विद्यालय - चरित्र निर्माण का पोषक

डॉ. डोरी लाल

- डोरी लाल

सहायक प्रोफेसर, आइ.ए.एस.इ., शिक्षा संकाय,
जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली


प्रस्तावना
जीवन के तीसरे वर्ष से ही बालक के चरित्र निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। चरित्र उत्तराधिकार में नहीं मिलता, हम सभी अपने माता-पिता से कुछ व्यावहारिक तो बात सीख सकते हैं, किन्तु चरित्र अपना स्वयं बनाते हैं। प्रत्येक बालक दूसरे से भिन्न है, सबकी अपनी-अपनी क्षमतायें, परिस्थितियां और सीखने की योग्यतायें हैं। इन परिस्थितियों में जो कुछ भी वे देखते हैं या सुनते हैं, उसी को वे परस्पर सीखने का प्रयास करने की चेष्टा करते हैं, परन्तु वह सभी कुछ ग्रहण करने योग्य नहीं होता। वह सब इतना पेंचीदा होता है कि उसे उसी रूप में ग्रहण करना भी सम्भव नहीं होता। ग्रहण करने से पूर्व उन तात्कालिक परिस्थितियों में उन्हें आंकलन कर फैसला लेना होता है, कि उनके लिए क्या सही है और क्या गलत। यही निर्णय बच्चे को आत्मनिर्णय का अधिकार देता है। कवि-आलोचक मैथ्यू आर्नल्ड यह मानते है कि "जीवन का तीन-चौथाई आधार अच्छा चाल-चलन हैं।" अच्छे चाल-चलन का अभिप्राय यही है कि हम अपने कार्य एवं व्यवहार दोनों में नैतिक हों। अच्छे चालचलन हमारी वे आदतें हैं, जिन्हें हम अपने परिवार, परिवेश और विद्यालय के माध्यम से विकसित करते हैं। परिवार बालक की प्रथम पाठशाला है, जहाँ पर वह अपने माता-पिता से शिक्षित एवं संस्कारित होता है। परिवार एवं आस-पड़ोस का वातावरण उस पर अपना प्रभाव डालता हैं, इस प्रकार चरित्र का प्रारम्भिक निर्माण बहुत कुछ परिवार की सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। लेकिन इतिहास में ऐसे उदाहरणों की भी कमी नहीं है, कि सामाजिक रूप से पिछड़ें, अशिक्षित या अर्ध-शिक्षित या आर्थिक स्थिति से हीन परिवार भी मूल्यपरक आचरण में आस्था रखते हैं और बड़े से बड़े प्रलोभन भी उन्हें सद्मार्ग से विचलित नहीं कर पाये। चरित्र जो मूल्य के रूप में परिलक्षित होता है, का संबंध हमारी आत्मा से है। अगर किसी चीज़ पर हमारा दृढ़ विश्वास हो, उसकी सत्यता पर संदेह न हो, तो उसके लिए हम बड़े से बड़ा त्याग या बलिदान हेतु सहर्ष तैयार हो जाते हैं। नैतिकता हमारे आचरण का वह मूल्य है, जो हमें न्याय और सच्चाई के सद्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता रहता है। हमारा नैतिक आचरण समाज को सद्पथ पर चलने की प्रेरणा देता है तथा स्वयं को आत्मसंतोष। इसके विपरीत अनैतिक आचरण हमें भय और चिन्ता से ग्रस्त रखता है। मन विचलित और अशान्त रहता है, क्योंकि सत्य से परे आचरण के पर्दाफाश होने का डर मन में सदैव बना रहता है। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि जब व्यक्ति नैतिक, सत्य और न्याय का पक्षधर होगा तब समाज के लिए उसके नैतिक मूल्य प्रेरक एवं विकासोन्मुख होंगे।

शैक्षिक सन्दर्भ में छात्रों का चारित्रिक पतन, उनमें बढ़ती हुई अनुशासनहीनता आज की प्रमुख समस्यायें हैं । शिक्षा जगत् की इन समस्याओं ने समाज के हर वर्ग को न्यूनाधिक रूप से प्रभावित किया है। कुछ विचारक मानते हैं कि छात्रों को माध्यमिक एवं उच्च शैक्षिक स्तर पर भी मूल्य शिक्षा देना आवश्यक है, जिससे विद्यार्थियों में चरित्र निर्माण की प्रक्रिया अनवरत चलती रहे। अच्छे चरित्र का आधार मूल्य है और किसी भी प्रकार की शिक्षा-व्यवस्था मूल्यविहीन नहीं हो सकती है। गांधीजी की शिक्षा प्रक्रिया का अंतिम लक्ष्य चरित्र निर्माण ही है। शिक्षा प्रक्रिया के माध्यम से चरित्र निर्माण की प्रक्रिया के प्रति गांधी जी कितने आग्रही थे, इस बात से पता हमें उनके इस कथन से चलता है कि- "सच्चरित्रता के अभाव में केवल बौद्धिक ज्ञान सुगन्धित शव के समान है।" स्वामी परमहंस का मत था कि- "आप चरित्रवान बनो, जगत् अपने आप मुग्ध हो जायेगा।" चरित्र के संबंध में स्वामीजी का यह विचार बहुत ही व्यापक है। राजनैतिक, सामाजिक, व्यावसायिक और प्रशासनिक आदि क्षेत्रों में हम जो मूल्यात्मक हृास देख रहे हैं, उसका मुख्य कारण उस क्षेत्र में चरित्रवान व्यक्तियों का अभाव ही है। निकृष्ट स्वार्थ इतने पैर पसार चुका है कि चरित्रवान व्यक्ति को सनकी या मूर्ख की संज्ञा देने में हम नहीं हिचकते। अपने चारित्रिक कमज़ोरी पर हम यह कहकर पर्दा डालते हैं कि "अब सब चलता है" या "यही कामकाज का तरीका है"। हम बुराई और भ्रष्टाचार के साथ जीने और उसे सहने के आदी होते जा रहे हैं और अगर यही हाल रहा, तो इसकी भारी कीमत हमें अपने साथ-साथ हमारे समाज को भी चुकानी पड़ेगी। सी. राजगोपालचारी का विश्वास था कि- "किसी राष्ट्र का विकास उसके विद्यार्थियों के चरित्र निर्माण से ही सम्भव है।" भारतीय संस्कृति का मूल स्वर है- भोग करो, किन्तु त्याग के साथ। कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा सामाजिक चरित्र ऐसा हो कि हम सारे सुखों का भोग करते हुए भी अपनी नैतिकता को कायम रखें। त्याज्य वही व्यक्ति कहलाता जो दूसरों को बिना आघात पहुँचाये अपने हित की रक्षा करता है। उसे इस मूल सिद्धांत पर अटूट विश्वास होता है कि सब के सुख में ही उसका सुख निहित है। उसके इस विश्वास की उपज नैतिकता ही है, जो उसके आचरण को समाज के हित में नियन्त्रित करती है। नैतिकता-विहीन शिक्षा अपूर्ण व अनप्रयुक्त है और ऐसी शिक्षा चरित्रवान समाज का निर्माण कदापि नहीं कर सकती।

चरित्र का सम्प्रत्यय एवं अर्थ
‘चरित्र’ शब्द व्यक्ति तथा समाज के सन्दर्भ में परिवर्तनशील, अनिश्चित और सापेक्षिक रहा है। ‘चरित्र’ शब्द संस्कृत भाषा के ‘चर्’ और ‘इत्र’ शब्दों का समागम है। ‘चर्’ एक धातु है जिसका अर्थ है- चलना, इधर-उधर करना, अभ्यास और व्यवहार करना, तथा ‘इत्र’ का अर्थ है- इस संसार में। इस प्रकार चरित्र का अर्थ इस संसार में होने वाला व्यवहार है। चरित्र का प्रयोग मानवीय सन्दर्भ में ही होता है, इस प्रकार चरित्र, पशु-व्यवहार न होकर केवल मानवीय व्यवहार ही है। चरित्र का अर्थ देश, काल और परिस्थित के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है और होता भी है, परन्तु इसका सामान्य सम्प्रत्यय निःसन्देह इस संसार से सम्बन्धित मानवीय व्यवहार से ही है। मानव-व्यवहार की कुछ विशिष्टताएँ होती हैं, जो पशु-व्यवहार में नहीं पायी जाती। मानव जो भी व्यवहार करता है, उसमें उसकी बुद्धि, भावना, संयमशीलता और समायोजन हेतु प्रयत्नशीलता पायी जाती है। इन विशिष्टताओं का प्रकटीकरण जब मनुष्य करता है, तो उसका व्यवहार ‘चरित्र’ कहलाता है। इन विशिष्टताओं से युक्त व्यवहार को अंग्रेजी भाषा में ‘कैरेक्टर’ कहा जाता है, जो चरित्र का सम्बोधक है। ‘कैरेक्टर’ शब्द का अर्थ अंग्रेज़ी शब्दकोश के अनुसार- "विशिष्ट गुणों का योग, जो व्यक्ति या राष्ट्रीय वैयक्तिकता का निर्माण करता है।" अतः चरित्र, व्यक्ति के निजी या विशिष्ट गुणों का योग मात्र है, जो उसके अपने निजी तथा सामाजिक जीवन के विभिन्न क्रियाकलापों में अभिव्यक्त होता है। मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में चरित्र के समान शब्द व्यक्तित्व या ‘पर्सनेल्टी’ है। प्रो. जे. एफ. डेशियल ने बताया है कि "किसी मनुष्य का व्यक्तित्व उसके संगठित व्यवहार का सम्पूर्ण चित्र होता है। आलपोर्ट महोदय ने व्यक्तित्व को "गत्यात्मक संगठन" से निरूपित किया है। इसी प्रकार प्रो. एल. पी. थोर्प ने व्यक्तित्व को "सम्पूर्ण व्यक्ति के आवयविक क्रियाशीलता" का समानार्थी बताया है। इन कथनों से मानव-व्यक्तित्व एवं मानव-चरित्र में पर्याप्त समीपता पाई जाती है। व्यक्तित्व मानव विशिष्टताओं का योग है और ये विशिष्टताएँ जब मानव व्यवहार में प्रकट होती है तब मानव-चरित्र या ‘केरेक्टर’ का निर्माण होता है।

चरित्र निर्माण का उद्देश्य
शिक्षाशास्त्रियों का एक वर्ग ने ज्ञान तथा संस्कृति के उद्देश्यों पर बल देता है तो दुसरा ने इस बात का समर्थन करता है कि शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य बालक के चरित्र निमार्ण होना चाहिये। जिन विद्वानों ने शिक्षा में बालक के चरित्र पर बल दिया है उनमें से जर्मनी के प्रसिद्ध दार्शनिक एवं शिक्षाशास्त्री हरबर्ट का नाम विशेष उलेखनीय है। उनका विचार है कि बालक जन्म से ही सदाचारी नहीं होता। उस समय उसकी प्रवृतियां अनियंत्रित होती है जिनके वशीभूत होकर वह अनैतिक आचरण करता रहता है। बालक का नैतिक विकास करने के लिए उसकी इन अनियंत्रित प्रवृतियों का परिमार्जन करना परम आवश्यक है। चरित्र विकास के बारे में हरबार्ट का मत है कि बालक के चरित्र के विकास में उसकी रुचियों को देखकर हम कह सकते हैं कि उसका चरित्र कैसा है। ध्यान देने की बात है कि बालक के विचारों तथा उसके आचरण में गहरा सम्बन्ध होता है। सामान्यतः बालक के आचरण का निर्माण उसकी रुचियों के अनुसार होता है और रुचियों का निर्माण उसके विचारों के अनुरूप। यदि बालक के विचार शुद्ध होंगे तो उसके आचरण भी शुद्ध होंगे। अतः हरबार्ट ने बालक की रुचियों और विचारों को पवित्र बनाकर उसका नैतिक विकास करने के लिए शिक्षा को एक महत्वपूर्ण साधन माना है। उसका विचार है कि शिक्षा का कार्य यह है कि वह बालकों के सम्मुख उच्च विचारों तथा आदर्शों को प्रस्तुत करे जिससे उनके ज्ञान की वृद्धि हो। ज्ञान सदाचार की कुंजी है। ज्ञान प्राप्त करने से बालक की चिन्तन, मनन तथा विवेक आदि शक्तियों का विकास होता है। इन शक्तियों के विकसित होने से वह अच्छे और बुरे आचरणों में अन्तर समझने लगता है। इसके विपरीत यदि बालक के ज्ञान में वृद्धि नहीं की जायेगी तो उसका मानसिक विकास कुण्ठित हो जायेगा और वह मूर्ख बन जायेगा। फलस्वरूप वह ऐसे घृणित तथा आवांछनीय कार्यों को भी कर बैठेगा जिनसे समाज में अव्यवस्था उत्पन्न होने का भय हो।

चरित्र निर्माण और शिक्षक
महान मनोवैज्ञानिक प्रो. ई. एच. वाटसन का कहना था कि "मुझे किसी बालक को दे दो, मैं उसे परिवेश/पर्यावरण के प्रभाव से वो बना दूँगा जो आप चहाते हैं।" विद्यालय, समाज के परिवेश का प्रभाव बालक के चेतन और अचेतन दोनों मन पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पड़ता है। कबिरा संगत साधु की हरै और की व्याधि, संगत बुरी असाधु की आठों पहर उपाधि’- सुक्ति भी इस ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास करती है कि जिन लोगों से हम घिरे है अथवा जिस परिवेश में हम रहते है, उसका सीधा संबंध हमारे चरित्र निर्माण की प्रक्रिया से है। विद्यालयी क्रियाकलाप विद्यार्थियों को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से मूल्य शिक्षा देने का कार्य करते रहते हैं। मूल्य परक शिक्षा देना जनतन्त्रिय विद्यालय के सबसे महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों में से एक है। कहा भी जाता है कि उपदेश की अपेक्षा सिखाने वाले का आचरण अधिक प्रभावी तथा श्रेयस्कर होता है। अध्यापक केवल उपदेशों और प्रवचनों द्वारा मूल्य-शिक्षा प्रदान करके अपने छात्रों का चरित्र निर्माण नहीं कर सकता। अपितु छात्र उसके विषयी ज्ञान के साथ उसके दैनिक व्यवहार और आचरण को देखते हैै और उनका अनुकरण करने का प्रयास करते हैं। बच्चों में अनुकरण की प्रवृति बहुत प्रबल होती है। अध्यापक का वार्तालाप करना, आत्मानुशान, आचरण, लेखन व भाषण शैली, हाव-भाव, वेश-भूषा, चाल-ढाल, समास्या समाधान करने का तरीका आदि सभी गतिविधियों का वे अनुकरण करते हैं। यदि अध्यापक खुलेआम अवांछनीय एवं अशोभिनीय व्यवहार करता है तो वह विद्याथियों को कैसे मना कर सकता है। अधिकांश विद्यार्थी अपने अध्यापक जैसा पढ़ने, उच्चारण करने, भाषण देने, अभिनय करने, लिखने आदि का प्रयास करते हैं। अध्यापक का व्यवहार और आचरण उन्हें प्रभावित किए बिना रह नहीं रहता। अतः अध्यापकों को विद्याथियों के समक्ष वैसा ही आचरण करना चाहिए, जैसा वह उन्हें सीखाना चाहते हैं। उसके उपदेश तो एक कान से सुनकर दूसरे कान से बाहर निकाले जा सकते हैं, परन्तु उसके आचरण और व्यवहार की अमिट छाप विद्याथियों पर पड़ेगी। इसीलिए कहा जाता है कि उपदेश की अपेक्षा आचरण अधिक प्रभावी होता है।

चरित्र निर्माण का पाठ्यक्रम
चरित्र निर्माण एक प्रक्रिया है जो ताउम्र नियमित रूप से अनवरत चलती है। माना जाता है कि इसका कोई पूर्व निर्धारित पाठ्यक्रम नहीं हो सकता। वह तो अध्यापक की योग्यता और कार्य कुशलता पर निर्भर होता है। सुयोग्य अध्यापक जानता है कि छात्रों का चरित्रोन्मुख बनाने के लिए उसे क्या और कब करना है। वह उनके लिए ऐसे वातावरण, परिवेश और परिस्थितियों का निर्माण करता हैं, जिनमें छात्रों के सम्मुख कुछ कसौठियाँ आती हैं, जिनके द्वारा छात्रों की चारित्रिक परीक्षा होती हैं। अगर इस प्रक्रिया में कहीं कोई विद्यार्थी चूकता है तो अध्यापक उसे संभालता है, और उस मार्ग पर जाने से बचाकर सही रास्ते पर लाता हैं। अतएव साधारणतः अध्यापक जानता है कि मूल्य-शिक्षा का वास्तविक पाठ्यक्रम क्या होना चाहिए, परन्तु फिर भी अध्यापकों के लिए मूल्य-शिक्षा का एक सामान्य पाठ्यक्रम हो तो उसमें कोई गुरेज़ नहीं होगा। कहने की आवश्यकता नहीं कि उस पाठ्यक्रम में मानवता के कल्याण के लिए जो भी आवश्यक गुण अपेक्षित हैं, उनका समावेश होगा। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का भाव उसमें प्रमुखता से होना चाहिए। प्रश्न यह उठता है कि बालकों में नैतिक गुणों को विकसित करने के लिए कौन-कौन से स्कूली विषयों का अध्ययन कराया जाये। इस पर आजतक मत भेद है। कुछ विद्वान् एक विषय को महत्त्व देते हैं तो कुछ दूसरे को। कुछ चरित्र को सुधारने के लिए नियमित धर्म उपदेश तथा सदुपदेश पर बल देते हैं तो कुछ का मानना है कि कोरे धर्म उपदेशों से ही बालकों के नैतिक जीवन को सुधारना तथा उनके चरित्र का निर्माण करना असम्भव है। यदि यह भी मान लिया जाये कि धर्म उपदेशों तथा सद् उपदेशों के द्वारा ही बालकों के नैतिक चरित्र का निर्माण किया जा सकता है तो फिर यह निश्चित करना कठिन हैं कि धर्म-उपदेश किस ढंग से तथा कितनी समयाविधि के लिए दिये जायें। हरबर्ट महोदय ने चरित्र निर्माण के लिए शिक्षा पाठ्यक्रम के विषय पर चर्चा करते हुए लिखा है कि पाठ्यक्रम के अन्तर्गत केवल उन विषयों को प्रमुखतः मिलनी चाहिये, जो नैतिक तथा धार्मिक विचारों से भरे हुए हों। इस दृष्टि से उसने इतिहास तथा साहित्य की शिक्षा पर विशेष बल दिया है। उसका विश्वास है कि इन विषयों के अध्ययन से बालकों में सत्य, साहस तथा सहानभूति आदि नैतिक गुणों तथा उच्च आदर्शों का विकास किया जा सकता है। अतः शिक्षकों को चाहिये कि वे बालकों की रूचि इतिहास तथा साहित्य के अध्ययन की ओर अग्रसर करें, जिससे वे सदाचारी तथा सचरित्र व्यक्ति बन सकें।

चरित्र निर्माण और विद्यालय
शिक्षक का प्रमुख कार्य छात्रों के ज्ञान में वृद्धि कर उनमें जीवन जीने की कुशलता पैदा करना। परन्तु आजकल शिक्षक का कार्य केवल परीक्षा विषयक ज्ञान अथवा जानकारी तक सीमित माना जाता है। वास्तव में केवल परीक्षा विषयक जानकारी और कुछ इधर-उधर की सामान्य ज्ञान की बातें कर देने से ही छात्र को समाज के लिए उपयोगी नहीं बनाया जा सकता। उसे पूर्ण मानव बनाने और उसके व्यक्तित्व विकास के लिए उसे मूल्य शिक्षा देना और उसका चरित्र निर्माण करना अध्यापक का महत्वपूर्ण कर्तव्य है। मनुष्य जीवन में चरित्र का महत्व सर्वाधिक है। एक अनुवादित अंग्रेजी कहावत है- यदि धन चला गया तो कुछ भी नहीं गया, यदि स्वास्थ्य चला गया तो कुछ हानि अवश्य हुई, परन्तु यदि चरित्र चला गया, तो सब कुछ नष्ट हो गया। धन तो पुनः अर्जित किया जा सकता है। स्वास्थ्य भी प्रयास करने पर सुधारा जा सकता है। परन्तु चरित्र भ्रष्ट हो जाने पर मनुष्य की मनुष्यता ही चली जाती है। अतः छात्रों के चरित्र का निर्माण करना और उसकी रक्षा करना सिखाना अध्यापक का मुख्य कार्य है। इसमें उसे किसी प्रकार का प्रमाद नहीं करना चाहिए, अवश्य ही बच्चों के चरित्र निर्माण का कार्य माता-पिता के सहयोग पर निर्भर होता है।

यहां मैं वॉलीबुड अभिनेता आशुतोष राणा की एक पोस्ट जो उन्होने फेसबुक सोशल मीडिया पर अपने पूज्य पिताजी के जन्मदिवस पर संस्मण के रूप में साझा की थी, का जिक्र करना चाहूंगा - "बात सत्तर के दशक की है जब बेहतर शिक्षा के लिए उनका दाखिला तीन भाइयों के साथ मध्य प्रदेश के महाकौशल अंचल में क्राइस्टचर्च उस समय अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में करा दिया गया था। उनके पिता उन्हें हॉस्टल छोड़, अगले इतवार को पुनः मिलने का आश्वासन दे कर वापस घर चले गए। इतवार की सुबह से ही पिता के आने से की खुशी से वे आह्लादित थे, यह जीवन के पहले सात दिन थे जब वे माँ बाबूजी के बिना अपने घर से बाहर रहे। दोपहर 3:30 बजे एक जीप विद्यालय प्रागण में रुकी। माँ -बाबूजी जीप से उतरे, वे सब दौड़ कर उनसे मिलना चाह रहे थे परन्तु मिल नहीं सकते थे क्योंकि यह स्कूल के नियमों के खिलाफ था, सो मीटिंग हॉल में जैसे सैनिक विश्राम की मुद्रा में अलर्ट खड़ा रहता है एक लाइन में तीनों भाई खड़े माँ बाबूजी का अपने पास पहुँचने का इंतजार करने लगे, जैसे ही माँ बाबूजी हमारे करीब आए, हम तीनों भाइयों ने सम्मिलित स्वर में अपनी जगह पर खड़े खड़े गुड इवनिंग मम्मी, गुड इवनिंग बाबूजी कहा। शब्द सुनकर बाबूजी हल्का सा चौंके फिर तुरंत ही उनके चहरे पर हल्की स्मित आई जिसमें बेहद लाड़ था मैं समझ गया कि वे प्रभावित हो चुके हैं। मैं जो माँ से लिपटा ही रहता था माँ के करीब नहीं जा रहा था ताकि उन्हें पता चले की मैं इंडिपेंडेंट हो गया हूँ … माँ ने अपनी स्नेहसिक्त मुस्कान से मुझे छुआ। मैं माँ से लिपटना चाहता था किंतु जगह पर खड़े खड़े मुस्कुराकर अपने आत्मनिर्भर होने का उन्हें सबूत दिया। माँ ने बाबूजी को देखा और मुस्कुरा दीं, मैं समझ गया की ये प्रभावित हो गईं हैं। माँ, बाबूजी, भाईजी और हम तीन भाई हॉल के एक कोने में बैठ बातें करने लगे हमसे पूरे हफ्ते का विवरण माँगा गया, और 6:30 बजे के लगभग बाबूजी ने हमसे कहा की अपना सामान पैक करो तुम लोगों को घर वापस चलना है वहीं आगे की पढ़ाई वहीं होगी। हमने अचकचा के माँ की तरफ देखा माँ बाबूजी के समर्थन में दिखाई दीं। मैंने घर वापस ले जाने का कारण पूछा ? उन्होंने कहा रानाजी मैं तुम्हें मात्र अच्छा विद्यार्थी नहीं एक अच्छा व्यक्ति बनाना चाहता हूँ। तुम लोगों को यहाँ नया सीखने भेजा था पुराना भूलने नहीं। कोई नया यदि पुराने को भुला दे तो उस नए की शुभता संदेह के दायरे में आ जाती है, हमारे घर में हर छोटा अपने से बड़े परिजन, परिचित, अपरिचित जो भी उसके सम्पर्क में आता है उसके चरण स्पर्श कर अपना सम्मान निवेदित करता है लेकिन देखा की इस नए वातावरण ने मात्र सात दिनों में ही मेरे बच्चों को परिचित छोड़ो अपने माता पिता से ही चरण स्पर्श की जगह गुड इवनिंग कहना सिखा दिया। मैं नहीं कहता की इस अभिवादन में सम्मान नहीं है, किंतु चरण स्पर्श करने में सम्मान होता है यह मैं विश्वास से कह सकता हूँ। विद्या व्यक्ति को संवेदनशील बनाने के लिए होती है संवेदनहीन बनाने के लिए नहीं होती। मैंने देखा तुम अपनी माँ से लिपटना चाहते थे लेकिन तुम दूर ही खड़े रहे, विद्या दूर खड़े व्यक्ति के पास जाने का हुनर देती है नाकि अपने से जुड़े हुए से दूर करने का काम करती है। आज मुझे विद्यालय और स्कूल का अंतर समझ आया, व्यक्ति को जो शिक्षा दे वह विद्यालय जो उसे सिर्फ साक्षर बनाए वह स्कूल, मैं नहीं चाहता की मेरे बच्चे सिर्फ साक्षर हो के डिग्रियों के बोझ से दब जाएँ, मैं अपने बच्चों को शिक्षित कर दर्द को समझने उसके बोझ को हल्का करने की महारथ देना चाहता हूँ। मैंने तुम्हें अंग्रेजी भाषा सीखने के लिए भेजा था आत्मीय भाव भूलने के लिए नहीं। संवेदनहीन साक्षर होने से कहीं अच्छा संवेदनशील निरक्षर होना है। इसलिए बिस्तर बाँधो और घर चलो। हम तीनों भाई तुरंत माँ बाबूजी के चरणों में गिर गए उन्होंने हमें उठा कर गले से लगा लिया व शुभआशीर्वाद दिया कि किसी और के जैसे नहीं स्वयं के जैसे बनो।"

सार रूप में कह सकते हैं कि माता-पिता प्रायः अपनी संतान के कल्याण, उसका उज्जवल भविष्य बनाने, चरित्रवान और यशस्वी बनाने के लिए उत्सुक एवं तत्पर रहते ही हैं। अध्यापक को ध्यान देना होगा कि अविभावकों ने जिन बच्चों को उन्हें सौंपा है, उन्हें उचित शिक्षा देकर शीलगुण संपन्न बनाए, बिना उनकी वास्तविक पहचान को बदलें। महापुरूषों का जीवन चरित्र पढ़ने से पता चलता है कि उनमें से कुछ अपने माता या पिता से प्रभावित हुए थे परन्तु अधिकांश के निर्माण में उनके अध्यापकों का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। अतः अध्यापक को चाहिए कि अपनी पुरातन सभ्यता, विरासत, संस्कृति, आचरण, आचार-विचार आदि का सम्मान करते हुए चरित्र निर्माण हेतु छात्रों की योग्ताओं को तराशें उनमें अपेक्षित परिवर्तन भी करें।

निष्कर्ष
शिक्षा वह है जो मानव को उसके शरीर, मन, मस्तिष्क तथा आत्मा में सामांजस्य करना सिखाये तथा उसे जीवन के लिए इस प्रकार तैयार करे कि वह प्रकृति द्वारा प्रदत्त साधनों का उचित एवं संयमित उपयोग कर अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए किसी पर भार न बने तथा सफल नागरिक के रूप में अपने और दूसरों के अधिकतम लाभ के लिए अपनी समस्त शक्तियों का उचित ढंग से प्रयोग कर सके। यही नहीं, वर्तमान में शिक्षा का यह भी कार्य है कि वह मानव को जातीयता, प्रान्तीयता, लिंगभेद तथा राष्ट्रीयता आदि भावनाओं पर आधारित वर्ग भेदों से ऊँचा उठाकर उसमें अपने राष्ट्र तथा अपनी संस्कृति के प्रति प्रेम की भावनाओं को विकसित करे। जिससे वह विश्व नागरिक के रूप में विश्व के सभी समूह, धर्म, समाज में एक साथ समझदारी के साथ रह सके। भारत एक भौगोलिक इकाई है और यहाँ के नागरिकों में अनेकता में एकता की भावना रची बसी है। हमारी संस्कृति समन्वयात्मक है। सहिष्णुता उसकी प्रमुख विशेषता है। ऐसी स्पृहणीय संस्कृति के हम वाहक है, यह हमारे लिये गौरव की बात है। इसकी रक्षा एवं इसका विकास हम नैतिकता पर आधारित चरित्र से ही कर सकते है। अतः शिक्षा के लिये हम ऐसा पाठ्यक्रम तैयार करें, जिसका जोर मूल्य पर हो और वह गौरवमयी संस्कृति को उत्तरोत्तर विकसित करने में सक्षम हो। भारत ने आजादी की लड़ाई अहिंसा, असहयोग, सत्याग्रह और सत्य को साधन बनाकर जीती है। आज भी भारत अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में अनेक दबावों के होते हुए भी शान्ति स्थापना का प्रयास कर रहा है। भारत सह अस्तित्व के सिद्धान्त पर अटल है तथा आर्थिक क्षेत्र में सभी देशों के सहयोग का आकांक्षी है। हमारे इस दृष्टिकोण का मुख्य कारण यही है कि भौतिक समृद्धि के लिए प्रयत्नशील होते हुए भी भारतवासी वसुधैव कुटुम्बकम और आध्यात्मिकता की भावना से अनुप्राणित रहते है। पाठ्यक्रम की हमारी पुस्तकों में आध्यात्मिक विचारधारा को अगर उचित स्थान दिया जायेगा, तो हमारा चरित्र सशक्त होगा।

संदर्भ सूची  
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* http://hi.vikaspedia.in/education/education-best-practices

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