पुस्तक समीक्षा: देशी चश्मे से लंदन डायरी (शिखा वार्ष्णेय) - संगीता स्वरूप

समीक्षक: संगीता स्वरूप

देशी चश्मे से लंदन डायरी

लेखिका - शिखा वार्ष्णेय
प्रकाशक - समय साक्ष्य, देहरादून
आईएसबीएन - 978-93-88165-18-1
मूल्य - ₹ 200.00


'देशी चश्मे से लंदन डायरी' यह पुस्तक और इसकी लेखिका शिखा वार्ष्णेय किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। शिखा वार्ष्णेय ने ब्लॉग जगत में भी अच्छा खासा नाम कमाया है। जहाँ तक मैं जानती हूँ इन्हें कविताओं से बेहद लगाव है और घुमक्कड़ी की शौकीन हैं तो जहाँ भी जाती है वहाँ का विस्तृत ब्योरा अपने लेखन में उतार देती हैं। इस पुस्तक से पहले इनकी दो पुस्तकें आ चुकी हैं एक काव्य संग्रह 'मन के प्रतिबिम्ब' और दूसरी यात्रा वृतांत के रूप में 'स्मृतियों में रूस'।

देशी चश्मे से लंदन डायरी किताब किस विधा के अंतर्गत आती है ये तो मैं नहीं बता पाऊंगी लेकिन इसमें वो सारे लेख संकलित हैं जो लेखिका ने बीते समय में समाचार पत्र के एक कॉलम 'लंदन डायरी' के लिए लिखे थे । उस समय अलग-अलग समय में लेखों को पढ़ना एक अलग अनुभव था आज उन लेखों का संकलित रूप पुस्तक के रूप में पढ़ना भिन्न अनुभव दे रहा है।

यूँ तो लेखिका लंदन वासी हैं, लेकिन भारतीय मूल की होने के कारण इन लेखों में लंदन की बात होते हुए भी कहीं न कहीं नज़रिया भारतीय ही रहा और इसी कारण इस किताब का शीर्षक 'देशी चश्मे से लंदन डायरी' सटीक लगता है।

संगीता स्वरूप
इस किताब में कुल 63 लेख शामिल हैं। इन लेखों के माध्यम से लेखिका ने लंदन की व्यवस्था, राजनीति, रहन-सहन, संस्कृति, मौसम आदि की झलक दिखलाई है। इन लेखों को पढ़ते हुए आश्चर्य होता है कि कैसे दैनिक जीवन में होने वाली छोटी-छोटी बातों को आत्मसात करते हुए लेखिका महत्त्वपूर्ण जानकारी देती चलती है और साथ ही एक जागरूक और ज़िम्मेदार नागरिक की तरह मन में उठने वाले प्रश्न या संशय भी सामने रखती हैं। हर लेख एक अलग विषय लिए पाठक के सामने प्रस्तुत होता है।

प्रत्येक लेख में जो भी विषय चुना गया है उसे यूँ ही सहज सपाट नहीं लिख दिया गया है, वरन बहुत ही मर्यादित व्यंग्य भाषा का प्रयोग किया है। कई लेख ऐसे हैं जिनमें बिल्कुल अंत में ही पता चल पाया कि आखिर लेखिका की कलम चली किस विषय पर है, जैसे 'हिंदी गीतों का दौर'। पुराने हिंदी फिल्मी गीतों के बोलों की तरफ जब वहाँ बच्चों का ध्यान जाता है और वो उन गानों को पसंद करते हैं तो लेखिका के मन में प्रश्न उठता है कि ऐसे सुमधुर गीत अब क्यों नहीं हैं, और जोड़ देती हैं इस बात से कि हिंदी के प्रोत्साहन के लिए लंदन में जितने भी प्रयास होते हैं उनमें वहाँ के बच्चे बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं, हिंदी का सम्मान करते हैं, तो ऐसा सम्मान अपने देश भारत में क्यों नहीं।

'पुरानी साख और गौरव पूर्ण इतिहास' लिखते हुए आज के समय को राजे-रजवाड़ों से जोड़ते हुए मंदी की मार सहते इंग्लैंड में वहाँ की रानी की हीरक जयंती को मनाना कहीं न कहीं लेखिका को कचोटता है। इस लेख में उनके मन की छटपटाहट साफ दिखाई देती है। अपने मन में उठने वाले भावों को चुटीले व्यंग्य के साथ इंगित किया है, "माँएँ अपने नवजात बच्चों को लिए रानी के दुर्लभ दर्शनों के लिए घंटों सड़क पर खड़ी इंतज़ार कर रही थीं ... बच्चों को कार से हिलता एक हाथ दिखाई दिया और कुछ बड़े बच्चों को चेहरे की एक झलक भी मिल गयी, बस हो गया जनता का रानी का गौरवपूर्ण दर्शन समारोह।" जनता पर अतिरिक्त कर का बोझ डाल इस तरह के दिखावे को लेखिका उचित नहीं मानती हैं।

इन लेखों के माध्यम से वहाँ की अनेक व्यवस्थाओं के बारे में नई जानकारी मिलती है। भले ही वहाँ की आर्थिक या शैक्षिक नीतियाँ हो, वहाँ मनाए जाने वाले त्योहार हों या फिर सामाजिक कार्य। फ़ॉस्टर केयर की क्या व्यवस्था होती है और इनसे क्या लाभ और हानि हो सकती है इसकी जानकारी 'घर बन पाते हैं फोस्टर केयर' में मिलती है। भारत में तो नानी- दादी ही बच्चों की देखभाल कर लेती हैं लेकिन वहाँ नानी की उम्र ज्यादा हो गयी तो उनसे बच्चे को लेकर फोस्टर केयर में डाल दिया गया।

'अनुभव का शहर' से जानकारी मिलती है कि बच्चों को आगे आने वाले जीवन में अस्पताल, बैंक, पोस्ट ऑफिस, पुलिस स्टेशन आदि में किस तरह काम होता है इस सबका अनुभव कराने के लिए सिटी किडज़ानिया नाम का प्ले स्टोर खोला है। लेखिका की दृष्टि में यह एक बहुत सकारात्मक पहल है जहाँ बच्चे ज़िन्दगी की सच्चाई से रूबरू होते हैं।

'अंकों के खेल' में भारत में आज दसवीं और बारहवीं कक्षा में जो 100% लाने की होड़ है और न आने पर अवसाद में आत्महत्या कर लेने की प्रवृत्ति। लेकिन इंग्लैंड में बच्चे की जैसी क्षमता हो उसी तरह उसको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाता है। बहुत अहम मुद्दे पर शिखा की लेखनी चली है।

सांस्कृतिक दृष्टि से देखा जाए तो कई लेखों में विभिन्न त्योहारों का ज़िक्र किया है। मई दिवस, थेम्स के तट से, लंदन में एशियाई त्योहार, क्रिसमस तब और अब आदि में वहाँ किस तरह सारे त्योहारों का आनंद लिया जाता है बहुत सुंदरता से और विस्तृत वर्णन किया है।

यूँ तो हर लेख ही अच्छी जानकारी से युक्त है लेकिन कुछ लेख खास आकर्षित करते हैं जैसे 'पुस्तकालय ऐसे भी', में स्कूल बस का महत्त्व, समान पाठ्यक्रम, अपराधों को रोकने की पहल, हार्न संस्कृति, चुनावी प्रक्रिया आदि। हार्न संस्कृति में बिना वजह के शोर पर व्यंग्य है तो इसके प्रारम्भिक इतिहास पर भी लेखिका की अपनी ही खोज है जो बहुत रोचक बन पड़ी है। ऐसे ही चुनावी प्रक्रिया ऐसा लेख है जिसमें भारत और इंग्लैंड के चुनावों की तुलना की गई है। इस तुलना का सच ही आनंद लेना है तो स्वयं ही इन लेखों को पढ़ना पड़ेगा।

'बाबा' लेख से इंगित किया गया कि भारत में ही बाबा लोगों का प्रचलन नहीं है वहाँ भी ऐसे बाबा पाए जाते हैं।

शिखा के लेखों को पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है कि वो अप्रत्यक्ष रूप से उन लोगों से प्रश्न कर रही हैं जो विदेशों की प्रशंसा में अपने देश भारत की निंदा करना शुरू कर देते हैं। यह विचार 'लोमड़ी का आतंक' पढ़ते हुए आया। वहाँ पर लोमड़ी को एक हानिरहित जीव माना जाता है इसलिए उससे निपटने की कोई व्यवस्था नहीं है। लेकिन लेखिका की नज़रों में लोमड़ी का कितना आतंक है वो आप लेख पढ़ कर ही जान पाएंगे। लेख के अंत में एक मासूम से प्रश्न कि भारत में बेचारे गाय, बैलों का क्या कसूर जो सड़क पर यूँ ही आवारा घूमते हैं। इसका तात्पर्य यह नहीं कि वे इसे सही बता रही हैं बस एक जिज्ञासा मात्र है उन लोगों से जो गाय, बैलों के सड़क पर घूमने के कारण देश की निंदा करते हैं।

कुल मिला कर ये सारे लेख केवल इंग्लैंड के लिए ही नहीं बल्कि भारत के लिए भी एक नया दृष्टिकोण देते हैं। यह पुस्तक इंग्लैंड के बारे में घर बैठे काफी जानकारी देती है। इन लेखों को पढ़ते हुए लगता है कि लेखिका का दिल भारत में बसा है या यह कहना ज़्यादा सही होगा कि भारत शिखा के दिल में बसता है।

भाषा सहज और सरल है। चुटीली और व्यंग्यात्मक भाषा से सभी लेख रोचक बन पड़े हैं। कहीं भी भाषा की दुरूहता नहीं दिखती। किसी भी लेख में नीरसता महसूस नहीं होती। पुस्तक का आकार-प्रकार भी आकर्षित करने वाला है। छपाई भी स्पष्ट है। इसके लिए प्रकाशक बधाई के पात्र हैं। पुस्तक का कवर पेज भी मनमोहक बन पड़ा है। कलाकार शीतल माहेश्वरी को हार्दिक बधाई। कहीं कहीं वर्तनी की अशुद्धि खटकती है। एक ही सुझाव है कि सम्पादन पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए था।

शिखा को इस पुस्तक के लिए मैं हार्दिक बधाई देती हूँ और आने वाले समय में और पुस्तकें प्रकाशित हों ऐसी कामना करती हूँ।

पाठकों से निवेदन है कि पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें यानी पहले ये पुस्तक पढ़ें फिर मेरे लिखे पर विश्वास करें।

संगीता स्वरूप (sangeetaswarup@gmail.com)
एम॰ ए॰ (अर्थशास्त्र), पूर्व शिक्षिका
प्रकाशित पुस्तकें - उजाला आसमां (काव्य संग्रह), टूटते सितारों की उड़ान (साझा काव्य संग्रह), अनमोल संचयन, शब्दों के अरण्य में, अरुणिमा।

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