हर्षवर्धन अस्पताल में मिलने आये, उनकी पत्नी रोने लगीं। मैंने हर्ष से कोई कविता सुनाने को कहा तो वे कुछ गिद्ध, पहाड़, रेगिस्तान की कविता सुनाने लगे। मैंने कहा, भाई तुम्हारा नाम शोकवर्धन नहीं हर्षवर्धन है, कुछ अच्छा सुनाओ। सब हँसे, और माहौल खुशनुमा हुआ।


अनुराग शर्मा: अति प्रेरक। बताने के लिये आभार! अन्य लोगों के लिये कोई सलाह?

डॉ नवल: मैं सबको कहता हूँ कि 40 वर्ष के बाद सभी पुरुषों को स्वास्थ्य जाँच में अपना पीएसए लेवल अवश्य चैक कराना चाहिये जिससे प्रोस्टेट केंसर का समय रहते पता लग जाये।


अनुराग शर्मा: जी, बहुत उपयोगी सलाह है। आपने भारत के अतिरिक्त 47 देश देखे हैं। भारतवंशियों के भी, तथा अन्य भी। इन सभी यात्राओं में किस देश की किस बात ने आपको प्रभावित किया? सबसे अच्छा कौन सा देश लगा?

डॉ नवल: हर देश की अपनी पहचान सी दिखी। उदाहरण के लिये वियेतनाम में विपन्नता बहुत थी, बुज़ुर्ग दिखते ही नहीं थे। स्विट्ज़रलैण्ड के अलावा मॉरिशस और ट्रिनिडाड जैसे देशों में भी प्राकृतिक सौंदर्य बिखरा हुआ है। जापान में अनुशासन है। लेकिन एक देश जो इन सबसे अच्छा लगा वह है संयुक्त राज्य अमेरिका। प्राचीन इतिहास और पूर्वाग्रहों से रहित, एकदम नया देश। यदि मूलनिवासियों को छोड़ दें तो हर कोई बाहर से आया हुआ। नृजाति का वैश्विक वैविध्य, नियम-पालन और अनुशासन होते हुए भी पूर्ण व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सचमुच अनुकरणीय है। स्कूल में एक पाठ पढ़ा था - रूल्स ऑफ़ द रोड, सब कुछ वैसा ही - बहुत सुंदर देश है।


अनुराग शर्मा: बहुत बढ़िया। आपने देशों की विशेषताएँ बताईं। आप गगनांचल के सम्पादक हैं, इससे पहले भी अन्य अनेक पत्रिकाओं से जुड़े रहे हैं। लगे हाथ एक अच्छे सम्पादक की विशेषताएँ भी बता दीजिये।

डॉ नवल: मैंने सरिता-मुक्ता में समीक्षा का कार्य किया है। माया समूह, इंडिया टुडे से भी जुड़ा रहा हूँ। हर पत्रिका का एक स्वर होता है। पत्रिका के स्वर की रक्षा सम्पादक का धर्म है। सम्पादक का अपना भी एक वाद हो सकता है। अच्छा सम्पादक भले ही किसी वाद में विश्वास रखता हो उसे अपना मत अपने पत्र पत्रिका, या पाठकों पर थोपना नहीं चाहिये। अपनी पत्रिका में खुद छा जाने के प्रलोभन से बचना चाहिये। अनुशासित हों, सतर्क रहें। अपने सहयोगियों पर पूरा विश्वास रखते हुये भी यथासम्भव स्वयं पढ़ने, जाँचने की आदत बनाये रखें। प्रूफ़ की शुद्धता से अधिक महत्व भाव का है, वह पिछड़ना नहीं चाहिये।

सम्पादकीय टीम के साथ-साथ लेखकगण किसी भी पत्र-पत्रिका के महत्वपूर्ण स्तम्भ हैं। सम्पादक को ध्यान रहे कि पत्रिका मेरे कारण नहीं, लेखकों के कारण है। पत्रिका का यश-अपयश लेखकों सहित पूरी टीम दिलाती है।

जैसे हम परिवार में वार्ता या पठन-पाठन करते हैं, वैसी ही स्वीकार्यता पत्रिका की हो सके यह सम्पादक का प्रयास होना चाहिये। इसके लिये पत्रिका की भाषा, प्रस्तुति आदि में शालीनता का विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता है। अपशब्द न हों, संतुलन बना रहे। कुछ साहित्यकार अति-संवेदनशील होते हैं। इसलिये सम्पादक सुसंस्कृत और विनम्र भी हो, धैर्य भी चाहिये। धैर्य, औदार्य, संतुलन, और अनुशासन एक अच्छे सम्पादक के अनिवार्य गुण हैं।

अनुराग शर्मा: जी। आपके प्रिय सम्पादक कौन हैं?

डॉ नवल: महावीर प्रसाद द्विवेदी और धर्मवीर भारती मेरे प्रिय सम्पादक रहे हैं। उसने कहा था को सामने लाने में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

धर्मवीर भारती का उदाहरण लें तो वे अपने आप को पीछे रखकर लेखकों को पूर्ण प्रोत्साहन देते थे। अपनी रचनाएँ तो दूर, सम्पादकीय भी कम ही देते थे। प्रकाशित सामग्री में सम्पूर्ण संतुलन बनाकर रखते थे। धर्मयुग में भाषा की शालीनता, सर्व-स्वीकार्यता, विविध विधाओं का समन्वय, सभी कुछ था।


अनुराग शर्मा: धर्मयुग, कहें तो साहित्य का एक सम्पूर्ण युग - इस युग का अवसान कैसे हो गया?

डॉ नवल: मार्शल मैक्लुहन ने कहा था, "The world is a global village." पहले हम सब नागरिक थे, और फिर ग्राहक में परिवर्तित हो गये। समय के साथ नैतिक आधार धरातल पर आ गये और जिन प्रवृत्तियों को पहले निकृष्ट समझा जाता था उनके प्रति समाज सहिष्णु होता चला गया। जब सम्पादकों का स्थान ब्रांड मैनजर्स लेंगे तब लाभ न होने की स्थिति में कोई पत्रिका क्यों चलायेगा? टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह हो या हिंदुस्तान टाइम्स, परिस्थितियाँ सब जगह एक सी थीं।


अनुराग शर्मा: धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, सारिका आदि के जाने से उत्पन्न हुये शून्य को क्या गगनांचल द्वारा भरा जा सकता है।

डॉ नवल: प्रयास चल रहे हैं। गगनांचल सभी दूतावासों, सांस्कृतिक केंद्रों आदि में पहुँचती है। आपको पता ही है, अभी उत्तर अमेरिका विषेशांक आया है। लेकिन उसके अतिरिक्त हिंदी में छोटी-बड़ी अनेक पत्रिकाएँ मौजूद हैं। साहित्य अमृत, नया ज्ञानोदय, पाखी, हंस, आदि तो हैं ही, सरिता, मुक्ता, इंडिया टुडे आदि भी अपनी उपस्थिति बनाये हुए हैं।


अनुराग शर्मा: पिछले कुछ समय से मैथिली, भोजपुरी आदि को हिंदी से अलग दर्जा दिये जाने की बहसें आरम्भ हो गयी हैं। इस विषय में आपका क्या विचार है? क्या उर्दू एक अलग भाषा है?

डॉ नवल: यदि अवधी, ब्रज, मैथिली, भोजपुरी आदि को हिंदी से अलग कर दिया जाये तो करते-करते कहाँ तक जायेंगे? हिंदी तो फिर केवल अमीर खुसरो की हिंदवी रह जायेगी। हिंदी भाषा का सारा इतिहास ही असत्य हो जायेगा। हिंदी और उर्दू में भी मात्र लिपि का अंतर है। भाषा के लिहाज़ से वे भी एकरूप हैं। भाषाएँ तोड़ने का नहीं जोड़ने का माध्यम हैं, वे तत्सम से तद्भव की ओर चलती हैं। ये दीवारें उठाना संकीर्णता है। ऐसा अंतर करना ग़लत है।


अनुराग शर्मा: क्या आपको लगता है कि हिंदी साहित्य में प्रामाणिकता पर संस्कृत या अंग्रेज़ी और अन्य विदेशी भाषाओं जैसा ज़ोर नहीं दिया जाता है?

डॉ नवल: काव्य सत्य का अपना महत्व है, पोएटिक ट्रुथ संसार भर के साहित्य में उपस्थित है। हिंदी भी अपवाद नहीं। नाटक, कविता, कहानी, पेंटिंग, कोई उदाहरण लीजिये, कलाकार और साहित्यकार एक आभासी संसार का सृजन करते हैं। चांद सा मुखड़ा हो या खंजन नयन, उपमाओं का अपना सौंदर्य है। साहित्य की भाषा तर्क की नहीं, बल्कि भाव की भाषा है।


अनुराग शर्मा: हिंदी वाले कहते हैं कि मुंशी प्रेमचंद जैसा लेखक भारत में नहीं हुआ। जबकि प्रेमचंद का हिंदी साहित्य तो दूर सामान्य उर्दूभाषी पाकिस्तानी को मुंशी नवाबराय के उर्दू लेखन की खबर भी नहीं है। उनके अनुसार अल्लामा इक़बाल जैसा साहित्यकार संसार में नहीं हुआ। सत्य यह है कि कवींद्र रवींद्र के बाद भारतीय साहित्य में अब तक कोई नोबल नहीं मिला, ऐसा क्यों?

डॉ नवल: मेरे दादाजी दस्तगीर पत्रिका निकालते थे जिसमें मुंशी नवाबराय छपते थे। लेकिन अब पाकिस्तान की क्या कहें, मुंशी नवाबराय को तो भारत के वर्तमान उर्दू जगत में भी वह स्थान नहीं मिलता जिसके वे हक़दार हैं।

हिंदी में विश्व स्तर के साहित्यकारों की कमी नहीं है। निराला को ही लीजिये। अज्ञेय का तो नोबल के लिये नामांकन भी हुआ था ऐसा सुनते हैं, लेकिन पुरस्कार नहीं मिला। पुरस्कार के अपने फ़ॉर्मूले हैं, निंदा-स्तुति, ऑड-मॉड का संतुलन बिठाना सरल कहाँ है।


अनुराग शर्मा: मंटो, और इब्ने इंशा जैसे लेखक स्वतंत्र, धर्म-निरपेक्ष, वैविध्यपूर्ण भारत छोड़कर इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान चले गये। कुछ साहित्यकार वहाँ जाकर निराश हुये, वापस भी आये। भारतीय साहित्यकार वहाँ पढ़े-पढ़ाये नहीं जाते, लेकिन भारत में मंटो का बोलबाला है।

डॉ नवल: एक ओर कट्टरता और संकीर्णता है तो दूसरी ओर लचीलापन और संतुलन। हम लोग लचीले हैं। एक आम हिंदू पंडित का मज़ाक उड़ा लेगा, लेकिन किसी पादरी या मौलाना का नही, यह लिहाज़ हमारे समाज का अंग है। भारतीय संस्कृति के मूल में उदारता है।


अनुराग शर्मा: अंतिम प्रश्न, लिखना पढ़ना कम होता दिख रहा है। क्या पुस्तक का अंत निकट है?

डॉ नवल: मुझे ऐसी चिंता नहीं है। संसार का मूल ज्ञान अभी भी पुस्तकों में है। बच्चों को उपहार में पुस्तकें मिलती हैं। शिक्षा संस्थानों में पुस्तकें प्रयुक्त हो रही हैं। लिखा हुआ अक्षर क्षर नहीं होगा।


अनुराग शर्मा: हरीश जी, लगा ही नहीं जैसे मैं आपसे पहले कभी मिला नहीं हूँ, या पहले हमारी बात नहीं हुई थी। बल्कि आपके कितने ही अनुभवों में छोटा ही सही अपना रिफ़्लेक्शन भी दिखा, आपका कैनवस बेशक़ कहीं अधिक विस्तृत रहा है। इतनी वार्ता में भी आपको तो जाना ही, जीवन और व्यवहार के बारे में भी बहुत कुछ समझा और सीखा। आपके समय और आत्मीयता के लिये आभार।

डॉ नवल: हृदय से आभार आपको जानने का अवसर मिला, आपकी प्रतिभा को सलाम।

5 comments :

  1. हरीश जी को मेरा सादर प्रणाम। हम जैसों के लिए इतना सुंदर एवं प्रेरणादायी साक्षात्कार प्रस्तुत करने के लिए आपका धन्यवाद,अनुराग जी। बहुत कुछ सीखने को मिला।

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  2. प्रख्यात साहित्यकार डॉ. हरीश नवलजी को
    श्रद्धा व आदर सहित
    कोटि शत कोटि प्रणाम
    सभी का अपना फ़साना है
    सभी का अपना तराना है
    जो गीत ज़िंदगी बदल सके
    वही सच्चा अफ़साना है ~
    " हर पत्रिका का एक स्वर होता है। पत्रिका के स्वर की रक्षा सम्पादक का धर्म है। सम्पादक का अपना भी एक वाद हो सकता है। अच्छा सम्पादक भले ही किसी वाद में विश्वास रखता हो उसे अपना मत अपने पत्र पत्रिका, या पाठकों पर थोपना नहीं चाहिये। अपनी पत्रिका में खुद छा जाने के प्रलोभन से बचना चाहिये। अनुशासित हों, सतर्क रहें। अपने सहयोगियों पर पूरा विश्वास रखते हुये भी यथासम्भव स्वयं पढ़ने, जाँचने की आदत बनाये रखें। प्रूफ़ की शुद्धता से अधिक महत्व भाव का है, वह पिछड़ना नहीं चाहिये।"

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  3. आपके सवालों में गज़ब की विविधता और गंभीरता थी; आपके जवाबों में दिल छू लेने वाली उदारता. आप दोनों को इस साक्षात्कार के लिये धन्यवाद.

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  4. बहुत सुंदर साक्षात्कार। प्रश्न और उत्तर दोनों ने दिशा दी। आदरणीय सर की जीवन शैली प्रेरणा देती है।
    आपको बधाई!

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  5. सुंदर,प्रभावी व ज़मीन से जुड़ी बातों का पढ़ना अच्छा लगा | प्रसन्नता है ,गए वर्ष नवल जी से मिलने का सुअवसर प्राप्त हुआ | मंच पर केवल परिचय भर ,पढ़कर बहुत कुछ जाना,समझने का प्रयास | एक स्तर पर पहुंचने के उपरांत ज़मीन से जुड़ीं शख़्सियत को जानना सुखद  | डॉ. नवल व अनुराग जी को सुंदर साक्षात्कार हेतु बधाई | 
    प्रणव भारती    

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